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सर्वकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 889 में से

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पृष्ठ 150

| अ० १४ ] | प्रथम स्कन्ध | १४१ |
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| येऽबुधा मन्दमतयो विधिना मुषिताश्च ये।<br>ते प्राप्य मानुषं जन्म पुनर्बन्धं विशन्त्युत॥ ५४ | जो अज्ञानी, मन्दबुद्धि तथा अभागे मनुष्य हैं; वे इस मानव-जन्मको पाकर भी पुनः बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ ५४॥ |
| व्यास उवाच<br>न गृहं बन्धनागारं बन्धने न च कारणम्।<br>मनसा यो विनिर्मुक्तो गृहस्थोऽपि विमुच्यते॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**गृह बन्धनागार नहीं है और न बन्धनका कारण ही है। जो मनसे बन्धनमुक्त है, वह गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है॥ ५५॥ |
| न्यायागतधनः कुर्वन्वेदोक्तं विधिवत्क्रमात्।<br>गृहस्थोऽपि विमुच्येत श्राद्धकृत्सत्यवाक् शुचिः॥ ५६ | जो न्यायमार्गसे धनोपार्जन करता है, शास्त्रोक्त कर्मोंका विधिवत् सम्पादन करता है, पितृश्राद्ध आदि यज्ञ करता है, सर्वदा सत्य बोलता है तथा पवित्र रहता है, वह गृहमें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है॥ ५६॥ |
| ब्रह्मचारी यतिश्चैव वानप्रस्थो व्रतस्थितः।<br>गृहस्थं समुपासन्ते मध्याह्नातिक्रमे सदा॥ ५७<br><br>श्रद्धया चान्नदानेन वाचा सूनृतया तथा।<br>उपकुर्वन्ति धर्मस्था गृहाश्रमनिवासिनः॥ ५८ | ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थी तथा व्रतोपवास करनेवाला—ये सब मनुष्य मध्याह्नोत्तरकालमें गृहस्थके पास ही जाते हैं। वे धार्मिक गृहस्थ श्रद्धाके साथ मधुर वचनोंद्वारा सबका सत्कार करते एवं अन्नदानसे उन्हें उपकृत करते हैं॥ ५७-५८॥ |
| गृहाश्रमात्परो धर्मो न दृष्टो न च वै श्रुतः।<br>वसिष्ठादिभिराचार्यैर्ज्ञानिभिः समुपाश्रितः॥ ५९ | गृहस्थ-आश्रमसे बढ़कर कोई दूसरा आश्रम देखा या सुना नहीं गया। वसिष्ठ आदि आचार्यों और तत्त्वज्ञानियोंने इसका आश्रय ग्रहण किया है॥ ५९॥ |
| किमसाध्यं महाभाग वेदोक्तानि च कुर्वतः।<br>स्वर्गं मोक्षं च सज्जन्म यद्यद्वाञ्छति तद्भवेत्॥ ६०<br><br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति धर्मविदो विदुः।<br>तस्मादग्निं समाधाय कुरु कर्माण्यतन्द्रितः॥ ६१ | हे महाभाग! वेदोक्त कर्म करनेवाले गृहस्थके लिये क्या असाध्य रह जाता है? वह स्वर्ग, मोक्ष अथवा उत्तम कुलमें जन्म—जो कुछ भी चाहता है, वह हो जाता है। 'एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाना चाहिये'—ऐसा धर्मज्ञोंने बताया है। अतः आलस्यरहित होकर गृहस्थसम्बन्धी कर्मोंको सम्पादित करो॥ ६०-६१॥ |
| देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च सन्तर्प्य विधिवत्सुत।<br>पुत्रमुत्पाद्य धर्मज्ञ संयोज्य च गृहाश्रमे॥ ६२<br><br>त्यक्त्वा गृहं वनं गत्वा कर्तासि व्रतमुत्तमम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं कृत्वा संन्यासं च ततः परम्॥ ६३ | हे धर्मज्ञ पुत्र! देवताओं, पितरों एवं आश्रित-जनोंको विधिवत् सन्तुष्ट करके, पुत्र उत्पन्न करके और उसे भी गृहस्थ-आश्रममें लगाकर पुनः गृह त्यागकर वनमें जाकर श्रेष्ठ व्रतका आश्रय ग्रहण करो। वहाँ वानप्रस्थ-आश्रम पूर्ण करके उसके बाद संन्यास धारण करो॥ ६२-६३॥ |
| इन्द्रियाणि महाभाग मादकानि सुनिश्चितम्।<br>अदारस्य दुरन्तानि पञ्चैव मनसा सह॥ ६४ | हे महाभाग! इन्द्रियाँ मनुष्यको निश्चितरूपसे प्रमत्त बना देती हैं। जो मनुष्य स्त्रीरहित होता है, उसे मन पाँचों इन्द्रियोंसहित विकल कर देता है॥ ६४॥ |