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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

प्रथम उद्योतः ६९
लोचनम्
ध्वननव्यापारः किं न सह्यते । किं च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्रा-
हकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिध्वंसोऽयम् । यदाह—'क्रोधोऽपि देवस्य
वरेण तुल्यः' इति । अथ रसस्यैवेयता प्राधान्यमुक्तम्; तत्को न सहते । अथ
वस्तुमात्रध्वनेरेतदुदाहरणं न युक्तमित्युच्यते, तथापि काव्योदाहरणत्वाद् द्वाव-
प्यत्र ध्वनी स्तः, को दोषः ।
यदि तु रसानुवेधेन विना न तुष्यति, तद् भयानकरसानुवेधो नात्र सहृद-
यहृदयदर्पणमध्यास्ते; अपि तु उक्तनीत्या सम्भोगाभिलाषविभावसङ्केतस्था-
नोचितविशिष्टकाकाद्यनुभावशबलनोदितशृङ्गाररसानुवेधः । रसस्यालौकिकत्वा-
प्रतिपत्ता की प्रतिभा से प्राणित ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सहन करते ? दूसरे यह
कि वस्तुध्वनि को तो दूषित करते हैं, रसध्वनि का, 'जो उस (वस्तुध्वनि) का
अनुग्राहक है, समर्थन करते हैं, तो खूब यह ध्वनि का ध्वंस है ! जो कि कहा है—
'देवता का क्रोध भी वर के जैसा होता है।' यदि कहिए कि अब तक रस का ही
प्राधान्य कहा है, तो इस बात को कौन नहीं सहन करता है ? यदि वस्तुमात्र ध्वनि
का यह उदाहरण ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं तथापि काव्य के उदाहरण होने से दोनों
ध्वनि यहाँ हैं तो क्या दोष है ?
यदि (सहृदय) विना रसानुवेध (रसावेश) के सन्तुष्ट नहीं होता है, तो
(कहना यह है कि) सहृदय के हृदय-दर्पण में भयानक रस का आवेश अधिष्ठित नहीं
होता, बल्कि उक्त प्रकार से सम्भोग की अभिलाषा का उद्दीपन-विभाव जो सङ्केत-स्थान
है उसके उचित जो विशिष्ट काकु आदि अनुभाव हैं, उनके शबलन (सम्मिश्रण) से
शृङ्गाररस का अनुवेध (आवेश) उदित होता है। रस के अलौकिक होने से और
उतने मात्र से ही उसका अवगम सम्भव नहीं है, अतएव प्रथम जिनका भेद निर्विवाद
समान 'भीरु' नहीं होता है, बल्कि वीरप्रकृति भी होता है। इस पर भट्टनायक के पक्ष का यह
कथन है कि यदि प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष अर्थात् भीरुत्व को यहाँ भयानकरस के आवेश के
होने में सहकारी कारण कल्पित कर लिया जाय तो नियम बन सकता है और उस तरह का
प्रत्येक प्रतिपत्ता भयानकरस के आवेश से 'निषेध' का ज्ञान कर सकता है। इस पर लोचनकार
का कहना है कि जब आपने प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष तक को स्वीकार कर लिया तब ध्वननव्यापार
को क्यों नहीं सह लेते हैं, क्योंकि ध्वनन में भी तो प्रतिपत्ता का प्रतिभाविशेष सहकारी होता
है ? आश्चर्य तो इस पर होता है कि वस्तुध्वनि को स्वीकार नहीं करते और रसध्वनि को स्वीकार
करते हैं, जब कि सध्वनि वस्तुध्वनि का अनुग्राहक है। यदि आप इस पर अड़े हुए हैं कि यहाँ
रसध्वनि का प्राधान्य है तो हम आपकी बात को अमान्य नहीं ठहराते। हमें तो बस यही कहना
है कि किसी प्रकार 'ध्वनि' का निराकरण नहीं होना चाहिए। प्रस्तुत में यदि रसध्वनि और
वस्तुध्वनि दोनों हों, तो क्या हर्ज है !

७० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
तावन्मात्रादेव चानवगमात्प्रथमं निर्विवादसिद्धविविक्तविधिनिषेधप्रदर्शनाभि-
प्रायेण चैतद्वस्तुध्वनेरुदाहरणं दत्तम् ।
यस्तु ध्वनिव्याख्यानोद्यतस्तात्पर्यशक्तिमेव विवक्षासूचकत्वमेव वा ध्वनन-
मवोचत्, स नास्माकं हृदयमावर्जयति । यदाहुः—'भिन्नरुचिर्हि लोकः' इति ।
तदेतदग्रे यथायथं प्रतनिष्याम इत्यास्तां तावत् । भ्रमेति । अतिसृष्टोऽसि प्राप्तस्ते
भ्रमणकालः । धार्मिकेति । कुसुमाद्युपकरणार्थं युक्तं ते भ्रमणम् । विस्रब्ध इति
शङ्काकारणवैकल्यात् । स इति यस्ते भयप्रकम्पामङ्गलतिकामकृत । अद्येति ।
दिष्ट्या वर्धस इत्यर्थः । मारित इति पुनरस्यानुत्थानम् । तेनेति । यः पूर्वं कर्णो-
पकर्णिकया त्वयाप्याकर्णितो गोदावरीकच्छगहने प्रतिवसतीति । पूर्वमेव हि
तद्रक्षायै तत्तयोपश्रावितोऽसौ; स चाधुना तु दृप्तत्वात्ततो गहनान्निस्सरतीति
प्रसिद्धगोदावरीतीरपरिसरानुसरणमपि तावत्कथाशेषीभूतं का कथा तल्लतागहन-
प्रवेशशङ्कयेति भावः ।
सिद्ध है उन विधि और निषेध के प्रदर्शन के अभिप्राय से यह वस्तुध्वनि¹ का उदाहरण
दिया है ।
जिसने ध्वनि का व्याख्यान करने के लिए उद्यत हो, तात्पर्य शक्ति को ही अथवा
विवक्षा के सूचकत्व ( अनुमापकत्व ) को ही ध्वनन कहा है, वह हमारे हृदय को
आकृष्ट नहीं करता । जैसा कि कहते हैं—'लोग भिन्न रुचि के होते हैं।' तो इसे आगे
यथावत् विस्तार करेंगे । घूमो—। तुम अतिसृष्ट हो ( तुम्हारी इच्छा पर है घूमो अथवा
न घूमो ), तुम्हारे घूमने का यह समय है । धार्मिक ( बाबाजी )—। फूल आदि सामग्री
के लिए तुम्हारा घूमना ठीक है । इतमीनान से—। क्योंकि शङ्का करने का अब कोई
कारण नहीं रह गया । वह—। जिसने तुम्हारे अङ्गों को भय से कम्पित कर डाला
था । आज—। अर्थात् तुम्हारे भाग्य की वृद्धि है । मार डाला गया—। अब फिर वह
नहीं आएगा । उस ( सिंह ने )—। जिसे पहले से तुमने भी कानोंकान सुन रखा है कि
गोदावरी के गहन कच्छ में रहता है । पहले से ही उस स्वैरिणी ने सङ्केत स्थान की
रक्षा के लिए सिंह के गोदावरी के गहन कच्छ में निवास करने का वृत्तान्त धार्मिक
को सुना रखा है । भाव यह कि ( पहले तो कच्छ गहन में रहता मात्र था ) अब तो
वह दृप्त ( मत्त, पागल ) हो जाने के कारण गहन से निकल जाता है, इसलिए प्रसिद्ध
गोदावरी नदी के तीर की भूमि के आस-पास घूमना भी बिल्कुल बन्द हो गया है
( सिर्फ चर्चा का विषय बन कर रह गया है ) वहाँ के लतागहन में प्रवेश की शङ्का
की तो बात ही नहीं ।
१. सहृदय पर भयानक रस का आवेश तो कतई नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कह
सकते हैं कि यहाँ शृङ्गार रस का अनुवेध है । परन्तु इसे वस्तुध्वनि का उदाहरण देते हुए आचार्य
का अभिप्राय यह है कि पहले निर्विवादसिद्ध विधि-निषेध का प्रदर्शन हो जाय ।

प्रथम उद्योतः ७१
ध्वन्यालोकः
क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा—
अत्ता एत्थ णिमज्जइ एत्थ अहं दिअसअं पलोएहि ।
मा पहिअ रत्तिअन्धअ सेज्जाए मह णिमज्जहिसि ॥
कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यंग्य विधिरूप; जैसे—
सास यहाँ गहरी सोती है, यहाँ मैं (सोती हूँ), दिन में ही देख लो। रात
के अन्धे (रतौंधी के रोगी) हे पथिक ! कहीं हमारी खाट पर न गिर पड़ना ।
लोचनम्
अत्ता इति ।
श्वश्रूरत्र शेते अथवा निमज्जति अत्राहं दिवसकं प्रलोकय ।
मा पथिक रात्र्यन्ध शय्यायामावयोः शयिष्ठाः ॥
मह इति निपातोऽनेकार्थवृत्तिरत्रावयोरित्यर्थे न तु ममेति । एवं हि विशेष-
वचनमेव शङ्काकारि भवेदिति प्रच्छन्नाभ्युपगमो न स्यात् । कांचत्प्रोषित-
पतिकां तरुणीमवलोक्य प्रवृद्धमदनाङ्कुरः संपन्नः पान्थोऽनेन निषेधद्वारेण तया-
भ्युपगत इति निषेधाभावोऽत्र विधिः । न तु निमन्त्रणरूपोऽप्रवृत्तप्रवर्तनास्व-
भावः सौभाग्याभिमानखण्डनाप्रसङ्गात् । अत एव रात्र्यन्धेति समुचितसमय-
(प्राकृत गाथा में) 'मह' यह निपात अनेकार्थवृत्ति होने के कारण यहाँ 'हमारी'
(अर्थात् मेरी और सास की) इस अर्थ में है न कि 'मेरी' इस अर्थ में। ऐसा करने
पर ('मम' यह) विशेष वचन ही श्वश्रू को शङ्कित कर देने वाला^१ हो जायगा,
ऐसी स्थिति में नायिका द्वारा किया गया पथिक का प्रच्छन्नाभ्युपगम (छिपे ढंग से साथ
सोने की स्वीकृति) नहीं बनेगा। किसी प्रोषित-पतिका (जिसका पति परदेश चला
गया है) तरुणी को देखकर कोई पथिक विशेष कामासक्त हो गया, तब इस निषेध के
प्रकार से उस तरुणी ने उसे शयन के लिए वचन दिया, इस प्रकार यहाँ निषेधाभावरूप
विधि है, न कि अप्रवृत्त में प्रवर्तन स्वभाव का निमन्त्रणरूप^२ (विधि) है; क्योंकि
(तब तो) सौभाग्य के अभिमान के खण्डित हो जाने का प्रसंग होगा। इसीलिए 'रात
के अन्धे' इसके द्वारा योग्य समय में सम्भावित होने वाले विकारों से उसका आकुलित
१. यदि नायिका 'मम' इस विशेष वचन का प्रयोग करेगी तब सुनती हुई उसकी सास को
यह शंका हो सकती है यह (बहू) अपनी ही खाट पर पथिक के गिर जाने की बात क्यों
करती है?, जब कि रतौंधी वाला पथिक मेरी भी खाट पर गिर सकता है। हो न हो यहाँ दाल
में कुछ काला है!
२. प्रस्तुत गाथा में प्रतीयमान विधि को निषेध का अभाव रूप समझना चाहिए, क्योंकि
नायिका ने 'खाट पर गिर न जाना' इस निषेध के प्रकार से पथिक को मिलन का वचन दिया है।
यहाँ आचार्य का निर्देश है कि 'विधि' को निमन्त्रण स्वरूप नहीं समझ लेना चाहिए, अर्थात्
नायिका ने यहाँ अप्रवृत्त पथिक को निमन्त्रण के द्वारा प्रवृत्त नहीं किया है, क्योंकि यदि ऐसा
माना जायगा तब उसे अपने सौभाग्य का अभिमान क्या रह जायगा। पथिक तो स्वयं नायिका से-

