छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
गड़ेरियों के लड़के भीतर ही भीतर हँस रहे थे।
यह विकट राह उनकी नित्य प्रति की जानी पहचानी थी। इसीलिए वे रहबर
बकरी के बच्चों की तरह छलाँग लगाते हुए सबसे आगे चल रहे थे। चढ़ाई चढ़ने
में जैसे-जैसे विलम्ब हो रहा था उसी क्रम में गणोजी का कलेजा पानी-पानी हो
रहा था। भय के कारण गणोजी पूरी तरह घबरा गया था। वह सोचता था कि कहीं
कोई चूक हो गयी या कोई धोखा हो गया तो सम्भाजी उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे।
दोपहरी बीत गयी। शाम की ठंडी हवा बहने लगी। आधा आकाश पार कर
सूर्य पश्चिम की ओर झुक गया। फिर भी पैरों के नीचे का रास्ता समाप्त होने को
नहीं आ रहा था। निरन्तर के परिश्रम से पूरी तरह थके हारे मुगल घुड़सवार हैरान हो
गये थे। उनकी जलती निगाह कह रही थी, 'गणोजी को खा जाऊँ या पीसकर पी
जाऊँ?' मुकर्रब गणोजी की ओर सशंक नजरों से देखने लगा। किसी के आदेश की
प्रतीक्षा किये बिना घोड़े बीच राह में ही बैठने लगे। थके-हारे सैनिक भी जमीन पर
लेटने लगे। भिश्ती पानी से भरी चमड़े की थैलियाँ सेना में घुमाने लगे। इसी अवसर
का लाभ उठाकर गणोजी मुकर्रब को एक पेड़ की आड़ में ले गया और हाथ
जोड़कर बोला, "सरकार, इस मुफ्त की विपत्ति को क्यों जिन्दा रखते हो? धोखा
हो जाएगा। इस प्रकार का खतरा मत उठाओ।"
"तो क्या करना चाहते हो?"
"सम्भा की और उस कपटी कलुशा की मुंडी यहीं पर छाँट दो। उसे सीधे
ले जाकर बादशाह के सामने पेश कर दो।"
"नहींऽऽ यह मुमकिन नहीं है।" मुकर्रब गरजा। "सम्भा को जीवित
पकड़ने का बीड़ा मैंने बादशाह के सामने उठाया है।"
"खान साहब, जिन्दा क्या और मुर्दा क्या? काम होने से मतलब।" गणोजी
ने झुँझलाकर कहा।
"नहीं गणोजी! पिछले आठ वर्षों से पाँच लाख की फौज जो कार्य नहीं कर
पायी उस पर मुकर्रबखान के इस दक्खिनी मुसलमान सरदार ने विजय हासिल की
है। सारी दुनिया में मेरा कितना नाम होगा? बादशाह तो खुशी से पागल हो
जाएगा।"
घुड़सवार सिपाहियों के पैरों में असह्य पीड़ा हो रही थी। किन्तु सम्भाजी
और कवि कलश के कलेजों पर वेदनाओं का नृत्य हो रहा था। उनका सारा शरीर
रस्सियों से इतना कसकर बाँधा गया था कि वह शरीर को काट रहा था। चढ़ाई पर
चढ़ रहे घोड़ों के शरीर की हरकत के साथ रस्सियाँ शरीर में चुभ रही थीं। खून बह
रहा था। शरीर की पीड़ा में हाथ-पैर फटकारने का व्यर्थ प्रयत्न उन दोनों ने कब का
छोड़ दिया था। शम्भूराजा और कविराज की ऐसी दशा हो गयी थी जैसे गरुड़ का
670 :: सम्भाजी
सारा शरीर अजगर की चपेट में आ गया हो, उसका शरीर, उसके पंख निगलने के
बाद अजगर के तीखे दाँत गरूड़ की गर्दन पर टिक गये हों और गरुड़ अपनी
अभागी आँखों से बाहर का डूबता संसार देख रहा हो।
पैरों के नीचे का विषैला रास्ता समाप्त होने को आया। मालेघाट के माथे पर
मराठों के गश्ती पहरे की अन्तिम चौकी थी। कविराज को इस बात का पूरा ध्यान
था। मुँह में लम्बा-चौड़ा कपड़ा भरा था किन्तु उस समय कविराज के दाँतों में ही
बुद्धि आ गयी थी। दाँतों में ही सारी शक्ति केन्द्रित हो गयी थी। उन्होंने धीरे-धीरे
दाँतों से मुँह का कपड़ा चूहों की तरह कुतरना आरम्भ कर दिया। घाट के माथे पर
की चौकी समीप आने लगी। चौकी के सिपाहियों की आवाजें आने लगीं। इन
आवाजों से मुकर्रबखान भयभीत हो गया। उसने गणोजी की ओर प्रश्नसूचक दृष्टि
से देखा। गणोजी ने आँखों से ही उसे शान्त रहने का संकेत किया।
अब एक बार मालेघाट समाप्त हो गया तो दो-ढाई घंटों में कराड़ आ
जाएगा। कराड़ में पन्द्रह हजार की मुगल सेना तैयार थी। वहाँ से आगे मुगलों का
प्रदेश आरम्भ होता था। एक बार यदि शम्भू महाराज वहाँ चले गये तो सब कुछ
समाप्त हो जाएगा। कवि कलश ने बड़े ध्यान से सुना। चौकी से आवाजें आ रही
थीं। जैसे डूबते हुए जहाज के पास यदि कोई लकड़ी का टुकड़ा दिख जाये तो
डूबता हुआ व्यक्ति उस तैरते टुकड़े को पकड़ने के लिए छटपटाने लगता है, वही
स्थिति कवि कलश की हो रही थी। मुँह में ठूँसा हुआ कपड़ा निकल चुका था।
उनके शरीर में जितनी शक्ति थी, उसे एकत्र कर कवि कलश अपनी पूरी शक्ति से
चिल्लाए, "बचाओऽऽ, बचाओऽऽ मेरे शम्भूराजा को बचाओऽऽ।"
कलश का यह घातक चिल्लाना सुनते ही इखलासखान ने अपने हाथ के
चाबुक को कविराज के मुंडे हुए सिर पर इतने जोर से मारा कि कविराज के सिर से
निकलने वाला खून का फौवारा इखलास की दाढ़ी तक पहुँच गया। कविराज बेहोश
हो गये। उनकी गर्दन एक ओर झुक गयी। नीचे से आवाज सुनकर ऊपर चौकी
सजग हो गयी। "कौन है बे? कौन है वहाँ?" ऊपर से आवाज आयी। मुकर्रब
घबरा गया। किन्तु उसी समय गणोजी ने ऊँचे स्वर में नारा लगाया, "सम्भाजी
महाराज की जयऽऽ।"
चौकी के थानेदार ने सभी की बारीकी से जाँच की। पूछताछ करने के लिए
अधिक था ही क्या? गणोजी रायगढ़ की महारानी येसूबाई के सगे बड़े भाई थे।
थानेदार की नजर खून और धूल से लथपथ उन दो सौदागरों पर भी गयी। कवि
कलश के सिर पर खून के ताजा निशान थे। किन्तु चक्कर आ जाने से उनकी गर्दन
एक ओर लुढ़क गयी थी। शम्भूराजा के शरीर पर मुसलमानी पहनावा था, दाढ़ी-
मूँछ सफाचट थी। मुंडे हुए सिर पर सूखे हुए खून के काले-नीले निशान थे। धूर्त
सम्भाजी :: 671
गणोजी ने दोनों की बची-खुची भौंहें भी निकाल दी थीं। शम्भुराजा अपने प्रदेश को
पहचान रहे थे किन्तु उनके सूजन भरे सफाचट मनहूस चेहरे को कोई नहीं पहचान
रहा था।
थानेदार ने पूछा, "लेकिन गणोजी भाई साहब! आप शम्भू महाराज के पास
क्यों जा रहे हैं?"
