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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

तृतीय उद्योतः ४८७
ध्वन्यालोकः
ब्देनार्थं प्रकाशयितुं समीहते कदाचित्स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रयोजना-
पेक्षया कयाचित् । स तु द्विविधोऽपि प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न
लिङ्गितया स्वरूपेण प्रकाशते, अपि तु कृत्रिमेणाकृत्रिमेण वा सम्बन्धा-
न्तरेण । विवक्षाविषयत्वं हि तस्यार्थस्य शब्दैर्लिङ्गितया प्रतीयते न तु
स्वरूपम् । यदि हि लिङ्गितया तत्र शब्दानां व्यापारः स्यात्तच्छब्दार्थे
सम्यङ् मिथ्यात्वादि विवादा एव न प्रवर्तेरन् धूमादिलिङ्गानुमितानु-
मेयान्तरवत् । व्यङ्ग्यश्चार्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्ततया वाच्यवच्छब्दस्य
सम्बन्धी भवत्येव । साक्षादसाक्षाद्भावो हि सम्बन्धस्याप्रयोजकः ।
वाच्यवाचकभावाश्रयत्वं च व्यञ्जकत्वस्य प्रागेव दर्शितम् । तस्माद्वक्तृ-
भिप्रायरूप एव व्यङ्ग्ये लिङ्गतया शब्दानां व्यापारः । तद्विषयीकृते तु
प्रतिपाद्यतया । प्रतीयमाने तस्मिन्नभिप्रायरूपेऽनभिप्रायरूपे च वाचकत्वे
नैव व्यापारः सम्बन्धान्तरेण वा । न तावद्वाचकत्वेन यथोक्तं प्राक् ।
अर्थ का प्रतिपादन करना चाहता है, कभी प्रयोजन की किसी अपेक्षा से अपने शब्द
के अनभिधेय रूप से । वह दोनों प्रकार का भी शब्दों का प्रतिपाद्य विषय लिङ्गी (अनु-
मेय) रूप से स्वरूपतः प्रकाशित नहीं होता, अपि तु कृत्रिम अथवा अकृत्रिम
सम्बन्धान्तर से । शब्दों से इस अर्थ का विवक्षाविषयत्व लिङ्गी (अनुमेय) रूप से
प्रतीत होता है न कि (अर्थ का) स्वरूप नहीं (प्रतीत होता) । यदि वहाँ शब्दों
का व्यापार लिङ्गी रूप से हो तो धूम आदि लिङ्ग से अनुमित अन्य अनुमेय की
भाँति शब्द के अर्थ में 'सम्यक् है या मिथ्या है' ऐसे विवाद ही न हों और व्यङ्ग्य
अर्थ वाच्य के सामर्थ्य से आक्षिप्त होने के कारण वाच्य की भाँति शब्द का सम्बन्धी
होता ही है, क्योंकि साक्षात् और असाक्षाद् भाव सम्बन्ध का प्रयोजक नहीं है ।
और व्यञ्जकत्व का वाच्यवाचक भावाश्रयत्व पहले ही दिखाया जा चुका है । इसलिए
वक्ता के अभिप्राय रूप ही व्यङ्ग्य में लिङ्ग रूप से शब्दों का व्यापार होता है और
उसके द्वारा विषयीकृत (अर्थ) में प्रतिपाद्य रूप से । अभिप्राय रूप और अनभिप्राय
रूप उस प्रतीयमान में वाचकत्व से ही व्यापार होगा अथवा सम्बन्धान्तर से ?
वाचकत्व से तो नहीं होगा जैसा कि पहले कह चुके हैं । सम्बन्धान्तर से, व्यञ्जकत्व
लोचनम्
कयाचिदिति । गोपनकृतसौन्दर्यादिलाभाभिसन्धानादिकयेत्यर्थः । शब्दार्थ
गोपनकृत सौन्दर्यादिलाभ के अभिसन्धान आदि अपेक्षा से । शब्द के अर्थ में—। भाव

४८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
सम्बन्धान्तरेण व्यञ्जकत्वमेव । न च व्यञ्जकत्वं लिङ्गत्वरूपमेव
आलोकादिष्वन्यथा दृष्टत्वात् । तस्मात्प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न
लिङ्गित्त्वेन सम्बन्धी वाच्यवत् । यो हि लिङ्गित्त्वेन तेषां सम्बन्धी
यथा दर्शितो विषयः स न वाच्यत्वेन प्रतीयते, अपि तूपाधित्वेन ।
प्रतिपाद्यस्य च विषयस्य लिङ्गित्त्वे तद्विषयाणां विप्रतिपत्तीनां लौकि-
कैरेव क्रियमाणानामभावः प्रसज्येतेति । एतच्चोक्तमेव ।
ही है और व्यञ्जकत्व लिङ्गत्व रूप नहीं है, आलोक आदि में अन्यथा देखा जा चुका
है। इसलिए शब्दों का प्रतिपाद्य विषय वाच्य की भाँति ही लिङ्गी रूप से सम्बन्ध
नहीं रखता । जो लिङ्गी रूप से उनका सम्बन्धी है, जैसा विषय दिखाया जा चुका
है, वह वाच्य रूप से प्रतीत नहीं होता, अपि तु उपाधि रूप से । और प्रतिपाद्य विषय
के लिङ्गी होने में उनके सम्बन्ध की लौकिक लोगों द्वारा ही की गई विप्रतिपत्तियों
का अभाव प्रसक्त होगा । इसे कह चुके ही हैं ।
लोचनम्
इति । अनुमानं हि निश्चयस्वरूपमेवेति भावः । उपाधित्वेनेति । वक्त्रिच्छा हि
वाच्यादेरर्थस्य विशेषणत्वेन भाति । प्रतिपाद्यस्येति । अर्थाद्व्यङ्ग्यस्य । लिङ्गित्त्व
इति । अनुमेयत्व इत्यर्थः । लौकिकैरेवेति । इच्छायां लोको न विप्रतिपद्यतेऽर्थे
तु विप्रतिपत्तिमानेव ।
ननु यदा व्यङ्ग्योऽर्थः प्रतिपन्नस्तदा सत्यत्वनिश्चयोऽस्यानुमानादेव प्रमा-
णान्तरात् क्रियत इति पुनरप्यनुमेय एवासौ । मैवम् ; वाच्यस्यापि हि सत्य-
त्वनिश्चयोऽनुमानादेव । यदाहुः—
'आप्तवादाविसंवादसामान्यादत्र चेदनुमानता' इति ।
यह कि अनुमान निश्चयस्वरूप ही होता है । उपाधिरूप से—। वक्ता की इच्छा
वाच्यादि अर्थ के विशेषण रूप से प्रतीत होती है । प्रतिपाद्य विषय के—। अर्थात्
व्यङ्ग्य के । लिङ्गी होने में—। अर्थात् अनुमेय होने में । लौकिक लोगों द्वारा ही—।
लोग इच्छा में विप्रतिपन्न नहीं होते, परन्तु अर्थ में विप्रतिपत्तिमान् होते ही हैं ।
( शङ्का ) जब व्यंग अर्थ ज्ञात होता है तब उसके सत्यत्व का निश्चय अन्य
प्रमाण अनुमान से ही किया जाता है इसलिए फिर भी वह अनुमेय ही है ( समाधान )
ऐसा नहीं, क्योंकि वाच्य के भी सत्यत्व का निश्चय अनुमान से ही होगा । क्योंकि
कहते हैं—
'यहाँ आप्तवाद के अविसंवाद होने से अनुमानता होगी ।'

तृतीय उद्द्योतः ४८९
ध्वन्यालोकः
यथा च वाच्यविषये प्रमाणान्तरानुगमेन सम्यक्त्वप्रतीतौ क्वचि-
त्क्रियमाणायां तस्य प्रमाणान्तरविषयत्वे सत्यपि न शब्दव्यापार-
विषयताहानिस्तद्व्यङ्ग्यस्यापि । काव्यविषये च व्यङ्ग्यप्रतीतीनां सत्या-
सत्यनिरूपणस्याप्रयोजकत्वमेवेति तत्र प्रमाणान्तरव्यापारपरीक्षोप-
हासायैव सम्पद्यते । तस्माल्लिङ्गिप्रतीतिरेव सर्वत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिरिति न
शक्यते वक्तुम् ।
और जैसे वाच्य के विषय में प्रमाणान्तर के अनुगमन से कहीं पर सम्यक्त्व
की प्रतीति करने पर उसके प्रमाणान्तर का विषय होने पर भी शब्दव्यापार
विषयत्व की हानि नहीं होती उसी प्रकार व्यङ्ग्य की भी । और काव्य के विषय
में व्यङ्ग्य की प्रतीतियों का सत्यासत्यनिरूपण अप्रयोजक ही है, इसलिए वहाँ
प्रमाणान्तर के व्यापार की परीक्षा उपहासास्पद ही होगी । इसलिए लिङ्गी की प्रतीति
ही सर्वत्र व्यङ्ग्य की प्रतीति है यह नहीं कह सकते ।
लोचनम्
न चैतावता वाच्यस्य प्रतीतिरानुमानिकी किं तु तद्गतस्य ततोऽधिकस्य
सत्यत्वस्य तद्व्यङ्ग्येऽपि भविष्यति । एतदाह—यथा चेत्यादिना । एतच्चाभ्युप
गम्योक्तं न त्वनेन नः प्रयोजनमित्याहुः । काव्यविषये चेति । अप्रयोजकत्वमिति ।
न हि तेषां वाक्यानामग्निष्टोमादिवाक्यवत्सत्यार्थप्रतिपादनद्वारेण प्रवर्त्तकत्वाय
प्रामाण्यमन्विष्यते, प्रीतिमात्रपर्यवसायित्वात् । प्रीतेरेव चालौकिकचमत्कार-
रूपाया व्युत्पत्त्यङ्गत्वात् । एतच्चोक्तं वितत्य प्राक् । उपहासायैवेति । नायं
सहृदयः केवलं शुष्कतर्कोपक्रमकर्कशहृदयः प्रतीतिं पराम्रष्टुं नालमित्येष
उपहासः ।
इतने मात्र से वाच्य की प्रतीति अनुमान-प्राप्त नहीं समझी जा सकती, उसे
व्यङ्ग्य मानने पर भी उसके अधिक सत्यत्व की (प्रतीति) हो सकती है । इसे
कहते हैं—और जैसे—। इत्यादि द्वारा । इसे अभ्युपगम करके कहा है इससे हमारा
कोई प्रयोजन नहीं है यह कहते हैं । और काव्य के विषय में—। अप्रयोजक—।
अग्निष्टोमादि वाक्यों (‘अग्निष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’) की भाँति सत्य अर्थ के
प्रतिपादन के द्वारा प्रवृत्त कराने के लिए उन वाक्यों का प्रामाण्य नहीं ढूँढ़ते, क्योंकि
(ये) प्रीति मात्र तक पर्यवसित हो जाते हैं । क्योंकि अलौकिक चमत्कार रूप प्रीति
ही व्युत्पत्ति का अङ्ग है । इसे विस्तारपूर्वक कह चुके हैं । उपहासास्पद ही—। यह
सहृदय नहीं है, केवल शुष्क तर्क के उपक्रम से कर्कश हृदय वाला व्यक्ति है क्योंकि
प्रतीति का परामर्श नहीं कर सकता, यह उपहास है ।

