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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

फिरंगी अत्यन्त भयभीत होकर चर्चों में दबी जबान से यीसू का नाम जपने
लगे। शहर में घरों की खिड़कियाँ-दरवाजे बन्द होने लगे। हाथों में शस्त्र लिए कुछ
लोग शहर के तट की ओर दौड़ पड़े। इनमें कांट द आल्होर सबसे आगे था! 'सर
थोड़ा धीरज रखें' ऐसा उसके सहयोगी कह रहे थे। किन्तु एक दिन में दूसरा किला
भी मराठों के अधिकार में चले जाने से वाइसराय पागल हो उठा। दूसरे दिन सवेरे-
सवेरे अपने सहयोगियों के साथ-साथ शान्त इस्तेहांव के किले की तटबन्दी से भिड़
गया। फिरंगियों की डेढ़ सौ सैनिकों की टुकड़ी ने किले को घेरने का प्रयास किया।
उसी समय शम्भू महाराज के नेतृत्व में मराठा सैनिक 'हर हर महादेव' की गर्जना के
साथ फिरंगियों पर टूट पड़े। उनका जोश और आवेश ऐसा था कि उनके घोड़े को
देखते ही फिरंगी भागने लगे। भागकर मांडवी नदी में कूदने लगे।
मराठों का एक तीव्रगामी दल कांट आल्होर का पीछा करते हुए उसके पास
पहुँच गया। उनकी नंगी तलवारें देखकर कांट के पैरों के तले की जमीन खिसकने
लगी। इसी बीच उसके कुछ घुड़सवार आकर उसे बचाकर लेकर भागे।
मांडवी के पानी में बाढ़ आ रही थी। दोनों किनारों पर पानी चढ़ रहा था।
किन्तु मराठा वीर फिरंगियों का पीछा करना नहीं छोड़ रहे थे। मराठा वीरों को
प्रोत्साहित करते हुए शम्भूमहाराज अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहे थे। 'काटो-काटो,
मारो-मारो' की गर्जना करते हुए वे मांडवी के बढ़ते रूप को निहार रहे थे। फिरंगी
घुड़सवार वाइसराय को खींचते हुए पानी के अन्दर लिए जा रहे थे। बाद में कुछ
ऐसी भाग-दौड़ शुरू हुई कि हर फिरंगी अपने शस्त्रों वस्त्रों की चिन्ता किये बिना
अपने प्राणों को बचाने में लग गया। सभी फिरंगी नदी की ओर भागे। अनेक फिरंगी
कीचड़ में फँस गये। उनमें से अनेक मराठों के बाणों और गोलियों के शिकार हो
गये। कुछ पानी में डूबकर मर गये। जैसे मधुमक्खियों ने उनका पीछा करके बुरी
तरह काटना शुरू किया हो। उसी तरह मराठों ने फिरंगियों को सताना आरम्भ
किया।
वाइसराय का भाग्य अच्छा था। उसे एक छोटी किश्ती का सहारा मिल गया।
उस छोटी नाव में बैठकर भय से काँपता हुआ वाइसराय आधी नदी को पार कर
चुका था। उसी समय मांडवी के दूसरे तट पर पहुँचे कुछ फिरंगी पानी से लबालब
भरे बाँध को काटने लगे। परिणामस्वरूप नदी का पानी वेग से बढ़ने लगा। पानी से
उठने वाली खलखलाहट की आवाज बाहर भी सुनी जा रही थी। पानी बढ़ता जा
रहा था। शम्भूराजा निराश भाव से वाइसराय की आगे बढ़ती नाव को देख रहे थे।
शिकार हाथ से निकला जा रहा था। शम्भूराजा को जीवित रूप में बादशाह औरंगजेब
के हवाले करने की योजना बनाने वाला शत्रु उन्हें चकमा देकर भाग रहा था। शम्भू
महाराज का मन उद्विग्न होने लगा। उनकी दृष्टि नदी के उस ओर गोवा पर पड़ी।
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वहाँ के चर्चों की ऊँची लाल आकृतियाँ, सुन्दर कमानें शम्भू महाराज के वीर हृदय
को पुकारने लगीं। फिरंगी भीतर से टूट चुके थे। आगे बढ़कर गोवा पर अधिकार
करने का यही सुअवसर था। गोवा हिन्दुस्तान के विदेश व्यापार की कुंजी थी। यह
कुंजी कई बार शिवाजी महाराज के हाथ से निकल चुकी थी। इस अवसर को खोना
वस्तुतः मूर्खता ही कही जाती।
नदी के एक तट पर महाराज खड़े थे। उनके हाथ युद्ध के लिए बेचैन हो रहे
थे। वीरत्व के आवेश से हृदय की धड़कन बढ़ गयी थी। अपनी सबल हथेली से
उन्होंने घोड़े का कन्धा थपथपाया। घोड़े के एड़ लगाकर उन्होंने गर्जना की
"चलो।" घोड़े के मुँह में लगाम के काँटे चुभने लगे। घोड़ा जोर-जोर से