"अरे भाई इन दोनों सौदागरों को उनके चरणो में डालना है। यह मुगलों की
सेना भी औरंगजेब से अलग होकर हमारे साथ आ रही है। यह देखकर शम्भू
महाराज बहुत प्रसन्न होंगे।" गणोजी ने बड़ी प्रसन्नता से कहा।
"जाइये, जाइये दिन रहते ही पहाड़ उतर जाइये।" थानेदार ने सुझाव दिया।
अब सामने का पाथरपुंज गाँव समीप आने लगा। छायाएँ लम्बी होने लगीं।
सूर्य पश्चिम की ओर झुकने लगा। विगत आठ वर्षों में महाराष्ट्र के पठारी प्रदेश की
सभी नदियों, समुद्रतट, गहरी खाइयों, बुरहानपुर की मुगलाई ही नहीं, कर्नाटक की
धर्मपुरी, जिंजी, मदुरा से लेकर लोलापुर के मैदानी भाग तक हजारों बहादुर मराठों
को प्रेरणा की संजीवनी देने वाला, अपने खून का पानी करके, शिवाजी महाराज के
गौरवपूर्ण स्वराज्य के जहाज को पार लगाने वाला सौदागर ही आज काल के कराल
गाल में खिंचा जा रहा है।
पिछले अनेक वर्षों में माँ की गोद की तरह शम्भू महाराज को सुरक्षित रखने
वाला सह्याद्रि अब तेजी से पीछे छूट रहा था। सुदूर अँधेरे में कराड़ की मुगल छावनी
पर जलते हुए पलीते दिखाई देने लगे थे।
672 :: सम्भाजी
महत्त्वकांक्षा और जुलूस
एक
पाथरपुज के मैदान में गड़ेरियो की एक बस्ती थी। राह दिखाने वाले गडेरियो के
लड़के बहुत प्रसन्न थे। प्रत्येक को सोने की तीन तीन मोहरें मिली थी। इनमे इल्या
पीऱ्या और धाकल्या उम्र में बड़े थे। पीऱ्या की मौसी पाथग्पुंज की गडेरियावाड़ी म
रहती थी। इतना बड़ा इनाम मिलन की खुशी में पीऱ्या ने अपनी मौसी को मुर्गा
काटने के लिए कहा। घर में मुर्गे का सुस्वादु रम्सा तैयार हो रहा था। इस बीच
लड़कों ने रास्ते पर ही गोटियों का खेल रचा लिया था। उन्होंने निश्चय किया था
कि मुर्गा रोटी खा लेने के बाद मालेघाट उतरेंगे।
परन्तु थोड़ी देर में कुछ लोग डरे-सहमे भागते हुए अपने गाँव की ओर
आये। रास्ते में एक दूसरे के साथ कानाफूसी कर रहे थे। उस रहस्यमयी स्थिति
और भागदौड को देखकर लडकों को कुछ शका हुई। उन्होने अपना खेल छोड़
दिया।
दूसरी ओर पीपल के नीचे पाथग्पुज के सात आठ किसान एकत्र हो गये थे।
वे बहुत गम्भीर होकर दबे स्वर में आपस में कुछ खुसुर फुसुर कर रहे थे।
“बहुत बुरा हुआ।”
“हे भगवान! ऐसा नहीं होना चाहिए था। बड़े महाराज को गुजर अभी दस
वर्ष हुए हैं और उनके बेटे की ऐसी दुर्दशा हो गयी ?”
पीऱ्या हिम्मत करके आगे बढा और गाँव वालों से पूछने लगा “क्या बात है
दादाजी ? इतनी कानाफूसी किसलिए हो रही है ?”
“अपने शम्भुराजा को उनके सगे माले ने ही धोखा दिया है। बच्चो! अपने
राजा को बैलों की तरह बाँधकर वह बादशाह के पास ले गया है रSS!” वह
किसान अपने आँसू पोंछते हुए कह रहा था। “आज शाम को वह नीच गणोजी
शिर्के ने शम्भुराजा के साथ धोखा किया और पकड़ ले गया। आज दोपहर को इसी
सम्भाजी 673
रास्ते से गये हैं वे सब।"
उस किसान की बात कानों में पड़ते ही गड़ेरियों के बच्चों के चेहरे सफेद
पड़ गये। वे घबराकर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। कुछ धीरज धारण कर
धाकल्या चिल्लाया, "क्या कह रहे हैं राव ? हम दोपहर को वहीं पर थे। गणोजी
शम्भूराजा को नहीं, हीरे के दो सौदागरों को लेकर गये हैं।"
गाँव वालों ने उन बच्चों की ओर ध्यान नहीं दिया। परन्तु उनकी गम्भीर बातें
चलती रहीं। यह समाचार आसपास के जंगलों में दावाग्नि की तरह फैल रहा था।
स्त्रियाँ और बच्चे रोने लगे। सभी को ऐसा लगा मानो उनके घर का ही कोई गुजर
गया है। इतनी जल्दी से बदलने वाले इस वातावरण को देखकर गड़ेरियों के लड़के
घबरा गये। वे शोकमग्न हो गये। वे सोचने लगे, 'अनजाने ही हम शिवाजी महाराज
के राजपुत्र शम्भू महाराज को संकट में डाल दिये। रायगढ़ के राजेश्वर को पकड़वा
दिया। हम शत्रु के रहबर बन गये।' यह कल्पना उन बच्चों के लिए असह्य हो रही
थी। बच्चों की आँखों के सामने दोपहर में घोड़े पर बैठा सौदागर प्रत्यक्ष हो गया।
उसकी विलक्षण तेज नजर, चमकदार आँखें बच्चों की कल्पना में फिर से प्रकट हो
गयीं। वे जंगली पंछी इस कल्पना से पूरी तरह विचलित हो गये। आठों बच्चे
बगल की आड़ में चले गये। पीर्या जामुन के तने पर अपना सिर पटकने लगा।
धाकल्या ने अपने ही गालों पर तमाचे लगाना शुरू किया। कुछ लोग वहाँ की
वनभूमि पर लोटने लगे। एक-दो ने त्रस्त होकर अपने मुँह में मिट्टी भर ली। पीर्या
उठकर खड़ा हो गया। उसने कमर में खोंसी हुई स्वर्ण मुद्राओं को बाहर निकाला।
गणोजी और मुकर्रबखान द्वारा दिया गया इनाम उसे साँप के विषैले दाँत की तरह
लगने लगा। सभी लड़कों ने अपनी मोहरें दूर फेंक दीं। ऐसा करने से उन्हें कुछ
हल्का लगा। किन्तु कलेजे में घुसी पश्चाताप की मधुमक्खी उनका पीछा छोड़ने को
तैयार न थी।
लड़के एक दूसरे के गले में बाँहें डालकर रोने लगे। उनमें सबसे छोटी उम्र
के बिरज्या ने पीर्या से पूछा, "दादा, अब हमलोग क्या करेंगे?" अपने गालों को
पीटते हुए और रोते हुए पीर्या बोला, "भगवान मल्हारीराय! यह क्या घोटाला हो
गया? वह कुत्ता गणोजी शिर्के? उसकी शैतानी धोखेबाजी हमारी समझ में नहीं
आयी। भाइयों हम अपने माँ बाप को एक बार भरे कुएँ में ढकेले जाते देख सकते हैं
किन्तु हमारे शम्भूराजा को कोई उँगली भी लगाये तो हमसे सहन नहीं होगा।
लड़के जोर-जोर मे रोते हुए आपस में बातें करने लगे।
इल्या जोर-जोर से रोने लगा। उसका मामा कापुरहोल में रहता था। वहाँ की
धाराऊ शम्भू महाराज की दूधमाता थी। उसी का दूध पीकर ही शम्भूराजा छोटे से
674 .. सम्भाजी
बड़े हुए थे। उसका स्मरण करके इल्या कहने लगा, "अपनी ही माई-मौसी के दूध
से शम्भूराजा पले बढ़े हैं, आज हमने ही उनके गले पर छुरा मारा है।"
बिरज्या रोते हुए कहने लगा, "मैंने भी अपनी माँ की गोद में यह गीत बहुत
बार सुना है।" वह आँखें पोंछते हुए स्वयं गाने लगा—
जब भी होंठ शम्भू के सूखे धाराऊ का दूध उमड़ता।
निपट गरीबों की कुटिया में सुवन शिवाजी का है पलता।।
आँसुओं की पहली बाढ़ सूख गयी। आठों लड़कों की कान की नमें गर्म हो
गयीं। ऐसा लगा जैसे उनके शरीर में आग लग गयी है। उनके हाथों में मुरसुरी उठने
लगी। सभी ने एक स्वर में पीर्या से पूछा, "बता दादा, हमें अब क्या करना
होगा?"
