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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

प्रथम उद्योतः ७७
लोचनम्
कस्य वेति । अनीर्ष्यालोरपि भवति रोषो दृष्ट्वैव; अकृत्वापि कुतश्चिद्देवा-
पूर्व्वतया प्रियायाः सव्रणमधरमवलोक्य । सभ्रमरपद्माघ्राणशीले शीलं हि कथंचि-
दपि वारयितुं न शक्यम् । वारिते वारणायां, वामे तदनङ्गीकारिणि । सहस्वेदानी-
मुपालम्भपरम्परा मित्यर्थः । अत्रायं भावः—काचिद्विनीता कुतश्चित्खण्डिता-
धरा निश्चिततत्सविधसंनिधाने तद्भर्त्तरि तमनवलोकमानयेव कयाचिद्विदग्ध-
सख्या तद्वाच्यतापरिहारायैवमुच्यते सहस्वेदानीमिति वाच्यमविनयवतीविषयम् ।
भर्तृविषयं तु-अपराधो नास्तीत्यावेद्यमानं व्यङ्ग्यम् । सहस्वेत्यपि च तद्विषयं
व्यङ्ग्यम् । तस्यां च प्रियतमेन गाढमुपालभ्यमानायां तद्व्यलीकशङ्कितप्रातिवे-
शिकलोकविषयं चाविनयप्रच्छादनेन प्रत्यायनं व्यङ्ग्यम् । तत्सपत्न्यां च तद्दु-
किया गया। अब विषय के भेद से भी व्यंग्य का भेद¹ है, यह कहते हैं—कहीं पर—।
व्यवस्थापित—। अर्थात् विषय का भेद भी विचित्ररूप से रहता हुआ सहृदयजनों के
द्वारा व्यवस्थापित किया जा सकता है ।
अथवा प्रिया के व्रणयुक्त······
ईर्ष्या से रहित व्यक्ति के भी क्रोध देखकर ही चढ़ आता है । न करके भी किसी
कारण अपूर्व भाव से प्रिया के व्रणयुक्त अधर को देखकर । भौंरे सहित कमल को
सूँघने के शील वाली—। शील किसी प्रकार हटाया नहीं जा सकता । वारित में,
निवारण में, वामा अर्थात् निवारण को अङ्गीकार न करनेवाली । अब सहन कर
( दुष्परिणाम भुगत )—। अर्थात् उलहनों की परम्परा को सहन कर ( अपने किए का
दुष्परिणाम भुगत ) । यहाँ भाव यह है—कोई चालाक ( विदग्ध ) सखी किसी अविनीत
नायिका से, जो कहीं से ( जार आदि के द्वारा ) अपना अधर-खण्डित करा चुकी है,
उसके पति को निश्चितरूप से सन्निहित जानकर, उसे ( उसके पति को ) न देखती
हुई-सी, पति के द्वारा उपालम्भ मिलने के परिहार के लिए ( जिससे कि उसका पति
खण्डित-अधर देखकर उसे न डाँटे ) कहती है । 'सहन कर' ( दुष्परिणाम भुगत ) यह
वाच्य अविनयवती उस नायिका के प्रति है । पति के प्रति तो—'इसका अपराध नहीं
है' यह आवेद्यमान ( निरपराधत्व ) व्यंग्य होता है । प्रियतम के द्वारा अधिक
उपालम्भ प्राप्त उस नायिका के होने पर पति का अप्रिय करने से शंकित आस-पास
के लोगों के प्रति नायिका के अविनय के प्रच्छादन के द्वारा ( नायिका के निरपराध
यहाँ 'निवर्तस्व' वाच्य है, किन्तु नायक का यह तात्पर्य व्यङ्ग्य है कि मेरे घर आ अथवा हम
दोनों ही तुम्हारे घर चलें, इस प्रकार यह अनुभय रूप व्यङ्ग्य है । चतुर्थ व्याख्यान के अनुसार
यहाँ तटस्थ सहृदयों का किसी अभिसारिका के प्रति वचन है। आचार्य के कथनानुसार इस
अंश में 'हुताशे' यह आमन्त्रण आदि ठीक बैठ जाता है या नहीं इसका निर्णय तो सहृदय
स्वयं कर सकते हैं !
१. व्यङ्ग्य और वाच्य में विषयभेद और स्वरूपभेद इन दो ही भेदों का दिङ्मात्र प्रदर्शन
'ध्वन्यालोक' में किया गया है। मम्मट आदि अन्य आचार्यों ने और भी कई भेद बतलाए हैं ।
'साहित्यदर्पण' में सबका संग्रह एक कारिका में किया गया है—

७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
पालम्भतदविनयप्रहृष्टायां सौभाग्यातिशयख्यापनं प्रियाया इति शब्दबलादिति
सपत्नीविषयं व्यङ्ग्यम्। सपत्नीमध्ये इयता खलीकृतास्मीति लाघवमात्मनि
ग्रहीतुं न युक्तं; प्रत्युतायं बहुमानः, सहस्व शोभस्वेदानीमिति सखीविषयं
सौभाग्यप्रख्यापनं व्यङ्ग्यम्। अद्येयं तव प्रच्छन्नानुरागिणी हृदयवल्लभैत्थं
रक्षिता, पुनः प्रकटदशनदंशनविधिर्न विधेय इति तच्चौर्यकामुकविषयसम्बोधनं
व्यङ्ग्यम्। इत्थं मयैतदपहृतमिति स्ववैदग्ध्यख्यापनं तटस्थविदग्धलोकविषयं
व्यङ्ग्यमिति। तदेतदुक्तं व्यवस्थापितशब्देन। अय इति द्वितीयोद्द्योते 'असं-
लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः क्रमेणोद्द्योतितः परः' इति विवक्षितान्यपरवाच्यस्य द्वितीय-
होने का) बोधन व्यंग्य है। उसकी सपत्नी के प्रति जो उसे उपालम्भ मिलने के कारण
और उसके अविनय से प्रसन्न है, 'प्रियाया:' इस शब्द के बल से नायिका के अतिशय
सौभाग्य का ख्यापन व्यङ्ग्य है। 'सपत्नियों के बीच इस तरह (अविनय के साफ
जाहिर करने से) मैं गौरवहीन कर दी गई हूँ' इस प्रकार का लघुभाव अपने में रखना
ठीक नहीं है, बल्कि यह (बहुमान-गौरव) की बात है, 'सहस्व' अर्थात् इस समय
शोभित हो, इस प्रकार सखी के प्रति सौभाग्य का प्रख्यापन व्यङ्ग्य है। 'आज तो
तुम्हारी इस प्रच्छन्नानुरागिणी हृदयवल्लभा को इस प्रकार बचा लिया, फिर कहीं स्पष्ट
रूप से दन्तक्षत नहीं करना' इस प्रकार उस नायिका के चौर्य-कामुक के प्रति सम्बोधन
व्यङ्ग्य है। और तटस्थ विदग्ध लोगों के प्रति 'अपना यह वैदग्ध्य-ख्यापन कि मैंने
इस प्रकार इसे छिपा लिया' व्यङ्ग्य है। इसीलिए वृत्तिग्रन्थ में 'व्यवस्थापित'¹ कहा है।
आगे—। दूसरे 'उद्द्योत' में 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः क्रमेणोद्द्योतितः परः' इस प्रकार
बोद्धृस्वरूपसंख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालानाम् ।
आश्रयविषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधीयते व्यङ्ग्यः ॥
(क) बोद्धृभेद; वाच्य अर्थ को तो पद-पदार्थ की व्युत्पत्ति रखने वाले वैयाकरण आदि भी
समझ लेते हैं, किन्तु व्यङ्ग्य को वही समझता है जो सर्वथा 'सहृदय' है ('सहृदय' वैयाकरण आदि
भी हो सकते हैं!)। (ख) स्वरूपभेद; वाच्य विधि रूप होता है तो व्यङ्ग्य निषेध रूप आदि।
स्वरूपभेद के कई उदाहरण 'ध्वन्यालोक' में दिए गए हैं। (ग) संख्याभेद; यदि वाच्य एक है तो
व्यङ्ग्य अनेक भी हो सकते हैं, जैसे 'गतोऽस्तमर्कः' में वाच्य अर्थ एक है और व्यङ्ग्य अर्थ अनेक
हैं। (घ) निमित्तभेद; वाच्य अर्थ के ज्ञान के कारण (निमित्त) संकेत-ग्रह आदि हैं किन्तु व्यङ्ग्य
अर्थ के बोध के लिए निर्मल प्रतिभा होनी चाहिए, सहृदयता आदि होनी चाहिए। (ङ) कार्यभेद;
वाच्य अर्थ केवल प्रतीति को उत्पन्न करता है और व्यङ्ग्य चमत्कार को भी उत्पन्न करता है। (च)
कालभेद; वाच्य अर्थ पहले प्रतीत होता है और व्यङ्ग्य अर्थ बाद में। (छ) आश्रयभेद; वाच्य अर्थ
शब्द के आश्रित होता है किन्तु व्यङ्ग्य शब्द के एक देश प्रकृति, प्रत्यय, वर्ण, संघटना आदि के
भी आश्रित हो सकता है। (ज) विषयभेद; इसका उदाहरण मूल में 'कस्य न वा भवति०' इस
गाथा में दिया है, यहाँ वाच्यार्थ-बोध का विषय नायिका है और व्यङ्ग्यार्थ का विषय नायक है।
१. प्रस्तुत गाथा में व्यङ्ग्य विषय के भेद से भिन्न रूप में 'व्यवस्थापित' है। 'व्यवस्थापित' कहने
का तात्पर्य है कि यहाँ कोई आचार्य के द्वारा अपनी ओर से नहीं जोड़ा गया है, बल्कि ऐसा है