७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
सम्भाव्यमानविकाराकुलितत्वं ध्वनितम् । भावतदभावयोश्च साक्षाद्विरोधाद्वा-
च्याद्व्यङ्ग्यस्य स्फुटमेवान्यत्वम् ।
यत्त्वाह भट्टनायकः-‘अहमित्यभिनयविशेषेणात्मदशावेदनाच्छाब्दमेतदपी’-
ति । तत्राहमिति शब्दस्य तावन्नायं साक्षादर्थः; काक्वादिसहायस्य च तावति
ध्वननमेव व्यापार इति ध्वनेर्भूषणमेतत् । अत्तेति प्रयत्नेनानिभृतसम्भोगपरि-
हारः । अथ यद्यपि भवान्मदनशरासारदीर्यमाणहृदय उपेक्षितुं न युक्तः, तथापि
किं करोमि पापो दिवसकोऽयमनुचितत्वात्कुत्सितोऽयमित्यर्थः । प्राकृते पुंनपुंस-
कयोरनियमः । न च सर्वथा त्वामुपेक्षे, यतोऽत्रैवाहं तत्प्रलोकय नान्यतोऽहं
गच्छामि, तदन्योन्यवदनावलोकनविनोदेन दिनं तावदतिवाहयाव इत्यर्थः ।
प्रतिपन्नमात्रायां च रात्रावन्धीभूतो मदीयायां शय्यायां मा श्लिक्षः, अपि
होना ध्वनित होता है । भाव और अभाव इन दोनों में साक्षात् विरोध होने के कारण
वाच्य से व्यंग्य का भिन्नत्व स्पष्ट ही है ।
जो कि भट्टनायक ने कहा है—( गाथा में प्रयुक्त ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस पद के
द्वारा अभिनय विशेष के बल से अपनी दशा के आवेदन करने के कारण यह ( निषेध
के द्वारा जो अभ्युपगमन ) भी वह शब्द ( शब्दाभिधेय ) है ।’ इस पर ( कहते हैं कि )
‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस शब्द का यह ( अभिनय विशेषरूप अभ्युपगमन ) साक्षात् अर्थ नहीं
है, बल्कि काकु की सहायता से ऐसा होता है, ऐसी स्थिति में ध्वनन ही व्यापार ( यहाँ
ठहरता ) है; यह ध्वनि का भूषण है, दूषण नहीं । ( गाथा में ) ‘अत्ता’ ( ‘श्वश्रू’ ) के
प्रयोग द्वारा प्रयत्नपूर्वक सम्भावित अपने अनिभृत ( एकान्त ) सम्भोग का परिहार
है । यद्यपि तुम काम के बाणों की वर्षा से फटे हृदय वाले किसी प्रकार उपेक्षणीय
नहीं हो तथापि यह पापी दिन सम्भोग के लिए अनुचित होने के कारण बड़ा खराब
है—यह अर्थ हुआ । प्राकृत में पुंल्लिङ्ग-नपुंसक का नियम¹ नहीं है । अर्थात् मैं सर्वथा
तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर रही हूँ, क्योंकि देखो कहीं अन्यत्र नहीं जाती हूँ, अतः हम एक
दूसरे का मुख देखने के विनोद से इस दिन को बितायें । रात के होते ही अन्धे होकर
मिलने के लिए प्रवृत्त है, उत्सुक है; इसी कारण ही नायिका ने उसे ‘रात्र्यन्ध’ ( रतौंधी का
रोगी या रात का अन्धा ) कह कर उसके सम्भाव्यमान विकारों के कारण आकुलता को सूचित
किया है ! अन्यथा नायिका को क्या पड़ी थी कि उसे ‘रात्र्यन्ध’ कहती, जब कि वह किसी प्रकार
पहुँचता स्वयं वह मिल ही लेती । किन्तु ऐसी स्थिति ही नहीं है ।
१. तात्पर्य यह कि कोई भी शब्द, जो पुंल्लिङ्ग है वह नपुंसक भी हो सकता है और जो नपुंसक
है वह पुंल्लिङ्ग भी हो सकता है, जैसा कि पुंल्लिङ्ग ‘दिवसक’ शब्द नपुंसक पढ़ा गया है । किन्तु
मेरा विचार है कि ‘दिवसकं प्रलोकय’—प्रस्तुत इस स्थल में ‘दिवसकम्’ यह प्रयोग ‘कालाध्वनोर-
त्यन्तसंयोगे’ के नियम के अनुसार ‘द्वितीया’ विभक्ति का प्रयोग हुआ है। इसलिए यहां प्राकृत-शब्द के
पुंनपुंसकत्व का विचार ही कोई आवश्यक नहीं है । फिर भी, सम्भव है आचार्य का यह
कहना ठीक हो ।

प्रथम उद्योतः ७३
ध्वन्यालोकः
क्वचिद्वाच्ये विधिरूपेऽनुभयरूपो यथा—
वच्च मह च्चिअ एक्केइ होन्तु णीसासरोइअव्वाईं ।
मा तुज्झ वि तीअ विणा दक्खिण्णहअस्स जाअन्तु ॥
कहीं वाच्य के विधिरूप होने पर (व्यङ्ग्य) अनुभय रूप (न विधिरूप तथा न
निषेधरूप) होता है। जैसे—
तू जा, मुझ ही अकेली के निश्वास और रुदन भाग में हों, उसके बिना दाक्षिण्य
(समानुरागिता) से रहित तेरे भी ये (निश्वास, रुदन) मत पैदा हों।
लोचनम्
तु निभृतनिभृतमेवात्ताभिधाननिकटकण्टकनिद्रान्वेषणपूर्वकमितीयदत्र ध्वन्यते।
व्रज ममैवैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितव्यानि ।
मा तवापि तया विना दाक्षिण्यहतस्य जनिषत ॥
अत्र व्रजेति विधिः । न प्रमादादेव नायिकान्तरसंगमनं तव, अपि तु गाढा-
नुरागात्, येनान्यादृङ्मुखरागः गोत्रस्खलनादि च, केवलं पूर्वकृतानुपालना-
त्मना दाक्षिण्येनैकरूपत्वाभिमानेनैव त्वमत्र स्थितः, तत्सर्वथा शठोऽसीति
गाढमन्युरूपोऽयं खण्डितनायिकाभिप्रायोऽत्र प्रतीयते । न चासौ व्रज्याभाव-
रूपो निषेधः, नापि विध्यन्तरमेवान्यनिषेधाभावः ।
मेरी शय्या पर मत गिर जाओ, बल्कि बहुत कायदे से यह पता कर लो कि 'श्वश्रू' नाम
का निकट वाला काँटा नींद में है, यह इतना ध्वनित होता है ।
यहाँ 'जा' यह विधि है। प्रमादवश ही तू दूसरी नायिका से नहीं मिलता, अपितु
गाढ़ अनुरागवश तू (उससे) मिलता है, जिससे यह तेरा मुखराग कुछ भिन्न-सा है और
गोत्रस्खलन (दूसरी नायिका का नामोच्चारण) आदि हो रहे हैं। सिर्फ तू यहाँ मेरे
पालन का जो पहले वचन कर चुका है उसी दाक्षिण्य के कारण जो एकरूपता का
अभिमान तुझे है उसी से तू यहाँ ठहरा है तो तू सर्वथा 'शठ'१ निकला, इस प्रकार
यहाँ 'खण्डिता'२ नायिका का अधिक कोपरूप अभिप्राय प्रतीत होता है। न तो यहाँ
गमनाभावरूप निषेध है और न तो कोई दूसरा विधि (विध्यन्तर) निषेध का अभाव
ही (व्यंग्य होता है)।
१. 'शठ' वह नायक कहलाता है जो एक नायिका में बाहर से अनुराग प्रकट करता है और
छिपे-छिपे दूसरी से अनुराग करते हुए उसका विप्रिय या अहित करता है—गूढविप्रियकृच्छठः ।
२. 'खण्डिता' वह नायिका कहलाती है जिसका प्रिय पराई के साथ सम्पन्न मिलन के चिह्न से
चिह्नित होकर प्रातःकाल उपस्थित होता है और वह उसे देख कर ईर्ष्या से भर जाती है—
पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः ।
सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्ष्याकषायिता ॥ साहित्यदर्पण ३।११७