"अरे गधो पूछते क्या हो? भेड़ बकरियों के बीच घुस आये भेड़ियों पर टूट
पड़ने वाले और जिन्दा भेड़ियों के जबड़े तोड़कर उन्हें मारने वाले गड़ेरियों की
औलादें हैं हम। हमारी आँखों को चकमा देकर शैतान हमारे राजा को ले गया है,
हम उसकी हड्डी पसली एक कर देंगे।"
सभी एक स्वर में चिल्ला उठे, "चलो चलोऽऽ हम गणोजी के कर्मचारी
पन्त को पहले समाप्त करेंगे।"
"पन्त को किसलिए? जड़ को ही पहले समाप्त करेंगे। उस गणोजी शिर्के
का ही गला घोटेंगे।"
लड़के भूख-प्यास भूल गये। वे धरती पुत्र आठ बालक खाई, पहाड़, झरने,
पेड़-पौधे पार करते हुए कराड़ की दिशा में दौड़ने लगे। उनके पैरों में दस हाथियों
की शक्ति आ गयी थी। उनकी छाती धक धक कर रही थी। हृदय में प्रतिशोध की
भावना भी धधक रही थी। शिवाजी और उनके पुत्र शम्भू महाराज को स्मरण करके
सिर चकरा रहा था। रायगढ़ का वह राज्याभिषेक, वह राजा का उत्सव, जनता
उल्लास, वे गालकियाँ, उनकी मज़ावट आदि इन लड़कों में से तीन-चार ने अपने
पिता अथवा चाचा के कन्धे पर बैठकर स्वयं देखा था। इन लड़कों ने शम्भू महाराज
का राज्याभिषेक स्वयं देखा था। गड़ेरियों ने अपना विशेष नृत्य गजनृत्य प्रस्तुत
किया था। शिवाजी के राज्याभिषेक के समय इन लड़कों के पुरखों ने उल्लास से
भाग लिया था। वे बड़े बड़े ढोल बजाते हुए नाचे-गाये थे। इनके चाचा मामाओं ने
बचपन में शम्भूराजा को अपने कन्धे पर बिठाकर, श्रृंगारपुर के खेतों खलिहानों में
घुमाया था।
इन धरतीपुत्रों को जागीर का अर्थ नहीं मालूम था। उन्हें स्वार्थ की विषैली
हवा नहीं छू सकी थी। उनके लिए शिवाजी और सम्भाजी प्राणों से भी बढ़कर थे।
सूर्य और चाँद थे। वे मानते थे कि इन दो छत्रपतियों के कारण ही सिर की शिखा
सम्भाजी : 675
सुरक्षित थी। वे जागीरदारों और जमींदारों के शोषण से बचे हुए थे। सह्याद्रि के
खाई-पठारों में गोकुल का सुख फैला था। उसी शिवपुत्र को आज शत्रु इसी रास्ते से
निकालकर ले गया। जाने-अनजाने हमने भी शत्रुओं की सहायता की है। इसी
एहसास से लड़कों का शरीर आग की तरह जल रहा था।
बिना रुके और एक क्षण भी गँवाये, आठों लड़के रातभर दौड़ते रहे। उनकी
कमर की करधनी में बँधे कोयले और छुरे सरसराते रहे। हाथ की मुट्ठियाँ भींचते
अपने दाँतों को चबाते, हवा की पीठ पर सवार वे यही सोचते रहे कि कहाँ है वह
गणोजी ?
कराड़ की मुगल छावनी गहरी नींद में थी। बगल के कोयना नदी के पाट से
ठंडी हवा आ रही थी। छावनी में केवल पहरेदार और चौकीदार जाग रहे थे।
जगह-जगह मशालें जल रही थीं। जिस प्रकार बकरियों के झुंड में छिपकर बैठे
भेड़िये को पकड़ने के लिए गड़ेरिये दबे पाँव चलते हैं वैसे ही ये लड़के दबे पाँव
आगे बढ़े। एक पहरेदार ने उन्हें रोका और पूछा, "क्या रे, कहाँ चले ?"
"जी हमें गणोजी शिर्के सरकार ने बुलाया है।"
"कहाँ से आये हो ?"
"आज शम्भूराजा का शिकार करने शिर्के सरकार आये थे। उन्हें राह दिखाने
वाले हमी हैं।" इल्या ने कहा।
पहरेदार थोड़ा-सा विचार में पड़ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि
क्या करे। इसी समय सामने की छोलदारी से एक सैनिक बाहर निकला। वह भी
पिछले दिन सेना के साथ था। उसने लड़कों को देखा। उसने हँसते हुए पहरेदार से
कहा, "अरे ले जाओ इनको गणोजी के पास, ये सब अपने ही छोकरे हैं।"
छावनी में गहरा सन्नाटा था। मुकर्रब के साथ आये सात आठ सौ सैनिक
बिल्कुल त्रस्त हो गये थे। उन्होंने अपने थके हाथ पैर धरती पर लम्बे कर दिये थे।
दोनों पहरेदार एक तम्बू के पास रुके। उन्होंने अन्दर से बन्द किया गया कपड़े का
दरवाजा लड़कों को दिखाया। देखते ही बच्चों ने नारा लगाया "बिरुबा की जयऽऽ,
बिरुबा की जयऽऽ"। इसके साथ ही वे अपने साथ आये पहरेदारों पर झपट पड़े।
उनके हाथों की मशालें अपने हाथों में ले लीं। मशालों की लपट से पहरेदारों की
दाढ़ी के बाल जल गये। कहीं आँखों की पुतलियाँ भी न बाहर आ जायँ, इस भय
से पहरेदार भाग खड़े हुए। लड़कों ने जलती मशालों को सामने के तम्बू से लगा
दिया।
देखते-देखते तम्बू धू धूकर जलने लगा। भीतर के सामान के साथ सारी
कनातें जलने लगीं। भीतर घोड़ों के लिए रखा घास भी सुलगने लगी। धुएँ की धारा
बाहर निकलने लगी। चारों ओर से एक ही आवाज आने लगी, 'भागोऽ भागो,
आगऽ आगऽऽ' तम्बू के भीतर से 'या अल्लाऽऽ बचाओऽ बचाओऽऽ' जैसी करुण
676 सम्भाजी
चीत्कार बाहर सुनाई देने लगी। इसके बाद आग से अपने को बचाते हुए कुछ लोग
सामने के दरवाजे से बाहर निकलने लगे। तब तक लड़कों ने तम्बू में लगी मजबूत
लाठियाँ अपने हाथों में ले लीं और सामने आने वाले लोगों को पीटने लगे।
तम्बू में लगी आग से इन लड़कों के दिल में लगी प्रतिशोध की आग अधिक
तेज थी। वे गला फाड़कर चिल्ला रहे थे, "आओ गणोजी शिर्के, बाहर आओ, हम
तुम्हारी बोटी-बोटी कर देते हैं।"
परन्तु इन बच्चों के आवेश से मुगलों की शक्ति बहुत अधिक थी। आसपास
से पहरेदार और सैनिक सैकड़ों की संख्या में भागकर आगे आ गये। उन आठ
जंगली पंछियों को कैद कर लिया गया। शीघ्र ही आग पर भी काबू पा लिया गया।
अन्दर सोये अनेक लोगों ने आग को भड़कता देखकर दूसरी ओर नदी में छलाँग
लगा दी थी। इस तरह अपनी जान बचाई थी।
आग ने अपना प्रभाव तो छोड़ा ही था। वहाँ तीन शव कोयले की तरह काले
होकर गिरे थे। काले-कलूटे, धुएँ से सने शव पहचान में नहीं आ रहे थे। उनके
वस्त्र और सिर के बाल जलकर खाक हो गये थे। उनकी आँखों की पुतलियाँ बाहर
आ गयी थीं। शवों की खाल जगह-जगह झूल रही थी। मुसलमान सैनिक धीरे
धीरे आपस में बात कर रहे थे, "एक गणोजी होगा, दूसरा नागोजी। परन्तु यह
तीसरा फौजी कौन हो सकता है?"