प्रथम उद्योतः ७९

लोचनम्

प्रभेदवर्णनावसरे । यथा हि विधिनिषेधतदनुभयात्मना रूपेण संकलय्य वस्तु-
ध्वनिः संक्षेपेण सुवचः, तथा नालङ्कारध्वनिः, अलङ्काराणां भूयस्त्वात् । तत
एवोक्तम्-सप्रपञ्चमिति ।
तृतीयस्त्विति । तुशब्दो व्यतिरेके । वस्त्वलङ्कारावपि शब्दाभिधेयत्व-
मध्यासाते तावत् । रसभावतदाभासतत्प्रशमाः पुनर्न कदाचिदभिधीयन्ते,
अथ चास्वाद्यमानताप्राणतया भान्ति । तत्र ध्वननव्यापारादृते नास्ति कल्प-
नान्तरम् । स्खलद्गतित्वाभावे मुख्यार्थबाधादेर्लक्षणा निवन्धनस्यानाशङ्कनीय-
त्वात् । औचित्येन प्रवृत्तौ चित्तवृत्तेरास्वाद्यत्वे स्थायिन्या रसो, व्यभिचारिण्या
‘विवक्षितान्यपरवाच्य’ नामक दूसरे प्रभेद के वर्णन के अवसर में । जिस प्रकार
विधि, निषेध और विधिनिषेधानुभय रूप प्रकार के द्वारा सङ्कलित करके वस्तुध्वनि
को संक्षेप में कहा जा सकता है, उस प्रकार अलङ्कारध्वनि को नहीं कह सकते, क्योंकि
अलङ्कारों की संख्या बहुत है । उसी कारण से कहा—प्रपञ्च के साथ—।
तीसरा प्रभेद तो—। ‘तो’ (‘तु’) शब्द व्यतिरेक में प्रयुक्त है। अभिप्राय यह कि वस्तु
और अलङ्कार शब्द के द्वारा अभिधेय होते भी हैं, लेकिन रस, भाव, रसाभास, भावा-
भास, भावप्रशम कभी-कभी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं होते और केवल प्राण रूप में
विद्यमान जो उनकी आस्वाद्यमानता है उसी के कारण वे प्रकाशित होते हैं । वहाँ ध्वनन
व्यापार को छोड़ कोई दूसरी कल्पना नहीं है । स्खलद्गतित्व के न होने से मुख्यार्थबाध
आदि लक्षणा के कारणों की आशङ्का नहीं की जा सकती । औचित्यपूर्वक प्रवृत्ति के होने
पर जब चित्तवृत्ति का आस्वाद होता है तब स्थायिनी चित्तवृत्ति से रस, व्यभिचारिणी
से भाव, एवं ( स्थायिनी चित्तवृत्ति से ) अनौचित्य-पूर्वक प्रवृत्त होने पर रसाभास


ही । नायिका किसी जार से अपना अधर खण्डित करा कर पहुँची है । यह स्वाभाविक है कि
उसका ‘अपराध’ प्रकट हो जायगा और उसका पति उस पर बेहद कुपित होगा । उसकी सखी ने
उसे निरपराध सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत ‘वचन’ कहा, जिसका व्यङ्ग्य उसके पति, सुनने वाले
आस-पड़ोस के लोग, सौत, स्वयं नायिका, चौर्यकामुक जार एवं तटस्थ विदग्ध जन के प्रति विभिन्न
रूप में प्रतीत होता है । नायिका की सखी उसके पति से यह कहना चाहती है कि इसका कोई
अपराध नहीं है, अन्यथा समझ कर कहीं क्रोध मत कर बैठना । आस-पड़ोस के लोगों से उसके
इस कथन का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि यदि इसका पति इसे उपालम्भ भी दे तो भी इसका
अविनय नहीं समझना चाहिए । सपत्नी, जो नायिका के उपालम्भ और अविनय से प्रसन्न है, के
प्रति ‘प्रियायाः’ इस शब्द के बल से नायिका का सौभाग्यातिशय ख्यापन व्यङ्ग्य है । नायिका के
प्रति व्यङ्ग्य है कि यह न समझना कि सपत्नियों के बीच वह इस तरह हल्की कर दी गई ही है
बल्कि ‘सहस्व’ का दूसरा अर्थ यह है कि अब उनके बीच शोभा को प्राप्त कर । ‘प्राकृत’ में ‘सहसु’
का दूसरा रूप ‘शोभस्व’ भी हो सकता है । चौर्यकामुक के प्रति व्यङ्ग्य यह प्रतीत होता है
कि आज तो किसी प्रकार प्रसन्नानुरागिणी तेरी इस प्रियतमा की रक्षा मैंने कर दी, अब
फिर कहीं स्पष्ट रूप से इसका अधर मत काट देना । तटस्थ सहृदय लोगों के प्रति इस
नायिका-सखी का व्यङ्ग्य प्रतीत होता है कि मैंने सफेद झूठ बोल कर किस प्रकार जाहिर
बात को छिपा दिया !

८० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
भावः, अनौचित्येन तदाभासः, रावणस्येव सीतायां रतेः । यद्यपि तत्र
हास्यरसरूपतैव, 'शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यः' इति वचनात् । तथापि पाश्चात्त्येयं
सामाजिकानां स्थितिः, तन्मयीभवनदशायां तु रतेरेवास्वाद्यतेति शृङ्गारतैव
भाति पौर्वापर्यविवेकावधारणेन 'दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते
श्रुतिम्' इत्यादौ । तदसौ शृङ्गाराभास एव । तदङ्गं भावाभासश्चित्तवृत्तेः प्रशम
एव प्रक्रान्ताया हृदयमाह्लादयति यतो विशेषेण, तत एव तत्संगृहीतोऽपि
पृथग्गणितोऽसौ । यथा—
एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो-
रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् ।
दंपत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषो-
र्भग्नो मानकलिः सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहम् ॥
इत्यत्रेष्र्यारोषात्मनो मानस्य प्रशमः । न चायं रसादिरर्थः 'पुत्रस्ते जातः'
इत्यतो यथा हर्षो जायते तथा । नापि लक्षणया । अपि तु सहृदयस्य हृदय-
होता है, जैसे रावण की सीता में रति से । यद्यपि वहाँ 'हास्यरस' का ही ढंग है,
जैसा कि वचन है—'शृङ्गार से हास्य होता है'; तथापि यह सामाजिकों की पाश्चात्य
(अन्त में होने वाली) स्थिति है । तन्मय होने की स्थिति में तो रति का ही आस्वाद
होता रहता है, इस प्रकार शृङ्गारता ही भासित होती है, पौर्वापर्य (क्रम) के विवेक
के अभाव के कारण—जैसे 'दूर ही से आकर्षण करनेवाले मोहमन्त्र के समान उसके
नाम के कर्णगोचर होने पर०' इत्यादि में । तो यह शृङ्गाराभास ही$^१$ है । उस
(शृङ्गार आदि रसाभास का) अङ्ग जो भावाभास है, चित्तवृत्ति जब प्रशम की
अवस्था में प्रक्रान्त होती है तभी विशेष रूप से हृदय को आह्लादित करता है, इसी
लिए 'भाव' शब्द से वह संगृहीत हुआ भी अलग से गणित है । जैसे—
'एक ही सेज पर एक दूससे से मुँह फेर लेने के कारण निद्रा के समाप्त हो जाने
के बाद सन्तप्त होते हुए, परस्पर एक दूसरे के प्रति अनुनय उनके हृदय में मौजूद था,
तब भी गौरव की रक्षा करते हुए पति और पत्नी के नेत्र जब धीरे से अपाङ्ग की ओर
झुकने के कारण मिल गए, तभी उनका प्रणय-रोष भग्न हो गया और वे हँस कर वेग-
पूर्वक एक दूसरे का कण्ठग्रह कर पड़े ।'
यहाँ ईर्ष्या-रोष रूप मान का प्रशम है । यह रसादि अर्थ 'तुम्हें लड़का हुआ है'
इस वाक्य के श्रवण से जैसे हर्ष होता है, उस प्रकार नहीं है । और न लक्षणा से
(वह प्रकाशित होता है) । अपितु, सहृदय जनों के हृदय के संवाद के बल से
१. क्योंकि रावण की सीताविषयक रति जब सहृदयों की रति से तन्मयीभाव प्राप्त करेगी तब
शृङ्गार की चर्वणा होगी । तत्पश्चात् उन्हें यह मालूम होगा कि यह रति अनुचित आलम्बन में हो
रही है । तभी हास का उद्बोध होगा, तभी शृङ्गार की चर्वणा शृङ्गाराभास-चर्वणा का रूप ले लेगी ।

प्रथम उद्योतः ८१
ध्वन्यालोकः
तृतीयस्तु रसादिलक्षणः प्रभेदो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तः प्रकाशते, न
तु साक्षाच्छब्दव्यापारविषय इति वाच्याद्विभिन्न एव । तथा हि वाच्यत्वं
तस्य स्वशब्दनिवेदितत्वेन वा स्यात् । विभावादिप्रतिपादनमुखेन वा ।
पूर्वस्मिन् पक्षे स्वशब्दनिवेदितत्वाभावे रसादीनामप्रतीतिप्रसङ्गः ।
रसाद्रिरूप तीसरा प्रभेद तो वाच्य की सामर्थ्य से आक्षिप्त हो प्रकाशित होता है,
न कि वह साक्षात् शब्द-व्यापार का विषय होता है, इसलिए वह भी वाच्य विभिन्न
ही है । जैसा कि उसका वाच्यत्व अपने शब्दों से निवेदित होने के रूप से अथवा
विभाव आदि के प्रतिपादन के द्वारा हो सकता है । पहले पक्ष में यदि अपने शब्द
(रस अथवा शृङ्गार आदि नामों) के द्वारा निवेदित न होने पर रसादिकों की
अप्रतीति का प्रसङ्ग होगा ।
लोचनम्
संवादबलाद्विभावानुभावप्रतीतौ तन्मयीभावेनास्वाद्यमान एव रस्यमानतैकप्राणः
सिद्धस्वभावसुखादिविलक्षणः परिस्फुरति । तदाह—प्रकाशत इति । तेन तत्र
शब्दस्य ध्वननमेव व्यापारोऽर्थसहकृतस्येति । विभावाद्यर्थोऽपि न पुत्रजन्म-
हर्षन्यायेन तां चित्तवृत्तिं जनयतीति जननातिरिक्तोऽर्थस्यापि व्यापारो ध्वनन-
मेवोच्यते । स्वशब्देति । शृङ्गारादिना शब्देनाभिधाव्यापारवशादेव निवेदित-
त्वेन । विभावादीति । तात्पर्यशक्त्येत्यर्थः ।
विभाव-अनुभाव की प्रतीति होने पर तन्मयीभाव के प्रकार से आस्वादित होता
हुआ ही, सर्वथा रस्यमान रूप, सिद्ध स्वभाव वाला एवं सुखादिकों से विलक्षण
(वह रसादि अर्थ) परिस्फुरित१ होता है । उसे कहा है—प्रकाशित होता है— ।
इससे वहाँ अर्थ-सहकृत शब्द का ध्वनन ही व्यापार है । पुत्रजन्म से हुए हर्ष के
समान विभावादि अर्थ भी उस चित्तवृत्ति को उत्पन्न नहीं करता, इस लिए 'जनन'
से अतिरिक्त अर्थ का भी व्यापार 'ध्वनन' ही कहा जाता है । अपना शब्द— ।
'शृङ्गार' आदि शब्द द्वारा अभिधा व्यापार के वश निवेदित होने के कारण ।
विभाव आदि— । अर्थात् तात्पर्य-शक्ति के द्वारा ।
१. रसादि अर्थ उत्पन्न नहीं होता हैं बल्कि प्रकाशित होता है। सहृदय के हृदय में स्थित
रत्यादि स्थायीभाव ही रस रूप में परिणत हो जाते हैं। स्थायीभावों की रस रूप में
परिणति के पूर्व सहृदय के हृदय का संवाद द्वारा जब विभाव आदि की प्रतीति हो जाती है तब
तन्मयीभाव होता है, ऐसी स्थिति में रस आस्वाद्यमान होने लगता है, यह सुखादि से विलक्षण
आत्मिक आनन्दानुभूति है ।
उसके रहने पर कार्य हो, यह 'अन्वय' है (दे० पृ० ८२) और उसके अभाव में कार्य न हो यह
'व्यतिरेक' है—'तत्सत्त्वे कार्यसत्त्वमन्वयः, तदभावे कार्याभावो व्यतिरेकः।' प्रस्तुत में आचार्य
आनन्दवर्धन ने स्वशब्द के अन्वयव्यतिरेक का निराकरण किया है अर्थात् 'शृङ्गार' आदि शब्द के
रहने पर रसादि की प्रतीति नहीं होती है और उसके अभाव में भी रसादि की प्रतीति हो जाती
है । किन्तु जहाँ ध्वनन व्यापार होता है वहीं रसादि की प्रतीति होती है ।
६ ध्व०