७४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपेऽनुभयरूपो यथा—
दे आ पसिअ णिवत्तसु मुहससिजोह्लाविलुत्ततमणिवहे ।
अहिसारिआणँ विघ्घं करोसि अण्णाणं वि हआसे ॥
कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यङ्ग्य अनुभयरूप होता है। जैसे—
प्रार्थना करता हूँ, प्रसन्न हो, लौट आओ, अरी, अपने मुखचन्द्र की चाँदनी से
अन्धकार-समूह को दूर करनेवाली, इन आशाओं वाली, तू दूसरी अभिसारिकाओं के
भी विघ्न करती है।
लोचनम्
दे इति निपातः प्रार्थनायाम् । आ इति तावच्छब्दार्थे । तेनायमर्थः—
प्रार्थये तावत्प्रसीद निवर्तस्व मुखशशिज्योत्स्नाविलुप्ततमोनिवहे ।
अभिसारिकाणां विघ्नं करोष्यन्यासामपि हताशे ॥
अत्र व्यवसिताद्गमनान्निवर्तस्वेति प्रतीतेर्निषेधो वाच्यः । गृहागता नायिका
गोत्रस्खलिताद्यपराधिनी नायके सति ततः प्रतिगन्तुं प्रवृत्ता, नायकेन चाटूप-
क्रमपूर्वकं निवर्त्यते । न केवलं स्वात्मनो मम च निर्वृतिविघ्नं करोषि, यावद्-
न्यासामपि; ततस्तव न कदाचन सुखलवलाभोऽपि भविष्यतीत्यत एव हताशा-
सीति वल्लभाभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः ।
यदि वा सख्योपदिश्यमानापि तदवधीरण्या गच्छन्ती सख्योच्यते—न
केवलमात्मनो विघ्नं करोषि, लाघवादबहुमानास्पदमात्मानं कुर्वती, अत एव
हताशा, यावद्वदनचन्द्रिकाप्रकाशितमार्गतयान्यासामप्यभिसारिकाणां विघ्नं
( गाथा में ) 'दे' यह निपात प्रार्थना के अर्थ में है । 'आ' यह निपात 'तावत्' शब्द
के अर्थ में है । इसलिए यह अर्थ हुआ—
प्रार्थना करता हूँ……।
यहाँ व्यवसित गमन से 'लौट आओ' इस प्रतीति के कारण गमन का निषेध वाच्य
है । जब नायिका घर आई तब नायक गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा और वह
(नायिका) लौट जाने के लिए प्रवृत्त हुई, तब नायक प्रशंसा की भाषा का उपक्रम
करके उसे निवृत्त करता है । न केवल तू अपने-आपके और मेरे सुख में विघ्न डालती
है, बल्कि दूसरी स्त्रियों के भी; इसलिए तुझे कभी भी सुखलेश का लाभ भी नहीं होगा,
अतएव तू हताशा है, इस प्रकार नायक का अभिप्राय रूप चाटु विशेष व्यंग्य है ।
अथवा सखी के द्वारा उपदेश दिए जाने पर भी उसे न मानकर जाती हुई नायिका
के प्रति सखी कहती है—न केवल तू अपना विघ्न करती है—इस प्रकार के छुटपन
(लघुता) से अपने को अवहुमान का आस्पद बनाती हुई—अतएव हताशा, बल्कि
तू अपने मुखचन्द्र की चाँदनी से मार्ग को प्रकाशित करके अन्य अभिसारिकाओं के भी
विघ्न करती है, यह सखी का अभिप्रायरूप चाटुविशेष व्यंग्य है । इन दोनों व्याख्यानों में

प्रथम उद्योतः ७५
लोचनम्
करोषीति सख्यभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः । अत्र तु व्याख्यानद्वयेऽपि
व्यवसितात्प्रतीपगमनात्प्रियतमगृहगमनाच्च निवर्तस्वेति पुनरपि वाच्य एव
विश्रान्तेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यभेदस्य प्रेयोरसवदलङ्कारस्योदाहरणमिदं स्यात्,
न ध्वनेः ।
तेनायमत्र भावः—काचिद्रभसात्प्रियतममभिसरन्ती तद्गृहाभिमुखमाग-
च्छता तेनैव हृदयवल्लभेनैवमुपश्लोक्यतेऽप्रत्यभिज्ञानच्छलेन, अत एवात्मप्रत्य-
भिज्ञापनार्थमेव नर्मवचनं हताश इति । अन्यासाञ्च विघ्नं करोषि तव चेप्सित-
लाभो भविष्यतीति का प्रत्याशा । अत एव मदीयं वा गृहमागच्छ, त्वदीयं वा
गच्छावेत्युभयत्रापि तात्पर्यादनुभयरूपो वल्लभाभिप्रायश्चात्वात्मा व्यङ्ग्य
इत्यत्येव व्यवतिष्ठते । अन्ये तु—'तटस्थानां सहृदयानामभिसारिकां प्रतीय-
मुक्तिः' इत्याहुः । तत्र हताशे इत्यामन्त्रणादि युक्तमयुक्तं वेति सहृदया एव
प्रमाणम् ।
भी (नायिका द्वारा) व्यवसित प्रतीपगमन (अपने घर के प्रति गमन) और प्रियतम
के गृह के गमन से 'लौट आओ' (निवृत्त हो) यह जो वाच्य है उसमें ही (सखीगत
नायिकाविषयकभावरूप रति अथवा नायकगत नायिकाविषयक रति के) विश्रान्त होने
के कारण गुणीभूतव्यंग्य के भेद जो क्रमशः प्रेयोऽलङ्कार और रसवदलङ्कार हैं उनका
यह उदाहरण होगा, न कि ध्वनि का।
इसलिए' यहाँ यह भाव है—कोई नायिका झटपट प्रियतम के घर के प्रति
अभिसार करती है, उसी समय मार्ग में उसके घर की ओर आता हुआ वही प्रियतम
अप्रत्यभिज्ञान (नायिका को न पहचानने) के बहाने उसे इस प्रकार प्रशंसा करता है।
इसीलिए अपने को पहचानने के लिए ही नर्मवचन 'हताशे' (का प्रयोग) है। दूसरी
(अभिसारिकाओं) के विघ्न पहुँचाती है, फिर तेरा ईप्सित लाभ होगा, इसकी क्या
प्रत्याशा है ? अतएव 'मेरे घर आ, या हम दोनों तेरे घर चलें' इन दोनों में तात्पर्य
होने के कारण अनुभयरूप चाटुगर्भित प्रिय का अभिप्राय व्यंग्य इतने में ही व्यवस्थित
होता है। दूसरे तो यह कहते हैं कि यह तटस्थ सहृदयों का अभिसारिका के प्रति
वचन है। वहाँ 'हताशे' यह आमन्त्रणादि ठीक है अथवा ठीक नहीं, सहृदयजन ही
प्रमाण हैं।
१. प्रस्तुत गाथा 'दे आ पसिअ०' को आचार्य ने वक्ता के भेद के आधार पर तीन-चार प्रकार
से लगाया है। पहले व्याख्यान के अनुसार नायक के घर पर नायिका पहुँची तब नायक उसके
समक्ष गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा । इस पर तुनक कर जब वह चल पड़ने के लिए उद्यत
हुई तब नायक उसकी प्रशंसा के द्वारा उसे निवृत्त करने का प्रयत्न करने लगा । उसने कहा कि
वह अपने और मेरे सुख में तत्काल विघ्न तो कर ही रही है अन्य अभिसारिकाओं के सुख में भी
विघ्न डाल रही है। 'अभिसारिका' वह नायिका कहलाती है जो अन्धकार आदि में प्रिय का
अभिसरण करती है'। यहाँ नायक का चाटुरूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है। दूसरे व्याख्यान के अनुसार
यह नायिका की सखी का वचन है, नायिका को सखी ने मना किया कि वह तत्काल अभिसार न करे;

७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
क्वचिद्वाच्याद्विभिन्नविषयत्वेन व्यवस्थापितो यथा—
कस्स व ण होइ रोसो दट्ठूण पिआएँ सव्वणं अहरम्।
सभमरपउमग्घाइणि वारिअवामे सहसु एह्निम्॥
अन्ये चैवंप्रकारा वाच्याद्विभेदिनः प्रतीयमानभेदाः सम्भवन्ति।
तेषां दिङ्मात्रमेतत्प्रदर्शितम्। द्वितीयोऽपि प्रभेदो वाच्याद्विभिन्नः
सप्रपञ्चमग्रे दर्शयिष्यते।
कहीं वाच्य से विभिन्न-विषय रूप में व्यवस्थापित व्यङ्ग्य, जैसे—
अथवा प्रिय के व्रणयुक्त अधर को देखकर किसे क्रोध नहीं होता, री, मना करने
पर भी भौंरे सहित कमल को सूंघने वाली, अब तू उसका दुष्परिणाम भुगत!
वाच्य से भेद रखने वाले प्रतीयमान के दूसरे इस प्रकार के भेद सम्भव हैं।
उन्हें दिङ्मात्र यहाँ प्रदर्शित किया है। वाच्य से विभिन्न दूसरा भी प्रभेद आगे प्रपञ्च
के साथ दिखायेंगे।
लोचनम्
एवं वाच्यव्यङ्ग्ययोर्धार्मिकपान्थप्रियतमाभिसारिकाविषयैक्येऽपि स्वरूप-
भेदाद्भेद इति प्रतिपादितम्। अधुना तु विषयभेदादपि व्यङ्ग्यस्य वाच्याद्भेद
इत्याह—क्वचिद्वाच्यादिति। व्यवस्थापित इति। विषयभेदोऽपि विचित्ररूपो
व्यवतिष्ठमानः सहृदयैर्व्यवस्थापयितुं शक्यत इत्यर्थः।
कस्य वा न भवति रोषो दृष्ट्वा प्रियायाः सव्रणमधरम्।
सभ्रमरपद्माघ्राणशीले वारितवामे सहस्वेदानीम्॥
इस प्रकार (इन निर्दिष्ट उदाहरणों में) धार्मिक, पान्थ, प्रियतम और अभिसारिका
के वाच्य और व्यंग्य के एकविषय होने पर भी स्वरूप के भेद से भेद है यह प्रतिपादन
किन्तु जब यह नायिका ने नहीं माना तब सखी ने कहा कि हताशा वह अपना विघ्न तो करती
ही है साथ ही अपने मुखचन्द्र की चन्द्रिका से मार्ग को प्रकाशित करके अन्य अभिसारिकाओं के
भी विघ्न करने के लिए प्रस्तुत है। यहाँ सखी का चाटु रूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है।
आचार्य के कथनानुसार इन दोनों व्याख्यानों में प्रस्तुत गाथा 'ध्वनि' का उदाहरण न
होकर गुणीभूत व्यङ्ग्य का उदाहरण हो जाती है। सखी के वचन के पक्ष में 'प्रेयोऽलङ्कार' है।
भाव के पराङ्ग होने पर 'प्रेयोऽलङ्कार' होता है। यहाँ सखी की नायिका में 'रति' व्यङ्ग्य है
एवं 'लौट आओ' (निवर्त्तस्व) इस वाच्य के प्रति अङ्ग हो रहा है। इसी प्रकार नायक के वचन
के पक्ष में यह रसवदलङ्कार है। क्योंकि रस जब पराङ्ग होता है तब 'रसवदलङ्कार' होता है।
यहाँ नायक की नायिकागत रति प्रस्तुत वाच्य के प्रति अङ्ग हो रही है।
इसलिए आचार्य ने तृतीय व्याख्यान किया कि नायिका को उस समय अभिसार करते हुए
नायक अंधेरे में मार्ग में पाता है जब वह स्वयं नायिका के घर उससे मिलने के लिए जा रहा था।
नायिका को पहचान कर भी न पहचानने का बहाना करके नायक ने प्रस्तुत वचन कहा।