आग और दंगा दोनों शान्त हो गये। किन्तु मुकर्रब के तम्बू मे कोई जागा
नहीं। इतना दंगा-फसाद और शोरगुल होने पर भी अनेक दिन थके मुकर्रब को
जगाने का साहस थानेदार को नहीं हो पाया।
दूसरे दिन दोपहर को मुकर्रबखान अपने तम्बू से बाहर आया। वह सामने की
चारपाई पर बैठकर अँगड़ाइयाँ ले रहा था। उन आठ जंगली पंछियों को खान के
तम्बू के बाहर मुस्कें बाँधकर खड़ा किया गया था। आग लगाने का दंड देने के लिए
उन्हें चाबुक से पीटा गया था। पीटे जाने के कारण लड़कों के मुँह सूज गये थे।
उनका शरीर जगह-जगह फट गया था। फिर भी वे सभी निडर भाव से सीना ताने
मुकर्रब की ओर देख रहे थे।
मुकर्रब ने पूरी घटना का ब्यौरा लिया। गणोजी और नागोजी के जलकर खाक
होने की बात उसे बताई गयी। उस ओर ध्यान न देते हुए उसने तत्काल थानेदार से
पूछा, "सम्भा कहाँ है?" राजबन्दी सुरक्षित हैं, यह जानते ही मुकर्रब शान्त हो
गया। इसी बीच एक कनात के पीछे से गणोजी और नागोजी जल्दी-जल्दी आते
हुए दिखाई पड़े। उनकी ओर देखते हुए मुकर्रब हँसकर बोला, "गणोजी, मैंने तो
सुना आप जल चुके हैं।" गणोजी अपने गालों में हँसते हुए बोला, "खान साहब!
सम्भाजी :: 677
अब तो समझ में आया कि उस सम्भा को पकड़ने से हमारे भाई-बन्धु मेरे साथ कैसा
व्यवहार करेंगे? सुबह होने से पहले ही ऐसी आशंका मेरे मन में आयी। मैंने
नागोजी को तत्काल जगाया और दूसरे तम्बू में जाकर सो गया। नागो बाबा उठने को
तैयार न थे। देखिए क्या से क्या हो गया।"
गणोजी की बातें सुनकर मुकर्रब ने हँसकर कहा, "चिन्ता मत कीजिए
गणोजी, बादशाह आपको जागीर और जवाहरात देकर मालामाल कर देंगे।"
"आगे का आप देखो, खानसाहब! हमारी जिम्मेदारी अब समाप्त हुई।"
नागोजी माने ने कहा।
नागोजी ने आगे कहा, "रात की घटना तो एक छोटी झंझट थी। हमें जागीर
मिले या न मिले पर आप सम्भाजी नाम की इस बला को जल्दी ही यहाँ से ले
जाइये, नहीं तो लोग हमारा नामोनिशान तक मिटा देंगे।"
"इन विद्रोही लड़कों का क्या करें?" थानेदार मुकर्रब से पूछने लगा। मुकर्रब
को एक क्षण को मालेघाट की वह जानलेवा चढ़ाई याद आयी। गणोजी का उपकार
उसके ऊपर पहाड़ के समान था। किन्तु उन जंगल घाटियों में इन बहादुर लड़कों
जैसे रहबर न मिले होते तो मुगल सेना को आज यह दिन देखने को न मिलता।
औरंगजेब को मोहरा चाहिए था वह तो मुकर्रब को मिल ही गया था। उसे पाने में
इन लड़कों का भी गिलहरी का हिस्सा था। कृतज्ञता के इस भाव से उसने थानेदार
से कहा, "छोड़ दो, जंगल के पंछी हैं जंगल की ओर ही जाएँगे।"
कैद हुए लड़के मुक्त हो गये। पैर घसीटते हुए वे जंगल की ओर आधा कोस
ही गये होंगे कि उनके पैर अटकने लगे। उनके हृदय में चटकती प्रतिशोध की आग
उन्हें चैन नहीं लेने दे रही थी। शम्भूराजा को जंगली पशु की तरह बाँधकर खींचते
हुए ले जाने वाला असली व्यक्ति मुकर्रबखान है। मुकर्रब की कल की गति, उसका
वह आवेश जैसी बातों को लड़के भूले न थे। दबी आवाज में पीर्या बोला,
"भाइयो! इस खान ने हमें तो छोड़ दिया किन्तु हमारे शम्भू महाराज को नहीं।"
पीर्या के शब्दों को सुनते ही सभी के पैर ठिठक गये। उनके शरीर का खून
गर्म होने लगा। अपने पास कोई हथियार न होने पर भी वे झट से पीछे मुड़े। ऐसा
लगा जैसे उनका शरीर ही माला बन गया हो।
उनमें से किसी ने नारा लगाया, 'जय मल्हारऽऽ' और दूसरे ही क्षण वे आठों
मानवी भाले, मुकर्रब और गणोजी का गला घोंटने के लिए हवा की गति से भागने
लगे। उन दोनों का गला दबाने के लिए दोनों के हाथ सुरसुराने लगे। उनके शरीर
को प्रतिशोध के पंख लग गये थे। गरुड़ की भाँति ये जंगली पंछी खान की ओर
दौड़े। मुकर्रब के चारों ओर सिपाहियों का कड़ा पहरा लगा हुआ था। उसका
अनुमान इन लड़कों को नहीं था।
678 :: सम्भाजी
ये सीधे खान का गला घोंटने के लिए भिड़ जाने वाले थे। किन्तु इनके
पहुँचते ही इन पर तलवार के सपासप वार हुए। खून की धारा बहने लगी। उस गर्म
खून को देखकर मुकर्रब, गणोजी और नागोजी भी सन्न रह गये। उस अचानक हुए
आक्रमण से मुकर्रब भी हिल गया। ये तीनो भय से काँप गये।
थोड़ी देर में हशम आगे आये। उन्होंने इन आठ शवों को उठाकर बोरो में भर
लिया। उन्हें ले जाकर बगल मे बह रही कोयना नदी की धारा में फेक दिया।
शाम होने को आयी। सूर्य धीरे धीरे पश्चिम की दिशा में उतर रहा था। सूर्य
की अरुणाभ किरणें कोयना के पानी में उतर रही थीं। खंडोबा के गले में पहनाई
गयी फूलों की माला, सूखने के बाद निर्माल्य होकर जैसे देवता के पैरो में आ गयी
हो उसी प्रकार ये आठ शव कोयना के रक्तिम प्रवाह में तैरते दिखाई पडे।
दो
धूप तप रही थी। दोपहर को येसूबाई का दल वाशिष्ठी नदी के तट पर पहुँचा।
चिपलून की अमराई में महारानी पहुँची। वहाँ नदी के किनारे जलपान के लिए सेना
रुकी थी। पीछे से आने वाले शम्भू महाराज की महारानी को प्रतीक्षा थी। इसी समय
पीछे की राह पर दूर झाड़ियों में कुछ शोर सुनाई पड़ा। पाँच-छह घोडे तेजी से
दौड़ते हुए आगे आये। महारानी ने हँस कर कहा, "महाराज ने कहा था दशम्या
(दूध से गुँथे आटे की रोटियाँ) खोलकर रखना। पहले निवाले के समय मैं पहुँच
जाऊँगा। उन्होंने अपनी बात पूरी करके दिखाई।"
आगे का रास्ता पार करना था। खंडोजी ने येसूबाई से कहा, "मातेश्री!
लीजिए राजाजी आ ही गये। अब दशम्या खोल दीजिए। महारानी पहला निवाला
मुँह में डालने ही वाली थी कि पीछे से आने वाले सवारों मे जो सबसे आगे था वह
इतनी विकलता से चिल्लाया जैसे उसे साँप ने काट लिया हो।
"रानी साहब धोखा हुआ, शत्रु ने धोखा किया।"
मुँह का कौर गिर गया। खंडोजी, येसबाई, दास-दासी सभी झट से उठकर
खड़े हो गये। पसीने से तर-ब-तर हुए घुड़सवार आगे आये और एक साथ बोलने
लगे, "संगमेश्वर पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया। वहाँ पर कम से कम एक हजार
मुगल सैनिकों को अपनी आँखों से देखा है।"
सम्भाजी 679
"और महाराज ? हमारे महाराज कहाँ हैं ?'' खंडो बल्लाल ने विह्वल होकर
पूछा।
"महाराज शत्रु पर टूट पड़े हैं। कवि कलश की कोठी के सामने घनघोर युद्ध
हो रहा है।"
"हाँ-हाँ महाराज को बड़ी कुशलता से लड़ते हुए मैंने देखा है। किन्तु
आक्रमण अचानक हुआ और हमारी सेना बहुत कम है। इतने में उन दो-तीन
घुड़सवारों के पीछे दो-तीन सौ घोड़ों की टापें सुनाई देने लगीं। चिपलून के सराई
के समीप यह सेना रुकी। घुड़सवार छलाँग लगाकर नीचे उतरे। उनका चेहरा
सम्भ्रमित था, उनके कपड़ों पर खून और धूल के धब्बे दिखाई पड़ रहे थे। उन्हें
देखकर येसूबाई दौड़ती हुई आगे आयीं। उन्होंने व्यग्रता से पूछा, "सन्ताजी क्या
हुआ? महाराज कहाँ हैं?"
