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दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

( २३ )
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
पिता का है। प्रसूता चेत्--आठों विवाहों में जिस स्त्री के सन्तति है तो
दुहितॄणाम्--लड़कियों का अधिकार है। दोहित्री के अभाव में दौहित्र
का अधिकार
विशेष: —
लड़कियों में प्रथम अविवाहिता का अधिकार उसके अभाव
में विवाहिता का, उनमें भी प्रथम दरिद्रा का अधिकार है [ गौतम ]
वाग्दत्ता की व्यवस्था—
दत्त्वा कन्या हरन् दण्ड्यो व्ययं दद्याच्च सोदयम्
मृतायाँ दत्त माद्यात् परिशोध्योभय व्ययम् ।३१।
अन्वयः—
कन्यां दत्वा हरन् दण्ड्यः व्ययं सोदयं दद्यात्
मृतायां दत्तं उभयं परिशोध्य आदद्यात् ॥
कन्यां दत्वा = मैंने तुम्हे कन्या दी यह वाणी से कहकर धन
लेले और हरन् - वर में दोष लगा कर उसे न दे तो दण्ड्यः--दण्ड
देने योग्य है। व्ययं सोदयं दद्यात्--वाग्दान के निमित्त 'वर, द्वारा किया
गया व्यय वृद्धि ( ब्याज ) सहित कन्या पिता दे ।
यदि वाग्दत्ता संस्कार के पूर्व मर जाय तो--
मृतायाम्--मरने पर, दत्तम् = मुँदरी आदि जो वरने दी हैं
उभय व्ययं परिशोध्य = कन्या पिता ने जो लड़की की रक्षा के लिये
व्यय किया है या वर का व्यय हुआ है उसे शोधकर शेष धन का
अधिकार वर का है ।
विशेष:--
१--नाना आदि का दिया गया धन, भाई लेंगे पति नहीं
२--सोदर के अभाव में माता, पिता का अधिकार है [ बौधायन ]

( २४ )
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
दुर्भिक्षे धर्म कार्ये च व्याधौ संप्रतिरोधके
गृहीतं स्त्री धनं भर्त्ता नस्त्रियै दातुमर्हति ।३२।
अन्वयः—
दुर्भिक्षे, धर्म कार्ये व्याधौच संप्रतिरोधके भर्त्ता गृहीतं स्त्री
धनं स्त्रियै दातुं न अर्हति ॥
दुर्भिक्षे = कुटुम्ब के पोषण के समय आवश्यकता में गृहीत
धन धर्म कार्ये = धर्मादि आवश्यक कार्य में, व्याधौ = भयंकर रोग में
संप्रतिरोध के = कारागार आदि से बचने के प्रसंग में गृहीत स्त्री धन
स्त्री को न भी दिया जाय तो हानि नहीं ।
विशेषः—
१—पति के अतिरिक्त जीवित स्त्री का धन कोई भी दाया-
द ग्रहण नहीं कर सकता ।
२---पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारो धतो भवेत्
न तंभजेरन् दायादा भज मानाः पतन्ति ते ।......................
[ मनु० ९।२०० ]
अधिविन्नास्त्रियै दद्यादाधिवेदनिकं समम्
न दत्तं स्त्री धनं यस्यै दत्ते त्वर्धं प्रकल्पयेत् ।३३।
अन्वयः---
अधिविन्न स्त्रियै आधि वेदनिकं धनं समं दद्यात् यस्य स्त्री
धनं न दत्तम् दत्ते तु अर्धं प्रकल्पयेत् ॥ अधिविन्ना = अधिविन्ना स्त्री के
लिये आधिवेदन के निमित्त धनं समं दद्यात् = जितना अधिवेदनाथं
व्ययीकृत धन है उसे दे । यस्यै = जिस स्त्री के लिये, स्त्री धनं न दत्तम्-