८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
न च सर्वत्र तेषां स्वशब्दनिवेदितत्वम् । यत्राप्यस्ति तत्,
तत्रापि विशिष्टविभावादिप्रतिपादनमुखेनैवैषां प्रतीतिः ।
स्वशब्देन सा केवलमनूद्यते, न तु तत्कृता विषयान्तरे तथा
तस्या अदर्शनात् ।
किन्तु सर्वत्र उन (रसादिकों) का अपने शब्दों द्वारा निवेदितत्व नहीं। जहाँ कहीं
भी वह है, वहाँ भी विशेष प्रकार से विभाव आदि के प्रतिपादन के द्वारा ही उनकी
प्रतीति है ।
अपने शब्द से वह प्रतीति केवल अनूदित हो जाती है, उस (शब्द के बदौलत)
कृत नहीं होती । क्योंकि विषयान्तर में उस प्रकार उसे नहीं देखते ।
लोचनम्
तत्र स्वशब्दस्यान्वयव्यतिरेकौ रस्यमानतासारं रसं प्रति निराकुर्वन्ध्वन-
नस्यैव ताविति दर्शयति-न च सर्वत्रेति । यथा भट्ठेन्दुराजस्य-
यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निःस्थेमनी लोचने
यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाब्जिनीनालवत् ।
दूर्वाकाण्डविडम्बकश्च निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः
कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥
इत्यत्रानुभावविभावावबोधनोत्तरमेव तन्मयीभवनयुक्त्या तद्विभावानुभावो-
चितचित्तवृत्तिवासनानुरञ्जितस्वसंविदानन्दचर्वणागोचरोऽर्थो रसात्मा स्फुरत्ये-
वाभिलाषचिन्तौत्सुक्यनिद्राधृतिग्लान्यालस्यश्रमस्मृतिवितर्कादिशब्दाभावेऽपि ।
एवं व्यतिरेकाभावं प्रदर्श्यान्वयाभावं दर्शयति-यत्रापीति । तदिति । स्वश-
ब्दनिवेदितत्वम् । प्रतिपादनमुखेनेति । शब्दप्रयुक्त्या विभावादिप्रतिपत्त्येत्यर्थः ।
वहाँ स्वशब्द (शृङ्गार आदि शब्द) के अन्वयव्यतिरेक को रस्यमानताप्राण रूप
रस के प्रति, निराकरण करते हुए वे दोनों (अन्वय और व्यतिरेक) हैं यह दिखाते
हैं- सर्वत्र वे शब्द द्वारा निवेदित नहीं होते हैं- । जैसे भट्ट इन्दुराज का-
'जो कि रुक-रुक कर विलोकनों में बहुत वार आँखें स्थैर्यरहित हो जाती हैं, जो
कि अङ्ग-अङ्ग कटे हुए कमलिनी के नाल की भांति प्रतिदिन सूखते जा रहे हैं, जो कि
गालों पर दूर्वाकाण्ड का अनुकरण करने वाला घना पीलापन छाया हुआ है, युवक
कृष्ण के प्रति युवतियों की यही वेषरचना है।'
यहाँ अनुभाव-विभाव के बोधन के बाद ही तन्मयीभाव की युक्ति से उस विभाव-
अनुभाव के अनुरूप वासना रूप चित्तवृत्ति से अनुरञ्जित स्वसंविदानन्द की चर्वणा का
गोचर रस रूप अर्थ अभिलाष, चिन्ता, औत्सुक्य, निद्रा, धृति, ग्लानि, आलस्य, श्रम, स्मृति,
वितर्क आदि शब्द के अभाव में भी स्फुरित होता ही है। इस प्रकार व्यतिरेक का अभाव
दिखाकर अन्वय का अभाव दिखाते हैं-जहाँ भी- । वह- । अर्थात् स्वशब्द द्वारा
निवेदितत्व । प्रतिपादन के जरिए- । अर्थात् शब्द से प्रयुक्त विभाव की प्रतिपत्ति के द्वारा ।

प्रथम उद्योतः ८३
लोचनम्
सा केवलमिति । तथाहि—
याते द्वारवतीं तदा मधुरिपौ तद्दत्तझम्पानतां
कालिन्दीतटरूढवञ्जुललतामालिङ्ग्य सोत्कण्ठया ।
तद्गीतं गुरुबाष्पगद्गदगलत्तारस्वरं राधया
येनान्तर्जलचारिभिर्जलचरैरप्युत्कमूत्कूजितम् ॥
इत्यत्र विभावानुभावावम्लानतया प्रतीयेते । उत्कण्ठा च चर्वणागोचरं
प्रतिपद्यत एव । सोत्कण्ठाशब्दः केवलं सिद्धं साधयति, उत्कमित्यनेन तूक्तानु-
भावानुकर्षणं कर्तुं सोत्कण्ठाशब्दः प्रयुक्त इत्यनुवादोऽपि नानर्थकः, पुनरनुभाव-
प्रतिपादने हि पुनरुक्तिरतन्मयीभावो वा न तु तत्कृतेत्यत्र हेतुमाह—विषयान्तर
इति । 'यद्विश्रम्य' इत्यादौ । न हि यद्भावेऽपि यद्भवति तत्कृतं तदिति भावः ।
वह केवल— । जैसा कि—
'कृष्ण के द्वारिका चले जाने पर उनके आस्फालनों के कारण झुकी हुई, कालिन्दी-
तट में उत्पन्न वेतसलता को आलिङ्गन करके उत्कण्ठायुक्त राधा ने अधिक बाष्प के
कारण गद्गद एवं स्खलित होती हुई आवाज में वह गान किया जिससे कि भीतर
पानी में रहने वाले जीव उत्कण्ठित हो शब्द करने लगे ।'
यहाँ विभाव-अनुभाव अम्लान रूप से प्रतीत होते हैं और उत्कण्ठा चर्वणा का
गोचर बनती है । 'सोत्कण्ठा' शब्द केवल सिद्ध का साधन करता है । 'उत्क' के
द्वारा उक्त अनुभावों को खींचने के उद्देश्य से 'सोत्कण्ठा' शब्द का प्रयोग है, इस
लिए अनुवाद भी अनर्थक नहीं । क्योंकि पुनः अनुभाव के प्रतिपादन के होने पर
पुनरुक्ति अथवा अतन्मयीभाव होगा । जो कि (वृत्तिग्रन्थ में) 'न तु तत्कृता' (उसके
द्वारा नहीं की गई है) कहा है उसका हेतु कहते हैं—विषयान्तर में— । 'जो कि
१. 'याते द्वारवतीं' इस पद्य में विभाव का भी वर्णन है और अनुभाव का भी वर्णन है । मधुरिपु
और कालिन्दीतट आदि यहाँ क्रमशः आलम्बन और उद्दीपन विभाव हैं । और साथ ही उत्कण्ठा
भी चर्वणा का गोचर हो रही है । किन्तु यहाँ भ्रम नहीं होना चाहिए कि उत्कण्ठा की प्रतीति
स्वशब्द 'सोत्कण्ठा' से हो रही है, बल्कि पूर्वसिद्ध उत्कण्ठा की प्रतीति का यह शब्द अनुवादक
मात्र है अर्थात् यह केवल सिद्ध का साधन करता है । ऐसी स्थिति में अनुवाद को अनर्थक समझना
ठीक न होगा, क्योंकि कवि ने आगे उत्कण्ठित होकर जलचारियों के कूजन का जिक्र किया है और
पहले जो 'उत्कण्ठा' का प्रयोग करता है उससे दोनों स्थानों के अनुभावों का समन्वय कवि का
यहाँ अभीष्ट है । इसलिए आचार्य लिखते हैं कि आगे के 'उत्क' से उक्त अनुभाव के अनुकर्षणार्थ
'सोत्कण्ठा' शब्द का प्रयोग किया है । अन्यथा केवल पुनः अनुभाव का प्रतिपादन मात्र यहाँ कवि
को अभी माना जाय तो पुनरुक्ति होगी और तन्मयीभाव भी नहीं सिद्ध होगा । यह सारी बातें
जिस तात्पर्य से कही गई हैं वह यह है कि स्वशब्द के साथ रसादि की प्रतीति के अन्वय-व्यतिरेक
का अभाव है । प्रस्तुत में 'सोत्कण्ठा' रूप स्वशब्द के निवेदन होने पर भी उत्कण्ठा की प्रतीति
लतालिङ्गन आदि रूप अनुभाव के प्रतिपादन के द्वारा ही होती है । 'सोत्कण्ठा' शब्द केवल इस
प्रतीति का अनुवादक मात्र है । यह अनुवाद भी, जैसा कि आचार्य का कहना है, अनर्थक नहीं ।