हिनहिनाने लगा। उसने सामने का भयंकर जल प्रवाह देख लिया था। इसलिए वह
किनारे पर ही खड़ा हो गया था। दूसरे क्षण महाराज ने उसके पुट्ठे पर प्रहार
किया। लगाम को उन्होंने इतने जोर से खींचा की घोड़े के मुख को गहरा आघात
लगा और वह कराह उठा। उसे एक प्राणान्तक छींक आयी। अपने मालिक के
आदेश का पालन करने के लिए वह बहादुर अश्व पानी में कूद पड़ा।
पानी की पर्वताकार लहरों में घोड़े ने प्रवेश किया। पानी इतना अधिक और
वेगवान था कि घोड़े का पैर टिकना असम्भव हो गया। पैर टिकते नहीं थे और ऊपर
उड़ने के लिए पंख तो थे नहीं। तेज लहरों के कारण उसका तैरना भी कठिन हो
गया। फिर भी शम्भू महाराज ने घोड़े को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होंने अपने दोनों पैरों से घोड़े को दबाकर रखा था। उस पर जोर जोर से प्रहार
करते हुए 'चल चल' की गर्जना कर रहे थे।
परन्तु पानी के बढ़ते वेगवान प्रवाह के आगे घोड़े की एक न चल पायी। घोड़े
की नाक में पानी घुसने लगा। ऊँची ऊँची लहरों के तेज आघात भी उसे झेलने पड़
रहे थे। जैसे कोई सूखी लकड़ी पानी के बहाव में उलट पुलट होती है उसी प्रकार
वह घोड़ा भी पानी में पलटी मारकर एक ओर झुक गया। शम्भू महाराज अपने को
घोड़े से अलग करने का प्रयास करने लगे। वे हाथ-पाँव मारकर ऊपर आते थे और
उसी वेग से गोता लगा लेते थे। किनारे पर खड़े सैनिक यह दृश्य देखकर जोर जोर
से चिल्ला रहे थे।
शम्भूमहाराज का दुर्भाग्य यह था कि उनका एक पैर रिकेब में फँस गया था।
किनारे पर हाहाकार मच गया। भीड़ से आगे आकर खंडो बल्लाल ने यह दृश्य
देखा। मराठों के परमप्रिय, शिवपुत्र और रामगढ़ के राजेश्वर को काल उनकी आँखों
के सामने से लिए जा रहा था।
यह दृश्य देखकर खंडोजी की धमनियों में प्रवाहित स्वामिभक्ति का खून
खौल पड़ा—'महाराज, महाराज, शम्भूमहाराज' चिल्लाते हुए अपने पाखर घोड़े के
सम्भाजी · 475

साथ वे नदी के कूद पड़े। जब उनके घोड़े के भी पैर उखड़ गये तो खंडोजी ने पानी
में छलाँग लगा दी।
पानी में रास्ता बनाते हुए खंडोजी महाराज की ओर बढ़ रहे थे। इस समय
तक महाराज ने कई गोते खा लिए थे। वे अव्वल दर्जे के तैराक थे। शेर से भी लड़
जाने की उनमें शक्ति थी। किन्तु उनका घोड़ा अर्धमृत अवस्था में तैर रहा था और
महराज का पैर रिकेब में फँस गया था। मुँह और नाक में अनेक बार पानी चले जाने
के कारण उनकी आँखें सफेद हो चुकी थीं।
महाराज ने खंडोजी को जोश के साथ अपनी ओर बढ़ते देख लिया। उन्होंने
चिल्लाकर कहा, "अरे खंडो, रिकेब की डोर काट दो उसमें मेरा पैर अटक गया
है। खंडोजी ने तत्काल कमर से छुरी निकाली और उछलकर आगे बढ़े। पानी में
डूबकर रिकेब की डोर काटते हुए उन्होंने भी दो-तीन गोते लगाए। सौभाग्य से
सफलता हाथ लगी। खंडोजी ने महाराज को सहारा दिया। लहरों का सामना करते
हुए खंडोजी के घोड़े की लगाम का सहारा लेकर बड़ी कठिनाई से दोनों किनारे
पहुँचे।
शम्भूमहाराज और खंडोजी अत्यधिक थकी हुई अवस्था में किनारे की बालू
तक पहुँचे और शरीर से टपकते पानी के साथ वहीं बैठ गये। बहुत देर तक उनकी
साँसें तेजी से चलती रहीं। पानी के भीतर चल रहे उस युद्ध को देखकर सभी
घुड़सवार और घोड़े भी सकते में आ गये थे। यहाँ तक कि पंछी भी अपने पंखों को
समेटकरु नीड़ों में छुप गये थे।
मराठों के अधिकार में आया सांत इस्तेहांव का किला रात की शीतल हवाओं
से भरे अँधेरे में गुमसुम खड़ा था। क़िले में शम्भूमहाराज और उनके साथी रुके हुए
थे। बीच के आँगन में कुछ परिचारकों ने आग जला रखी थी। रायप्पा ने आग में
बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ डाल रखी थीं। आग में लकड़ी रह-रह कर धधक उठती थी।
उसका गेरूआ प्रकाश अपनी ऊष्णता के साथ चारों ओर फैल रहा था।