४९० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
यच्चनुमेयरूपव्यङ्ग्यविषयं शब्दानां व्यञ्जकत्वं तद्ध्वनिव्यवहार-
स्याप्रयोजकम् । अपि तु व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दानां व्यापार औत्प-
त्तिकशब्दार्थसम्बन्धवादिनाप्यभ्युपगन्तव्य इति प्रदर्शनार्थमुपन्यस्त-
म् । तद्धि व्यञ्जकत्वं कदाचिल्लिङ्गत्वेन कदाचिद्रूपान्तरेण शब्दानां
वाचकानामवाचकानां च सर्ववादिभिरप्रतिषेध्यमित्ययमस्माभिर्यत्न
जो कि अनुमेय रूप व्यङ्ग्य के विषय वाला शब्दों का व्यञ्जकत्व है, वह ध्वनि
व्यवहार का प्रयोजक नहीं। अपितु शब्दों के व्यञ्जकत्वरूप व्यापार को शब्दार्थ
सम्बन्ध को औत्पत्तिक मानने वाले को भी स्वीकार करना चाहिए, यह दिखाने के
लिए उपन्यस्त किया है। वाचक और अवाचक शब्दों के उस व्यञ्जकत्व को कभी
अनुमान के द्वारा कभी रूपान्तर से सभी वादियों को मानना ही होगा, इसलिए
यह यत्न हमने किया है। तो इस प्रकार गुणवृत्ति, वाचकत्व आदि शब्द के प्रकारों
लोचनम्
नन्वेवं तर्हि मा भूद्यत्र यत्र व्यञ्जकता तत्र तत्रानुमानत्वम्; यत्र यत्रानु-
मानत्वं तत्र तत्र व्यञ्जकत्वमिति कथमपह्नुयत इत्याशङ्कयाह—यच्चनुमेयेति ।
तद्व्यञ्जकत्वं न ध्वनिलक्षणमभिप्रायव्यतिरिक्तविषयाव्यापारादिति भावः ।
नन्वभिप्रायविषयं यद्व्यञ्जकत्वमनुमानैकयोगक्षेमं तच्चेन्न प्रयोजकं ध्वनिव्यव-
हारस्य तर्हि किमर्थं तत्पूर्वमुपक्षिपतमित्याशङ्कयाह—अपि त्विति । एतदेव
संक्षिप्य निरूपयति—तद्धीति । अत एव हि क्वचिदनुमानेनाभिप्राय़ादौ
क्वचित्प्रत्यक्षेण दीपालोकादौ क्वचित्कारणत्वेन गीतध्वन्यादौ क्वचिदभिधया
विवक्षितान्यपरे क्वचिद्गुणवृत्त्या अविवक्षितवाच्येऽनुगृह्यमाणं व्यञ्जकत्वं दृष्टं
इस प्रकार जहाँ-जहाँ व्यंजकता है वहाँ-वहाँ अनुमानता मत हो, किन्तु जहाँ-जहाँ
अनुमानता है वहाँ-वहाँ व्यंजकत्व है इसे कैसे छिपाया जा सकता है, यह आशङ्का करके
कहते हैं—जो कि अनुमेय—। भाव यह कि वह व्यंजकत्व ध्वनिरूप नहीं है, क्योंकि
अभिप्राय से व्यतिरिक्त विषय ( रस अलङ्कार आदि व्यङ्ग्य ) में व्यापार-रहित है।
एकमात्र अनुमान के साथ योगक्षेम वाला जो अभिप्राय के विषय का व्यंजकत्व है वह
यदि ध्वनिव्यवहार का प्रयोजक नहीं है तो उसे पहले कैसे उपन्यस्त किया है ? यह
आशंका करके कहते हैं—अपि तु—। इसे ही संक्षेप में निरूपण करते हैं—उस
व्यंजकत्व को—। जिस कारण कहीं अनुमान से, जैसे अभिप्राय आदि में, कहीं प्रत्यक्ष
से जैसे दीप के आलोक आदि में, कहीं कारण रूप से जैसे गीत ध्वनि आदि में, कहीं
अभिधा से विवक्षितान्यपर से, कहीं गुणवृत्ति जैसे अविवक्षितवाच्य में अनुगृह्यमाण

तृतीय उद्योतः ४९१


ध्वन्यालोकः

आरब्धः। तदेवं गुणवृत्तिवाचकत्वादिभ्यः शब्दप्रकारेभ्यो नियमेनैव
तावद्विलक्षणं व्यञ्जकत्वम्। तदन्तःपातित्वेऽपि तस्य हठादभिधीय-
माने तद्विशेषस्य ध्वनेर्यत्प्रकाशनं विप्रतिपत्तिनिरासाय सहृदयव्युत्पत्तये
वा तत्क्रियमाणमनतिसन्धेयमेव। न हि सामान्यमात्रलक्षणेनोपयोगि-
विशेषलक्षणानां प्रतिक्षेपः शक्यः कर्तुम्। एवं हि सति सत्तामात्रल-
क्षणे कृते सकलसद्वस्तुलक्षणानां पौनरुक्त्यप्रसङ्गः। तदेवम्—
से व्यञ्जकत्व नियमतः ही विलक्षण है। जबर्दस्ती अभिधा में उसे (व्यञ्जकत्व) अन्त-
र्भुक्त करने पर भी उसके विशेष रूप ध्वनि का जो प्रकाशन विप्रतिपत्तियों के निरा-
करण के लिए अथवा सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिए किया जा रहा है उसे अतिसं-
धान नहीं किया जा सकता। सामान्य मात्र के लक्षण कर देने पर उपयोगी विशेष के
लक्षणों का निराकरण नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसा होने पर 'सत्ता' मात्र के
लक्षण कर दिये जाने पर समस्त सद्वस्तुओं का पौनरुक्त प्रसक्त होगा। तो इस प्रकार—

लोचनम्

तत एव तेभ्यः सर्वेभ्यो विलक्षणमस्य रूपं नत्सिध्यति तदाह—तदेवमिति।
ननु प्रसिद्धस्य किमर्थं रूपसंकोचः क्रियते अभिधाव्यापारगुणवृत्त्यादेः।
तस्यैव सामग्र्यन्तरोपनिपाताद्यद्विशिष्टं रूपं तदेव व्यञ्जकत्वमुच्यतामित्याश-
ङ्कयाह—तदन्तःपातित्वेऽपीति। न वयं संज्ञानिवेशनादि निषेधाम इति भावः।
विप्रतिपत्तिस्तादृग्वि शेषो नास्तीति। व्युत्पत्तिः संशयाज्ञाननिरासः। न हीति।
उपयोगिषु विशेषेषु यानि लक्षणानि तेषाम्। उपयोगिपदेनानुपयोगिनां काकद-
न्तादीनां व्युदासः। एवं हीति। त्रिपदार्थसङ्करी सत्तेत्यनेनैव द्रव्यगुणकर्मणां
लक्षितत्वाच्छ्रुतिस्मृत्यायुर्वेदधनुर्वेदप्रभृतीनां सकललोकयात्रोपयोगिनामनारम्भः
व्यंजकत्व देखा गया है इसी कारण इन सभी से इसका विलक्षण रूप हमें सिद्ध होता है,
उसे कहते हैं—तो इस प्रकार—।
प्रसिद्ध अभिधा व्यापार, गुणवृत्ति आदि का रूपसंकोच किसलिए करते हैं, उसी
( अभिधा व्यापार आदि ) का अन्य सामग्री के प्राप्त होने से जो विशिष्ट रूप है वही
व्यंजकत्व कहा जाय, यह आशङ्का करके कहते हैं—अन्तर्भुक्त करने पर भी—। भाव
यह कि हम नाम के प्रवेश आदि का निषेध नहीं करते । विप्रतिपत्ति अर्थात् इस प्रकार
का विशेष ( व्यंजकत्व ) नहीं है ( यह विरुद्ध ज्ञान ) व्युत्पत्ति अर्थात् संशय और
अज्ञान का निराकरण । सामान्य मात्र—। उपयोगी विशेषों में जो लक्षण हैं उनका ।
'उपयोगी' पद से अनुपयोगी काकदन्त आदि का निराकरण है। क्योंकि ऐसा होने
पर—। भाव यह कि 'सत्ता तीन पदार्थों में रहती है। इसी ( लक्षण ) से ही द्रव्य,
गुण, कर्म लक्षित हो जाने पर सकल लोकयात्रा के उपयोगी श्रुति, स्मृति, आयुर्वेद,

