धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 141, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० ] धम्मपदं [ २१।४
अनुवाद—दूसरेको दुःख देकर जो अपने लिये सुख चाहता है,
वैरके संसर्गमें पड़कर, वह वैरसे नहीं छूटता ।
भद्दियनगर ( जातियावन ) भद्दिय ( भिक्षु )
२९२—यं हि किच्चं तदपविद्धं अकिच्चं पन कयिरति ।
उन्नलानं पमत्तानं तेसं वड्ढन्ति आसवा ॥३॥
( यद्धि कृत्यं तद् अपविद्धं, अकृत्यं पुनः कुर्युः ।
उन्मलानां प्रमत्तानां तेषां वर्द्धन्त आस्रवाः ॥३॥ )
२९३—येसञ्च सुसमारद्धा निच्चं कायगता सति ।
अकिच्चन्ते न सेवन्ति किच्चे सातच्चकारिनो ।
सतानं सम्पजानानं अत्थं गच्छन्ति आसवा ॥४॥
( येषाञ्च सुसमारब्धा नित्यं कायगता स्मृतिः ।
अकृत्यं ते न सेवन्ते कृत्ये सातत्यकारिणः ।
स्मरतां* सम्प्रजानानां अस्तं गच्छन्त्यास्रवाः ॥४॥ )
अनुवाद—जो कर्तव्य है, उसे (तो वह) छोड़ता है, जो अकर्तव्य है उसे
करता है, ऐसे बढ़े मलवाले प्रमादियोंके आस्रव (=चित्तमल )
बढ़ते हैं । जिन्हें कायामें ( क्षणभङ्गुरता, मलिनता आदि
दोष सम्बन्धी ) स्मृति तय्यार रहती है, वह अकर्त्तव्यको
नहीं करते, और कर्त्तव्यके निरन्तर करनेवाले होते हैं ।
जो स्मृति, और सम्प्रजन्य (=सचेतपन)को रखनेवाले
होते हैं, उनके आस्रव अस्त हो जाते हैं ।
- सताम् ।