गरम और कशीदाकारी की हुई शाल लपेटे शम्भू महाराज आग के पास बैठे
थे। उनके साथ ही कवि कलश, जोत्याजी केसकर आदि भी थे किन्तु उन्होंने
खंडोजी बल्लाल को अपने बहुत करीब बैठाया था। समुद्र के खारे पानी में गोते
खाते हुए अनेक बार उनके मुँह और नाक में पानी गया था। परिणामस्वरूप उनका
सिर भारी हो रहा था। आग और ऊष्णता की उन्हें अत्यधिक आवश्यकता थी।
महाराज ने वहीं पर भोजन ग्रहण किया। उनके साथियों का भोजन भी हो चुका था।
शम्भू महाराज ने उठकर खंडो बल्लाल का मस्तक अपनी गोद में ले लिया।
उसकी पीठ पर प्यार की थपकी देते हुए बोले-
"खंडोबा आज मराठों का राजकलश पानी में नहीं समुद्र के तल में पहुँच
गया था। अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए आपने पानी में छलाँग लगाई। आपके
476 :: सम्भाजी

इस दुर्लभ जयकार के सामने मैं नतमस्तक हूँ। आपकी योग्यता को पहचानकर
हिंदवी स्वराज्य सम्मानित चिटणीस पद तो हम आपको पहले ही दे चुके थे। और
कुछ चाहिए तो बताइये।"
स्वाभिमान खंडो बल्लाल ने उठकर शम्भूमहाराज के पैर पकड़ लिए। उन्होंने
कहा, "आपके चरणों में मेरा जो स्थान है, उसे अबाधित बनाए रखें। इससे अधिक
मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
खंडोजी ने उसी समय अपना पाखर घोड़ा शम्भूमहाराज को देने का आग्रह
किया। इस बात से शम्भूमहाराज उन पर पूरी तरह रीझ गय। उन्होंने कहा, "अरे
खंडोबा, हमें और कितना लज्जित करना चाहते हो? क्या जन्म-जन्मान्तर तक के
लिए उपकार का बोझ मेरे सिर पर रखकर पुरस्कार भी मुझे ही देना चाहते हो?"
भावना के आवेश में शम्भूमहाराज के नेत्र चमक रहे थे। शब्दों में मन्दिर के
घंटा नाद का प्रभाव आ गया था। खंडो बल्लाल को अपनी बाँहों में भरते हुए
शम्भूमहाराज ने कहा, "हमारे पिताजी हर किले के जमादारखाने की चाभियाँ प्रभु
जमात के लोगों को सौंपकर चिन्तामुक्त हो जाते थे। उसका सही कारण मैं आज
समझ पाया हूँ। मराठा हो या ब्राह्मण, शिवाजी और सम्भाजी के समय में महाराष्ट्र
की धरती ने अनेक जातियाँ और उपजातियाँ देखी हैं, उनके रंग पहचाने हैं। अनेक
बार ये जातियाँ अपने जातीय गुण के अनुसार ही व्यवहार करती हैं। खंडोबा आपके
पिता की, बालाजी चिटणीस की राजनिष्ठा तो हीरे मोती की तरह प्रकाशवान है
ही, किन्तु गजापुर खंडहर में अपने स्वामी के लिए खून से नहाने वाला बाजी प्रभु,
पुरन्दर का वीर सेनानी मुरारबाजी अथवा समुद्र के गर्भ को चीरकर, शेषनाग की
चोटी खींचकर पाताल लोक से सम्भाजी जैसे अपने स्वामी को ले जाने वाला
खंडोजी बल्लाल हो, सभी राजनिष्ठा के बेजोड़ उदाहरण हैं। आपकी प्रभु जाति ने
'राजनिष्ठा' शब्द को इतनी ऊँचाई प्रदान कर दी है कि ऊपर के उस प्रभु ने भी
आपको हजार बार वन्दन किया तो अत्युक्ति न होगी। ऐसी विलक्षण आपकी
योग्यता है।"
छह
गोवा का समुद्र तट और वन प्रदेश निस्तब्ध था। युद्ध के बाद की भयावह शान्ति
चारों ओर छायी थी। घने जंगल की आड़ में पणजी शहर किसी गुमसुम बैठे जानवर
की तरह लग रहा था। शम्भूमहाराज का पड़ाव डिचोली में था। दो हजार सैनिकों
सम्भाजी :: 477

की फौज वहाँ से फोंडा की तटबन्दी के पास पहुँची शम्भूमहाराज ने सूबेदार को
तटबन्दी के पुनर्निमाण का आदेश दिया। आदेश पाते ही बेलदार और कामाठियों का
दल अपने काम पर जुट गया।
शम्भूमहाराज का घोड़ा तट के पास से आगे बढ़ रहा था उनके पीछे-पीछे
येसाजी कंक और खंडो बल्लाल के घोड़े चल रहे थे। पुर्तगालियों का वकील
साराइव्ह द अल्बुकर्क सवेरे से ही महाराज की प्रतीक्षा करते बैठा था। शम्भू महाराज
जानबूझकर उसकी उपेक्षा कर रहे थे। साथ-साथ चल रहे येसा से महाराज ने
पूछा—
"येसाजी काका, कृष्णाजी का स्वास्थ्य अब कैसा है?"