४९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
विमतिविषयो य आसीन्मनीषिणां सततमविदितसतत्त्वः ।
ध्वनिसञ्ज्ञितः प्रकारः काव्यस्य व्यञ्जितः सोऽयम् ॥
प्रकारोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्ग्यः काव्यस्य दृश्यते ।
यत्र व्यङ्ग्यान्वये वाच्यचारुत्वं स्यात्प्रकर्षवत् ॥ ३४॥
व्यङ्ग्योऽर्थो ललनालावण्यप्रख्यो यः प्रतिपादितस्तस्य प्राधान्ये
ध्वनिरित्युक्तम् । तस्य तु गुणीभावेन वाच्यचारुत्वप्रकर्षे गुणीभूत-
हमेशा से अविदितस्वरूप होने के कारण जो मनीषी लोगों की विमति का
विषय था, काव्य के ध्वनि नाम के उस इस प्रकार को व्यञ्जित किया गया ।
जहाँ व्यङ्ग्य का सम्बन्ध होने पर वाच्य का चारुत्व प्रकृष्ट होता है, काव्य का
(वहाँ) अन्य प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य देखा जाता है ॥ ३४ ॥
ललना के लावण्य के समान जो व्यङ्ग्य अर्थ प्रतिपादन किया गया है उसके
प्राधान्य में ध्वनि है यह कह चुके हैं । किन्तु उसके गुणीभाव से वाच्य के चारुत्व
लोचनम्
स्यादिति भावः । विमतिविषयत्वे हेतुः-अविदितसतत्त्व इति । अत एवाधुनात्र
न कस्यचिद्विमतिरेतस्मात्क्षणात्प्रभृतीति प्रतिपादयितुम्-आसीत् इत्युक्तम् ॥३३॥
एवं यावद्ध्वनेरात्मीयं रूपं भेदोपभेदसहितं यच्च व्यञ्जकभेदमुखेन रूपं
तत्सर्वं प्रतिपाद्य प्राणभूतं व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावमेकप्रघट्टकेन शिष्यबुद्धौ विनिवे-
शयितुं व्यञ्जकवादस्थानं रचितमिति ध्वनिं प्रति यद्वक्तव्यं तदुक्तमेव । अधुना
तु गुणीभूतोऽप्ययं व्यङ्ग्यः कविवाचः पवित्रयतीत्यमुना द्वारेण तस्यैवात्मत्वं
समर्थयितुमाह-प्रकार इति । व्यङ्ग्येनान्वयो वाच्यस्योपस्कार इत्यर्थः ।
प्रतिपादित इति । 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इत्यत्र । उक्तमिति । 'यत्रार्थः शब्दो
धनुर्वेद प्रभृत्ति शास्त्र बन्द हो जायँगे । विमति का विषय होने में कारण है-अविदित-
स्वरूप-। अतएव अब इस क्षण से इसमें किसी की विमति नहीं है इसे प्रतिपादन
करने के लिए 'था' यह कहा है ॥ ३३ ॥
इस प्रकार जितना ध्वनि का भेदोपभेदसहित स्वरूप है और जो व्यंजक के भेद
के प्रकार से रूप है उन सबको प्रतिपादन करके प्राणभूत व्यङ्ग्यव्यंजक भाव को एक
प्रघट्टक द्वारा शिष्य की बुद्धि में बैठाने के लिए व्यंजकवाद का स्थान बनाया है । इस
प्रकार ध्वनि के प्रति जो कहना चाहिए वह कह ही चुके । अब गुणीभूत भी यह व्यङ्ग्य
कवियों की वाणी को पवित्र करता है, इसलिए इस द्वारा उसी (व्यङ्ग्य) का स्वरूप
समर्थनार्थ कहते हैं-जहाँ व्यङ्ग्य- । व्यङ्ग्य का सम्बन्ध और वाच्य का उपस्कार ।
प्रतिपादन किया गया है-। 'प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इस स्थल में । कह चुके

तृतीय उद्योतः ४९३
ध्वन्यालोकः
व्यङ्ग्यो नाम काव्यप्रभेदः प्रकल्प्यते । तत्र वस्तुमात्रस्य व्यङ्ग्यस्य
तिरस्कृतवाच्येभ्यः प्रतीयमानस्य कदाचिद्वाच्यरूपवाक्यार्थापेक्षया
गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यता ।
यथा—
लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र
यत्रोत्पलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र
यत्रापरे कदलिकाण्डमृणालदण्डाः ॥
का प्रकर्ष होने पर गुणीभूत व्यङ्ग्य नाम का काव्य का प्रभेद कल्पित किया जाता
है। वहाँ तिरस्कृत वाच्य वाले (शब्दों) से प्रतीयमान व्यङ्ग्य का कभी वाच्य रूप
वाक्यार्थ की अपेक्षा गुणीभाव होने पर गुणीभूत व्यङ्ग्यता होती है। जैसे—
यहाँ यह कौन विलक्षण ही लावण्य की नदी है जिसमें चन्द्रमा के साथ कमल तैर
रहे हैं, जिसमें हाथी के कुम्भ का अग्रभाग निकल रहा है और जिसमें विलक्षण ही
कदलीकाण्ड और मृणाल दण्ड हैं।
लोचनम्
वा' इत्यत्रान्तरे व्यङ्ग्यं च वस्त्वावित्रयं तत्र वस्तुनो व्यङ्ग्यस्य ये भेदा
उक्तास्तेषां क्रमेण गुणभावं दर्शयति—तत्रेति । लावण्येति । अभिलापविस्मय-
गर्भेयं कस्यचित्तरुणस्योक्तिः ।
अत्र सिन्धुशब्देन परिपूर्णता, उत्पलशब्देन कटाक्षच्छटाः, शशिशब्देन
वदनं, द्विरदकुम्भतटीशब्देन स्तनयुगलं, कदलिकाण्डशब्देनोरुयुगलं, मृणालद-
ण्डशब्देन दोर्युग्ममिति ध्वन्यते । तत्र चैषां स्वार्थस्य सर्वथानुपपत्तेरन्धशब्दो-
क्तेन न्यायेन तिरस्कृतवाच्यत्वम् । स च प्रतीयमानोऽप्यर्थविशेषः 'अपरैव हि
केयं' इत्युक्तिगर्भकृते वाच्येऽशे चारुत्वच्छायां विधत्ते, वाच्यस्यैव स्वात्मोन्म-
हैं—। 'यत्रार्थः शब्दो वा' इसके प्रसङ्ग में वस्तु आदि तीन व्यङ्ग्य कहे गये हैं।
उनमें वस्तु व्यङ्ग्य के जो भेद कहे गये हैं उनका क्रम से गुणभाव दिखाते हैं—
वहाँ—।—लावण्य—। यह किसी तरुण की अभिलाष और विस्मय से युक्त उक्ति है।
यहाँ 'नदी' शब्द से परिपूर्णता, 'कमल' शब्द से कटाक्ष की छटा, 'शशी' शब्द
से मुख, 'हाथ के कुम्भ का अग्रभाग' शब्द से स्तनयुगल 'कदलीकाण्ड' शब्द से
ऊरुयुगल, 'मृणालदण्ड' शब्द से हस्तयुगल ध्वनित होते हैं और वहाँ इनके स्वार्थ
के सर्वथा अनुपपन्न होने के कारण 'अन्ध' शब्द में कहे गये न्याय के अनुसार
तिरस्कृत वाच्यत्व है। और वह प्रतीयमान (व्यङ्ग्य) भी अर्थविशेष 'यह कौन
विलक्षण ही' इस उक्ति से युक्त वाच्य अंश में चारुत्वच्छाया का विधान करता है,