८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
न हि केवलशृङ्गारादिशब्दमात्रभाजि विभावादिप्रतिपादनरहिते
काव्ये मनागपि रसवत्त्वप्रतीतिरस्ति । यतश्च स्वाभिधानमन्तरेण केवल-
भ्योऽपि विभावादिभ्यो विशिष्टेभ्यो रसादीनां प्रतीतिः । केवलाच्च
स्वाभिधानादप्रतीतिः । तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामभिधेयसामर्थ्याक्षि-
प्तत्वमेव रसादीनाम् । न त्वभिधेयत्वं कथञ्चित् , इति तृतीयोऽपि
प्रभेदो वाच्याद्भिन्न एवेति स्थितम् । वाच्येन त्वस्य सहैव प्रतीति-
रित्यग्रे दर्शयिष्यते ।
उस काव्य में, जहाँ केवल शृङ्गार आदि शब्दमात्र प्रयुक्त हों और विभावादि का
प्रतिपादन न हुआ हो, थोड़ी मात्रा में भी रसवत्ता की प्रतीति नहीं होती । क्योंकि
स्वशब्द का अभिधान न हो तो भी केवल विशिष्ट विभाव आदि द्वारा रसादि की
प्रतीति होती है । केवल स्वशब्द के अभिधान से प्रतीति नहीं होती । इस कारण
अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा रसादिकों का अभिधेय (वाच्य) के सामर्थ्य से
आक्षिप्तत्व ही सिद्ध होता है, न कि किसी प्रकार अभिधेयत्व (वाच्यत्व) है। इस
प्रकार तीसरा भी प्रभेद वाच्य से भिन्न ही है, यह ठहरा । वाच्य से इसकी साथ ही
जैसी प्रतीति होती है, इसे आगे चलकर दिखायेंगे ।
लोचनम्
अदर्शनमेव द्रढयति—न हीति । केवलशब्दार्थं स्फुटयति—विभावादीति । काव्य
इति । तव मते काव्यरूपतया प्रसज्यमान इत्यर्थः । मनागपीति ।
शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः ।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्य रसाः स्मृताः ॥
इत्यत्र । एवं स्वशब्देन सह रसादेर्व्यतिरेकान्वयाभावमुपपत्त्या प्रदर्श्य
तथैवोपसंहरति—यतश्चेत्यादिना कथञ्चिदित्यन्तेन । अभिधेयमेव सामर्थ्यं
सहकारिशक्तिरूपं विभावादिकं रसध्वनने शब्दस्य कर्तव्ये, अभिधेयस्य च
रुक-रुक करके' इत्यादि स्थल में । भाव यह कि उसके अभाव में भी जो होता है
वह उसके द्वारा किया नहीं जाता है । (विषयान्तर में होनेवाले) अदर्शन पर ही
जोर देते हैं—न कि— । 'केवल' शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हैं—विभावादि— ।
काव्य में— । अर्थात् तुम्हारे मत में काव्य के रूप में प्रसज्यमान । थोड़ा भी— ।
'शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत नाम के ये आठ
रस नाट्य में माने गए हैं ।'
यहाँ । इस प्रकार स्वशब्द के साथ रसादि का व्यतिरेकाभाव और अन्वयाभाव
उपपत्तिपूर्वक दिखाकर उसी प्रकार उपसंहार करते हैं—क्योंकि से लेकर—किसी
प्रकार—तक के ग्रन्थ से । जब शब्द का रसध्वनन व्यापार कर्तव्य होगा तब

प्रथम उद्योतः ८५
लोचनम्
पुत्रजन्महर्षभिन्नयोगक्षेमतया जननव्यतिरिक्ते दिवाभोजनाभावविशिष्टपीन-
त्वानुमितरात्रिभोजनविलक्षणतया चानुमानव्यतिरिक्ते ध्वनने कर्तव्ये सामर्थ्यं
शक्तिः विशिष्टसमुचितो वाचकसाकल्यमिति द्वयोरपि शब्दार्थयोर्ध्वननं
व्यापारः । एवं द्वौ पक्षावुपक्रम्याद्यो दूषितः, द्वितीयस्तु कथञ्चिद् दूषितः कथ-
ञ्चिदङ्गीकृतः, जननानुमानव्यापाराभिप्रायेण दूषितः, ध्वननाभिप्रायेणाङ्गीकृतः।
यस्त्वत्रापि तात्पर्यशक्तिमेव ध्वननं मन्यते, स न वस्तुतत्त्ववेदी । विभावा-
नुभावप्रतिपादके हि वाक्ये तात्पर्यशक्तिर्भेदे संसर्गे वा पर्यवस्येत्; न तु रस्य-
मानतासारे रसे इत्यलं बहुना । इतिशब्दो हेत्वर्थे । 'इत्यपि हेतोस्तृतीयोऽपि
प्रकारो वाच्याद्भिन्न एवे'ति सम्बन्धः । सहैवेति । इवशब्देन विद्यमानोऽपि क्रमो
न संलक्ष्यत इति तद्दर्शयति—अग्र इति । द्वितीयोद्द्योते ॥ ४ ॥
अभिधेय ( वाच्य अर्थ ) ही सामर्थ्य सहकारिशक्ति रूप विभाव आदि होगा । और
जब अभिधेय का ध्वनन रूप कार्य होगा, ऐसी स्थिति में पुत्रजन्म के हर्ष से भिन्न
होने के कारण जो ध्वनन होगा वह उत्पत्ति से अतिरिक्त होगा, तथा दिन में
भोजनाभावविशिष्ट पीनत्व द्वारा अनुमित रात्रिभोजन से विलक्षण होने के कारण
'अनुमान' से भी ध्वनन व्यापार अलग होगा, फिर सामर्थ्य अर्थात् शक्ति, विशिष्ट
एवं समुचित अर्थात् वाचक से परिपूर्णत्व रूप सिद्ध होती है । इसलिए ध्वनन व्यापार
शब्द और अर्थ दोनों का है। १ इस प्रकार दो पक्षों को उपक्रम करके पहले पक्ष को
दूषित किया और कुछ अंश में अङ्गीकार किया । जनन ( उत्पत्ति ) और अनुमान के
व्यापार के अभिप्राय से दूषित किया और 'ध्वनन' के अभिप्राय से अङ्गीकार किया ।
जो कि यहाँ 'तात्पर्य-शक्ति' को 'ध्वनन' मानता है वह वस्तुतत्त्व ( यथार्थ ) को
जानने वाला नहीं है, क्योंकि विभावानुभाव के प्रतिपादक वाक्य में तात्पर्य-शक्ति
'भेद में अथवा संसर्ग में पर्यवसित होगी, न कि रस्यमानतासार रस में । इस पर अब
ज्यादा कहना व्यर्थ है । 'इति' ( इस प्रकार ) शब्द हेत्वर्थक है । सम्बन्ध यह है कि
इस हेतु से भी तीसरा प्रकार भी वाच्य से भिन्न ही ठहरता है । 'साथ की तरह'— ।
'इव' ( 'तरह' ) शब्द के द्वारा यह दिखाते हैं कि रहता हुआ भी क्रम संलक्षित नहीं
होता—आगे— । दूसरे उद्योत में ।
१. वृत्तिग्रन्थ में रसादि को जो अभिधेय के सामर्थ्य से आक्षिप्त कहा है वह सर्वथा ध्वनन
व्यापार से ही गम्य है । जब शब्द से रस का ध्वनन होता है तब अभिधेय या वाच्य ही
विभावादि रूप से सहकारि शक्ति रूप सामर्थ्य होता है और इससे होने वाला ध्वनन न तो
पुत्रजन्म से उत्पन्न हर्ष जैसा उत्पन्न होता है और न तो उसे दिन के भोजन के अभाव में रात्रि
के भोजन के अनुमान जैसा अनुमान कहा जा सकता है । ध्वनन शब्द और अर्थ दोनों का
व्यापार है । इस प्रकार आचार्य ने यहाँ रसादि का शब्द-शब्दनिवेदितत्व को दूषित किया है
और विभावादि प्रतिपादन के ढंग को जनन और अनुमान के अभिप्राय से दूषित करके भी
ध्वनन के अभिप्राय से स्वीकार किया है, क्योंकि ध्वनन इन दोनों से भिन्न व्यापार है ।
यहाँ पुरानी शंका पुनः खड़ी होती है कि जब आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि रसादि

८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा ।
क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥ ५ ॥
काव्य का आत्मा वही अर्थ है, जैसा कि पुराकाल में क्रौञ्च-पक्षी के जोड़े के
वियोग से उत्पन्न शोक आदिकवि का श्लोक बन गया ॥ ५ ॥
लोचनम्
एवं ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव’ इतीयता ध्वनिस্বরূপं व्याख्यातम् । अधुना
काव्यात्मत्वमितिहासव्याजेन च दर्शयति—काव्यस्यात्मेति । स एवेति प्रतीय-
मानमात्रेऽपि प्रक्रान्ते तृतीय एव रसध्वनिरिति मन्तव्यम्, इतिहासबलात्
प्रक्रान्तवृत्तिग्रन्थार्थबलाच्च । तेन रस एव वस्तुत आत्मा, वस्त्वलङ्कारध्वनी तु
सर्वथा रसं प्रति पर्यवस्येते इति वाच्यादुत्कृष्टौ तावित्यभिप्रायेण ‘ध्वनिः
काव्यस्यात्मे’ति सामान्येनोक्तम् । शोक इति । क्रौञ्चस्य द्वन्द्ववियोगेन सहचरी-
इस प्रकार ‘प्रतीयमान फिर दूसरा ही’ इतने से ध्वनि के स्वरूप का व्याख्यान
किया। अब ध्वनि का काव्यात्मत्व इतिहास के व्याज से दिखाते हैं—काव्य का
आत्मा— । ‘वही’ यह ( कथन ) यद्यपि प्रतीयमान मात्र में प्रक्रान्त है तथापि तीसरा
‘रसध्वनि’ ही ( काव्यात्मा ) रूप मन्तव्य है। एक तो इतिहास के बल से और दूसरे
प्रक्रान्त वृत्तिग्रन्थ के अर्थ के बल से । इस लिए रस ही वस्तुतः आत्मा है, वस्तुध्वनि
और अलङ्कार-ध्वनि सर्वथा रस के प्रति पर्यवसित होते हैं अतः वे वाच्य से उत्कृष्ट
हैं। इस अभिप्राय से ‘ध्वनि काव्य का आत्मा है’ यह सामान्य रूप से कहा है।
शोक— । क्रौञ्च के द्वन्द्ववियोग से अर्थात् सहचरी क्रौञ्ची के मारे जाने से, साहचर्य
वाच्य-सामर्थ्य से आक्षिप्त होते हैं, तो ऐसा क्यों न माना जाय कि ‘ध्वनन’ तात्पर्य शक्ति ही
है। इस प्रकार चतुर्थ कक्षा में रहने वाले अतिरिक्त व्यापार की कल्पना का गौरव नहीं करना
पड़ता है ? क्योंकि तात्पर्य शक्ति वही है जो अभिधेय या वाच्य के अविनाभाव की सहायता से
अर्थबोधन की शक्ति है। इस पर आचार्य का कहना है कि जैसा हम पहले कह चुके हैं तात्पर्य
शक्ति या तो भेद में पर्यवसित होती है, अर्थात् कर्मान्तर और क्रियान्तर के भेद रूप वाक्यार्थ में
पर्यवसित होती है, या तो संसर्ग में, अर्थात् परस्पर पदार्थों के संसर्ग में पर्यवसित होती है और
रस तो सर्वथा आस्वाद्यमान रूप है ऐसी स्थिति में उसका रस में पर्यवसान असम्भव है। इस
प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के अतिरिक्त यह भी एक हेतु है जिससे रसादि तृतीय प्रकार वाच्य से
सर्वथा भिन्न ही ठहरता है।
वाच्य की प्रतीति और रसादि रूप व्यङ्ग्य की प्रतीति कुछ इस शीघ्रता से होती है
जिससे उन दोनों का क्रम अभिलक्षित नहीं होता। इसलिए रसादि को ‘असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य’ कहा
गया है। इसी लिए वृत्तिकार ने वाच्यादि के साथ इसकी प्रतीति ‘साथ की तरह’ होती है यह
कहा है। ऐसा नहीं कि वाच्यादि के साथ रस की प्रतीति होती है। यह विषय ‘द्वितीय उद्योत’ में
निर्दिष्ट होगा।

