सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 500, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-उपदेश अष्टक
अखिल विकार विभंजति, मंजति मन नीका ।
निगमागम नवनीत सौं, गिर प्राकृत टीका ॥ 6 ॥
बम्ह विचार प्रदायिनी, पर वैराग्य प्रदा ।
सफल करत नर तन को, सोचत सरति सदा ॥ 7 ॥
धारण करत बुद्धि को, बम्हनिष्ठ करती ।
नारायण निश्चय ही, मुक्ति महल धरती ॥ 8 ॥
उपदेश अष्टक
दादू सद्गुरु शीश पर, उरमें जिनको नांव ।
सुन्दर आये शरण तकि, जिन पायो निज धाम ॥
बहे जात संसार में, सद्गुरु पकरें केश ।
सुन्दर काढें डूबते, दे अद्भुत उपदेश ॥
उपदेश श्रवण सुनाय अद्भुत, हृदय ज्ञान प्रकाशियो ।
चिरकाल को अज्ञान पूरण, सकल भ्रम तम नाशियो ॥
आनन्ददायक पुनि सहायक, करत जन निष्काम हैं ।
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु, ताहि मोर प्रणाम हैं ॥ 1 ॥
सुन्दर सद्गुरु हाथ में, करडी लई कमान ।
मार्यो खैंच कसीस कर, बचन लगाया बाण ॥
जिनि बचन बाण लगाय उर में, मृतक फेर जिवाइया ।
मुख द्वार होय उचार कर, निज सार अमृत पाइया ॥
अत्यन्त कर आनन्द में, हम रहत आठों याम हैं ।
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु, ताहि मोर प्रणाम हैं ॥ 2 ॥
सुन्दर सद्गुरु जगत में, पर उपकारी होय ।
नीच ऊंच सब ऊबरैं, शरणे आवै कोय ॥
- 500 -