सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 681, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 681

ये सीधे खान का गला घोंटने के लिए भिड़ जाने वाले थे। किन्तु इनके
पहुँचते ही इन पर तलवार के सपासप वार हुए। खून की धारा बहने लगी। उस गर्म
खून को देखकर मुकर्रब, गणोजी और नागोजी भी सन्न रह गये। उस अचानक हुए
आक्रमण से मुकर्रब भी हिल गया। ये तीनो भय से काँप गये।
थोड़ी देर में हशम आगे आये। उन्होंने इन आठ शवों को उठाकर बोरो में भर
लिया। उन्हें ले जाकर बगल मे बह रही कोयना नदी की धारा में फेक दिया।
शाम होने को आयी। सूर्य धीरे धीरे पश्चिम की दिशा में उतर रहा था। सूर्य
की अरुणाभ किरणें कोयना के पानी में उतर रही थीं। खंडोबा के गले में पहनाई
गयी फूलों की माला, सूखने के बाद निर्माल्य होकर जैसे देवता के पैरो में आ गयी
हो उसी प्रकार ये आठ शव कोयना के रक्तिम प्रवाह में तैरते दिखाई पडे।
दो
धूप तप रही थी। दोपहर को येसूबाई का दल वाशिष्ठी नदी के तट पर पहुँचा।
चिपलून की अमराई में महारानी पहुँची। वहाँ नदी के किनारे जलपान के लिए सेना
रुकी थी। पीछे से आने वाले शम्भू महाराज की महारानी को प्रतीक्षा थी। इसी समय
पीछे की राह पर दूर झाड़ियों में कुछ शोर सुनाई पड़ा। पाँच-छह घोडे तेजी से
दौड़ते हुए आगे आये। महारानी ने हँस कर कहा, "महाराज ने कहा था दशम्या
(दूध से गुँथे आटे की रोटियाँ) खोलकर रखना। पहले निवाले के समय मैं पहुँच
जाऊँगा। उन्होंने अपनी बात पूरी करके दिखाई।"
आगे का रास्ता पार करना था। खंडोजी ने येसूबाई से कहा, "मातेश्री!
लीजिए राजाजी आ ही गये। अब दशम्या खोल दीजिए। महारानी पहला निवाला
मुँह में डालने ही वाली थी कि पीछे से आने वाले सवारों मे जो सबसे आगे था वह
इतनी विकलता से चिल्लाया जैसे उसे साँप ने काट लिया हो।
"रानी साहब धोखा हुआ, शत्रु ने धोखा किया।"
मुँह का कौर गिर गया। खंडोजी, येसबाई, दास-दासी सभी झट से उठकर
खड़े हो गये। पसीने से तर-ब-तर हुए घुड़सवार आगे आये और एक साथ बोलने
लगे, "संगमेश्वर पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया। वहाँ पर कम से कम एक हजार
मुगल सैनिकों को अपनी आँखों से देखा है।"
सम्भाजी 679