"माताजी घबराने का कोई कारण नहीं है। सवेरे अचानक शत्रु ने संगमेश्वर
पर आक्रमण कर दिया। कुल सात-आठ सौ सैनिक थे। हमारी संख्या बहुत कम
थी। किन्तु हमने उनका मुकाबला किया हमने उन्हें पीछे हटा दिया।"
"और महाराज? महाराज कहाँ हैं?" यह पूछते हुए येसूबाई का हृदय जोर
से धड़कने लगा।
"चिन्ता न करें मातुश्री ! महाराज सकुशल हैं। महाराज और कविराज बीच
वाले जंगल के रास्ते से सीधे रायगढ़ पहुँच जाएँगे।"
"परन्तु महाराज को छोड़कर तुम आगे आये कैसे सन्ताजी?"
"महारानी जी, 'महाराज वहाँ रुके नहीं हैं। उन्हें आपकी बड़ी चिन्ता थी।
आकाश से अचानक बरसते बादलों की तरह शत्रु ने अचानक हमला कर दिया। यह
पता ही नहीं लग पाया कि और कितने शत्रु किस दिशा से आ जाएँगे? इसलिए
महाराज ने मुझे चिपलून की चौकी सँभालने का आदेश दिया। महारानी के साथ की
बीस-पचीस पालकियों के लोग सकपकाये से खड़े थे। महारानी ने सन्ताजी से
पूछा, "सन्ताजी हमारे शिरकान के श्रृंगारपुर के रास्ते से तो हवा भी घुसने की
गुस्ताखी नहीं करती फिर दुश्मन कहाँ से घुस आये?"
"महारानी जी, यह अपने लोगों द्वारा किया गया धोखा है। परन्तु अब उसका
विचार न करें। यहाँ से जल्दी निकलें। नहीं तो पालकियों को रायगढ़ पहुँचने में
विलम्ब हो सकता है।"
कहारों ने पालकियाँ उठा लीं। वे तेज गति से आगे की ओर बढ़े। सन्ताजी
बेचैन हो रहे थे। उन्होंने चिपलून के थानेदार को अपने साथ लिया और दिनभर
चिपलून के बन्दोबस्त में व्यस्त रहे।
शाम को दो घुड़सवार संगमेश्वर की ओर से भागते हुए आये। उनके स्याह
680 :: सम्भाजी
पड़ गये चेहरे बेहाल थे। समाचार देते हुए वे रो पड़े, "सरदार धोखा हो गया। आप
लोग वहाँ से निकले और शत्रुओं ने पुनः गाँव पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने गाँव
को आग लगा दी और हम पूरी तरह हार गये।"
"परन्तु महाराज कहाँ हैं?"
"कुछ लोग कहते हैं कि बगल की खाड़ी का लाभ उठाकर महाराज निकल
गये। किन्तु कुछ लोगों का कहना है कि महाराज और कविराज को शत्रु पकड़कर
ले गये।"
"पकड़कर? तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है?" सन्ताजी सन्तप्त
हो गये। सही खबर समझ में नहीं आ रही थी। सन्ताजी और थानेदार खड़े-खड़े
बातें कर रहे थे। उन्हें विश्वास होने लगा कि पीछे कुछ भयंकर घटित हुआ है। अब
चिपलून में बैठे रहने में बुद्धिमानी नहीं थी। सन्ताजी पाँच सौ घुड़सवारों की सेना
लेकर चिपलून से संगमेश्वर की ओर चल पड़े। सन्ताजी के साथ घोड़े संगमेश्वर
की ओर भागने लगे।
पहाड़ी, जंगल, झरने, खोह आदि लाँघते हुए सन्ताजी की सेना वेग से दौड़ने
हुए जब संगमेश्वर पहुँची तब घना अन्धकार हो गया था। संगमेश्वर की स्थिति
देखते नहीं बन रही थी। इस सुन्दर कस्बे का हुलिया ही बदल गया था। क्षेत्र मे
अपना आतंक जमाने के लिए शत्रु ने आग लगा दी थी। अब भी कुछ कोठियाँ-
हवेलियाँ जलती हुई दिखाई पड़ रही थीं। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थीं।
टिड्डियों के दल आने के बाद जैसी स्थिति होती है उसी प्रकार पूरा कस्बा तहस
नहस हो गया था। कस्बे में कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ बूढ़े, कुछ लूले
लँगड़े भाग न सकने के कारण आड़ में छिपकर बैठे थे। वहाँ अफवाह फैल गयी थी
कि अभी फिर से औरंगजेब की सेना आने वाली है। इसी भय से बागों और जंगलों
में छिपे लोग बस्ती में जाने को तैयार न थे। सन्ताजी की सेना के आने का समाचार
पाकर कुछ छिपे हुए बूढ़े बाहर आये। उनसे पक्की खबर मिली कि शम्भूराजा और
कविराज को शत्रु सेना जीवित पकड़कर ले गयी। यह समाचार सुनते ही सन्नाजी
का चेहरा काला पड़ गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने तपते सोने पर कोयले का घोल
डाल दिया। उन्हें जोर से रुलाई आ गयी। दूसरी दिशा से पाँच घोड़े दौड़ते हुए
आये। उसी ओर से धनाजी जाधव अपनी सेना लेकर लौटे थे।
धनाजी और सन्ताजी एक-दूसरे से मिले। घोड़ों पर से ही कुछ बातें कीं।
धनाजी ने कहा, "सन्ताऽऽ मैं दो घंटे से चारों तरफ दौड़ रहा हूँ। बहुत खोज की,
लेकिन समझ में ही नहीं आ रहा है कि महाराज को लेकर दुश्मन किस रास्ते से
चले गये। लोग अपने अनुमान से दशों दिशाओं की ओर बताते हैं।"
"पर धनाजी इस तरह रुके रहने से क्या होगा? अपने सूर्य को शत्रु लेकर
सम्भाजी :: 681
चला गया। बाकी बचा यह जनसमुद्र लेकर हम क्या करेंगे?" सन्ताजी ने घबराये
स्वर में कहा।
आपस में विचार-विमर्श हुआ। गोवा और चिपलून का रास्ता छोड़ दिया
जाये तो आंबाघाट का एकमात्र रास्ता बचता था। निश्चित कि कोल्हापुर की ओर से
शत्रु उसी दिशा से आये होंगे। यहाँ से आंबाघाट पहुँचने के लिए कम से कम पाँच-
छह घंटे लगने वाले थे। रास्ता सँकरा, खड़ी चढ़ाइयों वाला और गहरी घाटियों
वाला विकट रास्ता था। सन्ताजी और धनाजी के एकत्र लगभग एक हजार घोड़े
आंबाघाट की ओर दौड़ पड़े। किन्तु इसी बीच कोई भीड़ से आकर सन्ताजी के घोड़े
से चिपक गया। अपने रिकेब में रखे पैर को पकड़कर खड़े उस दुबले-पतले ब्राह्मण
को सन्ताजी ने देखा। उसका चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था। सन्ताजी को ध्यान
आया यह तो संगमेश्वर के थानेदार के सहयोगी त्र्यंबक शास्त्री थे। सन्ताजी ने
शीघ्रता से पूछा, "कहिए शास्त्री बाबा, क्या कहना चाहते हैं?"
