दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिश्रित अंग ४७
धन को पाय भया 'धनवंता, निरधन मिल उन बुरा कहै।
वा की कबहुँ न मन में लावै, अपने धन सँग जाय रहै ॥२॥
पति को पाय भई पतिबरता, [वा की] बहु बिभचारिन हाँस करै।
वा के संग कबहुँ नहिं जावै, पति से मिल कर चिता जरै ॥३॥
दरिया राम भजै जो साधू, जगत भेख उपहाँस करै।
वा का दोष न अंतर आनै, चढ़ नाम जहाज भवसागर तरै ॥४॥
॥ राग बिलावल ॥
राम भरोसा राखिये, ऊनित१ नहिं काई२।
पूरन हारा पूरसी, कलपै मत भाई ॥टेक॥
जल दिरवै३ आकास से, कहो कहँ से आवै।
बिन जतना ही चहुँ दिसा, दह४ चाल चलावै ॥१॥
चात्रिक भूजल ना पिवै, बिन अहार न जीवै।
हर वाही को पूरवै, अंतर गत पीवै ॥२॥
राज हंस मुक्ता चुगै, कुछ गाँठ न बाँधै।
ता को साहब देत है, अपनो ब्रत साधै ॥३॥
गरभ बास में आय कर, जिव उद्दम न करही।
जानराय जानै सबै, उनको वहिं भरही ॥४॥
तीन लोक चौदह भवन, करै सहज प्रकासा।
जा के सिर समरथ धनी, सोचै क्या दासा ॥५॥
जब से यह बानक बना, सब समझ बनाई।
दरिया बिकलप मेट के, भज राम सहाई ॥६॥
साहब मेरे राम हैं, मैं उनकी दासी।
जो बान्या सो बन रहा, आज्ञा अबिनासी ॥टेक॥
अरधउरध पट कँवल बिच, करतार छिपाया।
सतगुर मिल किरपा करी, कोइ बिरले पाया ॥१॥
(१) घाटा। (२, काई। (३) टपकै। (४) बहाकर।