प्रथम उद्योतः ७७
लोचनम्
कस्य वेति । अनीर्ष्यालोरपि भवति रोषो दृष्ट्वैव; अकृत्वापि कुतश्चिद्देवा-
पूर्व्वतया प्रियायाः सव्रणमधरमवलोक्य । सभ्रमरपद्माघ्राणशीले शीलं हि कथंचि-
दपि वारयितुं न शक्यम् । वारिते वारणायां, वामे तदनङ्गीकारिणि । सहस्वेदानी-
मुपालम्भपरम्परा मित्यर्थः । अत्रायं भावः—काचिद्विनीता कुतश्चित्खण्डिता-
धरा निश्चिततत्सविधसंनिधाने तद्भर्त्तरि तमनवलोकमानयेव कयाचिद्विदग्ध-
सख्या तद्वाच्यतापरिहारायैवमुच्यते सहस्वेदानीमिति वाच्यमविनयवतीविषयम् ।
भर्तृविषयं तु-अपराधो नास्तीत्यावेद्यमानं व्यङ्ग्यम् । सहस्वेत्यपि च तद्विषयं
व्यङ्ग्यम् । तस्यां च प्रियतमेन गाढमुपालभ्यमानायां तद्व्यलीकशङ्कितप्रातिवे-
शिकलोकविषयं चाविनयप्रच्छादनेन प्रत्यायनं व्यङ्ग्यम् । तत्सपत्न्यां च तद्दु-
किया गया। अब विषय के भेद से भी व्यंग्य का भेद¹ है, यह कहते हैं—कहीं पर—।
व्यवस्थापित—। अर्थात् विषय का भेद भी विचित्ररूप से रहता हुआ सहृदयजनों के
द्वारा व्यवस्थापित किया जा सकता है ।
अथवा प्रिया के व्रणयुक्त······
ईर्ष्या से रहित व्यक्ति के भी क्रोध देखकर ही चढ़ आता है । न करके भी किसी
कारण अपूर्व भाव से प्रिया के व्रणयुक्त अधर को देखकर । भौंरे सहित कमल को
सूँघने के शील वाली—। शील किसी प्रकार हटाया नहीं जा सकता । वारित में,
निवारण में, वामा अर्थात् निवारण को अङ्गीकार न करनेवाली । अब सहन कर
( दुष्परिणाम भुगत )—। अर्थात् उलहनों की परम्परा को सहन कर ( अपने किए का
दुष्परिणाम भुगत ) । यहाँ भाव यह है—कोई चालाक ( विदग्ध ) सखी किसी अविनीत
नायिका से, जो कहीं से ( जार आदि के द्वारा ) अपना अधर-खण्डित करा चुकी है,
उसके पति को निश्चितरूप से सन्निहित जानकर, उसे ( उसके पति को ) न देखती
हुई-सी, पति के द्वारा उपालम्भ मिलने के परिहार के लिए ( जिससे कि उसका पति
खण्डित-अधर देखकर उसे न डाँटे ) कहती है । 'सहन कर' ( दुष्परिणाम भुगत ) यह
वाच्य अविनयवती उस नायिका के प्रति है । पति के प्रति तो—'इसका अपराध नहीं
है' यह आवेद्यमान ( निरपराधत्व ) व्यंग्य होता है । प्रियतम के द्वारा अधिक
उपालम्भ प्राप्त उस नायिका के होने पर पति का अप्रिय करने से शंकित आस-पास
के लोगों के प्रति नायिका के अविनय के प्रच्छादन के द्वारा ( नायिका के निरपराध
यहाँ 'निवर्तस्व' वाच्य है, किन्तु नायक का यह तात्पर्य व्यङ्ग्य है कि मेरे घर आ अथवा हम
दोनों ही तुम्हारे घर चलें, इस प्रकार यह अनुभय रूप व्यङ्ग्य है । चतुर्थ व्याख्यान के अनुसार
यहाँ तटस्थ सहृदयों का किसी अभिसारिका के प्रति वचन है। आचार्य के कथनानुसार इस
अंश में 'हुताशे' यह आमन्त्रण आदि ठीक बैठ जाता है या नहीं इसका निर्णय तो सहृदय
स्वयं कर सकते हैं !
१. व्यङ्ग्य और वाच्य में विषयभेद और स्वरूपभेद इन दो ही भेदों का दिङ्मात्र प्रदर्शन
'ध्वन्यालोक' में किया गया है। मम्मट आदि अन्य आचार्यों ने और भी कई भेद बतलाए हैं ।
'साहित्यदर्पण' में सबका संग्रह एक कारिका में किया गया है—

७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
पालम्भतदविनयप्रहृष्टायां सौभाग्यातिशयख्यापनं प्रियाया इति शब्दबलादिति
सपत्नीविषयं व्यङ्ग्यम्। सपत्नीमध्ये इयता खलीकृतास्मीति लाघवमात्मनि
ग्रहीतुं न युक्तं; प्रत्युतायं बहुमानः, सहस्व शोभस्वेदानीमिति सखीविषयं
सौभाग्यप्रख्यापनं व्यङ्ग्यम्। अद्येयं तव प्रच्छन्नानुरागिणी हृदयवल्लभैत्थं
रक्षिता, पुनः प्रकटदशनदंशनविधिर्न विधेय इति तच्चौर्यकामुकविषयसम्बोधनं
व्यङ्ग्यम्। इत्थं मयैतदपहृतमिति स्ववैदग्ध्यख्यापनं तटस्थविदग्धलोकविषयं
व्यङ्ग्यमिति। तदेतदुक्तं व्यवस्थापितशब्देन। अय इति द्वितीयोद्द्योते 'असं-
लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः क्रमेणोद्द्योतितः परः' इति विवक्षितान्यपरवाच्यस्य द्वितीय-
होने का) बोधन व्यंग्य है। उसकी सपत्नी के प्रति जो उसे उपालम्भ मिलने के कारण
और उसके अविनय से प्रसन्न है, 'प्रियाया:' इस शब्द के बल से नायिका के अतिशय
सौभाग्य का ख्यापन व्यङ्ग्य है। 'सपत्नियों के बीच इस तरह (अविनय के साफ
जाहिर करने से) मैं गौरवहीन कर दी गई हूँ' इस प्रकार का लघुभाव अपने में रखना
ठीक नहीं है, बल्कि यह (बहुमान-गौरव) की बात है, 'सहस्व' अर्थात् इस समय
शोभित हो, इस प्रकार सखी के प्रति सौभाग्य का प्रख्यापन व्यङ्ग्य है। 'आज तो
तुम्हारी इस प्रच्छन्नानुरागिणी हृदयवल्लभा को इस प्रकार बचा लिया, फिर कहीं स्पष्ट
रूप से दन्तक्षत नहीं करना' इस प्रकार उस नायिका के चौर्य-कामुक के प्रति सम्बोधन
व्यङ्ग्य है। और तटस्थ विदग्ध लोगों के प्रति 'अपना यह वैदग्ध्य-ख्यापन कि मैंने
इस प्रकार इसे छिपा लिया' व्यङ्ग्य है। इसीलिए वृत्तिग्रन्थ में 'व्यवस्थापित'¹ कहा है।
आगे—। दूसरे 'उद्द्योत' में 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः क्रमेणोद्द्योतितः परः' इस प्रकार
बोद्धृस्वरूपसंख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालानाम् ।
आश्रयविषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधीयते व्यङ्ग्यः ॥
(क) बोद्धृभेद; वाच्य अर्थ को तो पद-पदार्थ की व्युत्पत्ति रखने वाले वैयाकरण आदि भी
समझ लेते हैं, किन्तु व्यङ्ग्य को वही समझता है जो सर्वथा 'सहृदय' है ('सहृदय' वैयाकरण आदि
भी हो सकते हैं!)। (ख) स्वरूपभेद; वाच्य विधि रूप होता है तो व्यङ्ग्य निषेध रूप आदि।
स्वरूपभेद के कई उदाहरण 'ध्वन्यालोक' में दिए गए हैं। (ग) संख्याभेद; यदि वाच्य एक है तो
व्यङ्ग्य अनेक भी हो सकते हैं, जैसे 'गतोऽस्तमर्कः' में वाच्य अर्थ एक है और व्यङ्ग्य अर्थ अनेक
हैं। (घ) निमित्तभेद; वाच्य अर्थ के ज्ञान के कारण (निमित्त) संकेत-ग्रह आदि हैं किन्तु व्यङ्ग्य
अर्थ के बोध के लिए निर्मल प्रतिभा होनी चाहिए, सहृदयता आदि होनी चाहिए। (ङ) कार्यभेद;
वाच्य अर्थ केवल प्रतीति को उत्पन्न करता है और व्यङ्ग्य चमत्कार को भी उत्पन्न करता है। (च)
कालभेद; वाच्य अर्थ पहले प्रतीत होता है और व्यङ्ग्य अर्थ बाद में। (छ) आश्रयभेद; वाच्य अर्थ
शब्द के आश्रित होता है किन्तु व्यङ्ग्य शब्द के एक देश प्रकृति, प्रत्यय, वर्ण, संघटना आदि के
भी आश्रित हो सकता है। (ज) विषयभेद; इसका उदाहरण मूल में 'कस्य न वा भवति०' इस
गाथा में दिया है, यहाँ वाच्यार्थ-बोध का विषय नायिका है और व्यङ्ग्यार्थ का विषय नायक है।
१. प्रस्तुत गाथा में व्यङ्ग्य विषय के भेद से भिन्न रूप में 'व्यवस्थापित' है। 'व्यवस्थापित' कहने
का तात्पर्य है कि यहाँ कोई आचार्य के द्वारा अपनी ओर से नहीं जोड़ा गया है, बल्कि ऐसा है