"बस, एक क्षण के लिए मेरे साथ आइये।"
बगल में कवि कलश की कोठी जलकर राख हो गयी थी। अन्दर उठने
वाली लपटें अभी भी बाहर दरवाजे तक धधक रही थीं। सामने पचास-साठ शव
गिरे पड़े थे। उसमें से एक शव पर चादर उढ़ा दी गयी थी। शास्त्री जी ने धीरे से
चादर को हटाया। सामने का दृश्य देखकर सन्ताजी उलझन में पड़ गये। दिनभर की
भाग-दौड़ और शम्भूराजा पर आये संकट में सन्ताजी भूल ही गये थे कि उनका
कोई पिता भी है जो हिन्दवी स्वराज्य का सेनापति है। दोपहर की लड़ाई में शम्भू
महाराज को बचाते-बचाते वृद्ध सेनापति म्हालोजी घोडपड़े गिर गये थे। अपने पिता
का शव देखकर सन्ताजी पूरी तरह विचलित हो गये।
शोक सन्तप्त सन्ताजी को सँभालने का प्रयास धनाजी कर रहे थे। सन्ताजी ने
अपने मृत पिता के मुख पर हाथ फेरा, उन्हें सीने से लगा लिया। फिर अधिक समय
न गँवाकर उन्होंने पिता के सिर को हल्के से नीचे रख दिया। उन्होंने अपने गले की
रत्नों की माला को शास्त्रीजी को सौंपते हुए कहा, "शास्त्री महाराज, मेरे पिताजी के
साथ और जितनों का सम्भव हो अन्तिम संस्कार कर दीजिए। मुझे आगे बढ़कर शत्रु
का विनाश करना है।"
एक घंटे तक घोड़े दौड़ते रहे। मार्ग में एक पानी का झरना मिला। दिनभर की
निरन्तर भाग-दौड़ से घोड़े थक गये थे। प्यासे घोड़ों ने पानी पिया। पीठ पर बैठे
सैनिकों की चिन्ता किये बिना वे मूक जानवर वहीं बैठने लगे। आगे का रास्ता अभी
भी शेष था। समीप के गड़ेरियों की बस्ती से घोड़ों के लिए सूखा चारा लाया गया।
वहाँ के तीस-चालीस घर जग गये थे। जल्दी जल्दी नाचनी की रोटियाँ बनाई गयीं।
एक या डेढ़ रोटी सभी को मिली। सैनिकों ने उसे चटनी के साथ खा लिया।
682 :: सम्भाजी
घोड़ों को दो-ढाई घंटे का आराम मिल गया। एक-एक करके घोड़े स्वस्थ
होकर खड़े होने लगे। अपने मालिकों की स्थिति उन्हें भी महसूस हुई होगी। वे
फिर तैयार हो गये। आंबाघाट चढ़ते चढ़ते दोपहर ढल गयी। वहीं बीच में मराठों
की चौकी थी।
सन्ताजी और धनाजी को अचानक आया देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य
हुआ। घाट के बीच-बीच में कविराज ने अपनी सेना बिखेर रखी थी। यह सेना घाट
के पार अम्बा गाँव तक फैली थी। वहाँ पर कविराज के सहयोगी कृष्णाजी कान्हेरे
सन्ताजी और धनाजी का स्वागत करने आये। वहाँ सात हजार की तरोताजा सेना
देखकर सन्ताजी चकित हो गये। उन्होंने शम्भूराजा के बारे में कान्हेरे से पूछताछ
की। कान्हेरे ने कहा, "क्या कहते हैं, सरदार साहब ? हम पिछले बहुत दिनों से
यहीं पर टिके हुए हैं। कविराज ने मुझे विशेष रूप से तैनात किया है। इस रास्ते से
न कोई आया और न कोई गया।"
"क्या कह रहे हैं ? शत्रु की सेना यहाँ से ऊपर नहीं चढ़ी ?"
"कैसे चढ़ती सरकार ? हम छह-सात हजार सैनिक क्या यहाँ चूड़ियाँ
पहनकर बैठे हैं ? हम शत्रु को यहाँ से कैसे जाने देते ? यहाँ से कोई नहीं गुजरा। हम
कविराज के आदेश की राह देख रहे हैं।"
उन दोनों युवा सरदारों की उलझन देखकर कान्हेरे भी घबरा गये। यह सूचना
मिलते ही शम्भूराजा पर संकट आ गया है, स्वराज्य संकट में पड़ गया है, वहाँ
उपस्थित सभी लोग घबरा गये। महाराज का क्या हुआ होगा ? "बहुत बड़ा धोखा
हो गया।" कृष्णाजी कान्हेरे ने कहा, "रुकिए, अभी थोड़ी देर पहले रत्नागिरि के
सुनार नरहरिपन्त प्रचितगढ़ के रास्ते से पहाड़ी चढ़कर आये हैं। उनकी पुत्रवधू
पाटण की है उनके साथ तीस-चालीस लोग मेरे डेरे में विश्राम कर रहे हैं।"
नरहरिपन्त को शीघ्रता से बुलाया गया। नरहरिपन्त बताने लगे, "अपनी बहू
को लेकर हम प्रचितगढ़ और कुंडीघाट के बीच के रास्ते से तीन दिन की पहाड़ी
यात्रा करके आये हैं।" धनाजी ने जल्दी पूछा, "आते समय बीच वाले पट्टे में कुछ
आदमी, कोई फौज या ऐसी कोई चीज आपको दिखाई पड़ी ?" "वैसा कुछ खास
नहीं दिखा। " नरहरिपन्त अपनी बगुले जैसी गर्दन हिलाते हुए कहने लगे। कुछ
स्मरण करते हुए वे जल्दी से बोले, "हाँऽऽ कल शाम से पहले पाथरपुंज के जंगल
में अपने दादाजी दिखाई पड़े थे।"
"कौन दादाजी ?"
"अपने गणोजी शिर्के, अपने शम्भूराजा के साले साहब।"
धनाजी और सन्ताजी झट से आगे आ गये, उनकी साँसें तेज चलने लगीं।
सन्ताजी ने हड़बड़ाकर पूछा, "गणोजी वहाँ क्या कर रहा था ?"
सम्भाजी .: 683
"कुछ नहीं, सात-आठ सौ की फौज चल रही थी, कराड़ की दिशा में जा
रही थी। गणोजी सबसे आगे घोड़े पर थे। उनके पीछे यवन सैनिक थे मराठा सैनिक
बहुत कम थे।"
"और क्या क्या देखा?"
"मैं आगे क्यों जाता। मेरी बहू गहनों से लदी थी। व्यर्थ में राहजनी का
संकट क्यों बुलाता? इसलिए दूर झाड़ी में छुपकर ही उस फौज को देखा। परन्तु
सेना के आगे-आगे दो कैदियों को घोड़े पर लादकर ले जा रहे थे।"
"देखने में कैसे थे वे कैदी?"
"थे तो एकदम गोरे-चिट्टे, मजबूत कद काठी वाले पर उन पर बहुत मार-
पीट हुई थी। उनके मुँह में खून सने कपड़े ठूँसे थे। पूरा शरीर रस्सियों और जंजीरों
से बाँधा गया था।"
"ऐसा?"
"फौज के आगे निकल जाने पर मैंने गड़ेरियों के बच्चों से पूछताछ की तब
उन्होंने बताया कि गणोजी ने समुद्र के किनारे दो सौदागर पकड़े हैं। उन्हें लेकर
उंब्रज की ओर जा रहे हैं।"
नरहरिपन्त के बयान से सारी बातें स्पष्ट हो गयीं। सुनने वालों के चेहरे पर
प्रेतछाया-सी फैल गयी। सन्ताजी भाव विह्वल हो गये। उन्होंने धनाजी से लिपटकर
रोना-कलपना आरम्भ कर दिया। वे विकल होकर चीख पड़े, "धनाऽऽ धोखा हो
गया रेऽऽ, यह गणोजी शिर्के रूपी कालसर्प ही अपनी दौलत को डँस गया।"
सभी की आँखों में-आँसू भर आये। दुख के आवेग से सैनिक अपनी जगह पर
उठने-बैठने लगे। वहाँ कुछ हलचल मच गयी। सन्ताजी ने अपने गर्म आँसू पोंछ
लिये। उन्होंने अपनी तलवार को म्यान से बाहर निकाल लिया और ललकारकर
बोले, "चलो धनाजी! अभी भी अपने पास छह सात हजार की फौज है। ऐसे ही
भागकर चलेंगे और कराड़ पर आक्रमण कर देंगे। उस हरामखोर गणोजी के साथ
मुगलों को भी जलाकर खाक कर देंगे।"
"सन्ताजी सुनो! मेरी बात शान्ति से सुनो। इस आड़ी-तिरछी पहाड़ी चढ़ाई
से कराड़ पहुँचने में हमें कम-से-कम दो-तीन दिन लग जाएँगे। तब तक क्या शत्रु
हमारी राह देखता वहाँ बैठा रहेगा।" धनाजी ने कहा।
"मतलब?"
