धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४ ] धम्मपदं [ २१।१६
( श्रद्धः शीलेन सम्पन्नो यशोभोगसमर्पितः ।
यं यं प्रदेशं भजते तत्र तत्रैव पूजितः ॥१४॥ )
अनुवाद—श्रद्धावान्, शीलवान् यश और भोगसे युक्त (पुरुष)
जिस जिस स्थानमें जाता है, वहीं वहीं पूजित होता है।
जेतवन (चुल्ल) सुभदा
३०४-दूरे सन्तो पकासेन्ति हिमवन्तो 'व पव्वता ।
असन्तेत्थ न दिस्सन्ति रत्तिक्खित्ता यथा सरा ॥१५॥
( दूरे सन्तः प्रकाशन्ते हिमवन्त इव पर्वताः ।
असन्तोऽत्र न दृश्यन्ते रात्रिक्षिप्ता यथा शराः ॥१५॥ )
अनुवाद—सन्त (जन) दूर होनेपर भी हिमालय पर्वत (की)
धवल चोटियोंकी भाँति प्रकाशते हैं, और असन्त यहाँ
(पासमें भी) होनेपर, रातमें फेंके बाणकी भाँति
नहीं दिखलाई देते ।
जेतवन अकेले विहरनेवाले (थेर)
३०५-एकासनं एकसेय्यं एकोचरमतन्दितो ।
एको दमयमत्तानं वनन्ते रमितो सिया ॥१६॥
( एकासन एकशय्य एकश्चरन्नतन्द्रितः ।
एको दमयन्नात्मानं वनान्ते रतः स्यात् ॥१६॥ )
अनुवाद—एकही आसन रखनेवाला, एक शय्या रखनेवाला, अकेला
विचरनेवाला (यन), आलस्यरहित हो, अपनेको दमन
कर अकेला ही वनान्तमें रमण करे ।
२१-प्रकीर्णवर्ग समाप्त