प्रथम उद्योतः ७९

लोचनम्

प्रभेदवर्णनावसरे । यथा हि विधिनिषेधतदनुभयात्मना रूपेण संकलय्य वस्तु-
ध्वनिः संक्षेपेण सुवचः, तथा नालङ्कारध्वनिः, अलङ्काराणां भूयस्त्वात् । तत
एवोक्तम्-सप्रपञ्चमिति ।
तृतीयस्त्विति । तुशब्दो व्यतिरेके । वस्त्वलङ्कारावपि शब्दाभिधेयत्व-
मध्यासाते तावत् । रसभावतदाभासतत्प्रशमाः पुनर्न कदाचिदभिधीयन्ते,
अथ चास्वाद्यमानताप्राणतया भान्ति । तत्र ध्वननव्यापारादृते नास्ति कल्प-
नान्तरम् । स्खलद्गतित्वाभावे मुख्यार्थबाधादेर्लक्षणा निवन्धनस्यानाशङ्कनीय-
त्वात् । औचित्येन प्रवृत्तौ चित्तवृत्तेरास्वाद्यत्वे स्थायिन्या रसो, व्यभिचारिण्या
‘विवक्षितान्यपरवाच्य’ नामक दूसरे प्रभेद के वर्णन के अवसर में । जिस प्रकार
विधि, निषेध और विधिनिषेधानुभय रूप प्रकार के द्वारा सङ्कलित करके वस्तुध्वनि
को संक्षेप में कहा जा सकता है, उस प्रकार अलङ्कारध्वनि को नहीं कह सकते, क्योंकि
अलङ्कारों की संख्या बहुत है । उसी कारण से कहा—प्रपञ्च के साथ—।
तीसरा प्रभेद तो—। ‘तो’ (‘तु’) शब्द व्यतिरेक में प्रयुक्त है। अभिप्राय यह कि वस्तु
और अलङ्कार शब्द के द्वारा अभिधेय होते भी हैं, लेकिन रस, भाव, रसाभास, भावा-
भास, भावप्रशम कभी-कभी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं होते और केवल प्राण रूप में
विद्यमान जो उनकी आस्वाद्यमानता है उसी के कारण वे प्रकाशित होते हैं । वहाँ ध्वनन
व्यापार को छोड़ कोई दूसरी कल्पना नहीं है । स्खलद्गतित्व के न होने से मुख्यार्थबाध
आदि लक्षणा के कारणों की आशङ्का नहीं की जा सकती । औचित्यपूर्वक प्रवृत्ति के होने
पर जब चित्तवृत्ति का आस्वाद होता है तब स्थायिनी चित्तवृत्ति से रस, व्यभिचारिणी
से भाव, एवं ( स्थायिनी चित्तवृत्ति से ) अनौचित्य-पूर्वक प्रवृत्त होने पर रसाभास


ही । नायिका किसी जार से अपना अधर खण्डित करा कर पहुँची है । यह स्वाभाविक है कि
उसका ‘अपराध’ प्रकट हो जायगा और उसका पति उस पर बेहद कुपित होगा । उसकी सखी ने
उसे निरपराध सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत ‘वचन’ कहा, जिसका व्यङ्ग्य उसके पति, सुनने वाले
आस-पड़ोस के लोग, सौत, स्वयं नायिका, चौर्यकामुक जार एवं तटस्थ विदग्ध जन के प्रति विभिन्न
रूप में प्रतीत होता है । नायिका की सखी उसके पति से यह कहना चाहती है कि इसका कोई
अपराध नहीं है, अन्यथा समझ कर कहीं क्रोध मत कर बैठना । आस-पड़ोस के लोगों से उसके
इस कथन का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि यदि इसका पति इसे उपालम्भ भी दे तो भी इसका
अविनय नहीं समझना चाहिए । सपत्नी, जो नायिका के उपालम्भ और अविनय से प्रसन्न है, के
प्रति ‘प्रियायाः’ इस शब्द के बल से नायिका का सौभाग्यातिशय ख्यापन व्यङ्ग्य है । नायिका के
प्रति व्यङ्ग्य है कि यह न समझना कि सपत्नियों के बीच वह इस तरह हल्की कर दी गई ही है
बल्कि ‘सहस्व’ का दूसरा अर्थ यह है कि अब उनके बीच शोभा को प्राप्त कर । ‘प्राकृत’ में ‘सहसु’
का दूसरा रूप ‘शोभस्व’ भी हो सकता है । चौर्यकामुक के प्रति व्यङ्ग्य यह प्रतीत होता है
कि आज तो किसी प्रकार प्रसन्नानुरागिणी तेरी इस प्रियतमा की रक्षा मैंने कर दी, अब
फिर कहीं स्पष्ट रूप से इसका अधर मत काट देना । तटस्थ सहृदय लोगों के प्रति इस
नायिका-सखी का व्यङ्ग्य प्रतीत होता है कि मैंने सफेद झूठ बोल कर किस प्रकार जाहिर
बात को छिपा दिया !

८० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
भावः, अनौचित्येन तदाभासः, रावणस्येव सीतायां रतेः । यद्यपि तत्र
हास्यरसरूपतैव, 'शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यः' इति वचनात् । तथापि पाश्चात्त्येयं
सामाजिकानां स्थितिः, तन्मयीभवनदशायां तु रतेरेवास्वाद्यतेति शृङ्गारतैव
भाति पौर्वापर्यविवेकावधारणेन 'दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते
श्रुतिम्' इत्यादौ । तदसौ शृङ्गाराभास एव । तदङ्गं भावाभासश्चित्तवृत्तेः प्रशम
एव प्रक्रान्ताया हृदयमाह्लादयति यतो विशेषेण, तत एव तत्संगृहीतोऽपि
पृथग्गणितोऽसौ । यथा—
एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो-
रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् ।
दंपत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषो-
र्भग्नो मानकलिः सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहम् ॥
इत्यत्रेष्र्यारोषात्मनो मानस्य प्रशमः । न चायं रसादिरर्थः 'पुत्रस्ते जातः'
इत्यतो यथा हर्षो जायते तथा । नापि लक्षणया । अपि तु सहृदयस्य हृदय-
होता है, जैसे रावण की सीता में रति से । यद्यपि वहाँ 'हास्यरस' का ही ढंग है,
जैसा कि वचन है—'शृङ्गार से हास्य होता है'; तथापि यह सामाजिकों की पाश्चात्य
(अन्त में होने वाली) स्थिति है । तन्मय होने की स्थिति में तो रति का ही आस्वाद
होता रहता है, इस प्रकार शृङ्गारता ही भासित होती है, पौर्वापर्य (क्रम) के विवेक
के अभाव के कारण—जैसे 'दूर ही से आकर्षण करनेवाले मोहमन्त्र के समान उसके
नाम के कर्णगोचर होने पर०' इत्यादि में । तो यह शृङ्गाराभास ही$^१$ है । उस
(शृङ्गार आदि रसाभास का) अङ्ग जो भावाभास है, चित्तवृत्ति जब प्रशम की
अवस्था में प्रक्रान्त होती है तभी विशेष रूप से हृदय को आह्लादित करता है, इसी
लिए 'भाव' शब्द से वह संगृहीत हुआ भी अलग से गणित है । जैसे—
'एक ही सेज पर एक दूससे से मुँह फेर लेने के कारण निद्रा के समाप्त हो जाने
के बाद सन्तप्त होते हुए, परस्पर एक दूसरे के प्रति अनुनय उनके हृदय में मौजूद था,
तब भी गौरव की रक्षा करते हुए पति और पत्नी के नेत्र जब धीरे से अपाङ्ग की ओर
झुकने के कारण मिल गए, तभी उनका प्रणय-रोष भग्न हो गया और वे हँस कर वेग-
पूर्वक एक दूसरे का कण्ठग्रह कर पड़े ।'
यहाँ ईर्ष्या-रोष रूप मान का प्रशम है । यह रसादि अर्थ 'तुम्हें लड़का हुआ है'
इस वाक्य के श्रवण से जैसे हर्ष होता है, उस प्रकार नहीं है । और न लक्षणा से
(वह प्रकाशित होता है) । अपितु, सहृदय जनों के हृदय के संवाद के बल से
१. क्योंकि रावण की सीताविषयक रति जब सहृदयों की रति से तन्मयीभाव प्राप्त करेगी तब
शृङ्गार की चर्वणा होगी । तत्पश्चात् उन्हें यह मालूम होगा कि यह रति अनुचित आलम्बन में हो
रही है । तभी हास का उद्बोध होगा, तभी शृङ्गार की चर्वणा शृङ्गाराभास-चर्वणा का रूप ले लेगी ।

प्रथम उद्योतः ८१
ध्वन्यालोकः
तृतीयस्तु रसादिलक्षणः प्रभेदो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तः प्रकाशते, न
तु साक्षाच्छब्दव्यापारविषय इति वाच्याद्विभिन्न एव । तथा हि वाच्यत्वं
तस्य स्वशब्दनिवेदितत्वेन वा स्यात् । विभावादिप्रतिपादनमुखेन वा ।
पूर्वस्मिन् पक्षे स्वशब्दनिवेदितत्वाभावे रसादीनामप्रतीतिप्रसङ्गः ।
रसाद्रिरूप तीसरा प्रभेद तो वाच्य की सामर्थ्य से आक्षिप्त हो प्रकाशित होता है,
न कि वह साक्षात् शब्द-व्यापार का विषय होता है, इसलिए वह भी वाच्य विभिन्न
ही है । जैसा कि उसका वाच्यत्व अपने शब्दों से निवेदित होने के रूप से अथवा
विभाव आदि के प्रतिपादन के द्वारा हो सकता है । पहले पक्ष में यदि अपने शब्द
(रस अथवा शृङ्गार आदि नामों) के द्वारा निवेदित न होने पर रसादिकों की
अप्रतीति का प्रसङ्ग होगा ।
लोचनम्
संवादबलाद्विभावानुभावप्रतीतौ तन्मयीभावेनास्वाद्यमान एव रस्यमानतैकप्राणः
सिद्धस्वभावसुखादिविलक्षणः परिस्फुरति । तदाह—प्रकाशत इति । तेन तत्र
शब्दस्य ध्वननमेव व्यापारोऽर्थसहकृतस्येति । विभावाद्यर्थोऽपि न पुत्रजन्म-
हर्षन्यायेन तां चित्तवृत्तिं जनयतीति जननातिरिक्तोऽर्थस्यापि व्यापारो ध्वनन-
मेवोच्यते । स्वशब्देति । शृङ्गारादिना शब्देनाभिधाव्यापारवशादेव निवेदित-
त्वेन । विभावादीति । तात्पर्यशक्त्येत्यर्थः ।
विभाव-अनुभाव की प्रतीति होने पर तन्मयीभाव के प्रकार से आस्वादित होता
हुआ ही, सर्वथा रस्यमान रूप, सिद्ध स्वभाव वाला एवं सुखादिकों से विलक्षण
(वह रसादि अर्थ) परिस्फुरित१ होता है । उसे कहा है—प्रकाशित होता है— ।
इससे वहाँ अर्थ-सहकृत शब्द का ध्वनन ही व्यापार है । पुत्रजन्म से हुए हर्ष के
समान विभावादि अर्थ भी उस चित्तवृत्ति को उत्पन्न नहीं करता, इस लिए 'जनन'
से अतिरिक्त अर्थ का भी व्यापार 'ध्वनन' ही कहा जाता है । अपना शब्द— ।
'शृङ्गार' आदि शब्द द्वारा अभिधा व्यापार के वश निवेदित होने के कारण ।
विभाव आदि— । अर्थात् तात्पर्य-शक्ति के द्वारा ।
१. रसादि अर्थ उत्पन्न नहीं होता हैं बल्कि प्रकाशित होता है। सहृदय के हृदय में स्थित
रत्यादि स्थायीभाव ही रस रूप में परिणत हो जाते हैं। स्थायीभावों की रस रूप में
परिणति के पूर्व सहृदय के हृदय का संवाद द्वारा जब विभाव आदि की प्रतीति हो जाती है तब
तन्मयीभाव होता है, ऐसी स्थिति में रस आस्वाद्यमान होने लगता है, यह सुखादि से विलक्षण
आत्मिक आनन्दानुभूति है ।
उसके रहने पर कार्य हो, यह 'अन्वय' है (दे० पृ० ८२) और उसके अभाव में कार्य न हो यह
'व्यतिरेक' है—'तत्सत्त्वे कार्यसत्त्वमन्वयः, तदभावे कार्याभावो व्यतिरेकः।' प्रस्तुत में आचार्य
आनन्दवर्धन ने स्वशब्द के अन्वयव्यतिरेक का निराकरण किया है अर्थात् 'शृङ्गार' आदि शब्द के
रहने पर रसादि की प्रतीति नहीं होती है और उसके अभाव में भी रसादि की प्रतीति हो जाती
है । किन्तु जहाँ ध्वनन व्यापार होता है वहीं रसादि की प्रतीति होती है ।
६ ध्व०