प्रथम उद्योतः ८७
लोचनम्
हननोद्भूतेन साहचर्यध्वंसनेनोत्थितो यः शोकः स्थायिभावो निरपेक्षभावत्वा-
द्विप्रलम्भशृङ्गारोचितरतिस्थायिभावादन्य एव, स एव तथाभूतविभावतदुत्था-
क्रन्दाद्यनुभावचर्वणया हृदयसंवादतन्मयीभवनक्रमादास्वाद्यमानतां प्रतिपन्नः
करुणरसरूपतां लौकिकशोकव्यतिरिक्तां स्वचित्तद्रुतिसमास्वाद्यसारां प्रतिपन्नो
रसपरिपूर्णकुम्भोच्छलनवच्चित्तवृत्तिनिःष्यन्दस्वभाववाग्विलापादिवच्च समयानपेक्ष-
त्वेऽपि चित्तवृत्तिव्यञ्जकत्वादिति नयेनाकृतकतयैवावेशवशात्समुचितशब्दच्छ-
न्दोवृत्तादिनियन्त्रितश्लोकरूपतां प्राप्तः—
( साथ ) के ध्वंस हो जाने के कारण उत्पन्न जो शोक रूप स्थायीभाव, निरपेक्षभाव
होने के कारण विप्रलम्भ शृङ्गार के उचित रतिरूप स्थायीभाव से अतिरिक्त ही है।
वही ( शोक ) उस प्रकार के विभाव और उससे उत्पन्न आक्रन्द आदि अनुभाव की
चर्वणा द्वारा, हृदय के संवाद और फिर तन्मयीभाव के क्रम से आस्वाद्यमान
अवस्था को प्राप्त, लौकिक शोक के अतिरिक्त, चर्वयिता के अपने चित्त की द्रुति के
द्वारा समास्वाद्य-सार करुणरसरूपता को प्राप्त, जैसे जल से भरा घड़ा झलकता है
और जैसे चित्तवृत्ति के निष्यन्द रूप वाग्विलाप आदि होते हैं उसी प्रकार 'समय'
( शब्द के सङ्केत ) की अपेक्षा न रखने पर भी ( वचन ) चित्तवृत्ति के व्यञ्जक
होते हैं' इस न्याय से अकृत्रिम रूप से ही, आवेश के कारण, समुचित शब्द, छन्द, वृत्त
आदि से नियन्त्रित हुआ, 'श्लोक' की अवस्था को प्राप्त होता है'—
१. 'शोक श्लोक की अवस्था को प्राप्त है' आचार्य आनन्दवर्धन का यह निर्देश एक ऐतिहासिक
घटना को सूचित करता है, जो 'वाल्मीकीय रामायण' से विदित होती है। किसी समय वाल्मीकि
अपने आश्रम से समिद्कुशाहरण के लिए निकल कर वनप्रान्त में घूम रहे थे। तभी उन्होंने व्याध
के द्वारा बाण से बिधे एक क्रौञ्च को देखा, जिसके वियोग-व्यथा से व्याकुल होकर क्रौञ्ची अत्यन्त
कातर होकर चिल्ला रही थी। तत्काल ऋषि के मुख से शापयुक्त छन्दोमयी वाणी निकल पड़ी,
जो निर्दिष्ट 'मा निषाद' के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ही 'शोकः श्लोकत्वमागतः' कहा गया है।
महाकवि कालिदास ने भी 'रघुवंश महाकाव्य' के चौदहवें सर्ग में इस घटना का स्मरण किया है—
तामभ्यगच्छद् रुदितानुसारी कविः कुशेध्माहरणाय यातः।
निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ॥
प्रस्तुत में आचार्य ने 'रस' को काव्य का आत्मा सिद्ध करने के उद्देश्य से इस प्रसंग का
उल्लेख किया है। लोचनकार ने इस प्रसंग का जो व्याख्यान किया है उसका स्पष्टीकरण यह है—
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि विप्रलम्भ शृङ्गार का स्थायीभाव रति तब होती है जब
नायक-नायिका दोनों विद्यमान रहते हैं, केवल दोनों का एकमिलन न सम्पन्न होने के कारण
दोनों में सापेक्षता रहती है अर्थात् विप्रलम्भ शृङ्गार की रति सापेक्ष भाव है। इसके विपरीत
शोक रूप स्थायीभाव में आलम्बन विभाव नायिका और नायक में कोई एक दिवङ्गत हो जाता
है और पुनर्मिलन की आशा समाप्त हो जाती है अर्थात् शोक रूप स्थायीभाव निरपेक्ष होता
है। प्रस्तुत पद्य 'मा निषाद' में क्रौञ्च के जोड़े में से एक व्याध के बाण से मारा गया है इस
प्रकार साहचर्य के ध्वंस होने से यहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार का स्थायीभाव रति न होकर करुण का
स्थायी भाव शोक ही माना गया है।

८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ इति ।
न तु मुनेः शोक इति मन्तव्यम् । एवं हि सति तद्दुःखेन सोऽपि दुःखित
इति कृत्वा रसस्यात्मतेति निरवकाशं भवेत् । न च दुःखसन्तप्तस्यैषा दशेति ।
एवं चर्वणोचितशोकस्थायिभावात्मककरुणरससमुच्छलनस्वभावत्वात्स एव
काव्यस्यात्मा सारभूतस्वभावोऽपरशाब्दवैलक्षण्यकारकः ।
एतदेवोक्तं हृदयदर्पणे—'यावत्पूर्णो न चैतेन तावन्नैव वमत्यमुम्' इति ।
'हे व्याध, काम से मोहित क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से एक को तू ने मार डाला है
इसलिए अनन्तकाल तक प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो ।'
न कि मुनि का शोक है यह मानना चाहिए । क्योंकि ऐसा होने पर उस ( क्रौञ्च )
के दुःख से वह भी दुखित हो जाते हैं, फिर रसात्मकता की बात नहीं बनेगी । दुःख
से जो प्राणी सन्तप्त हो उसकी ऐसी दशा ( कि शाप देने के लिए श्लोक का निर्माण
करे ) नहीं होती । इस प्रकार चर्वणा के योग्य शोकरूप स्थायीभाव वाले करुणरस
से प्रवाहित होने के स्वभाव के कारण वही काव्य का आत्मा अर्थात् सारभूतस्वभाव
एवं दूसरे शब्दबोध से वैलक्षण्य करने वाला है ।
'हृदयदर्पण' में इसे ही कहा है—'जब तक इस रस से भर नहीं जाता तब तक
यहाँ क्रौञ्च रूप आलम्बन में उत्पन्न शोक आक्रन्दन आदि अनुभावों की चर्वणा से अलौकिक
स्थिति में हृदय-संवाद और तन्मयीभाव के क्रम से आ जाता है । इस प्रकार ऋषि ने उस
अलौकिक शोक को चित्त की द्युति द्वारा आस्वादन किया । यह आस्वादन उस शोक का
परिवर्तित रूप 'करुण रस' ही है । इस प्रकार जब ऋषि ने करुण रस का अनुभव किया तभी
उनके मुख से छन्दोमयी वाणी अनायास निकल पड़ी, यह उसी प्रकार हुआ जैसे कि भरा
हुआ घड़ा छलक पड़ता है अथवा जैसे दुःख आदि की चित्तवृत्ति के होने पर अनायास मुंह से
शब्द निकल पड़ते हैं । इस प्रकार शोक करुण रस की स्थिति में पहुँच कर श्लोक बन गया ।
क्रौञ्च वाल्मीकि
| |
शोक ( लौकिक ) शोक ( अलौकिक )
|
( हृदयसंवाद और तन्मयीभाव )
|
करुणरस
|
छन्दोमयी वाणी
१. आचार्य का यह भी निर्देश है कि शोक को भ्रम से मुनि का नहीं समझ लेना चाहिए ।
अन्यथा क्रौञ्च के दुःख से सन्तप्त ऋषि के मुख से इस प्रकार श्लोक-रचना अस्वाभाविक प्रतीत
होती है । अतः वह शोक वस्तुतः ऋषि के द्वारा आस्वाद्यमान होकर अलौकिक हो गया और
ऋषि ने चित्तद्रुति के द्वारा उसे करुण रस की स्थिति में अनुभव किया, जो सर्वथा आनन्दमयता
की स्थिति है । इस प्रकार इस युक्ति से करुण रस ही प्रस्तुत छन्दोमयी वाणी का सार होने के
कारण 'काव्य का आत्मा' निश्चित होता है ।