"पाथरपुंज से कराड़ अधिक दूर नहीं है। रात को भोजन के समय तक मुगल
महाराज को लेकर कराड़ पहुँच गये होंगे। वहाँ आसपास रहिमतपुर, इस्लामपुर,
औंध जैसी जगहों पर औरंगजेब की चौकियाँ हैं। अब तक उन दुष्टों ने दस-पन्द्रह
हजार की सेना साथ लेकर कराड़ भी छोड़ दिया होगा।" धनाजी ने स्पष्ट किया।
684 :: सम्भाजी
“धनाजी तुम ऐसे ही हो। हमेशा मेरे उत्साह पर पानी फेर देते हो।”
सन्ताजी ने रुआँसा होकर कहा।
धनाजी ने आगे बढ़कर सन्ताजी को गले से लगा लिया। धनाजी उन्हें
समझाते हुए बोले, “सन्ताजी, भावना के आधार पर नहीं बुद्धि के सहारे से लड़ो।
ऐसा अपने शम्भूराजा क्यों कहते थे? इस पर भी थोड़ा सोचो, थोड़ा विचार करो।
अपने सेनापति, आपके पिता अभी कल ही शहीद हो गये। महाराज को मुगल ले
गये। सेनापति दिवंगत हो गये। अपनी मातेश्री महारानी रायगढ़ पहुँचीं कि नहीं,
इसका भी पता हमें नहीं है।
“तो हम क्या करें?”
“यहाँ आंबा घाटी में सुरक्षा के लिए दो हजार सैनिकों को छोड़कर बाकी
सेना को लेकर हमें रायगढ़ पहुँचना है। वहाँ महारानी की राय लेंगे। सन्ताजी अपने
महाराज को कराल काल खींचकर ले गया है। कम-से-कम राजधानी तो बचाएँ।
वह भी चली गयी तो?—मेरे भाई तब तो संसार ही डूब जाएगा।”
एक हाथ से आँसू पोंछते-पोंछते सन्ताजी ने दूसरा हाथ अपनी कमर की पेटी
पर रखा। सभी ने अपनी कमर कस ली। कृष्णाजी के साथ दो हजार की फौज रख
दी गयी। पुनः सभी लोग रात में ही आंबाघाट उतरने लगे। उन्हें शीघ्रातिशीघ्र
राजधानी रायगढ़ पहुँचना था।
तीन
उस सूनी शाम को महारानी येसूबाई राजप्रासाद के भव्य तुलसी चौरे के पास बैठी
थीं। वे चिन्तित होकर सोच रही थीं कि उनसे पहले पहुँचने का आश्वासन देने वाले
शम्भूराजा अभी तक क्यों नहीं आये?
इसी समय तीन घुड़सवार वहाँ प्रस्तुत हुए। उनके पीछे-पीछे येसाजी कंक
और उनके साथी उसी ओर आते दिखाई पड़े। उन सभी के घबराये चेहरे को देखकर
महारानी का कलेजा धड़कने लगा।
तीनों घुड़सवार घोड़े से उतर पड़े। महारानी के पैर पकड़कर जोर-जोर से
रोते हुए कहने लगे, “रानी सरकारऽऽ हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा है, गजब हो गया
है गजब। शत्रु अपने महाराज को पकड़कर ले गये।”
सम्भाजी 685
"क्या?" येसूबाई ऐसे थरथराई मानो उन पर बिजली गिर गयी हो। दासियों
ने उन्हें सहारा देकर संभाला।
"कौन पकड़कर ले गया दादासाहब को?" येसूबाई के समीप खड़ी ताराऊ
ने पूछा।
"मुकर्रबखान।"
"मराठों के राजा को पकड़कर ले गये? क्या कहते हो तुम? वे क्या कोई
गाय या घोड़ा थे? ऐसा कैसे हो गया?"
कुछ समय के लिए लगा कि महारानी की रीढ़ की हड्डी ही चिपक गयी। वे
उसी तरह नीचे बैठ गयीं। वे पसीने से भीग गयीं। उन्हें चक्कर आ गया। लोग
भाग-दौड़ करने लगे। दासियों ने सफेद प्याज फाड़कर उनकी नाक के पास रखा।
महारानी थोड़ी ही देर में मूर्च्छा से बाहर आ गयीं। राजारामसाहब भी वहाँ पर आ
गये। उनकी मूर्च्छा का कारण वह धक्कादायक समाचार था।
विगत नौ वर्षों तक रायगढ़ की युवराज्ञी का खून खौल गया। उन्होंने हरकारे
से पूरा समाचार जान लेने का प्रयास किया।
तब तक वहाँ खंडो बल्लाल, जोत्याजी केसकर, रायप्पा महार जैसे अनेक
लोग एकत्र हो गये थे। रायप्पा अपना रोना रोक नहीं पा रहा था। "ऐसे स्वामी को
छोड़कर मैं यहाँ आया ही किसलिए?" ऐसा कहते हुए वह जोर जोर से रोने
लगा। महारानी को जब पता चला कि कविराज और महाराज को मालेघाट से लेकर
गये हैं, उनका आश्चर्य और भी बढ़ गया। उन्होंने कहा, "नहीं नहीं ऐमा कभी
नहीं हो सकता मालेघाट? उस भयानक जंगल से तो जाते हुए भूत प्रेत भी घबरा
जाते हैं। ऐमी भयानक राह खान को मिलेगी ही कैसे?"
"क्या कहें महारानीजी दाँत भी अपने और होंठ भी अपने।"
"क्या हुआ ठीक-ठीक बताओ? यहाँ मेरी साँस अटक रही है।"
"आपके-आपके भाई गणोजी शिर्के स्वयं मुकर्रबखान के साथ थे।"
"नहीं, उस वीरान जंगल का रास्ता गणोजी को भी कहाँ पता है?"
"उन्होंने ही राह दिखाने वालों की व्यवस्था की, भोजन और घोड़ों की
व्यवस्था भी उन्होंने ही की थी। उनके सहयोगी गोवर्धन पन्त भी उनके साथ थे।"
आँखों से गिरने वाले गर्म आँसू महारानी ने अपने पल्लू से पोंछ लिये। दूसरे
ही क्षण उन्होंने हरकारे से पूछा, "धनाजी और सन्ताजी कहाँ हैं?"
"महारानीजी कौन बता सकता है? महाराज पर संकट का पहाड़ टूट पड़ा है,
सभी ओर अफरातफरी मची है।"
"परन्तु महारानीजी चिन्ता की बात नहीं है। धनाजी बहुत तेज बुद्धि के
व्यक्ति हैं। वे सन्ताजी को लेकर यहीं आ रहे होंगे। आपकी आज्ञा लिए बिना वे
कोई कार्य नहीं करेंगे।" खंडो बल्लाल ने कहा।
686 :: सम्भाजी
इस भयानक समाचार से पूरा रायगढ़ थरथरा गया था। हर बुर्ज हर दरवाजे से
निकलकर लोग राजमहल की ओर भागे आ रहे थे। राजमहल के सामने तीन-चार
हजार लोगों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। महाराजऽऽ शम्भू महाराज कहाँ चले गये
आप? ऐसी दुखभरी चीखें और दहाड़ें अन्दर सुनाई पड़ने लगीं। बाहर की आवाजें
सुनकर येसूबाई सँभल गयीं। उन्हें किसी बात का ध्यान आ गया। उन्होंने अपने
सहयोगियों से कहा, "चलो खंडोबाऽऽ चलो ताराऊऽऽ।"
वे सब महल के बाहर आ गये। सभी एक ऊँचे चबूतरे पर खड़े हो गये।
महारानी को देखकर सभी ने एक साथ पूछना आरम्भ कर दिया, "महारानीऽऽ हमारे
महाराज कहाँ हैं?"
आक्रोश में उद्विग्न प्रजा को शान्त करने के लिए महारानी ने हाथ जोड़ लिये।
उन्होंने कहा, "सुनिएऽऽ आपलोग इस प्रकार का हो हल्ला मत मचाइये।
औरंगजेब के साथ हमारा युद्ध चल रहा है। युद्ध में तो आगा-पीछा होता ही रहता
है।"
"परन्तु महाराज? हमारे महाराज?"