८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
न च सर्वत्र तेषां स्वशब्दनिवेदितत्वम् । यत्राप्यस्ति तत्,
तत्रापि विशिष्टविभावादिप्रतिपादनमुखेनैवैषां प्रतीतिः ।
स्वशब्देन सा केवलमनूद्यते, न तु तत्कृता विषयान्तरे तथा
तस्या अदर्शनात् ।
किन्तु सर्वत्र उन (रसादिकों) का अपने शब्दों द्वारा निवेदितत्व नहीं। जहाँ कहीं
भी वह है, वहाँ भी विशेष प्रकार से विभाव आदि के प्रतिपादन के द्वारा ही उनकी
प्रतीति है ।
अपने शब्द से वह प्रतीति केवल अनूदित हो जाती है, उस (शब्द के बदौलत)
कृत नहीं होती । क्योंकि विषयान्तर में उस प्रकार उसे नहीं देखते ।
लोचनम्
तत्र स्वशब्दस्यान्वयव्यतिरेकौ रस्यमानतासारं रसं प्रति निराकुर्वन्ध्वन-
नस्यैव ताविति दर्शयति-न च सर्वत्रेति । यथा भट्ठेन्दुराजस्य-
यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निःस्थेमनी लोचने
यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाब्जिनीनालवत् ।
दूर्वाकाण्डविडम्बकश्च निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः
कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥
इत्यत्रानुभावविभावावबोधनोत्तरमेव तन्मयीभवनयुक्त्या तद्विभावानुभावो-
चितचित्तवृत्तिवासनानुरञ्जितस्वसंविदानन्दचर्वणागोचरोऽर्थो रसात्मा स्फुरत्ये-
वाभिलाषचिन्तौत्सुक्यनिद्राधृतिग्लान्यालस्यश्रमस्मृतिवितर्कादिशब्दाभावेऽपि ।
एवं व्यतिरेकाभावं प्रदर्श्यान्वयाभावं दर्शयति-यत्रापीति । तदिति । स्वश-
ब्दनिवेदितत्वम् । प्रतिपादनमुखेनेति । शब्दप्रयुक्त्या विभावादिप्रतिपत्त्येत्यर्थः ।
वहाँ स्वशब्द (शृङ्गार आदि शब्द) के अन्वयव्यतिरेक को रस्यमानताप्राण रूप
रस के प्रति, निराकरण करते हुए वे दोनों (अन्वय और व्यतिरेक) हैं यह दिखाते
हैं- सर्वत्र वे शब्द द्वारा निवेदित नहीं होते हैं- । जैसे भट्ट इन्दुराज का-
'जो कि रुक-रुक कर विलोकनों में बहुत वार आँखें स्थैर्यरहित हो जाती हैं, जो
कि अङ्ग-अङ्ग कटे हुए कमलिनी के नाल की भांति प्रतिदिन सूखते जा रहे हैं, जो कि
गालों पर दूर्वाकाण्ड का अनुकरण करने वाला घना पीलापन छाया हुआ है, युवक
कृष्ण के प्रति युवतियों की यही वेषरचना है।'
यहाँ अनुभाव-विभाव के बोधन के बाद ही तन्मयीभाव की युक्ति से उस विभाव-
अनुभाव के अनुरूप वासना रूप चित्तवृत्ति से अनुरञ्जित स्वसंविदानन्द की चर्वणा का
गोचर रस रूप अर्थ अभिलाष, चिन्ता, औत्सुक्य, निद्रा, धृति, ग्लानि, आलस्य, श्रम, स्मृति,
वितर्क आदि शब्द के अभाव में भी स्फुरित होता ही है। इस प्रकार व्यतिरेक का अभाव
दिखाकर अन्वय का अभाव दिखाते हैं-जहाँ भी- । वह- । अर्थात् स्वशब्द द्वारा
निवेदितत्व । प्रतिपादन के जरिए- । अर्थात् शब्द से प्रयुक्त विभाव की प्रतिपत्ति के द्वारा ।

प्रथम उद्योतः ८३
लोचनम्
सा केवलमिति । तथाहि—
याते द्वारवतीं तदा मधुरिपौ तद्दत्तझम्पानतां
कालिन्दीतटरूढवञ्जुललतामालिङ्ग्य सोत्कण्ठया ।
तद्गीतं गुरुबाष्पगद्गदगलत्तारस्वरं राधया
येनान्तर्जलचारिभिर्जलचरैरप्युत्कमूत्कूजितम् ॥
इत्यत्र विभावानुभावावम्लानतया प्रतीयेते । उत्कण्ठा च चर्वणागोचरं
प्रतिपद्यत एव । सोत्कण्ठाशब्दः केवलं सिद्धं साधयति, उत्कमित्यनेन तूक्तानु-
भावानुकर्षणं कर्तुं सोत्कण्ठाशब्दः प्रयुक्त इत्यनुवादोऽपि नानर्थकः, पुनरनुभाव-
प्रतिपादने हि पुनरुक्तिरतन्मयीभावो वा न तु तत्कृतेत्यत्र हेतुमाह—विषयान्तर
इति । 'यद्विश्रम्य' इत्यादौ । न हि यद्भावेऽपि यद्भवति तत्कृतं तदिति भावः ।
वह केवल— । जैसा कि—
'कृष्ण के द्वारिका चले जाने पर उनके आस्फालनों के कारण झुकी हुई, कालिन्दी-
तट में उत्पन्न वेतसलता को आलिङ्गन करके उत्कण्ठायुक्त राधा ने अधिक बाष्प के
कारण गद्गद एवं स्खलित होती हुई आवाज में वह गान किया जिससे कि भीतर
पानी में रहने वाले जीव उत्कण्ठित हो शब्द करने लगे ।'
यहाँ विभाव-अनुभाव अम्लान रूप से प्रतीत होते हैं और उत्कण्ठा चर्वणा का
गोचर बनती है । 'सोत्कण्ठा' शब्द केवल सिद्ध का साधन करता है । 'उत्क' के
द्वारा उक्त अनुभावों को खींचने के उद्देश्य से 'सोत्कण्ठा' शब्द का प्रयोग है, इस
लिए अनुवाद भी अनर्थक नहीं । क्योंकि पुनः अनुभाव के प्रतिपादन के होने पर
पुनरुक्ति अथवा अतन्मयीभाव होगा । जो कि (वृत्तिग्रन्थ में) 'न तु तत्कृता' (उसके
द्वारा नहीं की गई है) कहा है उसका हेतु कहते हैं—विषयान्तर में— । 'जो कि
१. 'याते द्वारवतीं' इस पद्य में विभाव का भी वर्णन है और अनुभाव का भी वर्णन है । मधुरिपु
और कालिन्दीतट आदि यहाँ क्रमशः आलम्बन और उद्दीपन विभाव हैं । और साथ ही उत्कण्ठा
भी चर्वणा का गोचर हो रही है । किन्तु यहाँ भ्रम नहीं होना चाहिए कि उत्कण्ठा की प्रतीति
स्वशब्द 'सोत्कण्ठा' से हो रही है, बल्कि पूर्वसिद्ध उत्कण्ठा की प्रतीति का यह शब्द अनुवादक
मात्र है अर्थात् यह केवल सिद्ध का साधन करता है । ऐसी स्थिति में अनुवाद को अनर्थक समझना
ठीक न होगा, क्योंकि कवि ने आगे उत्कण्ठित होकर जलचारियों के कूजन का जिक्र किया है और
पहले जो 'उत्कण्ठा' का प्रयोग करता है उससे दोनों स्थानों के अनुभावों का समन्वय कवि का
यहाँ अभीष्ट है । इसलिए आचार्य लिखते हैं कि आगे के 'उत्क' से उक्त अनुभाव के अनुकर्षणार्थ
'सोत्कण्ठा' शब्द का प्रयोग किया है । अन्यथा केवल पुनः अनुभाव का प्रतिपादन मात्र यहाँ कवि
को अभी माना जाय तो पुनरुक्ति होगी और तन्मयीभाव भी नहीं सिद्ध होगा । यह सारी बातें
जिस तात्पर्य से कही गई हैं वह यह है कि स्वशब्द के साथ रसादि की प्रतीति के अन्वय-व्यतिरेक
का अभाव है । प्रस्तुत में 'सोत्कण्ठा' रूप स्वशब्द के निवेदन होने पर भी उत्कण्ठा की प्रतीति
लतालिङ्गन आदि रूप अनुभाव के प्रतिपादन के द्वारा ही होती है । 'सोत्कण्ठा' शब्द केवल इस
प्रतीति का अनुवादक मात्र है । यह अनुवाद भी, जैसा कि आचार्य का कहना है, अनर्थक नहीं ।