४९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
अतिरस्कृतवाच्येभ्योऽपि शब्देभ्यः प्रतीयमानस्य व्यङ्ग्यस्य
कदाचिद्वाच्यप्राधान्येन काव्यचारुत्वापेक्षया गुणीभावे सति गुणी-
भूतव्यङ्ग्यता, यथोदाहृतम्-‘अनुरागवती सन्ध्या' इत्येवमादि ।
अतिरस्कृतवाच्य भी शब्दों से प्रतीयमान व्यङ्ग्य की कभी वाच्य के प्राधान्य
से काव्य चारुत्व की अपेक्षा गुणीभाव होने पर गुणीभूत व्यङ्ग्यता होती है, जैसे
उदाहरण दे चुके हैं 'अनुरागवती सन्ध्या' इस प्रकार आदि । उसी (व्यङ्ग्य) का
लोचनम्
जनया निमज्जितव्यङ्ग्यजातस्य सुन्दरत्वेनावभासनात् । सुन्दरत्वं चास्यास-
म्भाव्यमानसङ्गमसकललोकसारभूतकुवलयादिभाववर्गस्यातिसुभगैकाधिकर-
णविश्रान्तिलब्धसमुच्चयरूपतया विस्मयविभावताप्राप्तिपुरस्कारेण व्यङ्ग्यार्थोप-
स्कृतस्य तथा विचित्रस्यैव वाच्यरूपोन्मज्जनेनाभिलाषादिविभावत्वात् । अत
एवेयति यद्यपि वाच्यस्य प्राधान्यं, तथापि रसध्वनौ तस्यापि गुणतेति सर्वस्य
गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य प्रकारे मन्तव्यम् । अत एव ध्वनेरेवात्मत्वमित्युक्तचरं बहुशः ।
अन्ये तु जलक्रीडावतीर्णतरुणीजनलावण्यद्रवसुन्दरीकृतनदीविषयेयमुक्ति-
रिति सहृदयाः, तत्रापि चोक्तप्रकारेणैव योजना । यदि वा नदीसन्निधौ स्नाना-
वतीर्णयुवतिविषया । सर्वथा तावद्विस्मयमुखेनेयति व्यापाराद्गुणताव्यङ्ग्यस्य ।
उदाहृतमिति । एतच्च प्रथमोद्द्योत एव निरूपितम् । अनुरागशब्दस्य चाभिलाषे
तदुपपरक्तत्वलक्षणया लावण्यशब्दवत्प्रवृत्तिरित्त्यभिप्रायेणातिरस्कृतवाच्यत्वमु-
क्योंकि वाच्य के ही स्वरूप के उन्मज्जित होने और व्यङ्ग्यसमूह के निमज्जित होने
से सुन्दर रूप से प्रतीति होती है । सुन्दरत्व इस लिए है कि जिनका समागम सम्भा-
व्यमान नहीं है ऐसे सकललोक के सारभूत कुवलयादि भाव वर्ग की अतिसुभग
(नायिका रूप) एक अधिकरण में विश्रान्ति से समुच्चयरूप प्राप्त होने से विस्मय के
विभावत्व की प्राप्तिपूर्वक व्यङ्ग्य अर्थ से उपस्कृत तथा विचित्र ही (वाच्य) वाच्य
रूप के उन्मज्जन के कारण अभिलाष आदि का विभाव बन जाता है । इसी लिए
इतने में यद्यपि वाच्य का प्राधान्य है तथापि रसध्वनि में उसका भी गुणभाव हो
जाता है, इस प्रकार सभी गुणीभूत व्यङ्ग्य के प्रकार में मानना चाहिए । इसीलिए
बहुत बार कह चुके हैं कि ध्वनि ही काव्य का आत्मा है ।
किन्तु अन्य सहृदय लोगों के अनुसार यह जलक्रीड़ा के लिए अवतीर्ण युवतियों के
लावण्यद्रव से सुन्दरीकृत नदी के सम्बन्ध में उक्ति है और वहाँ पर भी उक्त प्रकार से
ही योजना होगी । अथवा यह नदी में स्नानार्थ अवतीर्ण युवतियों के सम्बन्ध में
(उक्ति) है । सब प्रकार से विस्मय के प्रकार से इतने में व्यापार होने से व्यङ्ग्य
का गुणीभाव है । उदाहरण दे चुके हैं—। इसे प्रथम उद्योत में ही निरूपण कर चुके
हैं। 'अनुराग' शब्द की 'अभिलाष' अर्थ में उसमें उपरक्तत्व में लक्षणा द्वारा 'लावण्य'

तृतीय उद्योतः ४९५
ध्वन्यालोकः
तस्यैव स्वयमुक्त्या प्रकाशीकृतत्वेन गुणीभावः, यथोदाहृतम्—
‘सङ्केतकालमनसम्’ इत्यादि । रसादिरूपव्यङ्ग्यस्य गुणीभावो रसवद-
लङ्कारे दर्शितः ; तत्र च तेषामाधिकारिकवाक्यापेक्षया गुणीभावो
विवहनप्रवृत्तभृत्यानुयायिराजवत् । व्यङ्ग्यालङ्कारस्य गुणीभावे
दीपकादिविषयः ।
तथा—
स्वयं उक्ति से प्रकाशित होने पर गुणीभाव होता है, जैसे उदाहरण दे चुके हैं
‘सङ्केतकालमनसं०’ इत्यादि । रसादि रूप व्यङ्ग्य का गुणीभाव रसवद् अलङ्कार में
दिखाया जा चुका है, वहाँ उनका आधिकारिक वाक्य की अपेक्षा गुणीभाव विवाह
में प्रवृत्त भृत्य का अनुगमन करने वाले राजा की भांति होता है । व्यङ्ग्य अलङ्कार
के गुणीभाव में दीपक आदि विषय हैं ।
उस प्रकार—
लोचनम्
क्तम् । तस्यैवेति । वस्तुमात्रस्य । रसादीति । आदिशब्देन भावादयः रसवच्छ-
ब्देन प्रेयस्विप्रभृतयोऽलङ्कारा उपलक्षिताः ।
नन्वत्यर्थं प्रधानभूतस्य रसादेः कथं गुणीभावः, गुणीभावे वा कथमचा-
रुत्वं न स्यादित्याशङ्क्य प्रत्युत सुन्दरता भवतीति प्रसिद्धदृष्टान्तमुखेन दर्श-
यति—तत्र चेति । रसवदाद्यलङ्कारविषये । एवं वस्तुनो रसादेश्च गुणीभावं
प्रदर्श्यालङ्कारात्मनोऽपि तृतीयस्य व्यङ्ग्यप्रकारस्य तं दर्शयति—व्यङ्ग्यालङ्का-
रस्येति । उपमादेः ॥ ३४ ॥
एवं प्रकारत्रयस्यापि गुणभावं प्रदर्श्य बहुतरलक्ष्यव्यापकतास्येति दर्शयि-
तुमाह—तथेति । प्रसन्नानि प्रसादगुणयोगाद्गम्भीराणि च व्यङ्ग्यार्थात्क्षेपक्तवा-
शब्द की भाँति प्रवृत्ति है, इसलिए अतिरस्कृत वाच्यत्व कहा है उसी का—। वस्तु-
मात्र का । रसादि—। ‘आदि’ शब्द से भाव आदि, ‘रसवत्’ शब्द से प्रेयस्वी प्रभृति
अलङ्कार उपलक्षित होते हैं ।
अत्यन्त प्रधानभूत रस आदि का गुणीभाव कैसे होगा ? या गुणीभाव होने पर
अचारुत्व कैसे नहीं होगा ? यह आशङ्का करके ‘बल्कि सुन्दरता होती है’ इस बात को
प्रसिद्ध दृष्टान्त के द्वारा दिखाते हैं—वहाँ—। रसवत् आदि अलङ्कारों के विषय में ।
इस प्रकार वस्तु रूप और रसादि का गुणीभाव प्रदर्शित करके अलङ्कार रूप उस तीसरे
व्यङ्ग्य प्रकार को दिखाते हैं—व्यङ्ग्य अलङ्कार के—। उपमा आदि के—॥ ३४ ॥
इस प्रकार तीनों प्रकारों का भी गुणभाव दिखाकर इसकी बहुत लक्ष्यों में व्यापकता
है यह दिखाने के लिए कहते हैं—उस प्रकार—। प्रसादगुण के योग से प्रसन्न और

४९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
प्रसन्नगम्भीरपदाः काव्यबन्धाः सुखावहाः ।
ये च तेषु प्रकारोऽयमेव योज्यः सुमेधसा ॥ ३५ ॥
ये चैतेऽपरिमितस्वरूपा अपि प्रकाशमानास्तथाविधार्थरमणीयाः
सन्तो विवेकिनां सुखावहाः काव्यबन्धास्तेषु सर्वेष्वेवायं प्रकारो गुणी-
भूतव्यङ्ग्यो नाम योजनीयः । यथा—
प्रसन्न और गम्भीर पद वाले जो सुखावह काव्यबन्ध होते हैं उनमें सुमेधा को
यही प्रकार जोड़ना चाहिए ॥ ३५ ॥
और जो ये अपरिमितस्वरूप भी प्रकाशमान उस प्रकार के अर्थ रमणीय होते
हुए विवेकी जनों के सुखावह काव्य बन्ध हैं उन सभी में यह गुणीभूत व्यङ्ग्य नाम
का प्रकार जोड़ना चाहिए। जैसे—
लोचनम्
त्पदानि येषु । सुखावहा इति चारुत्वहेतुः । तत्रायमेव प्रकार इति भावः ।
सुमेधसेति । यस्त्वेतं प्रकारं तंत्र योजयितुं न शक्तः स परमलीकसहृदयभावना-
मुकुलितलोचनोक्त्योपहसनीयः स्यादिति भावः ।
लक्ष्मीः सकलजनाभिलाषभूमिर्दुहिता । जामाता हरिः यः समस्तभोगाप-
वर्गदानसततोद्यमी । तथा गृहिणी गङ्गा यस्याः समभिलषणीये सर्वस्मिन्वस्तु-
न्यपहत उपायभावः । अमृतमृगाङ्कौ च सुतौ, अमृतमिह वारुणी । तेन गङ्गा-
स्नानहरिचरणाराधनाद्युपायशतलब्धाया लक्ष्म्याश्चन्द्रोदयपानगोष्ठ्युपभोगल-
क्षणं मुख्यं फलमिति त्रैलोक्यसारभूतता प्रतीयमाना सती अहो कुटुम्बं
महोदधेरित्यहोशब्दाच्च गुणीभावमनुभवत ॥ ३५ ॥
व्यङ्ग्य अर्थ के आक्षेपक होने से गम्भीर पद हैं जिनमें । सुखावह अर्थात् चारुत्व
के हेतु। भाव वह कि यहाँ भी यही प्रकार—है। सुमेधा को—। भाव यह कि जो
इस प्रकार को वहाँ जोड़ने में समर्थ नहीं है वह 'अलीक सहृदय भावना से मुकुलित
लोचनों वाला है' इस कथन से उपहास के योग्य है।
समस्त लोगों के अभिलाष की भूमि लक्ष्मी पुत्री है। जामाता विष्णु जी समस्त
भोग और अपवर्ग (मोक्ष) को देने के लिए सतत उद्यमशील रहते हैं। पत्नी गङ्गा
जिसका उपायभाव समभिलषणीय समस्त वस्तु में अपहृत है और अमृत तथा चन्द्रमा
पुत्र हैं। 'अमृत' यहाँ वारुणी (मदिरा) है। इस (अर्थ) से गङ्गास्नान, हरिचरण
के आराधन आदि सैकड़ों उपायों से लक्ष्मी का मुख्य फल चन्द्रोदय और पानगोष्ठी का
उपभोग है; इस प्रकार (समुद्र की) त्रैलोक्य में सारभूतता प्रतीयमान (व्यङ्ग्य)
होती हुई 'वाह रे, महासमुद्र का परिवार !' यहाँ 'वाह रे' शब्द से गुणीभाव को प्राप्त
करती है ॥ ३५ ॥