"कल ही गाँव से खबर आयी थी। घाव अभी भी भरे नहीं हैं। अभी भी
खतरा टला नहीं है।"
"तो फिर येसाजी काका आप इतना हठ क्यों कर रहे हैं?" घोड़े का मुँह
घुमाते हुए शम्भूमहाराज ने पूछा।
"महाराज आपको संकट में कैसे छोड़ूँ? कभी आधा पेट खाकर उठ
जाना सम्भव हो सकता है किन्तु लड़ाई को आधे में छोड़ देना बहुत खतरनाक होता
है, महाराज।"
येसाजी का आशय समझकर महाराज चुप हो गये। आगे बढ़ते हुए वे कार्य
का निरीक्षण कर रहे थे। उसी समय किले के दूसरे छोर पर कुछ शोरगुल सुनाई
पड़ा। महाराज का संकेत पाकर खंडो बल्लाल उसी ओर आगे बढ़ गये। थोड़े ही
समय में लौटकर कहने लगे—'महाराज उधर चलिए। वहाँ बड़ा हंगामा हो रहा
है। सैनिक और वहाँ के निवासी मेरी बात सुनने के लिए तैयार नहीं है।"
"वहाँ ऐसा क्या हो रहा है?"
"वहाँ पर ईसाइयों की माता 'लेडी वर्जिन' की मूर्ति है, उस मूर्ति को कुछ
लोग तोड़ना चाहते हैं और वहाँ पर जो छोटा-सा चर्च है, उसमें आग लगाने की
तैयारी कर रहे हैं।"
यह समाचार सुनते ही शम्भूमहाराज चिन्तित हो गये। वे घोड़े को एड़
लगाकर जल्दी से आगे बढ़े। आगे का बुर्ज पार करके वे आगे बढ़े। लोगों की
सन्तप्त भीड़ चर्च को आग लगाने की तैयारी कर रही थी। एक ओर से आग लगाई
भी जा चुकी थी। उसी समय शम्भू महाराज का घोड़ा वहाँ पहुच गया। उन्होंने
कड़कती आवाज में डाँटते हुए कहा, "अपने हाथों को सँभालो। पहले आग को
बुझाओ, नहीं तो एक-एक के टुकड़े करके रख दूँगा।" शम्भू महाराज के सहयोगी
भी वहाँ पहुँच गये। आग बुझाते समय कई सैनिकों के हाथ जल गये। गोवा के कई
हिन्दू वहाँ पर दिखाई पड़ रहे थे। उन्होंने ही शम्भू महाराज के सैनिकों को
478 :: सम्भाजी

भड़काया था। आग तो बुझ गयी किन्तु वहाँ की जनता अभी तक शान्त नहीं हो पा
रही थी। उन्हीं में से एक मूर्ख आदमी महाराज से कहने लगा, “महाराज आपको
क्या पता कि हम हिन्दू लोग यहाँ पर किस तरह का जीवन जी रहे हैं?''
“चुप रहो। किसी भी तरह की गड़बड़ मत करो।'' महाराज ने डाँटते हुए
कहा, “शिवाजी का नाम लेकर आप ऐसा शैतानी खेल बिलकुल नहीं खेल
सकते।''
“पर शम्भू महाराज। हम पर जो अत्याचार हुआ .?''
“एक ने यदि गाय को मारा तो दूसरे को उसके बछड़े को मारना चाहिए
क्या ? अपने पूर्वजों को याद कीजिए मराठा देवी-देवता, सदाचार और नीति धर्म के
पुजारी रहे हैं। वे मूर्ति भंजक और डाकू कभी नहीं रहे हैं।''
साष्टी, बारदेश और गोवा के दूसरे क्षेत्रों से दंगे के समाचार आ रहे थे।
शम्भूमहाराज के आक्रमण को देखकर हिन्दुओं में जोश आ गया था। पिछले कुछ
दशकों में ईसाइयों के अन्याय और अत्याचार से पीड़ित जनता प्रतिकार के लिए उठ
खड़ी हुई थी। उनमें कुछ धर्मान्ध, स्थिति का फायदा उठाकर कहीं कहीं चर्चों को
जला रहे थे। शम्भू महाराज ने फोंडा से आदेश दिया कि “किसी के भी धर्मस्थान
को कोई हानि मत पहुँचाओ।'' किन्तु लोगों की बढ़ती उत्तेजना से वे स्वयं निराश
हो रहे थे।
महाराज एक बार फिर अपने डिचोली के पड़ाव पर पहुँच गये। घायल
सैनिकों और घोड़ा का वहाँ उपचार किया जा रहा था। गोवा और कोंकण की सीमा
पर स्थित डिचोली महाराज का प्रिय स्थान बन गया था। वहाँ की लाल मिट्टी,
वहाँ के नारियल और सुपारी के बगीचे, छोटे-छोटे खपरैलों वाले पर, गाँव के
छोटे-छोटे तालाब सब कुछ नयनाभिराम थे। वहीं पर महाराज ने अपने और कवि
कलश के लिए महल बनवा लिए थे।
वाइसराय सोचता था कि फोंडा पर अधिकार कर लेने के बाद महाराज
पन्हालगढ़ की ओर लौट जाएँगे। किन्तु शम्भूमहाराज ने पूरी सफलता प्राप्त करने
और फिरंगियों को नेस्तनाबूद कर देने का संकल्प ले रखा था। तटवर्ती क्षेत्र में
फिरंगियों के साथ अनेक स्थानों पर लड़ाई चल रही थी। रायगढ़ से नित्यप्रति