प्रथम उद्योतः ८९
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ध्वन्यालोकः
विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य स एवार्थः
सारभूतः । चादिकवेर्वाल्मीकेः निहतसहचरीविरहकातरक्रौञ्चाक्रन्द-
जनितः शोक एव श्लोकतया परिणतः ।
विविध वाच्य, वाचक और रचना के प्रपञ्च से सुन्दर काव्य का वही अर्थ
सारभूत है । जैसा कि आदिकवि वाल्मीकि का निहत¹ सहचरी के वियोग से कातर
क्रौञ्च की चीख (आक्रन्द) से उत्पन्न शोक ही श्लोकरूप से परिणत हो गया ।
लोचनम्
अगम इति च्छान्दसेनाडागमेन । स एवैत्येवकारेणोदमाह—नान्य आत्मेति ।
तेन यदाह भट्टनायकः—
शब्दप्राधान्यमाश्रित्य तत्र शास्त्रं पृथग्विदुः ।
अर्थतत्त्वेन युक्तं तु वदन्त्याख्यानमेतयोः ॥
द्वयोर्गुणत्वे व्यापारप्राधान्ये काव्यधीर्भवेत् ।
इति तदपास्तम् । व्यापारो हि यदि ध्वननात्मा रसनास्वभावस्तन्नापूर्व-
मुक्तम् । अथाभिधैव व्यापारस्तथाप्यस्याः प्राधान्यं नेत्यावेदितं प्राक् ।
श्लोकं व्याचष्टे—विविधेति । विविधं तत्तदभिव्यञ्जनीयरसानुगुण्येन विचित्रं
कृत्वा वाच्ये वाचके रचनायां च प्रपञ्चेन यच्चारु शब्दार्थालङ्कारगुणयुक्त-
उसे वमन नहीं करता है।' (वाल्मीकि के पद्य में) 'अगमः' में वैदिक नियमानुसार
अडागम हुआ है । 'वही' इस 'एव' ( 'ही' ) कहने से यह कहा है—दूसरा आत्मा
नहीं है । इस लिए जो कि 'भट्टनायक' कहते हैं—
'शब्द के प्राधान्य का आश्रयण करके शास्त्र को अलग मानते हैं, अर्थतत्त्व से
युक्त को 'आख्यान' कहते हैं और इन दोनों (शब्द-अर्थ) के गुणीभूत होने की स्थिति
में व्यापार का प्राधान्य होने पर काव्य की धी होती है ।'
वह निरस्त हो जाता है । यदि ध्वनन रूप व्यापार रसना-स्वभाव है आपने अपूर्व
नहीं कहा । यदि अभिधा ही व्यापार है तथापि उसका प्राधान्य नहीं है, यह पहले
बताया जा चुका है !
श्लोक की व्याख्या करते हैं—विविध— । विविध अर्थात् उस-उस अभिव्यञ्जनीय
रस के आनुगुण्य से विचित्र बनाकर, वाच्य, वाचक और रचना में प्रपञ्च जो चारु
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
१. 'वाल्मीकि रामायण' में उल्लिखित 'क्रौञ्चवध' घटना के अनुसार क्रौञ्च के जोड़े में से नर
क्रौञ्च का ही वध निर्दिष्ट है और उसके वियोग में क्रौञ्ची रुदन करती है—'तं शोणितपरीताङ्गं
चेष्टमानं महीतले । दृष्ट्वा क्रौञ्ची रुरोदार्ता करुणं खे परिभ्रमा ॥' प्रस्तुत ग्रन्थ में क्रौञ्चयुगल में
सहचरी के वध और क्रौञ्च के आक्रन्द का उल्लेख है, इतना ही नहीं, 'लोचन' से भी सहचरी
क्रौञ्ची का वध ही सिद्ध होता है । साथ ही 'काव्यमीमांसा' में राजशेखर ने भी 'निपादनिहतसह-
चरीकं क्रौञ्चयुवानम्' उल्लेख द्वारा क्रौञ्ची का वध माना है । यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है

९० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
मित्यर्थः । तेन सर्वत्रापि ध्वननसद्भावेऽपि न तथा व्यवहारः । आत्मस-
द्भावेऽपि क्वचिदेव जीवव्यवहार इत्युक्तं प्रागेव । तेनैतन्निरवकाशम्; यदुक्तं हृदय-
दर्पणे—‘सर्वत्र तर्हि काव्यव्यवहारः स्यात्’ इति । निहतसहचरीति विभाव
उक्तः । आक्रन्दितशब्देनानुभावः । जनित इति । चर्वणागोचरत्वेनेति शेषः ।
अर्थात् शब्द और अर्थ के अलङ्कार और गुणों से युक्त है। इस लिए सर्वत्र ध्वनन के
होते हुए भी काव्य का व्यवहार नहीं होता है ।¹ पहले ही कह चुके हैं कि आत्मा के
सद्भाव में भी कहीं-कहीं पर ही 'जीव' का व्यवहार होता है ! इस लिए इस बात का
कोई अवकाश ही नहीं जो कि 'हृदयदर्पण' में कही गई है—'तब तो सर्वत्र काव्य का
व्यवहार होगा ।' 'निहतसहचरी' के द्वारा विभाव कहा है, 'आक्रन्दित' से अनुभाव ।
उत्पन्न— । शेष यह कि चर्वणा के गोचर होने से ।
कि यदि वृत्तिकार, लोचनकार एवं राजशेखर तीनों ने यह जानते हुए कि 'रामायण' में क्रौञ्च
के ही वध का निर्देश है, प्रस्तुत में जो विरुद्धार्थ का प्रतिपादन किया है, उसमें निमित्त क्या है ?
दीधितिकार ने मूल वृत्तिग्रन्थ और लोचन का पाठ ही परिवर्तित कर दिया है, उनका पाठ
है—'निहतसहचर-विरहक्रौञ्च्याक्रन्दजनितः ।' परन्तु कुछ लोगों ने क्लिष्ट समास करके मूल का
परिवर्तन न करते हुए भी व्याख्यान किया है जिससे उनका अभिमत क्रौञ्च का वध और क्रौञ्ची का
आक्रन्द सिद्ध हो जाता है, इसके अनुसार—'निहतः सहचरीविरहकातरः यः क्रौञ्चः तदुद्देशकः
क्रौञ्चीकर्तृको यः आक्रन्दः तज्जनितः' होगा । इस प्रकार रामायण का विरोध भी नहीं होता
और न यथास्थित मूल का परिवर्तन ही करना पड़ता है । कुछ विद्वानों का तीसरा पक्ष यह है
कि क्यों न यही माना जाय कि रामायण का विरोध होने पर भी यथास्थित मूल का पाठ ही
ठीक है ? यह इस लिए भी कह सकते हैं कि ध्वन्यालोक और लोचन की प्रायः सभी प्रतियों में
ऐसा ही पाठ मिलता है । उसे सर्वथा 'गलत' करार देना ठीक नहीं कहा जा सकता । दूसरे,
उपपत्ति यह मिलती है कि 'ध्वन्यालोक' ग्रन्थ प्रधान रूप से ध्वनि का प्रतिपादन करता है,
अतः इसे ध्वन्यर्थ ही अभिप्रेत है । 'मा निषाद०' का भी ध्वन्यर्थ है कि 'हे निषाद ! ( रावण ! )
राम और सीता के जोड़े में से एक को ( अर्थात् सीता को ) जो तू ने वध किया ( बल्कि वध से
भी अधिक पीड़ा दी ) उस कारण तू ( लङ्का में अधिष्ठान रूप ) प्रतिष्ठा को न प्राप्त कर ।' तो,
नहीं स्वीकार किया जाय कि ध्वन्यालोककार ने जानबूझ कर रामायण की घटना को अपने
अनुकूल ढालकर ध्वन्यर्थ के उचित यह उदाहरण प्रस्तुत किया है ! यह ध्वन्यर्थ 'रामायण' के
प्राचीन टीकाकारों के अनुसार एवं करुण रस के अनुकूल है । अतः यह पक्ष बहुत अंश में मन्तव्य
प्रतीत होता है ।
१. यह तो सिद्धान्त ही है कि ध्वनि काव्य का आत्मा है, सारभूत तत्त्व है। किन्तु सारभूत
उस ध्वनि तत्त्व के रहने मात्र से काव्य की पूर्णता नहीं होती, किन्तु उसके साथ ही उस काव्य
को अभिव्यञ्जनीय रस के आनुगुण्य से वाच्य, वाचक और रचना के प्रपञ्च से 'चारु' होना
चाहिए । तात्पर्य यह है कि रस के अनुकूल शब्द और अर्थ के अलङ्कार और गुण का भी वहाँ
योग होना चाहिए । अन्यथा ध्वनि तो बिलकुल साधारण किसी वाक्य में भी हो सकता है,
ऐसी स्थिति में सर्वत्र 'ध्वनि' के व्यवहार की आपत्ति का वारण नहीं हो सकता । जैसा कि लोक
में भी देखते हैं कि आत्मा के सद्भाव होने पर भी जीव का व्यवहार सर्वत्र नहीं, बल्कि कहीं-कहीं
पर ही होता है । वही स्थिति प्रस्तुत में समझनी चाहिए । इसी उद्देश्य से मूल वृत्तिग्रन्थ में 'काव्य'
के विशेषण रूप में 'विविधवाच्यवाचक-रचनाप्रपञ्चचारु' कहा है ।

प्रथम उद्योतः ९१
ध्वन्यालोकः
शोको हि करुणस्थायिभावः। प्रतीयमानस्य चान्यभेददर्श-
नेऽपि रसभावमुखेनैवोपलक्षणं प्राधान्यात्।
शोक करुण का स्थायीभाव है। प्रतीयमान के अन्य भेदों के रहते हुए भी
प्राधान्य के कारण रस और भाव द्वारा ही उनका उपलक्षण (बोधन) है।
लोचनम्
ननु शोकचर्वणातो यदि श्लोक उद्भूतस्तत्प्रतीयमानं वस्तु काव्यस्या-
त्मेति कुत इत्याशङ्क्याह—शोको हीति। करुणस्य तच्चर्वणागोचरात्मनः
स्थायिभावः। शोके हि स्थायिभावे ये विभावातुभावास्तत्समुचिता चित्तवृत्ति-
श्चर्व्यमाणात्मा रस इत्यौचित्यात्स्थायिनो रसतापत्तिरित्युच्यते। प्राक्स्वसंवि-
दितं परत्रानुमितं च चित्तवृत्तिजातं संस्कारक्रमेण हृदयसंवादमादधानं चर्वणा-
यामुपयुज्यते यतः। ननु प्रतीयमानरूपमात्मा तत्र त्रिभेदं प्रतिपादितं न तु
रसैकरूपम्, अनेन चेतिहासेन रसस्यैवात्मभूतत्वमुक्तं भवतीत्याशङ्कयाभ्युपग-
मेनैवोत्तरमाह—प्रतीयमानस्य चेति। अन्यो भेदो वस्त्वलङ्कारात्मा। भावग्रहणेन
यदि शोक की चर्वणा से श्लोक उद्भूत हुआ तो प्रतीयमान (रसरूप) वस्तु
'काव्य का आत्मा' कैसे है? यह आशङ्का करके कहते हैं—शोक। उस (शोक) की
चर्वणा के विषय रूप करुण का स्थायीभाव। शोक के स्थायीभाव होने पर जो
विभाव, अनुभाव हैं उनके समुचित चित्तवृत्ति चर्व्यमाण रूप रस हो जाती है, इस
औचित्य के बल से स्थायीभाव रस की अवस्था को प्राप्त करता है, ऐसा कहा
जाता है। पहले अपने में संविदित (अनुभूत) और दूसरे में अनुमित चित्तवृत्तिसमूह
संस्कार के क्रम से हृदय-संवाद को प्राप्त करता हुआ चर्वणा¹ में उपयोगी होता है।
जब कि प्रतीयमान रूप आत्मा है, उसमें तीन भेदों का प्रतिपादन हुआ है न कि
एकमात्र रस रूप प्रतीयमान (ही प्रतिपादित है), और इस इतिहास से रस का ही
आत्मभूतत्व कहा गया है, यह आशङ्का करके अभ्युपगम द्वारा ही उत्तर कहते हैं—
प्रतीयमान के—। अन्य भेद अर्थात् वस्तु और अलङ्कार रूप भेद। 'भाव'² के ग्रहण से
चर्वणा के गोचर व्यभिचारीभाव की उतने मात्र में विश्रान्ति न होने पर भी, स्थायी-
१. 'चर्वणा' एक पुनः पुनः आस्वादन रूप अलौकिक व्यापार है। इसा के द्वारा चित्तवृत्ति
का रसानुभूति की अवस्था में आस्वादन होता है। इसके पूर्व चित्तवृत्ति हृदय-संवाद की स्थिति
में आकर तन्मयीभाव को प्राप्त करती है। तभी उसकी 'चर्वणा' होती है। यह प्रसंग पहले भी
आ चुका है।
२. रस के साथ भाव के उल्लेख का तात्पर्य यह है कि भाव के व्यञ्जित होने पर भी
काव्यात्मत्व सुरक्षित रहता है। यद्यपि व्यभिचारी भाव, चर्वणा की स्थिति में न तो स्वरूप मात्र
में विश्रान्त होगा और न रस की प्रतिष्ठा को, जो स्थायी भाव की चर्वणा से प्राप्त होती है, प्राप्त
करेगा। तथापि उस व्यभिचारी भाव की चर्वणा से भी चमत्कार अवश्य होता है इस लिए भाव
आदि भी संग्राह्य हैं।