"घबराइये नहीं। एकाध बार क्षण पल के लिए कोई दाँव उल्टा पड़ गया तो
इसका मतलब यह नहीं होता कि औरंगजेब जीत गया। अब शीघ्र ही रायगढ़ से
सेना निकलेगी। हम शत्रु पर टूट पड़ेंगे। महाराज को औरंगजेब की मुट्ठी से ही नहीं
यमराज के जबड़े के भीतर से भी निकालकर ले आएँगे।"
उस समय वहाँ एकत्र हजारों की भीड़ ने महाराज और महारानी का जयघोष
किया। उन्हें शान्त करते हुए येसूबाई ने कहा, "सैनिको! आप सभी अपनी-अपनी
जगह पर चले जाइये। अपने पहरे, मोर्चे, बुर्ज आदि छोड़कर कहीं भी न जाइये।
अधिक होहल्ला करोगे तो शत्रु का ही लाभ होगा।"
जमा हुई भीड़ बिखरने लगी। राजाराम अपने बड़े भाई पर आये संकट से
बहुत विह्वल हो गये थे। वे अधीर होकर पूछने लगे, "भाभीजी! हमें दुश्मन की
मुट्ठी से छुड़ाकर ले आने वाले भाईसाहब स्वयं शत्रु के हाथ कैसे लग गये?"
येसूबाई ने पूछा, "खंडोबा, कम से कम दस-पन्द्रह हजार की सुदृढ़ फौज
तैयार करने में कितना समय लगेगा?"
"यहाँ पाँच छह हजार की फौज है। परन्तु सामान इकट्ठा करना, शस्त्रास्त्र
जुटाना भी आवश्यक है। शेष सेना तो स्वराज्य में जगह-जगह तैनात की गयी है।"
"ऐसा कीजिए, सुधागढ़, सागरगढ़ और क्सिवारी के किले पर शीघ्रातिशीघ्र
दूत भेजिए। सुबह नाश्ते से पहले यहाँ की फौजें पाचाड़ पहुँच जानी चाहिए।"
"महारानी चिन्ता न करें। निश्चित समय पर बाँधणी के मैदान पर घास-दाने
के साथ फौज तैयार रखूँगा। तब तक सन्ताजी और धनाजी भी आ ही जाएँगे।"
सम्भाजी :: 687
खंडो बल्लाल ने आश्वस्त किया।
महारानी येसूबाई और उनकी देवरानी ताराबाई सारी रात जागती रहीं।
दूसरे दिन युद्ध पर निकलने का निश्चय किया गया था। बहुत-सी तैयारी हो
चुकी थी। सभी लोग अपने-अपने लिए निश्चित कार्य के लिए निकल गये थे।
राजमहल सूना हो गया था।
महाराज को स्मरण करते हुए महारानी को आवेश आ गया। वे देवघर की
ओर दौड़ पड़ीं और भवानी माता के चरणों में गिर पड़ीं। उनके मन से मालेघाट,
शिर्के लोगों का क्षेत्र और गणोजी का ध्यान हट नहीं रहा था। 'येसूऽ तुझे विधवा
हुआ देखना मुझे बहुत अच्छा लगेगा।' गणोजी के इन विषैले शब्दों का उन्हें स्मरण
हुआ। यह स्मरण होते ही वे थरथरा उठीं और विह्वल होकर रोने लगीं। उनके मुँह
से शब्द निकले, 'भाई साहब आपने अपनी छोटी बहन पर अच्छा उपकार किया है।
भैयादूज की ऐसी भयानक भेंट संसार के किस भाई ने दी होगी?'
चार
जैसे किसी चोर-उचक्के के हाथ अचानक कोहिनूर जैसा अनमोल हीरा लग जाये
और उसकी रक्षा की चिन्ता में वह पूरी तरह घबरा जाये वही स्थिति मुकर्रब की हो
रही थी। शम्भू महाराज जैसा अकल्पित शिकार उसके हाथ लग गया था। अब
उसका एकमात्र लक्ष्य था उसे जल्दी से जल्दी औरंगजेब को सौंप देना। इसके लिए
वह रात दिन एक कर रहा था। उसने दो दिन के भीतर ही इस्लामपुर औंध मिरज,
रहिमतपुर जैसी आसपास की जगहों से पच्चीस-तीस हजार की मुगल सेना तैयार
की।
शम्भुराजा और कविराज को बीच में करके यह सेना जल्दी जल्दी आगे
बढ़ी। कृष्णा और कोयना का क्षेत्र पीछे छूट रहा था। दोपहर का विश्राम लेकर
सामने के पहाड़ की श्यामगाँव घाटी में पहुँचना था। वहाँ पहुँचने के पहले प्राकृतिक
कारणों से भी रुकना नहीं है। ऐसा खान का हुक्म था।
शम्भू महाराज की भावभरी दृष्टि आसपास के क्षेत्र पर बार-बार घूम रही थी।
वसन्तगढ़ की तलहटी और फिर पायथे के तलबीड गाँव पर उनकी दृष्टि अटक
गयी। शम्भुराजा को हंबीरमामा का स्मरण हो आया। उनके अन्तःकरण में प्रश्न
688 सम्भाजी
उभरा, 'मामा यदि आप आज होते तो?' कविराज का मन निरन्तर क्रन्दन कर रहा
था। कृष्णा कोयना के आसपास का परिसर पीछे छूटता जा रहा था। शम्भू महाराज
की स्थिति देखकर उनका कलेजा तार तार हो रहा था। सामने की पहाड़ी पार हुई।
कराड़ के समीप का संगम स्थान पीछे छूटने लगा। फौज मुगलों के शासन क्षेत्र की
ओर मुड़ गयी। इसी समय कवि कलश में आवेश आ गया। वे हाथ उठाकर जोर
जोर से गा उठे मानो किसी कवि सम्मेलन में कविता पाठ कर रहे हों—
गले लिपट कृष्णा नदी, कह कोयना बिलखाय।
दीदी लख ये यवन खल, शिवा सुवन ले जाय।।
“चलो भागो, चलो जल्दी करो,” मुकर्रब और इखलास चिल्ला रहे थे।
उन्हें अभी भी इस बात का भय था कि मराठी सेना कहीं से अचानक टूट पड़ेगी
और इस प्रकार आक्रमण करके अपना दुर्लभ यश छीनकर ले जाएगी। इसी चिन्ता से
उनकी हालत खराब हो रही थी। साथ में पचीस तीस हजार की सेना थी फिर भी
बाप-बेटे को भरोसा नहीं था।
कराड़ की छावनी में मुकर्रबखान ने नागोजी और गणोजी से आग्रहपूर्वक
कहा था, "आप दोनों हमारे साथ चलिए।"
"कठिन परिस्थिति और दुर्गम रास्ते से बाहर निकाल दिया न ? अब आगे का
खुद देखिए। अन्यथा रायगढ़ से बड़ी फौज बाहर निकली तो ये लोग हमें पत्थरों से
कुचल डालेंगे।" नागोजी ने कहा।
“इसके अतिरिक्त यदि कहीं दाँव उल्टा पड़ा तो हम दोनों के घर अपनी
जगह पर नहीं रहेंगे।" गणोजी ने स्पष्टीकरण दिया।
नागोजी और गणोजी वहाँ से भाग खड़े हुए और मुकर्रबखान की चिन्ता बढ़
गयी। श्यामगाँव की घाटी तक सेना पहुँच गयी। वहाँ से कृष्णा के तट की बस्ती पर
नजर डालते हुए मुकर्रब ने अपने बेटे से कहा, "बेटे इखलास ! इतनी बड़ी फतह
हासिल करने पर लोग जश्न मनाते हैं, मगर ये दोनों बदतमीज तो डरकर भाग गये।
इसका मतलब यह है कि हम अभी भी खतरे से बाहर नहीं हैं।"
महाराज की दृष्टि आसपास के वनों और मैदानों पर घूम रही थी। क्षण-क्षण
अपना स्वराज्य पीछे छूटता जा रहा था। रास्ते में किसी नाले या झरने के आने पर
जान उसमें गूँथ जाती थी। रास्ते के समीप वाले पेड़-पौधों को बाँहों में भर लेने का
मन होता था। मैं कहाँ जा रहा हूँ? मेरा स्वदेश मुझ पर इस तरह क्यों क्रुद्ध हो रहा
है ? विजय के यश का अधिकारी होने पर भी कर्ण का रथ ऐन मौके पर युद्धभूमि की
मिट्टी में अटक गया था। कवच कुंडल का दान करते हुए, अपने रक्तरंजित कानों
को देखकर कैसा लगा होगा उस महान योद्धा को ? गुरुदक्षिणा के बहाने एकलव्य
का अँगूठा काट लेने वाले गुरु द्रोणाचार्य और धोखे से पीठ में खंजर भोंकने वाले
गणोजी की प्रवृत्ति में अन्तर ही क्या है ?
सम्भाजी .: 689