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सर्वकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 889 में से

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पृष्ठ 144

| अ० १३ ] | प्रथम स्कन्ध | १३५ |
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| नष्टाहं तव विश्वासाद्धतौ चोरैर्ममोरणौ।<br>राजन्यपुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥ २० | रखी थी, वह टूट गयी। आपके विश्वासपर मैं धोखेमें पड़ी; क्योंकि पुत्रके समान मेरे प्रिय भेड़ोंको चोरोंने चुरा लिया फिर भी आप घरमें स्त्रीकी तरह शयन कर रहे हैं॥ १९-२०॥ |
| हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना।<br>उरणौ मे गतौ चाद्य सदा प्राणप्रियौ मम॥ २१ | अपनेको वीर समझनेवाले नपुंसक इस अधम स्वामीके द्वारा मैं नष्ट कर दी गयी। सर्वदा प्राणोंके समान मेरे दोनों भेड़ अब चले गये। उर्वशीको इस प्रकार विलाप करती देख प्रेममें आसक्त राजा पुरूरवा चोरोंके पीछे नग्नावस्थामें ही तुरंत दौड़ पड़े॥ २१-२२॥ |
| एवं विलप्यमानां तां दृष्ट्वा राजा विमोहितः।<br>नग्न एव ययौ तूर्णं पृष्ठतः पृथिवीपतिः॥ २२ | |
| विद्युत्प्रकाशिता तत्र गन्धर्वैर्नृपवेश्मनि।<br>नग्नभूतस्तया दृष्टो भूपतिर्गन्तुकामया॥ २३ | उसी समय गन्धर्वोंद्वारा वहाँ राजाके भवनमें बिजली चमका दी गयी, जिसके कारण वहाँसे जानेकी इच्छावाली उर्वशीने राजाको नग्न देख लिया॥ २३॥ |
| त्यक्त्वोरणौ गताः सर्वे गन्धर्वाः पथि पार्थिवः।<br>नग्नो जग्राह तौ श्रान्तो जगाम स्वगृहं प्रति॥ २४ | गन्धर्व उन दोनों भेड़ोंको वहीं मार्गमें छोड़कर भाग गये। थके एवं नग्न राजा भेड़ोंको लेकर अपने घर चले आये। तब वे उर्वशीको वहाँसे गयी हुई देखकर अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे एवं लज्जित हुए। पतिको नग्न देखकर वह सुन्दरी उर्वशी चली गयी थी॥ २४-२५॥ |
| तदोर्वशीं गतां दृष्ट्वा विललापातिदुःखितः।<br>नग्नं वीक्ष्य पतिं नारी गता सा वरवर्णिनी॥ २५ | |
| क्रन्दन्स देशदेशेषु बभ्राम नृपतिः स्वयम्।<br>तच्चित्तो विह्वलः शोचन्विवशः काममोहितः॥ २६ | व्याकुल, लाचार, कामसे मोहित तथा एकमात्र उर्वशीमें आसक्त चित्तवाले राजा शोक तथा क्रन्दन करते हुए देश-देशमें भ्रमण करने लगे॥ २६॥ |
| भ्रमन्वै सकलां पृथ्वीं कुरुक्षेत्रे ददर्श ताम्।<br>दृष्ट्वा संहृष्टवदनः प्राह सूक्तं नृपोत्तमः॥ २७ | इस प्रकार समस्त भूमण्डलपर भ्रमण करते हुए उन्होंने उर्वशीको कुरुक्षेत्रमें देखा। उसे देखते ही प्रसन्न मुखवाले नृपश्रेष्ठ राजा पुरूरवाने मधुर वाणीमें कहा— हे प्रिये! ठहरो-ठहरो। हे कठोरहृदये! मैं अब भी तुमपर आसक्त हूँ, मैं तुम्हारे वशमें हूँ; अतः मुझ निरपराधी पतिको तुम मत छोड़ो॥ २७-२८॥ |
| अये जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि।<br>मां त्वं तन्मनसं कान्तं वशगं चाप्यनागसम्॥ २८ | |
| स देहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया।<br>खादन्त्येनं वृकाः काकास्त्वया त्यक्तं वरोरु यत्॥ २९ | हे देवि! जिस शरीरसे तुमने इतना प्रेम किया था, जिसे तुमने यहाँतक खींच लिया, वह शरीर आज यहीं गिर जायगा। हे सुन्दरि! तुम्हारे द्वारा त्यक्त इस देहको भेड़िये और कौए खा जायेंगे॥ २९॥ |
| एवं विलपमानं तं राजानं प्राह चोर्वशी।<br>दुःखितं कृपणं श्रान्तं कामार्तं विवशं भृशम्॥ ३० | इस प्रकार विलाप करते हुए दुःखित, दीन, थके, कामातुर और अत्यन्त लाचार राजा पुरूरवासे उर्वशी कहने लगी॥ ३०॥ |