समाचार आ रहे थे। सभी सैन्य दलों और राजधानी रायगढ़ के साथ महाराज का
पत्राचार चल रहा था। पत्रवाहक हरकारे समाचारों के साथ सभी ओर भाग रहे थे।
डिचोली पहुँचकर महाराज ने शिविर की प्रदक्षिणा की, सभी घायल सैनिकों
से पूछताछ की। वहाँ से वे अपने महल में बैठक के लिए आ गये। उन्होंने बीजापुर
के आदिलशाह को पत्र लिखा, “आजकल औरंगजेब इस ओर है। इसमें प्रसन्न होने
की आवश्यकता नहीं है, कल वह आपकी ओर भी पहुँच जाएगा। यह भी सोचो
सम्भाजी :: 479

कि यदि मराठे हार गये तो आप भी बच नहीं पाएँगे। इस स्थिति पर गम्भीरता से
विचार करो और साथ देने का वचन दो। "
उसी समय महाराज ने हैदराबाद के दीवान मादण्णा को भी पत्र लिखवाया-
"आपके कुतुबशाह जितनी समृद्धि, संत्ति हमारे पास होती तो हम सीधे दिल्ली
पर आक्रमण करके उस औरंगजेब को यमुना में डुबो-डुबोकर समाप्त कर देते। घर
में शान्त बैठकर वास्तविक शान्ति का अनुभव न करो। अन्दर छिप जाने से बाहर का
तूफान शान्त नहीं होगा।"
दोपहर को एक हरकारा डिचोली पहुँचा। वह एक दुखद समाचार लेकर
आया था। उस समाचार से शम्भूराजा के साथ सभी के हृदय दहल गये। गाँव में
कृष्णाजी कंक के घाव फूट गये। वे भगवान को प्यारे हो गये। वह समाचार सुनकर
येसाजी अपने को सँभाल नहीं पाये। वे जोर-जोर से रोने लगे। शम्भूमहाराज की
आँखों से भी अश्रुपात होने लगा। उन्होंने येसाजी को अपनी बाँहों में भरकर उन्हें
सांत्वना देने का प्रयास किया।
"महाराज जो कुछ हुआ वह सब प्रभु की लीला थी। किन्तु मुझे एक ही बात
का दुख है।" येसाजी ने कहा, "मैं तो सूखा हुआ पीला पत्ता हूँ। आपकी सेवा में
कभी भी टूट कर गिरूँगा और धन्य हो जाऊँगा। किन्तु आपके कन्धे से कन्धा
मिलाकर लड़ने के लिए हमारे कृष्णाजी को रहना चाहिए था।"
उस रात डिचोली में अनेक मराठा घुड़सवार एकत्र हुए थे। शम्भूमहाराज ने
येसाजी को अपने समीप ही बिठाया था। उन्होंने येसाजी के हाथ को अपने सीने मे
लगाया। आकाश की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "येसाजी, आपका कृष्णाजी
अब कभी वापस आने वाला नहीं है। इसलिए अब अधिक दुखी न हों। स्वराज्य की
सेवा में जो अपने प्राण अर्पित करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। वह एक
सितारा बन जाता है। और ध्रुवतारे की भाँति चमकता रहता है। कृष्णाजी भी अब
आकाश का एक सितारा बन गया है।"
शम्भूमहाराज ने कवि कलश और अन्य कर्मचारियों को पहले ही बुला लिया
था। महाराज ने कृष्णाजी के तीन वर्ष के पुत्र के नाम एक सूबा लिख दिया। कंकवंश
के लिए उन्होंने प्रत्येक वर्ष पर्याप्त धन मिलने की व्यवस्था कर दी। शम्भूमहाराज के
इस तात्कालिक निर्णय और असीम औदार्य से सामान्य सैनिक भी दंग रह गये।
येसाजी ने रोते रोते ही शम्भू महाराज को अपनी बाँहों में भर लिया और
कहा, "सच कहूँ महाराज! आपके साथ रहने से हमें यह भान ही नहीं होता कि
शिवाजी महाराज हमें छोड़कर चले गये हैं।"
480 :: सम्भाजी

सात
गोवा की उस लाल धरती पर जोरदार लड़ाई चल रही थी। माष्टी और बारदेश में
मराठा फौज डटकर लड़ रही थी। नारियल सुपारी के वनों से धुआँ उठ रहा था।
अपने बलवान और बहादुर सैनिकों को महाराज ने पणजी के चारों ओर फैला दिया
था।
एक महीने के बाद भी मराठा फौज डटकर लड़ रही थी उधर बेंगुर्ला मे
औरंगजेब ने अपनी जहाजो का लंगर डाल दिया था। गोवा के समुद्र में रसद उतारने
की अनुमति उन्हें वाइसराय कांट नहीं दे रहा था। जिन मुगलों के साथ उन्होंने
समझौता किया था उनसे भी फिरंगी डरने लगे थे। मराठों का शक्तिशाली विरोध
देखकर उन्होंने मुगलों की सहायता का आश्वासन दिया था। परन्तु वे यह भी
सोचते थे कि परिस्थिति का लाभ उठाकर मुगलों ने ही गोवा पर कब्जा कर लिया
तो क्या होगा ?
