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सर्वकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 889 में से

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पृष्ठ 155

| १४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| अद्याहं तव पुत्रोऽस्मि न जाने पूर्वजन्मनि।<br>कोऽहं कस्त्वं महाभाग विभ्रमोऽयं महात्मनि॥ ३७ | हे महाभाग! इस समय मैं आपका पुत्र हूँ, परंतु यह कौन जानता है कि पूर्वजन्ममें मैं कौन था और आप कौन थे ? यह संसार तो महात्माओंके लिये एक भ्रममात्र है ॥ ३७ ॥ |
| कुरु धैर्यं प्रबुध्यस्व मा विषादे मनः कृथाः।<br>मोहजालमिमं मत्वा मुञ्च शोकं महामते॥ ३८ | अतएव आप धैर्य रखें, विवेक धारण करें तथा मनमें खेद न करें। हे महामते! इसे मोहजाल समझकर आप शोकका परित्याग करें ॥ ३८ ॥ |
| क्षुधानिवृत्तिर्भक्ष्येण न पुत्रदर्शनेन च।<br>पिपासा जलपानेन याति नैवात्मजेक्षणात्॥ ३९<br><br>घ्राणं सुखं सुगन्धेन कर्णजं श्रवणेन च।<br>स्त्रीसुखं तु स्त्रिया नूनं पुत्रोऽहं किं करोमि ते॥ ४० | भूख भोजनसे मिटती है, पुत्रके देखनेसे नहीं। प्यास भी जल पीनेसे मिटती है, केवल पुत्र-दर्शनसे नहीं। इसी प्रकार सुगन्धित पदार्थसे नाकको तथा अच्छी बातोंसे कानोंको एवं स्त्रीसे विषय-सुखका आनन्द मिलता है। मैं आपका पुत्र हूँ, बताइये मैं आपके लिये क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥ |
| अजीगर्तेन पुत्रोऽपि हरिश्चन्द्राय भूभुजे।<br>पशुकामाय यज्ञार्थे दत्तो मूल्येन सर्वथा॥ ४१<br><br>सुखानां साधनं द्रव्यं धनात्सुखसमुच्चयः।<br>धनमर्जय लोभश्चेत्पुत्रोऽहं किं करोम्यहम्॥ ४२ | किसी समय अजीगर्त नामक ब्राह्मणने धन लेकर अपने पुत्र शुनःशेपको यज्ञपशुके रूपमें राजा हरिश्चन्द्रके हाथ बेच दिया था। सुखका साधन केवल धन ही है, धन ही सुखकी राशि है। अतः यदि आपको लोभ हो, तो धनका संचय कीजिये। मैं आपका पुत्र हूँ, अतः [आपके सुखके लिये] मैं क्या करूँ ? ॥ ४१-४२ ॥ |
| मां प्रबोधय बुद्ध्या त्वं दैवज्ञोऽसि महामते।<br>यथा मुच्येयमत्यन्तं गर्भवासभयान्मुने॥ ४३ | हे महामते! आप दैवज्ञ हैं। अतः हे मुने! आप मुझे अपनी बुद्धिसे ऐसा ज्ञान दीजिये, जिससे मैं गर्भवासजनित महान् भयसे मुक्त हो जाऊँ॥ ४३॥ |
| दुर्लभं मानुषं जन्म कर्मभूमाविहानघ।<br>तत्रापि ब्राह्मणत्वं वै दुर्लभं चोत्तमे कुले॥ ४४ | हे पवित्रात्मन्! इस कर्मभूमिमें मनुष्य-जन्म अति दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें ब्राह्मणका जन्म और भी दुर्लभ है ॥ ४४ ॥ |
| बद्धोऽहमिति मे बुद्धिर्नापसर्पति चित्ततः।<br>संसारवासनाजाले निविष्टा वृद्धिगामिनी॥ ४५ | ‘मैं आबद्ध हूँ’—यह बुद्धि मेरे चित्तसे नहीं हटती। संसारके वासनाजालमें यह उत्तरोत्तर बढ़ती हुई फँसती ही जाती है ॥ ४५ ॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तस्तु तदा व्यासः पुत्रेणामितबुद्धिना।<br>प्रत्युवाच शुकं शान्तं चतुर्थाश्रममानसम्॥ ४६ | **सूतजी बोले—**असीम बुद्धिवाले अपने पुत्र शुकदेवके ऐसा कहनेपर व्यासजीने शान्त एवं संन्यास-आश्रमके लिये उत्सुक मनवाले शुकदेवजीसे कहा— ॥ ४६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>पठ पुत्र महाभाग मया भागवतं कृतम्।<br>शुभं न चातिविस्तीर्णं पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ४७ | **व्यासजी बोले—**हे महाभाग पुत्र! मेरेद्वारा रचित श्रीमद्देवीभागवतपुराणको तुम पढ़ो; वेदतुल्य यह पवित्र पुराण अधिक विस्तृत भी नहीं है ॥ ४७ ॥ |

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