८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
न हि केवलशृङ्गारादिशब्दमात्रभाजि विभावादिप्रतिपादनरहिते
काव्ये मनागपि रसवत्त्वप्रतीतिरस्ति । यतश्च स्वाभिधानमन्तरेण केवल-
भ्योऽपि विभावादिभ्यो विशिष्टेभ्यो रसादीनां प्रतीतिः । केवलाच्च
स्वाभिधानादप्रतीतिः । तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामभिधेयसामर्थ्याक्षि-
प्तत्वमेव रसादीनाम् । न त्वभिधेयत्वं कथञ्चित् , इति तृतीयोऽपि
प्रभेदो वाच्याद्भिन्न एवेति स्थितम् । वाच्येन त्वस्य सहैव प्रतीति-
रित्यग्रे दर्शयिष्यते ।
उस काव्य में, जहाँ केवल शृङ्गार आदि शब्दमात्र प्रयुक्त हों और विभावादि का
प्रतिपादन न हुआ हो, थोड़ी मात्रा में भी रसवत्ता की प्रतीति नहीं होती । क्योंकि
स्वशब्द का अभिधान न हो तो भी केवल विशिष्ट विभाव आदि द्वारा रसादि की
प्रतीति होती है । केवल स्वशब्द के अभिधान से प्रतीति नहीं होती । इस कारण
अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा रसादिकों का अभिधेय (वाच्य) के सामर्थ्य से
आक्षिप्तत्व ही सिद्ध होता है, न कि किसी प्रकार अभिधेयत्व (वाच्यत्व) है। इस
प्रकार तीसरा भी प्रभेद वाच्य से भिन्न ही है, यह ठहरा । वाच्य से इसकी साथ ही
जैसी प्रतीति होती है, इसे आगे चलकर दिखायेंगे ।
लोचनम्
अदर्शनमेव द्रढयति—न हीति । केवलशब्दार्थं स्फुटयति—विभावादीति । काव्य
इति । तव मते काव्यरूपतया प्रसज्यमान इत्यर्थः । मनागपीति ।
शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः ।
बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्य रसाः स्मृताः ॥
इत्यत्र । एवं स्वशब्देन सह रसादेर्व्यतिरेकान्वयाभावमुपपत्त्या प्रदर्श्य
तथैवोपसंहरति—यतश्चेत्यादिना कथञ्चिदित्यन्तेन । अभिधेयमेव सामर्थ्यं
सहकारिशक्तिरूपं विभावादिकं रसध्वनने शब्दस्य कर्तव्ये, अभिधेयस्य च
रुक-रुक करके' इत्यादि स्थल में । भाव यह कि उसके अभाव में भी जो होता है
वह उसके द्वारा किया नहीं जाता है । (विषयान्तर में होनेवाले) अदर्शन पर ही
जोर देते हैं—न कि— । 'केवल' शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हैं—विभावादि— ।
काव्य में— । अर्थात् तुम्हारे मत में काव्य के रूप में प्रसज्यमान । थोड़ा भी— ।
'शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत नाम के ये आठ
रस नाट्य में माने गए हैं ।'
यहाँ । इस प्रकार स्वशब्द के साथ रसादि का व्यतिरेकाभाव और अन्वयाभाव
उपपत्तिपूर्वक दिखाकर उसी प्रकार उपसंहार करते हैं—क्योंकि से लेकर—किसी
प्रकार—तक के ग्रन्थ से । जब शब्द का रसध्वनन व्यापार कर्तव्य होगा तब

प्रथम उद्योतः ८५
लोचनम्
पुत्रजन्महर्षभिन्नयोगक्षेमतया जननव्यतिरिक्ते दिवाभोजनाभावविशिष्टपीन-
त्वानुमितरात्रिभोजनविलक्षणतया चानुमानव्यतिरिक्ते ध्वनने कर्तव्ये सामर्थ्यं
शक्तिः विशिष्टसमुचितो वाचकसाकल्यमिति द्वयोरपि शब्दार्थयोर्ध्वननं
व्यापारः । एवं द्वौ पक्षावुपक्रम्याद्यो दूषितः, द्वितीयस्तु कथञ्चिद् दूषितः कथ-
ञ्चिदङ्गीकृतः, जननानुमानव्यापाराभिप्रायेण दूषितः, ध्वननाभिप्रायेणाङ्गीकृतः।
यस्त्वत्रापि तात्पर्यशक्तिमेव ध्वननं मन्यते, स न वस्तुतत्त्ववेदी । विभावा-
नुभावप्रतिपादके हि वाक्ये तात्पर्यशक्तिर्भेदे संसर्गे वा पर्यवस्येत्; न तु रस्य-
मानतासारे रसे इत्यलं बहुना । इतिशब्दो हेत्वर्थे । 'इत्यपि हेतोस्तृतीयोऽपि
प्रकारो वाच्याद्भिन्न एवे'ति सम्बन्धः । सहैवेति । इवशब्देन विद्यमानोऽपि क्रमो
न संलक्ष्यत इति तद्दर्शयति—अग्र इति । द्वितीयोद्द्योते ॥ ४ ॥
अभिधेय ( वाच्य अर्थ ) ही सामर्थ्य सहकारिशक्ति रूप विभाव आदि होगा । और
जब अभिधेय का ध्वनन रूप कार्य होगा, ऐसी स्थिति में पुत्रजन्म के हर्ष से भिन्न
होने के कारण जो ध्वनन होगा वह उत्पत्ति से अतिरिक्त होगा, तथा दिन में
भोजनाभावविशिष्ट पीनत्व द्वारा अनुमित रात्रिभोजन से विलक्षण होने के कारण
'अनुमान' से भी ध्वनन व्यापार अलग होगा, फिर सामर्थ्य अर्थात् शक्ति, विशिष्ट
एवं समुचित अर्थात् वाचक से परिपूर्णत्व रूप सिद्ध होती है । इसलिए ध्वनन व्यापार
शब्द और अर्थ दोनों का है। १ इस प्रकार दो पक्षों को उपक्रम करके पहले पक्ष को
दूषित किया और कुछ अंश में अङ्गीकार किया । जनन ( उत्पत्ति ) और अनुमान के
व्यापार के अभिप्राय से दूषित किया और 'ध्वनन' के अभिप्राय से अङ्गीकार किया ।
जो कि यहाँ 'तात्पर्य-शक्ति' को 'ध्वनन' मानता है वह वस्तुतत्त्व ( यथार्थ ) को
जानने वाला नहीं है, क्योंकि विभावानुभाव के प्रतिपादक वाक्य में तात्पर्य-शक्ति
'भेद में अथवा संसर्ग में पर्यवसित होगी, न कि रस्यमानतासार रस में । इस पर अब
ज्यादा कहना व्यर्थ है । 'इति' ( इस प्रकार ) शब्द हेत्वर्थक है । सम्बन्ध यह है कि
इस हेतु से भी तीसरा प्रकार भी वाच्य से भिन्न ही ठहरता है । 'साथ की तरह'— ।
'इव' ( 'तरह' ) शब्द के द्वारा यह दिखाते हैं कि रहता हुआ भी क्रम संलक्षित नहीं
होता—आगे— । दूसरे उद्योत में ।
१. वृत्तिग्रन्थ में रसादि को जो अभिधेय के सामर्थ्य से आक्षिप्त कहा है वह सर्वथा ध्वनन
व्यापार से ही गम्य है । जब शब्द से रस का ध्वनन होता है तब अभिधेय या वाच्य ही
विभावादि रूप से सहकारि शक्ति रूप सामर्थ्य होता है और इससे होने वाला ध्वनन न तो
पुत्रजन्म से उत्पन्न हर्ष जैसा उत्पन्न होता है और न तो उसे दिन के भोजन के अभाव में रात्रि
के भोजन के अनुमान जैसा अनुमान कहा जा सकता है । ध्वनन शब्द और अर्थ दोनों का
व्यापार है । इस प्रकार आचार्य ने यहाँ रसादि का शब्द-शब्दनिवेदितत्व को दूषित किया है
और विभावादि प्रतिपादन के ढंग को जनन और अनुमान के अभिप्राय से दूषित करके भी
ध्वनन के अभिप्राय से स्वीकार किया है, क्योंकि ध्वनन इन दोनों से भिन्न व्यापार है ।
यहाँ पुरानी शंका पुनः खड़ी होती है कि जब आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि रसादि