तृतीय उद्योतः ४९७
ध्वन्यालोकः
लच्छी दुहिदा जामाउओ हरी तंस धरिणिआ गङ्गा ।
अमिअमिअङ्का अ सुआ अहो कुडुम्बं महोअहिणो ॥
वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यांशानुगमे सति ।
प्रायेणैव परां छायां बिभ्रल्लक्ष्ये निरीक्ष्यते ॥ ३६ ॥
वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं व्यङ्ग्यांशस्यालङ्कारस्य वस्तुमात्रस्य वा
यथायोगमनुगमे सति च्छायातिशयं बिभ्रल्लक्षणकारैरेकदेशेन दर्शितः ।
स तु तथारूपः प्रायेण सर्व एव परीक्ष्यमाणो लक्ष्ये निरीक्ष्यते ।
उसकी पुत्री लक्ष्मी जामाता विष्णु, पत्नी गङ्गा और अमृत और चन्द्रमा पुत्र
हैं वाह रे ! यह समुद्र का परिवार है ?
यह वाच्य अलङ्कारवर्ग व्यङ्ग्य—अंश का अनुगम होने पर प्रायः करके अतिशय
शोभा धारण करता हुआ लक्ष्य में देखा जाता है ॥ ३६ ॥
यह वाच्य अलङ्कारवर्ग व्यङ्ग्यांश अलङ्कार अथवा वस्तुमात्र का यथायोग्य अनुगम
होने पर अतिशय शोभा को धारण करता हुआ लक्षणकारों द्वारा एक देश से (स्थाली-
पुलाक न्याय से) दिखाया गया है । उस प्रकार का वह परीक्षा करने पर प्रायः
लोचनम्
एवं निरलङ्कारेपूत्तानतायां तुच्छतयैव भासमानममुनान्तःसारेण काव्यं
पवित्रीकृतमित्युक्त्वालङ्कारस्याप्यनेनैव रम्यतरत्वमिति दर्शयति—वाच्येति ।
अंशत्वं गुणमात्रत्वम् । एकदेशेनेति । एकदेशविवर्तिरूपकमनेन दर्शितम् ।
तदयमर्थः—एकदेशविवर्तिरूपके—
राजहंसैर्वीज्यन्त शरदैव सरोनृपाः
इत्यत्र हंसानां यच्चामरत्वं प्रतीयमानं तन्नृपा इति वाच्येऽर्थे गुणतां प्राप्त-
मलङ्कारकारैर्यावदेव दर्शितं तावदमुना द्वारेण सूचितोऽयं प्रकार इत्यर्थः । अन्ये
त्वेकदेशेन वाच्यभागवैचित्र्यमात्रेणेत्यनुद्भिग्नमेव व्याचचक्षिरे । व्यङ्ग्यं यद्-
इस प्रकार निरलङ्कार (काव्यों) में आपातः प्रतीति में तुच्छरूप से भासमान
काव्य इस अन्तःसार (गुणीभूत व्यङ्ग्य) द्वारा पवित्र कर दिया गया है यह कह कर
अलङ्कार का भी इसी से रम्यतरत्व होता है यह दिखाते हैं—यह वाच्य—।
अंश अर्थात् गुणमात्र । एकदेश से—। इससे एकदेशविवर्ति रूपक को दिखाया है ।
तो यह अर्थ है—एकदेशविवर्तिरूपक में—
‘शरद ने ही सरोवररूपी राजाओं के राजहंसों से झले।’
अर्थात् यहाँ जो हंसों का चामरत्व व्यङ्ग्य हो रहा है वह ‘राजा’ इस वाच्य अर्थ
में गुणता को प्राप्त है, इस प्रकार आलङ्कारिकों ने जितना ही दिखाया है उस प्रकार
को इस ढंग से सूचित किया है । किन्तु अन्य लोगों ने ‘एकदेश से अर्थात् वाच्यभाग
३२ ध्व०

४९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तथा हि—दीपकसमासोक्त्यादिवदन्येऽप्यलङ्काराः प्रायेण व्यङ्ग्यचालङ्का-
रान्तरवस्त्वन्तरसंस्पर्शिनो दृश्यन्ते । यतः प्रथमं तावदतिशयोक्ति-
गर्भता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया । कृतैव च सा महाकविभिः कामपि
काव्यच्छविं पुष्यति, कथं ह्यतिशययोगिता स्वविषयौचित्येन क्रियमाणा
सभी लक्ष्य में देखा जाता है। जैसा कि—दीपक, समासोक्ति आदि की भाँति अन्य
भी अलङ्कार प्रायः करके व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर और वस्त्वन्तर का स्पर्श करने वाले देखे
जाते हैं। क्योंकि पहले तो सब अलङ्कारों में अतिशयोक्ति—गर्भता हो सकती है ।
महाकवियों द्वारा की जाने पर ही वह कुछ अपूर्व काव्य की शोभा बढ़ाती है । क्योंकि
लोचनम्
लङ्कारान्तरं वस्त्वन्तरं च संस्पृशन्ति ये स्वात्मनः संस्कारायाश्लिष्यन्तीति ते
तथा । महाकविभिरिति । कालिदासादिभिः । काव्यशोभां पुष्यतीति यदुक्तं तत्र
हेतुमाह—कथं हीति । हिशब्दो हेतौ । अतिशययोगिता कथं नोत्कर्षमावहेत्
काव्ये नास्त्येवासौ प्रकार इत्यर्थः । स्वविषये यदौचित्यं तेन चेद्धृदयस्थितेन
तामतिशयोक्तिं कविः करोति । यथा भट्टेन्दुराजस्य—
यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निःस्थेमनी लोचने
यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाब्जिनीनालवत् ।
दूर्वाकाण्डविडम्बकश्च निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः
कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥
अत्र हि भगवतो मन्मथवपुषः सौभाग्यविषयः सम्भाव्यत एवायमतिशय
के वैचित्र्यमात्र से' यह अस्पष्टार्थक व्याख्यान किया है। जो व्यङ्ग्य अलङ्कारान्तर
और वस्त्वन्तर का स्पर्श करते हैं, अपने संस्कार के लिए आश्लेष करते हैं वे उस
प्रकार । महाकवियों द्वारा—। कालिदास आदि द्वारा । 'काव्य की शोभा को बढ़ाती
है' यह जो कहा है उसमें हेतु कहते हैं—अतिशययोगिता—। ( 'हि' शब्द हेतु' अर्थ में
है । ) अतिशययोगिता कैसे नहीं उत्कर्ष लायेगी अर्थात् काव्य में वह प्रकार नहीं ही है ।
अपने विषय में जो औचित्य है उस हृदयस्थित ( औचित्य से ) उस अतिशयोक्ति को
कवि करता है । जैसे भट्ट इन्दुराज का—
दृष्टिपातों के प्रसंग में बहुत वार आँखें विश्राम करके जो स्थैर्य रहित हो जाती
हैं, अङ्ग प्रतिदिन कहे हुए कमलिनी के नाल की भाँति जो सूखते जा रहे हैं, गालों में
दूर्वाकाण्ड का अनुकरण करने वाला घना जो कि पीलापन है, युवक कृष्ण के प्रति
तरुणी गोपियों में ऐसी ही वेषरचना हो गई है ।
यहाँ मन्मथ की भाँति शरीर वाले भगवान् का सौभाग्यविषयक अतिशय सम्भा-

तृतीय उद्योतः ४९९
ध्वन्यालोकः
सती काव्ये नोत्कर्षमावहेत् । भामहेनाप्यतिशयोक्तिलक्षणे यदुक्तम्—
सैषा सर्वैव वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते ।
यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलङ्कारोऽनया विना ॥ इति ।
अतिशय योगिता अपने विषय के औचित्य से की जाने पर कैसे नहीं काव्य में उत्कर्ष
लायेगी ? भामहने भी अतिशयोक्ति के लक्षण में जो यह कहा है—
यह सभी ही ( अतिशयोक्ति ) वक्रोक्ति है, इससे अर्थ शोभित हो जाता है ।
इसमें कवि को यत्न करना चाहिए । इसके बिना कौन अलङ्कार है !
लोचनम्
इति तत्काव्ये लोकोत्तरैव शोभोल्लसति । अनौचित्येन तु शोभा लीयेत
एव । यथा—
अल्पं निर्मितमाकाशमनालोच्यैव वेधसा ।
इदमेवंविधं भावि भवत्याः स्तनजृम्भणम् ॥ इति ।
नन्वतिशयोक्तिः सर्वालङ्कारेषु व्यङ्ग्यतयान्तर्लीनैवास्त इति यदुक्तं तत्क-
थम् ? यतो भामहोऽतिशयोक्तिं सर्वालङ्कारसामान्यरूपामवादीत् । न च
सामान्यं शब्दाद्विशेषप्रतीतेः पृथग्भूततया पश्चात्तनत्वेन चकास्तीति कथमस्य
व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्कयाह—भामहेनेति । भामहेनापि यदुक्तं तत्रायमेवार्थोऽवग-
न्तव्य इति दूरेण सम्बन्धः । किं तदुक्तम्—सैषेति । यातिशयोक्तिर्लक्षिता सैव
सर्वा वक्रोक्तिरलङ्कारप्रकारः सर्वः ।
वक्राभिधेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलङ्कृतिः ।
इति वचनात् । शब्दस्य हि वक्रता अभिधेयस्य च वक्रता लोकोत्तीर्णेन
वित ही हो रहा है, इसलिए काव्य में लोकोत्तर ही शोभा उल्लसित होती है । परन्तु
अनौचित्य से शोभा समाप्त ही हो जाती है । जैसे—
इस प्रकार के होने वाले तेरे स्तन के उठान को ध्यान में न रख कर ही विधाता
ने आकाश को छोटा बना दिया ।
अतिशयोक्ति सभी अलंकारों में व्यङ्ग्यरूप से अन्तर्लीन ही है यह जो कहा है वह
कैसे ? क्योंकि भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलङ्कारों का सामान्यरूप कहा है ।
सामान्य शब्द से विशेष की प्रतीति होने से पृथग्भूत होकर पश्चाद्भावी रूप से नहीं
प्रतीति होता है, तो फिर कैसे इसका व्यङ्ग्यत्व है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—
भामह ने—। भामह ने भी जो कहा है वहाँ यही अर्थ समझना चाहिए यह दूर से
अन्वय है । वह क्या कथन है—वह सभी—। जो अतिशयोक्ति लक्षित की गई है वही
सब वक्रोक्ति अलङ्कार का सब प्रकार है ।
वक्र अर्थ और शब्द की उक्ति वाणी की अलंकृति मानी जाती है ।
स वचन से । शब्द की वक्रता और अभिधेय की वक्रता अर्थात् लोकोत्तीर्णरूप से

