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सर्वकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

पञ्चमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ६१
मानसं राजहंसं शनैर्गृहीत्वा बिसगुणेन तस्य चरणयुगलं निगडयित्वा
कान्तामुखं सानुरागं विलोकयन्मन्दस्मितविकसितैककपोलमण्डलस्ताम-
भाषत—'इन्दुमुखि, मया बद्धो मरालः शान्तो मुनिवदास्ते । स्वेच्छयानेन
गम्यताम्' इति ।
(१३) सोऽपि राजहंसः शाम्बमशपत्—'महीपाल, यदस्मिन्नम्बुज-
खण्डेऽनुष्ठानपरायणतया परमानन्देन तिष्ठन्तं नैष्ठिकं मामकारणं राज्यगर्वे-
णावमानितवानसि तदेतत्पाप्मना रमणीविरहसन्तापमनुभव' इति । वि-
षण्णवदनः शाम्बो जीवितेश्वरीविरहमसहिष्णुर्भूभौ दण्डवत्प्रणम्य सवि-
नयमभाषत—'महाभाग, यदज्ञानेनाकरवं तत्क्षमस्व' इति । स तापसः
हंसस्य । निगडयित्वा बद्ध्वा । मन्दस्मितेन ईषद्धसितेन विकसितं प्रफुल्लमेकं
कपोलमण्डलं गण्डस्थलं यस्य सः । तां स्वकान्ताम् । अनेन हंसेन ।
(१३) अम्बुजखण्डे कमलसमुदाये । अनुष्ठाने ध्यानादिकरणे परायणः प्रवृत्तः
तस्य भावस्तया । नैष्ठिकं ब्रह्मचारिणम् । अवमानितवान् अवज्ञावान् । पाप्मना
पापेन अपराधेनेति यावत् । रमण्या दयिताया विरहस्य विच्छेदस्य सन्तापं क्लेशम् ।
असहिष्णुः सोढुमशक्नुवन् । करुणया आकृष्टं चेतो यस्य सः दयापरवशचित्तः । शा-
पफलाभावः—शापस्य फलं न भविष्यतीत्यर्थः । अमोघतया अन्यर्थतया । भाविनि
उचित समझकर बात-चीत छेड़ दी । उन्होंने लीलापूर्वक कहा—हे प्रिये ! प्राचीन कालमें
शाम्ब नामका एक महीपति अपनी जायाके साथ जलविहार करनेकी अभिलाषासे एक सरो-
वरके तटपर गया । वहांपर कमलोंके मध्यमण्डलमें सोता हुआ एक राजहंस दीख पड़ा । उसे
पकड़कर उसने धीरेसे उसके चरणोंमें कमलदण्डका सूत्र बाँध दिया। प्रेमसे प्रफुल्लित
कपोलमण्डल करके अपनी प्रियतमाके मुखको मन्दस्मितके साथ देखकर बोला- हे चन्द्रमुखि !
मैंने इस राजहंसको बाँध दिया है। यह मुनिके समान स्थिरचित्त हो गया है । अच्छा अब
इसे छोड़ ही देता हूँ ! यह चाहे जहाँ विचरे । यह कहकर उसने उसे छोड़ दिया ।
(१३) उस राजहंसने राजा शाम्बको उसी समय शाप दिया कि, हे राजन् ! इस
कमलवनमें राजहंसके रूपमें मैं परब्रह्मके ध्यानमग्न समाविस्थ था और परमानन्द सुखभोग
रहा था । ऐसे नैष्ठिक तथा निरपराधी मुनिका राज्यमदसे अपमान तुमने स्व-प्रियाके अनुरं-
जनार्थ किया है अतः इस अपराधका दण्ड तुम्हें अपनी 'भार्याका वियोग' भोगना पड़ेगा ।
इसपर राजाका मुख म्लान हो गया और अपनी प्रियाके विरहको सहन करनेमें अशक्त होकर
उसने ऋषिवरके चरण छुए तथा प्रार्थना की कि, हे महाभाग ! अज्ञानवश मुझसे यह अप-
राध हो गया, कृपया क्षमा करें । करुणाद्रंचित्त उन तपस्वीने राजा शाम्बसे कहा-हे राजन् !
मेरी वाणी सत्य है । अतः तुम्हें यह शाप इस जीवनमें न होकर अन्य जीवनमें अवश्य प्राप्त