९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु निःष्यन्दमाना महतां कवीनाम् ।
अलोकसामान्यमभिव्यनक्ति परिस्फुरन्तं प्रतिभाविशेषम् ॥ ६॥
उस स्वादु ( रसस्वभावरूप ) अर्थ वस्तु को प्रवर्त्तित करती ( प्रवाहित करती ) हुई
महाकवियों की सरस्वती ( वाणी ) अलौकिक, परिस्फुरित होते हुए प्रतिभा-विशेष
को अभिव्यक्त करती है ॥ ६ ॥
लोचनम्
व्यभिचारिणोऽपि चर्व्यमाणस्य तावन्मात्राविश्रान्तावपि स्थायिचर्वणापर्यव-
सानोचितरसप्रतिष्ठामनवाप्यापि प्राणत्वं भवतीत्युक्तम् । यथा—
नखं नखाग्रेण विघट्टयन्ती विवर्तयन्ती वलयं विलोलम् ।
आमन्द्रमाशिञ्जितनूपुरेण पादेन मन्दं भुवमालिखन्ती ॥
इत्यत्र लज्जायाः । रसभावशब्देन च तदाभासतत्प्रशमावपि संगृहीतावेव;
अवान्तरवैचित्र्येऽपि तदेकरूपत्वात् । प्राधान्यादिति । रसपर्यवसानादित्यर्थः ।
तावन्मात्राविश्रान्तावपि चान्यशाब्दवैलक्षण्यकारित्वेन वस्त्वलङ्कारध्वनेरपि
जीवितत्वमौचित्यादुक्तमिति भावः ॥ ५ ॥
एवमितिहासमुखेन प्रतीयमानस्य काव्यात्मतां प्रदर्श्य स्वसंवित्तिसिद्धमप्येत-
दिति दर्शयति—सरस्वतीति । वाग्रूपा भगवतीत्यर्थः । वस्तुशब्देनार्थशब्दं
तत्त्वशब्देन च वस्तुशब्दं व्याचष्टे—निःष्यन्दमानेति । दिव्यमानन्दरसं स्वयमेव
प्रस्नुवानेत्यर्थः । यदाह भट्टनायकः—
भाव की चर्वणा के पर्यवसान रूप उचित रस की प्रतिष्ठा को न प्राप्त करके भी प्राणत्व
बन जाता है, यह कहा है । जैसे—
'नख को नखाग्र से लिखती, चंचल वलय को घुमाती और गम्भीर स्वर में बजते
नूपुरों से युक्त अपने पैर से धीरे-धीरे जमीन पर लिखती हुई।'
यहाँ लज्जा का । 'रसभाव' शब्द से उनके आभास और प्रशम भी संगृहीत ही हुए;
क्योंकि अवान्तर वैचित्र्य होने पर भी वे एक ही रूप के हैं । प्राधान्य से— । अर्थात्
रस में पर्यवसान से । भाव यह कि वस्तु अलङ्कार के स्वरूप मात्र में विश्रान्ति के न
होने पर भी दूसरे शब्द से वैलक्षण्यकारी होने के कारण वस्तुध्वनि और अलङ्कार
ध्वनि का भी जीवितत्व औचित्य से कहा है ।
इस प्रकार इतिहास के प्रकार से 'प्रतीयमान' का काव्यात्मत्व प्रदर्शित करके
'(सहृदय जनों के) अपने अनुभव से भी सिद्ध है' यह दिखाते हैं—सरस्वती— ।
'वस्तु' शब्द से 'अर्थ' शब्द की और 'तत्त्व' शब्द से 'वस्तु' शब्द की व्याख्या करते
हैं—प्रवाहित करती हुई— । अर्थात् दिव्य आनन्द को स्वयं ही प्रस्तुत करती हुई ।
जैसा कि भट्टनायक ने कहा है—
१. कारिकाग्रन्थ में 'अर्थवस्तु' का प्रयोग है और वृत्तिग्रन्थ में उसकी व्याख्या 'वस्तु' शब्द से

प्रथम उद्योतः ९३
लोचनम्
वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि रसं यद्बालतृष्णया ।
तेन नास्य समः स स्याद् दुह्यते योगिभिर्हि यः ॥
तदावेशेन विनाप्याक्रान्त्या हि यो योगिभिर्दुह्यते । अत एव—
यं सर्वशैलाः परिकल्प्य वत्सं मेरौ स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे ।
भास्वन्ति रत्नानि महौषधींश्च पृथूपदिष्टां दुदुहुर्धरित्रीम् ॥
इत्यनेन साराग्रयवस्तुपात्रत्वं हिमवत उक्तम् । 'अभिव्यनक्ति परिस्फु-
रन्तमिति । प्रतिपत्तॄन् प्रति सा प्रतिभा नानुनीयमाना, अपि तु तदावेशेन
भासमानेत्यर्थः । यदुक्तमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन—'नायकस्य कवेः श्रोतुः
समानोऽनुभवस्ततः ।' इति । 'प्रतिभा' अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा; तस्या
'( सहृदय जन रूप ) वत्स में स्नेह के कारण वाणीरूप धेनु इस रस को जो कि
प्रस्तुत करती है, इस लिए इसके समान वह ( रस ) रस नहीं हो सकता जिसे योगी
लोग दुहा करते हैं ।'
जिसे योगी लोग रसावेश के बिना ही केवल बलात्कारपूर्वक दुहा करते हैं ।
अत एव—
'दोहन कार्य में चतुर दुहने वाले मेरुपर्वत के विद्यमान रहने पर सारे पर्वतों ने
जिस हिमालय को वत्स बनाकर पृथु के द्वारा प्रदर्शित पृथिवी से प्रदर्शित चमकदार
रत्नों और महौषधियों का दोहन किया ।'
इससे सारवस्तुओं का पात्रत्व हिमवान् का कहा है । 'परिस्फुरित होते हुए को
अभिव्यञ्जित करती है ।' अर्थात् प्रतिपत्ता ( सहृदय ) जनों के प्रति वह प्रतिभा
अनुमीयमान नहीं होती, बल्कि उसके ( प्रतिभा के विषयीभूत रस के ) आवेश से
भासित होता है । जैसा कि हमारे उपाध्याय भट्ट तौत ने कहा है—'नायक, कवि
और श्रोता का उससे ( उस कारण ) समान अनुभव होता है ।' अपूर्व वस्तु के
निर्माण में समर्थ प्रज्ञा 'प्रतिभा' ( कहलाती ) है, उसका 'विशेष', रसावेश के कारण
की गई है । लोचनकार का कहना है कि 'वस्तु' शब्द 'अर्थ' की व्याख्या है और 'तत्त्व' शब्द
'वस्तु' की व्याख्या है । तात्पर्य यह कि वस्तु, अलङ्कार और रस रूप अर्थों अर्थात् वस्तुओं में जो
वस्तु अर्थात् तत्त्व या सार ।
१. आचार्य ने महाकवियों की वाणी को व्यङ्ग्यार्थ को प्रवाहित करने वाली कहा है। यह
एक प्रकार की धेनु है जो सहृदयरूपी वत्सों को स्वयं दिव्य रस पिलाकर आनन्दित करती है ।
यहाँ लोचनकार ने 'वचन' उद्धृत करके यह निर्देश किया है कि वह आनन्द, जो सहृदयों को
कविता से प्राप्त होता है, तथा वह आनन्द, जो योगियों को समाधि में मिलता है, दोनों में बहुत
अन्तर है । इस प्रकार कवियों के प्रतिभा-विशेष का पता चलता है । जो कविता जितना ही रस
का अनुभव कराती है उतना ही उससे कवि की प्रतिभाविशेष का अन्दाजा मिलता है । और
उसी अभिव्यक्त प्रतिभा-विशेष के आधार पर ही कवि की महाकवि की कोटि में गणना होती है ।
संसार में हजारों की संख्या में कवि होते आए हैं, किन्तु वह प्रतिभा-विशेष का ही चमत्कार है जो
कालिदास प्रभृति कुछ ही कवि महाकवि की श्रेणी में आते हैं ।