५०० सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत्रातिशयोक्तिर्यमलङ्कारमधितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य
चारुत्वातिशययोगोऽन्यस्य त्वलङ्कारमात्रतैवेति सर्वालङ्कारशरीरस्वी-
करणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपेत्ययमेवार्थोऽवग-
वहाँ, अतिशयोक्ति जिस अलङ्कार कवि की प्रतिभा के वश से जिस अलङ्कार पर
अधिष्ठित होती है, उसमें अतिशय चारुत्व का योग्य हो जाता है और अन्य अल-
ङ्कारमात्र होते हैं, इस प्रकार सभी अलङ्कारों के शरीर को अङ्गीकार की योग्यता
लोचनम्
रूपेणावस्थानमित्ययमेवासावलङ्कारभावः ; लोकोत्तरतैव चातिशयः, तेनातिश-
योक्तिः सर्वालङ्कारसामान्यम् । तथा हि—अनया अतिशयोक्त्या, अर्थः सकल-
जनोपभोगपुराणीकृतोऽपि विचित्रतया भाव्यते । तथा प्रमदोद्यानादिः विभा-
वतां नीयते । विशेषेण च भाव्यते रसमयीक्रियते, इति तावत्तेनोक्तं, तत्र
कोऽसावर्थ इत्याह—अभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपेति । उपचारे निमित्त-
माह—सर्वालङ्कारेति । उपचारे प्रयोजनमाह—अतिशयोक्तिरित्यादिना अलङ्कार-
मात्रतैवेत्यन्तेन । मुख्यार्थबाधोऽप्यत्रैव दर्शितः कविप्रतिभावशादित्यादिना ।
अयं भावः—यदि तावदतिशयोक्तेः सर्वालङ्कारेषु सामान्यरूपता सा तर्हि
तादात्म्यपर्यवसायिनीति तद्व्यतिरिक्तो नैवालङ्कारो दृश्यत इति कविप्रतिभानं
न तत्रापेक्षणीयं स्यात् । अलङ्कारमात्रं च न किञ्चिद्दृश्येत । अथ सा काव्य-
जीवितत्वेनेत्थं विवक्षिता, तथाप्यनौचित्येनापि निबध्यमाना तथा स्यात् ।
अवस्थान, यही वह अलङ्कार का अलङ्कारत्व है । और लोकोत्तरता ही अतिशय है,
इस कारण अतिशयोक्ति सब अलङ्कार का सामान्य है । जैसा कि—इस अतिशयोक्ति से,
बहुत लोगों के द्वारा उपयोग करने से पुराना हुआ भी अर्थ विचित्र रूप से मालूम
पड़ता है । उस प्रकार प्रमदा, उद्यान आदि को विभाव बनाते हैं । विशेषरूप से
भावित किया जाता है, अर्थात् रसमय किया जाता है, यह जो उसने कहा है उसका
अर्थ क्या है, इस प्रसंग में कहते हैं—अभेदोपचार से वही सर्वालङ्काररूप है । उपचार
में निमित्त कहते हैं—सर्वालङ्कार—। उपचार में प्रयोजन कहते हैं—अतिशयोक्ति से
लेकर अलङ्कारमात्र होते हैं तक । कवि की प्रतिभा के वश से—इत्यादि से मुख्यार्थ-
बाध भी यहीं दिखा दिया गया ।
भाव यह है—यदि अतिशयोक्ति सभी अलङ्कारों में सामान्यरूप है और वह
( उसकी सामान्यरूपता ) तादात्म्य में पर्यवसित होती है । ( अर्थात् सभी अलङ्कार
अतिशयोक्तिरूप हैं ) तो उस ( अतिशयोक्ति ) से व्यतिरिक्त अलङ्कार नहीं है, ऐसी
स्थिति में कवि की प्रतिभा की अपेक्षा नहीं रह जायगी, और कोई ( अतिशयोक्ति
से अतिरिक्त ) अलंकारमात्र नहीं दिखेगा । यदि वह ( अतिशयोक्ति ) काव्य का
जीवितरूप से विवक्षित है, ऐसी स्थिति में भी औचित्य से भी निबन्ध्यमान होकर

तृतीय उद्योतः ५०१


ध्वन्यालोकः
न्तव्यः । तस्याश्चालङ्कारान्तरसंकीर्णत्वं कदाचिद्वाच्यत्वेन कदाचिद्व्य-
ङ्ग्यत्वेन । व्यङ्ग्यत्वमपि कदाचित्प्राधान्येन कदाचिद्गुणभावेन ।
तत्राद्ये पक्षे वाच्यालङ्कारमार्गः । द्वितीये तु ध्वनावन्तर्भावः । तृतीये
तु गुणीभूतव्यङ्ग्यरूपता ।
हो जाने से अभेदोपचार से वही सर्वालङ्कार स्वरूप है, यही अर्थ समझना चाहिए ।
और वह अलङ्कारान्तर से सङ्कीर्ण कभी वाच्यरूप से कभी व्यङ्ग्य रूप से होती है ।
व्यङ्ग्यत्व भी कभी प्राधान्य से कभी गुणभाव से होता है । उनमें पहले पक्ष में
वाच्य अलङ्कार का मार्ग है, दूसरे में ध्वनि में अन्तर्भाव है और तीसरे में गुणीभूत-
व्यङ्ग्यरूपता है ।

लोचनम्
औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यनिबन्धनं रसभावादि मुक्त्वा
नान्यत्किञ्चिदस्तीति तदेवान्तर्यामि मुख्यं जीवितमित्यभ्युपगन्तव्यं न तु सा ।
एतेन यदाहुः केचित्—औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमये काव्ये किमन्येन-
ध्वनिनात्मभूतेनेति ते स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावाभ्युपगमसाक्षिभूतं मन्यमानाः
प्रत्युक्ताः । तस्मान्मुख्यार्थबाधादुपचारे च निमित्तप्रयोजनसद्भावादभेदोपचार
एवायम् । ततश्चोपपन्नमतिशयोक्तेर्व्यङ्ग्यत्वमिति । यदुक्तमलङ्कारान्तरस्वीकरणं
तदेव त्रिधा विभजते—तस्याश्चेति । वाच्यत्वेनेति । सापि वाच्या भवति । यथा-
‘अपरैव हि केयमत्र’ इति । अत्र रूपकेऽप्यतिशयः शब्दस्पृगेव । अस्य त्रैवि-
ध्यस्य विषयविभागमाह—तत्रेति । तेषु प्रकारेषु मध्ये य आद्यः प्रकारस्तस्मिन् ।
वह उस प्रकार ( काव्य का जीवित ) हो सकती है । औचित्य वाली अतिशयोक्ति
( काव्य का ) जीवित है यदि कहो तो औचित्य के निबन्धन रस, भाव आदि को
छोड़ कर कोई दूसरा नहीं है, इसलिए वही अन्तर्यामी होने से मुख्य जीवित है यह
मानना चाहिए न कि वह ( औचित्ययुक्त अतिशयोक्ति ) । इसलिए जो कि कुछ लोग
कहते हैं कि औचित्यघटितसुन्दरशब्दार्थमय काव्य में अन्य किसी आत्मभूत ध्वनि
से क्या होगा ? वे अपने वचन को ही ध्वनि के सद्भाव के स्वीकार का साक्षिभूत
मानते हुए जवाब दिये जा चुके । इसलिए मुख्यार्थ के बाध से और निमित्तरूप
प्रयोजन के सद्भाव से यह अभेदोपचार ही है । इसलिए अतिशयोक्ति के व्यङ्ग्य होने
की बात बन गई । जो कि अलङ्कारान्त का स्वीकरण कहा है उसे ही तीन प्रकार से
विभाग करते हैं—और वह अलङ्कारान्तर से—। वाच्यरूप से—। वह (अतिशयोक्ति)
भी वाच्य होती है ( जैसे—‘अपरैव हि केयमत्र’ । यहाँ रूपक में भी अतिशय शब्द का
स्पर्श कर ही रहा है ( अर्थात् वाच्य ही है ) इस त्रैविध्य का विषयविभाग कहते
हैं—उनमें—। उन प्रकारों के बीच जो पहला प्रकार है उसमें ।