८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा ।
क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥ ५ ॥
काव्य का आत्मा वही अर्थ है, जैसा कि पुराकाल में क्रौञ्च-पक्षी के जोड़े के
वियोग से उत्पन्न शोक आदिकवि का श्लोक बन गया ॥ ५ ॥
लोचनम्
एवं ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव’ इतीयता ध्वनिस্বরূপं व्याख्यातम् । अधुना
काव्यात्मत्वमितिहासव्याजेन च दर्शयति—काव्यस्यात्मेति । स एवेति प्रतीय-
मानमात्रेऽपि प्रक्रान्ते तृतीय एव रसध्वनिरिति मन्तव्यम्, इतिहासबलात्
प्रक्रान्तवृत्तिग्रन्थार्थबलाच्च । तेन रस एव वस्तुत आत्मा, वस्त्वलङ्कारध्वनी तु
सर्वथा रसं प्रति पर्यवस्येते इति वाच्यादुत्कृष्टौ तावित्यभिप्रायेण ‘ध्वनिः
काव्यस्यात्मे’ति सामान्येनोक्तम् । शोक इति । क्रौञ्चस्य द्वन्द्ववियोगेन सहचरी-
इस प्रकार ‘प्रतीयमान फिर दूसरा ही’ इतने से ध्वनि के स्वरूप का व्याख्यान
किया। अब ध्वनि का काव्यात्मत्व इतिहास के व्याज से दिखाते हैं—काव्य का
आत्मा— । ‘वही’ यह ( कथन ) यद्यपि प्रतीयमान मात्र में प्रक्रान्त है तथापि तीसरा
‘रसध्वनि’ ही ( काव्यात्मा ) रूप मन्तव्य है। एक तो इतिहास के बल से और दूसरे
प्रक्रान्त वृत्तिग्रन्थ के अर्थ के बल से । इस लिए रस ही वस्तुतः आत्मा है, वस्तुध्वनि
और अलङ्कार-ध्वनि सर्वथा रस के प्रति पर्यवसित होते हैं अतः वे वाच्य से उत्कृष्ट
हैं। इस अभिप्राय से ‘ध्वनि काव्य का आत्मा है’ यह सामान्य रूप से कहा है।
शोक— । क्रौञ्च के द्वन्द्ववियोग से अर्थात् सहचरी क्रौञ्ची के मारे जाने से, साहचर्य
वाच्य-सामर्थ्य से आक्षिप्त होते हैं, तो ऐसा क्यों न माना जाय कि ‘ध्वनन’ तात्पर्य शक्ति ही
है। इस प्रकार चतुर्थ कक्षा में रहने वाले अतिरिक्त व्यापार की कल्पना का गौरव नहीं करना
पड़ता है ? क्योंकि तात्पर्य शक्ति वही है जो अभिधेय या वाच्य के अविनाभाव की सहायता से
अर्थबोधन की शक्ति है। इस पर आचार्य का कहना है कि जैसा हम पहले कह चुके हैं तात्पर्य
शक्ति या तो भेद में पर्यवसित होती है, अर्थात् कर्मान्तर और क्रियान्तर के भेद रूप वाक्यार्थ में
पर्यवसित होती है, या तो संसर्ग में, अर्थात् परस्पर पदार्थों के संसर्ग में पर्यवसित होती है और
रस तो सर्वथा आस्वाद्यमान रूप है ऐसी स्थिति में उसका रस में पर्यवसान असम्भव है। इस
प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के अतिरिक्त यह भी एक हेतु है जिससे रसादि तृतीय प्रकार वाच्य से
सर्वथा भिन्न ही ठहरता है।
वाच्य की प्रतीति और रसादि रूप व्यङ्ग्य की प्रतीति कुछ इस शीघ्रता से होती है
जिससे उन दोनों का क्रम अभिलक्षित नहीं होता। इसलिए रसादि को ‘असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य’ कहा
गया है। इसी लिए वृत्तिकार ने वाच्यादि के साथ इसकी प्रतीति ‘साथ की तरह’ होती है यह
कहा है। ऐसा नहीं कि वाच्यादि के साथ रस की प्रतीति होती है। यह विषय ‘द्वितीय उद्योत’ में
निर्दिष्ट होगा।

प्रथम उद्योतः ८७
लोचनम्
हननोद्भूतेन साहचर्यध्वंसनेनोत्थितो यः शोकः स्थायिभावो निरपेक्षभावत्वा-
द्विप्रलम्भशृङ्गारोचितरतिस्थायिभावादन्य एव, स एव तथाभूतविभावतदुत्था-
क्रन्दाद्यनुभावचर्वणया हृदयसंवादतन्मयीभवनक्रमादास्वाद्यमानतां प्रतिपन्नः
करुणरसरूपतां लौकिकशोकव्यतिरिक्तां स्वचित्तद्रुतिसमास्वाद्यसारां प्रतिपन्नो
रसपरिपूर्णकुम्भोच्छलनवच्चित्तवृत्तिनिःष्यन्दस्वभाववाग्विलापादिवच्च समयानपेक्ष-
त्वेऽपि चित्तवृत्तिव्यञ्जकत्वादिति नयेनाकृतकतयैवावेशवशात्समुचितशब्दच्छ-
न्दोवृत्तादिनियन्त्रितश्लोकरूपतां प्राप्तः—
( साथ ) के ध्वंस हो जाने के कारण उत्पन्न जो शोक रूप स्थायीभाव, निरपेक्षभाव
होने के कारण विप्रलम्भ शृङ्गार के उचित रतिरूप स्थायीभाव से अतिरिक्त ही है।
वही ( शोक ) उस प्रकार के विभाव और उससे उत्पन्न आक्रन्द आदि अनुभाव की
चर्वणा द्वारा, हृदय के संवाद और फिर तन्मयीभाव के क्रम से आस्वाद्यमान
अवस्था को प्राप्त, लौकिक शोक के अतिरिक्त, चर्वयिता के अपने चित्त की द्रुति के
द्वारा समास्वाद्य-सार करुणरसरूपता को प्राप्त, जैसे जल से भरा घड़ा झलकता है
और जैसे चित्तवृत्ति के निष्यन्द रूप वाग्विलाप आदि होते हैं उसी प्रकार 'समय'
( शब्द के सङ्केत ) की अपेक्षा न रखने पर भी ( वचन ) चित्तवृत्ति के व्यञ्जक
होते हैं' इस न्याय से अकृत्रिम रूप से ही, आवेश के कारण, समुचित शब्द, छन्द, वृत्त
आदि से नियन्त्रित हुआ, 'श्लोक' की अवस्था को प्राप्त होता है'—
१. 'शोक श्लोक की अवस्था को प्राप्त है' आचार्य आनन्दवर्धन का यह निर्देश एक ऐतिहासिक
घटना को सूचित करता है, जो 'वाल्मीकीय रामायण' से विदित होती है। किसी समय वाल्मीकि
अपने आश्रम से समिद्कुशाहरण के लिए निकल कर वनप्रान्त में घूम रहे थे। तभी उन्होंने व्याध
के द्वारा बाण से बिधे एक क्रौञ्च को देखा, जिसके वियोग-व्यथा से व्याकुल होकर क्रौञ्ची अत्यन्त
कातर होकर चिल्ला रही थी। तत्काल ऋषि के मुख से शापयुक्त छन्दोमयी वाणी निकल पड़ी,
जो निर्दिष्ट 'मा निषाद' के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ही 'शोकः श्लोकत्वमागतः' कहा गया है।
महाकवि कालिदास ने भी 'रघुवंश महाकाव्य' के चौदहवें सर्ग में इस घटना का स्मरण किया है—
तामभ्यगच्छद् रुदितानुसारी कविः कुशेध्माहरणाय यातः।
निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ॥
प्रस्तुत में आचार्य ने 'रस' को काव्य का आत्मा सिद्ध करने के उद्देश्य से इस प्रसंग का
उल्लेख किया है। लोचनकार ने इस प्रसंग का जो व्याख्यान किया है उसका स्पष्टीकरण यह है—
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि विप्रलम्भ शृङ्गार का स्थायीभाव रति तब होती है जब
नायक-नायिका दोनों विद्यमान रहते हैं, केवल दोनों का एकमिलन न सम्पन्न होने के कारण
दोनों में सापेक्षता रहती है अर्थात् विप्रलम्भ शृङ्गार की रति सापेक्ष भाव है। इसके विपरीत
शोक रूप स्थायीभाव में आलम्बन विभाव नायिका और नायक में कोई एक दिवङ्गत हो जाता
है और पुनर्मिलन की आशा समाप्त हो जाती है अर्थात् शोक रूप स्थायीभाव निरपेक्ष होता
है। प्रस्तुत पद्य 'मा निषाद' में क्रौञ्च के जोड़े में से एक व्याध के बाण से मारा गया है इस
प्रकार साहचर्य के ध्वंस होने से यहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार का स्थायीभाव रति न होकर करुण का
स्थायी भाव शोक ही माना गया है।

८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ इति ।
न तु मुनेः शोक इति मन्तव्यम् । एवं हि सति तद्दुःखेन सोऽपि दुःखित
इति कृत्वा रसस्यात्मतेति निरवकाशं भवेत् । न च दुःखसन्तप्तस्यैषा दशेति ।
एवं चर्वणोचितशोकस्थायिभावात्मककरुणरससमुच्छलनस्वभावत्वात्स एव
काव्यस्यात्मा सारभूतस्वभावोऽपरशाब्दवैलक्षण्यकारकः ।
एतदेवोक्तं हृदयदर्पणे—'यावत्पूर्णो न चैतेन तावन्नैव वमत्यमुम्' इति ।
'हे व्याध, काम से मोहित क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से एक को तू ने मार डाला है
इसलिए अनन्तकाल तक प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो ।'
न कि मुनि का शोक है यह मानना चाहिए । क्योंकि ऐसा होने पर उस ( क्रौञ्च )
के दुःख से वह भी दुखित हो जाते हैं, फिर रसात्मकता की बात नहीं बनेगी । दुःख
से जो प्राणी सन्तप्त हो उसकी ऐसी दशा ( कि शाप देने के लिए श्लोक का निर्माण
करे ) नहीं होती । इस प्रकार चर्वणा के योग्य शोकरूप स्थायीभाव वाले करुणरस
से प्रवाहित होने के स्वभाव के कारण वही काव्य का आत्मा अर्थात् सारभूतस्वभाव
एवं दूसरे शब्दबोध से वैलक्षण्य करने वाला है ।
'हृदयदर्पण' में इसे ही कहा है—'जब तक इस रस से भर नहीं जाता तब तक
यहाँ क्रौञ्च रूप आलम्बन में उत्पन्न शोक आक्रन्दन आदि अनुभावों की चर्वणा से अलौकिक
स्थिति में हृदय-संवाद और तन्मयीभाव के क्रम से आ जाता है । इस प्रकार ऋषि ने उस
अलौकिक शोक को चित्त की द्युति द्वारा आस्वादन किया । यह आस्वादन उस शोक का
परिवर्तित रूप 'करुण रस' ही है । इस प्रकार जब ऋषि ने करुण रस का अनुभव किया तभी
उनके मुख से छन्दोमयी वाणी अनायास निकल पड़ी, यह उसी प्रकार हुआ जैसे कि भरा
हुआ घड़ा छलक पड़ता है अथवा जैसे दुःख आदि की चित्तवृत्ति के होने पर अनायास मुंह से
शब्द निकल पड़ते हैं । इस प्रकार शोक करुण रस की स्थिति में पहुँच कर श्लोक बन गया ।
क्रौञ्च वाल्मीकि
| |
शोक ( लौकिक ) शोक ( अलौकिक )
|
( हृदयसंवाद और तन्मयीभाव )
|
करुणरस
|
छन्दोमयी वाणी
१. आचार्य का यह भी निर्देश है कि शोक को भ्रम से मुनि का नहीं समझ लेना चाहिए ।
अन्यथा क्रौञ्च के दुःख से सन्तप्त ऋषि के मुख से इस प्रकार श्लोक-रचना अस्वाभाविक प्रतीत
होती है । अतः वह शोक वस्तुतः ऋषि के द्वारा आस्वाद्यमान होकर अलौकिक हो गया और
ऋषि ने चित्तद्रुति के द्वारा उसे करुण रस की स्थिति में अनुभव किया, जो सर्वथा आनन्दमयता
की स्थिति है । इस प्रकार इस युक्ति से करुण रस ही प्रस्तुत छन्दोमयी वाणी का सार होने के
कारण 'काव्य का आत्मा' निश्चित होता है ।