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सर्वकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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पृष्ठ 30

२४ धनुर्वेदसंहिता
अथ श्रमक्रिया
क्रियाकलापान्वक्ष्यामि श्रमसाध्याञ्छुचिष्मताम् ।
येषां विज्ञानमात्रेण सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥१७॥
अब श्रम क्रिया कहते हैं, पवित्र पुरुषों के लिये धनुष की क्रिया कहते हैं,
जो परिश्रम से सिद्ध हो सकती है, जिनके जानने मात्र से ही सिद्धि हो
जाती है यह अन्यथा नहीं है॥१७॥
प्रथमं चापमारोप्य चूलिकां बन्धयेत्ततः ।
स्थानकं तु ततः कृत्वा बाणोपरि करं न्यसेत् ॥१८॥
प्रथम धनुष को आरोपण करके पीछे चूलिको बांधे, तत्पश्चात् स्थानक
करके बाण पर हाथ रखे॥१८॥
तोलनं धनुषश्चैव कर्तव्यं वामपाणिना ।
आदानं च ततः कृत्वा सन्धानं च ततःपरम् ॥१९॥
धनुषका तोलन बाँये हाथ से करना चाहिये, बोझ तोलकर पीछे उठावे,
उसके उपरान्त वाण संधान करे॥१९॥
सकृदाकृष्टचापेन भूमिवेधं न कारयेत् ।
नमस्कुर्याच्च मां विघ्नराजं गुरुधनुःशरान् ॥२०॥
पहले चढ़ाये धनुष से धरती का वेध न करे और हे विश्वामित्र! शिवजी
महाराज कहते हैं कि गणेशजी को और मुझको, गुरुको, धनुषको, बाणों
को नमस्कार करे॥२०॥
याचितव्या गुरोराज्ञा बाणस्याकर्षणं प्रति ।
प्राणवायुं प्रयत्नेन प्राणेन सह पूरयेत् ॥२१॥
कुम्भकेन स्थिरं कृत्वा हुङ्कारेण विसर्जयेत् ।
इत्यभ्यासक्रिया कार्या धन्विना सिद्धिमिच्छता ॥२२॥
फिर गुरु से बाण खैंचने की आज्ञा मांगे, प्राण वायु को जतन से प्राण के
साथ पूरक करे, पीछे कुम्भक से वायु को स्थिरकर हुंकार से रेचक करे,
सिद्धि चाहने वाले धनुषधारी को यदि सिद्धि चाहे तो इस अभ्यास की
क्रिया करनी चाहिये॥२१-२२॥
षण्मासात्सिध्यते मुष्टिः शराः संवत्सरेण तु ।