५०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
अयं च प्रकारोऽन्येषामप्यलङ्काराणामस्ति, तेषां तु न सर्वविषयः ।
अतिशयोक्तेस्तु सर्वालङ्कारविषयोऽपि सम्भवतीत्ययं विशेषः । येषु
चालङ्कारेषु सादृश्यमुखेन तत्त्वप्रतिलम्भः यथा रूपकोपमातुल्ययोगिता-
निदर्शनादिषु तेषु गम्यमानधर्ममुखेनैव यत्सादृश्यं तदेव शोभातिशय-
शालि भवतीति ते सर्वेऽपि चारुत्वातिशययोगिनः सन्तो गुणीभूतव्य-
ङ्ग्यस्यैव विषयाः । समासोक्त्याक्षेपपर्यायोक्तादिषु तु गम्यमानांशावि-
नाभावेनैव तत्त्वव्यवस्थानाद्गुणीभूतव्यङ्ग्यता निर्विवादैव । तत्र च
यह प्रकार अन्य अलङ्कारों का भी है, परन्तु उनका ( प्रकार ) सब विषय वाला
नहीं है, परन्तु अतिशयोक्ति का ( प्रकार ) सब अलङ्कार के विषय वाला भी सम्भव
होता है इस प्रकार यह विशेष है। जिन अलङ्कारों में सादृश्य के द्वारा तत्त्व ( अल-
ङ्कारत्व ) का लाभ होता है, जैसे रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना आदि, उनमें
गम्यमान धर्म के प्रकार से ही जो सादृश्य है वही अतिशय शोभा वाला होता है,
इस प्रकार वे सभी अतिशय चारुत्व से युक्त होते हुए गुणीभूत व्यङ्ग्य के ही विषय
होते हैं । किन्तु समासोक्ति, आक्षेप, पर्यायोक्त आदि में गम्यमान अंश के अविनाभाव
से ही तत्त्व ( अलङ्कारत्व ) की व्यवस्था होने से गुणीभूतव्यङ्ग्यता निर्विवाद ही
लोचनम्
नन्वतिशयोक्तिरेव चेदेवम्भूता तत्किमपेक्षया प्रथमं तावदिति क्रमः सूचित
इत्याशङ्क्याह—अयं चेति । योऽतिशयोक्तौ निरूपितोऽलङ्कारान्तरेऽप्यनुप्रवे-
शात्मकः । नन्वेवमपि प्रथममिति केनाशयेनोक्तमित्याशङ्क्याह—तेषामिति ।
एवमलङ्कारेषु तावद्व्यङ्ग्यस्पर्शोऽस्तीत्युक्त्या तत्र किं व्यङ्ग्यत्वेन भातीति
विभागं व्युत्पादयति—येषु चेति । रूपकादीनां पूर्वमेवोक्तं स्वरूपम् । निदर्शना-
यास्तु 'क्रिययैव तदर्थस्य विशिष्टस्योपदर्शनम् । इष्टा निदर्शने'ति । उदाहरणम्-
जब अतिशयोक्ति इस प्रकार की है तो किस अपेक्षा से 'पहले' यह क्रम सूचित
किया है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—यह प्रकार—। अतिशयोक्ति में अलङ्कारान्तर में
अनुप्रवेशरूप जो निरूपण किया गया है। फिर भी 'पहले' यह किस आशय से कहा है ?
यह आशङ्का करके कहते हैं—उनका—। इस प्रकार 'अलङ्कारों में व्यङ्ग्य का स्पर्श
है' यह कह कर व्यङ्ग्यत्व से क्या होता है यह व्युत्पादन करते हैं—और जिन
अलङ्कारों में—। रूपक आदि का स्वरूप पहले ही कह चुके हैं। किन्तु निदर्शना का
( लक्षण है )—'क्रिया के द्वारा ही उसके विशिष्ट अर्थ का उपदर्शन निदर्शना मानी
जाती है' उदाहरण—

तृतीय उद्योतः ५०३
ध्वन्यालोकः
गुणीभूतव्यङ्ग्यतायामलङ्काराणां केषाञ्चिदलङ्कारविशेषगर्भतायां नियमः।
यथा व्याजस्तुतेः प्रेयोऽलङ्कारगर्भत्वे। केषाञ्चिदलङ्कारमात्रगर्भतायां
नियमः। यथा सन्देहादीनामुपमागर्भत्वे। केषाञ्चिदलङ्काराणां परस्प-
रगर्भतापि सम्भवति। यथा दीपकोपमयोः। तत्र दीपकमुपमागर्भत्वेन
प्रसिद्धम्। उपमापि कदाचिद्दीपकच्छायानुयायिनी। यथा मालोपमा।
तथा हि 'प्रभामहत्या शिखयेव दीपः' इत्यादौ स्फुटैव दीपकच्छाया
लक्ष्यते।
तदेवं व्यङ्ग्यांशसंस्पर्शे सति चारुत्वातिशययोगिनो रूपकादयोऽ-
लङ्काराः सर्व एव गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य मार्गः। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं च
है। और उस गुणीभूतव्यङ्ग्यता में कुछ अलङ्कार नियमतः—अलङ्कार विशेषगर्भ
होते हैं, जैसे व्याजस्तुति प्रेयोऽलङ्कारगर्भ होती है; कुछ (अलङ्कार) नियमतः अल-
ङ्कारमात्रगर्भ होते हैं, जैसे सन्देह आदि उपमागर्भ होते हैं; कुछ अलङ्कार परस्पर
गर्भ भी सम्भव होते हैं, जैसे दीपक और उपमा में वहाँ दीपक उपमागर्भ रूप से
प्रसिद्ध है। उपमा भी कभी दीपक की छायानुयायिनी हो जाती है, जैसे मालोपमा।
जैसा कि 'प्रभा महत्या शिखयेव दीपः' इत्यादि में स्पष्ट ही दीपक की छाया लक्षित
होती है।
तो इस प्रकार व्यङ्ग्यांश का संस्पर्श होने पर रूपक आदि अलङ्कार अतिशय
चारुत्व से युक्त होते हैं, यह सभी गुणीभूतव्यङ्ग्य का मार्ग है। उस प्रकार की जाति
लोचनम्
अयं मन्दद्युतिर्भास्वानस्तं प्रति यियासति।
उदयः पतनायेति श्रीमतो बोधयन्नरान् ॥
प्रेयोऽलङ्कारेति। चाटुपर्यवसायित्वात्तस्याः। सा चोदाहृतैव द्वितीयोद्द्योतेऽ-
स्माभिः। उपमागर्भत्व इत्युपमाशब्देन सर्व एव तद्विशेषा रूपकादयः, अथवौ-
पम्यं सर्वसामान्यमिति तेन सर्वमाक्षिप्तमेव। स्फुटैवेति। 'तया स पूतश्च विभू-
षितश्च' इत्येतेन दीपस्थानीयेन दीपनाद्दीपकमात्रानुप्रविष्टं प्रतीयमानतया,
यह मन्द प्रकाश वाला सूर्य 'उदय पतन के लिए होता है' यह वैभवशाली लोगों
को बोध कराता हुआ अस्त जाना चाहता है।
प्रेयोऽलङ्कार—। क्योंकि वह (व्याजस्तुति) चाटु में पर्यवसान प्राप्त करती है।
और उसे हमने दूसरे उद्योत में उदाहृत किया ही है। 'उपमागर्भ' यहां 'उपमा' शब्द
से उसके सभी विशेष रूपक आदि, अथवा 'औपम्य सब में सामान्य है' इसलिए सब
आक्षिप्त ही हैं। स्पष्ट हो—। 'तया स पूतश्च विभूषितश्च' इस दीपस्थानीय से दीपन
होने के कारण प्रतीयमान रूप से यहां दीपक अनुप्रविष्ट है। इस उपमा में साधारण-

