दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
( २४ )
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दुर्भिक्षे धर्म कार्ये च व्याधौ संप्रतिरोधके
गृहीतं स्त्री धनं भर्त्ता नस्त्रियै दातुमर्हति ।३२।
अन्वयः—
दुर्भिक्षे, धर्म कार्ये व्याधौच संप्रतिरोधके भर्त्ता गृहीतं स्त्री
धनं स्त्रियै दातुं न अर्हति ॥
दुर्भिक्षे = कुटुम्ब के पोषण के समय आवश्यकता में गृहीत
धन धर्म कार्ये = धर्मादि आवश्यक कार्य में, व्याधौ = भयंकर रोग में
संप्रतिरोध के = कारागार आदि से बचने के प्रसंग में गृहीत स्त्री धन
स्त्री को न भी दिया जाय तो हानि नहीं ।
विशेषः—
१—पति के अतिरिक्त जीवित स्त्री का धन कोई भी दाया-
द ग्रहण नहीं कर सकता ।
२---पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारो धतो भवेत्
न तंभजेरन् दायादा भज मानाः पतन्ति ते ।......................
[ मनु० ९।२०० ]
अधिविन्नास्त्रियै दद्यादाधिवेदनिकं समम्
न दत्तं स्त्री धनं यस्यै दत्ते त्वर्धं प्रकल्पयेत् ।३३।
अन्वयः---
अधिविन्न स्त्रियै आधि वेदनिकं धनं समं दद्यात् यस्य स्त्री
धनं न दत्तम् दत्ते तु अर्धं प्रकल्पयेत् ॥ अधिविन्ना = अधिविन्ना स्त्री के
लिये आधिवेदन के निमित्त धनं समं दद्यात् = जितना अधिवेदनाथं
व्ययीकृत धन है उसे दे । यस्यै = जिस स्त्री के लिये, स्त्री धनं न दत्तम्-