९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
तत् वस्तुतत्त्वं निःष्यन्दमाना महतां कवीनां भारती अलोकसामान्यं
प्रतिभाविशेषं परिस्फुरन्तमभिव्यनक्ति । येनास्मिन्नतिविचित्रकविपर-
म्परावाहिनि संसारे कालिदासप्रभृतयो द्वित्राः पञ्चषा वा महाकवय
इति गण्यन्ते ।
इदं चापरं प्रतीयमानस्यार्थस्य सद्भावसाधनं प्रमाणम्—
शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते ।
वेद्यते स तु काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव केवलम् ॥ ७ ॥
उस वस्तुतत्त्व को प्रवाहित करती हुई महान् कवियों की सरस्वती (वाणी)
परिस्फुरित होते हुए अलोकसामान्य प्रतिभा-विशेष को अभिव्यक्त करती है। जिससे
अतिविचित्र कवियों की परम्परा से युक्त इस संसार में कालिदास प्रभृति दो-तीन
अथवा पाँच-छः महाकवि गिने जाते हैं।
और यह दूसरा प्रतीयमान अर्थ के सद्भाव का साधन प्रमाण है—
केवल शब्द-अर्थ के शासनों (नियमों) के ज्ञानमात्र से नहीं जाना जाता है,
बल्कि केवल वह तो काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है ॥ ७ ॥
लोचनम्
‘विशेषो’ रसावेशवैशद्यसौन्दर्य काव्यनिर्माणक्षमत्वम् । यदाह मुनिः—‘कवेर-
न्तर्गतं भावम्’ इति । येनेति । अभिव्यक्तेन स्फुरता प्रतिभाविशेषेण निमित्तेन
महाकवित्वगणनेति यावत् ॥ ६ ॥
इदं चेति । न केवलं ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव’ इत्येतत्कारिकासूचितौ स्वरूप-
विषयभेदावेव; यावद्भिन्नसामग्रीवेद्यत्वमपि वाच्यातिरिक्तत्वे प्रमाणमिति
यावत् । वेद्यत इति । न तु न वेद्यते, येन न स्यादसाविति भावः । काव्यस्य
तत्त्वभूतो योऽर्थस्तस्य भावना वाच्यातिरेकेणानवरतचर्वणा तत्र विमुखानाम् ।
उत्पन्न वैशद्यप्रयुक्त सौन्दर्य रूप काव्य-निर्माण की क्षमता है। जैसा कि मुनि ने
कहा है—‘कवि के अन्तर्गत भाव को।' जिससे—। मतलब यह कि अभिव्यक्त
या स्फुरित होते हुए प्रतिभा विशेष रूप निमित्त से महाकवित्व की गणना (कहाकवियों
में गणना) होती है।
और यह—। न केवल ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इस कारिका से सूचित स्वरूप
और विषयगत भेद, बल्कि भिन्न सामग्री द्वारा वेद्यत्व भी (प्रतीयमान = व्यङ्ग्य के)
वाच्य से अतिरिक्त (पृथक्) होने में प्रमाण है। जाना जाता है—। भाव यह कि
न कि नहीं जाना जाता है जिससे वह नहीं होता। काव्य का तत्त्वभूत जो अर्थ
उसकी भावना, वाच्य के अतिरेकपूर्वक निरन्तर चर्वणा उसमें विमुख। स्वर, षड्ज

प्रथम उद्योतः ९५
ध्वन्यालोकः
सोऽर्थो यस्मात्केवलं काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव ज्ञायते । यदि च
वाच्यरूप एवासावर्थः स्यात्तद्वाच्यवाचकरूपपरिज्ञानादेव तत्प्रतीतिः
स्यात् । अथ च वाच्यवाचक लक्षणमात्रकृतश्रमाणां काव्यतत्त्वार्थभाव-
नाविमुखानां स्वरश्रुत्यादिलक्षणमिवाऽप्रगीतानां गान्धर्वलक्षणविदाम-
गोचर एवासावर्थः ।
वह अर्थ जिस कारण काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है। और,
यदि वह अर्थ वाच्यरूप ही होता तो वाच्य और वाचक के रूप के परिज्ञान से ही
उसकी प्रतीति होती । और भी, वाच्य-वाचक के लक्षणमात्र में जिन्होंने श्रम किया
है तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से पराङ्मुख हैं उनके लिए यह अर्थ, गाने में असमर्थ
किन्तु सङ्गीतशास्त्र (गान्धर्व) के लक्षणों को जाननेवालों के लिए स्वर और श्रुति
आदि के तत्त्व की भाँति, अगोचर ही है।
लोचनम्
स्वराः षड्जादयः सप्त । श्रुतिर्नाम शब्दस्य वैलक्षण्यमात्रकारि यद्रूपान्तरं
तत्परिमाणा स्वरतदन्तरालोभयभेदकल्पिता द्वाविंशतिविधा । आदिशब्देन
जात्यंशकग्रामरागभाषाविभाषान्तरभाषादेशीमार्गा गृह्यन्ते । प्रकृष्टं गीतं गानं
येषां ते प्रगीताः, गातुं वा प्रारब्धा इत्यादिकर्मणि क्तः । प्रारम्भेण चात्र फलप-
र्यन्तता लक्ष्यते ॥ ७ ॥
आदि सात । शब्द का वैलक्षण्यकारी जो रूपान्तर है उसके परिमाण की ‘श्रुति’
होती है वह स्वर, स्वरान्तराल, और उभय के भेद से बाईस¹ प्रकार की होती है ।
‘आदि’ शब्द से जात्यंश,² ग्राम, राग, भाषा, विभाषा, अन्तरभाषा, देशी मार्ग गृहीत
होते हैं। प्रकृष्ट गीत या गान है जिनका वे ‘प्रगीत’ हैं अथवा गाने के लिए ‘प्रारब्ध’
इस प्रकार ‘आदिकर्म’ में ‘क्त’ प्रत्यय है। यहाँ ‘प्रारम्भ’ से फलपर्यन्तता लक्षित
होती है।
१. मूल में ‘अप्रगीत’ और ‘प्रगीत’ दोनों पाठ हैं। लोचनकार ने दोनों के अनुसार
व्याख्यान किया है; ‘अप्रगीत’ का अर्थ करते हैं कि वे लोग प्रगीत नहीं अर्थात् प्रकृष्ट गान नहीं
करते हैं । ‘प्रगीत’ का व्याख्यान है कि जिन्होंने गान का प्रारम्भ ही किया है अर्थात् जो अभी
गाने में सफल नहीं हैं । स्पष्टार्थ यह कि जिस प्रकार गान-विद्या में निपुणता हासिल कर लेने
वाला यदि गान का अभ्यास न करने पर स्वर और श्रुति आदि के तत्त्वों से अपरिचित रहता
है उसी प्रकार केवल वाच्य-वाचक मात्र में श्रम करने वाले तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से
विमुख लोग उस प्रतीयमान अर्थ को नहीं समझ सकते । स्वर और श्रुति आदि सङ्गीत-शास्त्रीय
तत्त्वों का विशकलन ग्रन्थान्तर से अवगत करना चाहिए । ‘सङ्गीतरत्नाकर’ में इनका विवेचन विशद
रूप से मिलता है।

९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यङ्ग्यस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्राधान्यं
तस्यैवेति दर्शयति—
इस प्रकार वाच्य से व्यतिरेक ( पार्थक्य ) रखनेवाले व्यङ्ग्य का सद्भाव प्रतिपादन
करके 'प्राधान्य उसका ही है' यह दिखलाते हैं—
लोचनम्
एवमिति । स्वरूपभेदेन भिन्नसामग्रीज्ञेयत्वेन चेत्यर्थः । प्रत्यभिज्ञेयावि-
त्याहार्थे कृत्यः, सर्वो हि तथा यतते इतीयता प्राधान्ये लोकसिद्धत्वं प्रमाण-
मुक्तम् । नियोगाथेन च कृत्येन शिक्षाक्रम उक्तः । प्रत्यभिज्ञेयशब्देनेदमाह—
'काव्यं तु जातु जायेत कस्यचित्प्रतिभावतः ।'
इस प्रकार— । अर्थात् स्वरूप-भेद और भिन्न सामग्री द्वारा ज्ञेय होने के कारण ।
'प्रत्यभिज्ञेय' यहाँ अहार्थ में 'कृत्य' प्रत्यय हुआ है, सब लोग इस अंश में प्रयत्न करते
हैं, 'सहृदयों द्वारा प्रत्यभिज्ञेय है' इतने से व्यङ्ग्य के प्राधान्य के सम्बन्ध में लोकसिद्धत्व
को प्रमाण कहा है । नियोगाथक 'कृत्य' प्रत्यय द्वारा शिक्षा का क्रम सूचित किया है ।'
'प्रत्यभिज्ञेय' शब्द से यह कहते हैं—
'काव्य तो कदाचित् किसी प्रतिभावान् से उत्पन्न होता है ।'
१. 'उन अर्थ और शब्द महाकवि के प्रत्यभिज्ञेय हैं' आचार्य के इस कथन का एक अभिप्राय
यह भी हो सकता है कि सहृदय लोगों द्वारा महाकवि के शब्द-अर्थ प्रत्यभिज्ञेय या पहचानने
योग्य हैं और दूसरा यह भी हो सकता है कि महाकवि को स्वयं उन्हीं शब्द-अर्थ का प्रत्यभिज्ञान
करना चाहिए । 'प्रत्यभिज्ञेय' 'अर्हार्थ' में 'कृत्य' प्रत्यय मानने पर प्रथम पक्ष के अनुकूल व्याख्यान
होगा । इसलिए लोचनकार ने यहाँ यह अर्थ उद्भावित किया है कि व्यङ्ग्य अर्थ का प्राधान्य
इसलिए है कि सभी लोग उस प्रकार के शब्द अर्थ के ज्ञान की इच्छा से प्रयत्न करते हैं । इस
प्रकार तथाविध अर्थ और शब्द के प्राधान्य में लोकसिद्धत्व यह प्रमाण या हेतु कहा गया । किसी
भी अप्रधान वस्तु के लिए लोकप्रवृत्ति नहीं होती । यहाँ 'लोक' शब्द से 'सहृदय' ही समझना
चाहिए । दूसरे अभिप्राय के अनुसार यहाँ कृत्य-प्रत्यय नियोगाथक है । अर्थात् आचार्य कवियों
को यह शिक्षा देते हैं कि उन्हें पूर्वोक्त' शब्द-अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । क्योंकि जैसा
वृत्तिग्रन्थ भी निर्देश करता है कि व्यङ्ग्य अर्थ और व्यञ्जक शब्द का ही सुप्रयोग करके महाकवि
महाकवि बनता है अतः उसके लिए उनका प्रत्यभिज्ञान अनिवार्य है ।
२. 'प्रत्यभिज्ञेय'—लोचनकार की दृष्टि में ग्रन्थकार का यह प्रयोग विशेष तात्पर्य रखता है ।
ग्रन्थकार का कहना है कि शब्द अर्थ जो सामान्य रूप से व्यवहार में विदित होते हैं उन्हें काव्य
के क्षेत्र में उसी रूप में नहीं जानना चाहिए । यद्यपि 'प्रत्यभिज्ञान' ज्ञात वस्तु का ही पुनः
ज्ञान होता है, तथापि यहाँ ज्ञान का विशेष रूप से अनुसन्धान को ही 'प्रत्यभिज्ञान' से समझना
चाहिए । जब तक लोकव्यवहार की स्थिति है, शब्द-अर्थ अपने साधारण रूप से होते हैं किन्तु
काव्य के क्षेत्र में उनकी सीमा का विस्तार हो जाता है और उनका स्वरूप भी बहुत कुछ
निखर जाता है अतः केवल ज्ञात का पुनः ज्ञान न करके ज्ञात का पुनः पुनः अनुसन्धान रूप
विशेष निरूपण या प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । यह प्रतिभावान् महाकवि के लिए उतना ही
अपेक्षित है जितना सहृदय के लिए । लोचनकार ने प्रस्तुत वक्तव्य को अपने रंग में ढालते हुए