५०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
तेषां तथाजातीयानां सर्वेषामेवोक्तानुक्तानां सामान्यम् । तल्लक्षणे सर्व
वाले उन उक्त और अनुक्त सभी का गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य है। उसके लक्षण
में सभी ये सुष्ठु प्रकार से लक्षित हो जाते हैं । सामान्य लक्षण से रहित प्रत्येक का
लोचनम्
साधारणधर्माभिधानं ह्येतदुपमायां स्पष्टेनाभिधाप्रकारेणैव । तथाजातीयाना-
मिति । चारुत्वातिशयवतामित्यर्थः । सुलक्षिता इति यत्किलैषां तद्विनिर्मुक्तं
रूपं न तत्काव्येऽभ्यर्थनीयम् । उपमा हि ‘यथा गौस्तथा गवयः’ इति । रूपकं
‘खलेवाली यूप’ इति । श्लेषः ‘द्विर्वचनेऽची’ति तन्त्रात्मकः । यथासंख्यं ‘तुदी-
शालातुरै’ति । दीपकं ‘गामश्वम्’ इति । ससन्देहः ‘स्थाणुर्वा स्यात्’ इति ।
अपह्नुतिः ‘नेदं रजतम्’ इति । पर्यायोक्तं ‘पीनो दिवा नात्ति’ इति । तुल्ययो-
गिता ‘स्थाध्वोरिच्च’ इति । अप्रस्तुतप्रशंसा सर्वाणि ज्ञापकानि, यथा पदसंज्ञा-
यामन्तवचनम्— ‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिर्न’ इति । आक्षे-
पश्चोभयत्र विभाषासु विकल्पात्मकविशेषाभिधित्सया इष्टस्यापि विधेः पूर्व
निषेधनात्प्रतिषेधेन समीकृत इति न्यायात् । अतिशयोक्तिः ‘समुद्रः कुण्डिका’
‘विन्ध्योवर्धितवानर्कवर्त्मगृण्हात्’ इति । एवमन्यत् ।
न चैवमादि काव्योपगीति, गुणीभूतव्यङ्ग्यतैवात्रालङ्कारतायां मर्मभूता
लक्षिताः तान् सुष्ठु लक्ष्यति । यया सुपूर्णं कृत्वा लक्षिताः सङ्गृहीता
धर्म का अभिधान स्पष्ट अभिधा प्रकार से ही है । उस प्रकार की जाति वाले—।
अर्थात् अतिशय चारुत्व वाले । सुष्ठु प्रकार से लक्षित—। जो कि इन (उपमा आदि
अलङ्कारों) का उस (गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व) से रहित रूप है वह काव्य में अभीष्ट नहीं
है । क्योंकि उपमा—‘जैसा गौ वैसा गवय’ । रूपक—‘खलेवाली यूप है’ । श्लेष—
‘द्विर्वचनेऽचि’ तन्त्रात्मक है। यथासङ्ख्य—‘तुदीशालातुर०’। दीपक—‘गौ अश्व’।
ससन्देह—‘अथवा स्थाणु होगा’ अपह्नुति—‘यह रजत नहीं है’। पर्यायोक्त—‘पीन
दिन में भोजन नहीं करता है’। तुल्ययोगिता—स्थध्वोरिच्च’। अप्रस्तुतप्रशंसा—सब
ज्ञापक, जैसे पदसंज्ञा में अन्तवचन—‘अन्यत्र संज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिर्न’।
आक्षेप—विभाषाओं में दोनों जगह विकल्परूप विशेष के अभिधान की इच्छा से इष्ट
भी विधि के निषेध से प्रतिषेध के समान बना हुआ’ इस न्याय से । अतिशयोक्ति—
‘कुण्डिका समुद्र है’; ‘विन्ध्य ने बढ़ कर सूर्य के मार्ग को छेक लिया’ । इस प्रकार
दूसरा ।
इत्यादि को काव्य नहीं कहते । अलङ्कारता में मर्मभूत गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही यहाँ
लक्षित होकर उन्हें सुष्ठु प्रकार से लक्षित करती है । जिस (गुणीभूतव्यङ्ग्यता से)
सुपूर्ण करके लक्षित अर्थात् संगृहीत होते हैं, अन्यथा अवश्य अव्याप्ति हो जाती । उसे ।

तृतीय उद्योतः ५०५
ध्वन्यालोकः
एवैते सुलक्षिता भवन्ति। एकैकस्य स्वरूपविशेषकथनेन तु सामान्य-
लक्षणरहितेन प्रतिपादपाठेनेव शब्दा न शक्यन्ते तत्त्वतो निर्ज्ञातुम्,
आनन्त्यात् । अनन्ता हि वाग्विकल्पास्तत्प्रकारा एव चालङ्काराः।
गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च प्रकारान्तरेणापि व्यङ्ग्यार्थानुगमलक्षणेन
स्वरूपविशेष कहने से तो प्रत्येक पद के पाठ से शब्दों की भांति अनन्त होने के
कारण तत्त्वतःज्ञान नहीं किया जा सकता । क्योंकि वाग्विकल्प अनन्त हैं और अलङ्कार
उनके प्रकार ही हैं।—गुणीभूतव्यङ्ग्य का विषय व्यङ्ग्य अर्थ के अनुगम से प्रकारान्तर
लोचनम्
भवन्ति, अन्यथा त्ववश्यमव्याप्तिर्भवेत् । तदाह—एकैकस्येति । न चातिशयो-
क्तिवक्रोक्त्युपमादीनां सामान्यरूपत्वं चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदा-
यत्तेत्येतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं
रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम् , रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्न आनन्दात्म-
कत्वमिति नानवस्था काचिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता हीति । प्रथमोद्द्योत
एव व्याख्यातमेतत् ‘वाग्विकल्पानामानन्त्यात्’ इत्यत्रान्तरे ।
ननु सर्वेष्वलङ्कारेषु नालङ्कारान्तरं व्यङ्ग्यं चकास्ति ; तत्कथं गुणीभूत-
व्यङ्ग्येन लक्षितेन सर्वेषां संग्रहः । मैवम्; वस्तुमात्रं वा रसो वा व्यङ्ग्यं
सद्गुणीभूतं भविष्यति तदेवाह—गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य चेति । प्रकारान्तरेण
वस्तु रसात्मनोपलक्षितस्य ।
यदि वेत्थमवतरणिका—ननु गुणीभूतव्यङ्ग्येनालङ्कारा यदि लक्षितास्तर्हि
कहते हैं—प्रत्येक का—। चारुताहीन अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा आदि का सामान्य-
रूपत्व बन सकता है, और चारुता इसके अधीन है, यही गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य
लक्षण है और व्यङ्ग्य का चारुत्व रसाभिव्यक्ति योग्यतारूप है, इस स्वस्वरूप से ही
विश्रान्तिधाम है, अतएव आनन्दात्मक है, इस प्रकार कोई अनवस्था नहीं है यह
तात्पर्य है । क्योंकि अनन्त—। प्रथम उद्योत में ही 'वाग्विकल्पानामानन्त्यात्' इस
प्रसंग में यह व्याख्यान किया जा चुका है ।
( प्रश्न ) सब अलङ्कारों में अलङ्कारान्तर व्यङ्ग्य नहीं होता, तो गुणीभूतव्यङ्ग्य
के लक्षित होने पर कैसे सभी का संग्रह होगा ? ( उत्तर ) ऐसा नहीं, वस्तुमात्र
अथवा रस व्यङ्ग होता हुआ गुणीभूत होगा, उसे ही कहते हैं—गुणीभूतव्यङ्ग्य का—।
वस्तु और रसरूप प्रकारान्तर से—। उपलक्षित ।
अथवा अवतरणिका इस प्रकार है—गुणीभूतव्यङ्ग्य से यदि अलङ्कार लक्षित
हो गये तो लक्षण कहना चाहिए, फिर क्यों नहीं कहा, यह आशङ्का करके कहते हैं—

५०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
विषयत्वमस्त्येव । तदयं ध्वनिनिष्यन्दरूपो द्वितीयोऽपि महाकविविष-
योऽतिरमणीयो लक्षणीयः सहृदयैः । सर्वथा नास्त्येव सहृदयहृदयहा-
रिणः काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शेन सौभाग्यम् ।
तदिदं काव्यरहस्यं परमिति सूरिभिर्भावनीयम् ।
मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभृतामपि ।
प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥ ३७ ॥
से भी होता ही है । इसलिए ध्वनिनिष्यन्द रूप, महाकवियों का विषय, अतिरम-
णीय दूसरा भी सहृदयों को लक्षित करना चाहिए । सहृदय हृदयहारी काव्य का
वह सर्वथा प्रकार नहीं ही है जिसमें प्रतीयमान अर्थ के संस्पर्श से सौभाग्य नहीं
है । तो यह उत्कृष्ट काव्यरहस्य है यह विद्वानों को समझना चाहिए ।
महाकवियों को अलङ्कार युक्त भी वाणी की यह प्रतीयमानकृत छाया स्त्रियों की
लज्जा की भाँति मुख्य भूषा है ।
लोचनम्
लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशङ्क्याह—गुणीभूतेति । विषयत्वमिति
लक्षणीयत्वमिति यावत् । केन लक्षणीयत्वं ध्वनिव्यतिरिक्तो यः प्रकारो व्यङ्ग्य-
त्वेनार्थानुगमो नाम तदेव लक्षणं तेनेत्यर्थः । व्यङ्ग्ये लक्षिते तद्गुणीभावे
च निरूपिते किमन्यदस्य लक्षणं क्रियतामिति तात्पर्यम् । एवं 'काव्यस्यात्मा
ध्वनिः' इति निर्वाह्योपसंहरति—तदयमित्यादिना सौभाग्यमित्यन्तेन । यत्प्रागुक्तं
सकलसत्कविकाव्योपनिषद्भूतमिति तन्न प्रतारणमात्रमर्थवादरूपं मन्तव्यमिति
दर्शयितुम्-तदिदमिति ॥ ३६ ॥
मुख्या भूषेति । अलङ्कृतिभृतामपिशब्दादलङ्कारशून्यानामपीत्यर्थः ।
प्रतीयमानकृता छाया शोभा सा च लज्जासदृशी गोपनासारसौन्दर्यप्राणत्वात् ।
अलङ्कारधारिणीनामपि नायिकानां लज्जा मुख्यं भूषणम् । प्रतीयमाना च्छाया
गुणीभूतव्यङ्ग्य का—। विषय अर्थात् लक्षणीय । अर्थात् किससे लक्षणीय होगा, व्यङ्ग्य-
रूप से अर्थानुगम नाम का ध्वनिव्यतिरिक्त जो प्रकार है वही लक्षण है उससे । व्यङ्ग्य
के लक्षित होने पर और उसके गुणीभाव के निरूपण किये जाने पर दूसरा लक्षण क्या
किया जाय, यह तात्पर्य है । इस प्रकार 'काव्य का आत्मा ध्वनि है' यह निर्वाह करके
उपसंहार करते हैं—इसलिए—। इत्यादि से लेकर सौभाग्य तक । जो पहले कहा है कि
समस्त सत्कवियों के काव्य का उपनिषदभूत है वह प्रतारणमात्र नहीं है, बल्कि अर्थवाद-
रूप मानना चाहिए यह दिखाने के लिए—तो यह—॥ ३६ ॥
मुख्य भूषा—। 'अलङ्कारयुक्त भी' शब्द से 'अलङ्कारशून्य भी' यह अर्थ है ।
प्रतीयमानकृत छाया अर्थात् शोभा, वह लज्जा के समान है, क्योंकि गोपना के सार