शम्भूमहाराज बहुत अस्वस्थ दिख रहे थे। पाखरा घोड़े पर वे मांडवी के दोनो
ओर चक्कर लगाते रहते थे। पणजी की तटबन्दी उसके बड़े बुर्ज बुर्जो पर लगी
बड़ी-बड़ी तोपें, समुद्र और खाडी में निरन्तर गश्त लगाती जहाजें वे निरन्तर देखते
रहते थे। पणजी पर अधिकार करने का उत्साह उनमें बार-बार आता था। साथ-साथ
चलने वाले कवि कलश, दुर्गादास, शहजादा अकबर से वे कहते थे-
"कुछ भी कीजिए। कोई-न-कोई योजना बनकर हमें पणजी को अपने
अधिकार में लेना ही है। यदि शहर में हमारे पाँच सात सौ लोग घुसकर उपद्रव
मचा सकें तो बाद में बाहर कैसे सहायता की जाये तो काम बन सकता है इसे हम
बहुत अच्छी तरह जानते हैं।"
शहजादा अकबर का वाइसराय आल्होर के साथ पत्राचार चल रहा था।
शहजादा अकबर ने पणजी के पास एक जहाज के निर्माण की अनुमति माँगी थी।
फिरंगियों से अनुमति मिलते ही, इस ओर के तट पर लुहार-बढ़ई आदि की
आवाजाही आरम्भ हो गयी। उनकी संख्या बढ़ती देखकर वाइसराय को आशंका
हुई। उसने इस भीड़ और भीड़ के पणजी में आवास पर प्रतिबंध लगा दिया।
समझौता करने के उद्देश्य से अकबर एक बार अपने छः सौ सैनिकों के साथ
निकला। उस समय फिरंगियों ने उनका विरोध किया। एक ओर शम्भूमहाराज गोवा
को अपने अधिकार में लेने के लिए बेचैन हो रहे थे तो दूसरी ओर वाइसराय अपने
राज्य की रक्षा का जी-जान से प्रयास कर रहा था।
महाराज आज कुछ तनावग्रस्त दिखाई पड़ रहे थे। दो दिन पहले ही उनकी
सम्भाजी 481

दो हजार की स्थल सेना और एक हजार की अश्व सेना मड़गाँव मे प्रवेश कर चुकी
थी। महाराज ने गोवा के अपने सभी सेनानायकों और अधिकारियों को आदेश भेजा,
"पुर्तगालियों की सम्पत्ति अवश्य लूटो किन्तु किसी भी व्यक्ति को आघात पहुँचाने
का कोई उपयोग नहीं है। चर्चों के साथ सभी धर्मों के प्रार्थना स्थलों का सम्मान
करो।"
डिचोली के महल में शम्भूमहाराज फिरंगियों पर किये आक्रमण का समाचार
ले रहे थे। उसी समय कवि कलश ने महाराज से पूछा—"पणजी पर किया गया
आक्रमण अभी और कितने दिन चालू रखना है? पुर्तगालियों का वकील साराइव्ह् दे
अल्बुकर्क, सुलह के लिए आपके पास बहुत चक्कर काट रहा है।"
"उससे कहिये कि सूरत से औरंगजेब ने तो रसद भेजी है उसकी आधी
रसद हमारे हवाले कर दो फिर समझौते की शतरंज बिछाओ।"
कवि कलश दिल खोलकर हँसे। उन्होंने बड़े उत्साह से कहा, "राजन! एक
दूसरी बात के लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है।"
"हुआ क्या? हमें भी तो कुछ बताइये।"
"गोवा पर अपने जोरदार हमले से वाइसराय इतना डर गया है कि राजधानी
पणजी को पीछे मार्मा गोवा ले जाने का निर्णय ले लिया। अपना खजाना और
काग़जपत्र भी वहीं ले जाकर रख रहा है।"
शम्भूमहाराज ने प्रसन्न होकर कहा, "कविराज इतने से काम नहीं चलेगा।
अगले दो-चार दिनों में हम साष्टी और बारदेश पर पूर्ण अधिकार कर लेंगे। उसके
बाद मांडवी को पार करके गोवा के शिखर पर अपना भगवा ध्वज फहराएँगे।"
यह चर्चा चल ही रही थी कि बाहर किसी के चिल्लाने की आवाज आयी।
वह कह रहा था—"महाराज न्याय कीजिए। हमारी व्यथा-कथा सुनिये।"
एक ही ताल-सुर में असंख्य आवाजें एक साथ भीतर आने लगीं। बाहर
हजार पाँच सौ लोग एकत्र हो गये थे। कार्य में व्यस्त होने के कारण महाराज ने
कवि कलश की ओर संकेत किया। कवि कलश तत्काल उठकर बाहर चले गये।
शम्भूमहाराज आक्रमण सम्बन्धी किसी कागज को पढ़ रहे थे। किन्तु बाहर
का शोर बढ़ता ही जा रहा था। महाराज ने अपने एक कर्मचारी से पूछा, "इतना हो
हल्ला किसलिए हो रहा है?"
