सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15
ज्यों यहु काया जीव की, त्यों सांई के साध।
दादू सब संतोषिये, मांहि आप अगाध ॥ 4 ॥
सत्संग महात्म
साधु जन संसार में, भव-जल बोहित अंग।
दादू केते उद्धरे, जेते बैठे संग ॥ 5 ॥
साधु जन संसार में, शीतल चंदन वास।
दादू केते उद्धरे, जे आये उन पास ॥ 6 ॥
साधु जन संसार में, हीरे जैसा होय।
दादू केते उद्धरे, संगति आये सोय ॥ 7 ॥
साधु जन संसार में, पारस प्रकट गाइ।
दादू केते उद्धरे, जेते परसे आइ ॥ 8 ॥
रूख वृक्ष वनराइ सब, चंदन पासैं होइ।
दादू बास लगाइ कर, किये सुगन्धे सोइ ॥ 9 ॥
जहाँ अरण्ड अरु आक थे, तहँ चन्दन ऊग्या मांहि।
दादू चन्दन कर लिया, आक कहै को नांहि ॥ 10 ॥
साधु नदी जल राम रस, तहाँ पखाले अंग।
दादू निर्मल मल गया, साधु जन के संग ॥ 11 ॥
ब्रह्मांड हंड चढ़ाइया, मानौं ऊरे अन।
कोई गुरु कृपा तैं ऊबरे, दादू साधू जन ॥ 11क॥
साधु बरसें राम रस, अमृत वाणी आइ।
दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥ 12 ॥
साधु संग महिमा महात्म
संसार विचारा जात है, बहिया लहर तरंग।
भेरे बैठा ऊबरे, सत साधु के संग ॥ 13 ॥

  • 185 -