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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

१८।१९ ] मलवग्गो [ ११६
जेतवन पाँच उपासक
२५१-नत्थि रागसमो अग्गि नत्थि दोससमो गहो ।
नत्थि मोहसमं जालं नत्थि तणहासमा नदी ॥१७॥
( नास्ति रागसमोऽग्निः नाऽस्ति द्वेषसमो ग्राहः ।
नाऽस्ति मोहसमं जालं, नाऽस्ति तृष्णा समा नदी ॥१७॥ )
अनुवाद—रागके समान आग नहीं, द्वेषके समान ग्रह (=भूत,
चुडैल ) नहीं; मोहके समान जाल नहीं, तृष्णाके समान
नदी नहीं ।
भद्दियनगर ( जातियावन ) मेण्डक ( श्रेष्ठी )
२५२-सुदस्सं वज्जमञ्ञेसं अत्तनो पन दुद्दसं ।
परेसं हि सो वज्जानि ओपुणाति यथाभुसं ।
अत्तनो पन छादेति कलिं'व कितवा सठो ॥१८॥
( सुदर्शं वद्यमन्येषां आत्मनः पुनर्दुर्दर्शम् ।
परेषां हि स वद्यानि अवपुणाति यथातुषम् ।
आत्मनः पुनः छादयति कलिमिव कितवान् शठः ॥१८॥ )
अनुवाद—दूसरेका दोष देखना आसान है, किन्तु अपना (दोष)
देखना कठिन है, वह ( पुरुष ) दूसरोंके ही दोषोंको भुसकी
भाँति उड़ाता फिरता है, किन्तु अपने (दोषों) को वैसे ही
ढाँकता है, जैसे शठ जुआरीसे पासेको ।
जेतवन उज्झानसञ्ञी ( थेर )
२५३-परवज्जानुपस्सिस्स निच्चं उज्झानसञ्जिनो ।
आसवा तस्स वड्ढन्ति आरा स आसवक्खया ॥१६॥
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