"ये लोग साष्टी से आये हैं, महाराज! वहाँ के उत्साही लोग हाथ में मशालें
लेकर वहाँ की चर्च को जलाने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु हमारे अधिकारी राणोजी
मोरे ने उन्हें पीट-पीटकर भगा दिया। इसी कारण से वे लोग बहुत रुष्ट हैं और
किसी भी बात सुनने को तैयार नहीं हैं।"
यह समाचार सुनते ही महाराज उठकर उन लोगों के पास पहुँचे। महाराज को
देखते ही चिल्ला रहे लोग शान्त हो गये। कुछ समय तक लोग आँखें फाड़कर
482 :: सम्भाजी

महाराज को देखते रहे। उसके बाद उनके कंठ फूटे—
“महाराज आपने फिरंगियों का जो दुर्दशा की उसे देखकर हमें अत्यन्त
आनन्द हुआ। किन्तु आज भी उनका गुरूर कम नहीं हुआ है।”
एक बूढ़ा आगे आकर अपने हाथों को नचाते हुए बोला, “वहाँ रायगढ़ पर
रहकर आप क्या जान पाएँगे कि हम हिन्दू इन फिरंगियों के शासन में कैसे जीते हैं ?
हमारे मन्दिरों में देवता अब नहीं रह गये है। फिरंगियों ने बलपूर्व हिन्दुओं को
धर्मान्तरण के लिए विवश किया। हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ तालाबों में फेंक दीं।
इन लोगों ने कुँओं की जगत पर सामान्य पत्थर के रूप में मूर्तियों को गाड़ रखा है।
पानी खींचते हुए रस्सियों की रगड़ से ये मूर्तियाँ अब टूटने लगी हैं। आप स्वयं ही
चलकर देख लें।”
“मुझे सब पता है। गोवा में शान्ता, दुर्गा, महालक्ष्मी, मंगेशी जैसे देवस्थलों
को भी अपने चारों ओर तटबन्दी और लोहे के मजबूत दरवाजों की आवश्यकता
होती है। फिरंगियों के अत्याचार से यहाँ के देवी देवताओं को भी पसीना छूटता
है।”
“वही हम भी कह रहे हैं, महाराज ! जब हमारे देवताओं की ऐसी दशा है तो
हम लोगों की क्या होगी ? फिरंगियों से बदला लेने का यही अच्छा अवसर है, आप
हमें रोके नहीं।” पाँच-छः लोग एक साथ बोल उठे।
सामने जमी भीड़ में लोग अपने भाले और लाठियाँ ऊपर उठाकर अपना
आवेश व्यक्त करने लगे। किन्तु शम्भूमहाराज ने डाँटते हुए कहा—
“खामोश ! किसी तरह का शोरगुल न करो। इस बात को कभी न भूलो कि
गोवा पर आक्रमण शिवाजी के पुत्र का हो रहा है, औरंगजेब के किसी शहजादे का
नहीं।”
महाराज की कठोर वाणी से सभी लोग सन्न रह गये, तब महाराज ने कहा,
“आप लोगों की पीड़ा को मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ। हिन्दुओं का राजा होने
के नाते आप मेरे सामने अपनी हर माँग रख सकते हैं। हम आपकी हर माँग पूरी
करेंगे। किन्तु इस बात का हमेशा स्मरण रखो कि किसी के द्वेष की नींव पर बनाए
गये हमारे मन्दिर टिकने वाले नहीं हैं।”
कवि कलश को महाराज ने कुछ नये आदेश तैयार करने के लिए बुलाया।
उन्होंने जिन हिन्दू मन्दिरों को फिरंगियों ने ध्वस्त कर दिया था, उनके लिए अपने
खजाने से धन देने की व्यवस्था की जिससे उनका पुनर्निर्माण हो सके। धर्म की रक्षा
के लिए कुछ योजनाएँ भी बनाई गयीं।”
सभी लोग प्रसन्न हो गये। किन्तु मडगाँव का वह वृद्ध जो अभी-अभी
महाराज से बातें कर रहा था, सन्तुष्ट नहीं लग रहा था। महाराज ने उसे छेड़ते हुए
उसके सामने हाथ जोड़ दिये। उसने बड़े प्रेम से कहा, “सरकार आपने हमारे
सम्भाजी :: 483

बारदेश के चारों किलों पर अपना अधिकार कर लिया। फिरंगियों के शासन से हमें
मुक्त किया। पर महाराज आपसे एक और प्रार्थना है। "
"कहिए।"
"महाराज यहाँ के पादरी हम पर बहुत अत्याचार करते रहे हैं। आपका कहना
है कि किसी की धार्मिक भावना पर ठेस न लगने दें। परन्तु महाराज, ये पादरी यीसु
का नाम लेकर हमारे साथ जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं। धर्मान्तरण कराने के लिए
इन्होंने हमारे घर-परिवार को जलाकर रख दिया। ईसाइयों के इन पादरियों का चरित्र
भी कहाँ ठीक है? यीशु का नाम लेकर इन पादरियों ने बहुत धन इकट्ठा किया है।
इनके सफेद वस्त्रों में मोमबत्तियाँ नहीं, धारदार कटारियाँ रखी हैं।"
"बाबा! आपको क्या चाहिए?"
"हम किसी को उँगली से भी नहीं छुयेंगे। पर कल मडगाँव के अत्याचारी
पादरियों के चोंगे उतारकर उनके सिर पर बाँधेंगे और उनका जुलूस निकालेंगे। बस
और कुछ नहीं।"
बूढ़े व्यक्ति की यह माँग सुनकर महाराज के साथ सभी लोग जोर-जोर से
हँसने लगे। महाराज ने उनके आक्रोश को ठीक-ठीक समझा। मडगाँव में सचमुच
धर्म के नाम पर बहुत अत्याचार हुआ था। महाराज ने जुलूस की अनुमति दे दी।
किन्तु अनुमति देने के साथ ही उन्होंने कवि कलश को आदेश दिया—
"इस खतरे की जवाबदारी आप पर है। जुलूस के साथ सेना की एक विशेष
टुकड़ी भेजिए। किसी चर्च की इमारत अथवा किसी धर्मगुरु के प्राणों की कोई क्षति
नहीं होनी चाहिए।" लोग सन्तुष्ट होकर वहाँ से चले गये। दूसरे दिन समाचार
आया कि मडगाँव के पादरियों ने मराठों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। चर्चों के
साथ ही उन्होंने सम्पत्ति को भी मराठों के हवाले कर दिया। चर्च पर क़ब्ज़ा लेते
समय चर्च के बाहर कम से कम दो हजार फिरंगी वहाँ एकत्र हुए थे। मराठों ने सभी
को शान्तिपूर्वक बाहर जाने दिया।
आठ
वाइसराय की पसलियों का घाव अब भी उसे पीड़ित कर रहा था। मांडवी के दूसरे
किनारे पर 'हरऽ हरऽ महादेव' के नारे गूँज रहे थे। उस किनारे पर शम्भूमहाराज का
घोड़ा निरन्तर घूम रहा था। रात में मराठा घुड़सवारों की तलवारें नारियल और सुपारी
484 . : सम्भाजी

के बगीचों में चमकती दिखती थीं। कांट द आल्होर के साथ सम्पूर्ण पणजी शहर
दहशत में आ गया था। पुर्तगाली सेना की भूख-प्यास बन्द हो गयी थी। पादरी
भीतर ही भीतर बहुत भयभीत हो गये थे।
वाइसराय की स्थिति ऐसी हो गयी थी जैसे कोई सियार अपनी माँद में बैठकर
शिकारियों का हांका और शिकारी कुत्तों की आवाज सुनकर भय के मारे भीतर ही
भीतर मरा जा रहा हो। थोड़ी-सी सेना और उससे कहीं अधिक अपनी कुशाग्र बुद्धि
के बल पर उसने अब तक पणजी पर अपना अधिकार जमा रखा था। किन्तु पणजी
वासियों का दबाव निरन्तर बढ़ रहा था। इसकी सूचना वाइसराय ने पुर्तगाल को भी
दे दी थी। हिन्दुस्तान में पुर्तगालियों का शासन समाप्ति पर आ रहा था। चारों ओर
वाइसराय और उसकी नीतियों को अन्यायपूर्ण ठहराया जा रहा था।
थाना से लेकर गोवा तक फिरंगियों की प्रत्येक चौकी पर मराठों के आक्रमण
हो रहे थे। उसी बीच चौल के गवर्नर फ्रांसिस द कोश्त का सन्देश आया—
"यहाँ पर अँग्रेजों ने खुलेआम सम्भाजी की सहायता करनी आरम्भ कर दी
है। वे मराठों को बन्दूकें तोपें, गोले, बारूद सब कुछ दे रहे हैं। दुगुना दाम देने पर
भी हमें चुटकी भर भी बारूद नहीं मिल रही है। यदि समय से हमारी सहायता न
की गयी तो हम मारे जायेंगे।"
वाइसराय की पसलियों का घाव अभी भी भरा नहीं था। शम्भूमहाराज के
भय से पणजी छोड़कर भाग रहे थे। वाइसराय और उसकी सेना से फिरंगियों का
विश्वास उठ गया था।
उस रात कांट ने दूरबीन से देखा। डरे हुए लोग बड़ी संख्या में दूसरी दिशा
की ओर जा रहे थे। उसने अपने सचिव से पूछा, "मूर्खों की तरह वे लोग कहाँ जा
रहे हैं?"
"बॉमगेसू चर्च की ओर।"
"इतनी रात को?"
"जी सर, सेंट जेवियर पर इनकी अगाध श्रद्धा है। इनका विश्वास है कि इस
भयानक संकट से इन्हें सेंट जेवियर ही बचा सकते हैं। सर मुझे भी लगता है..."
सचिव कुछ डर गया। उसका वाक्य अधूरा ही छूट गया।
"क्या?"
"आप भी वहाँ जाकर सेंट जेवियर के सामने अपनी झोली फैलाएँ। सेंट
जेवियर से की गयी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी।"
इस समय सेंट जेवियर की पुरानी चर्च फिरंगियों की शरणस्थली बन गयी
थी। वहाँ पर एकत्र लोग दबी आवाज में सेंट जेवियर का नाम जप रहे थे। रात-दिन
प्रार्थनाएँ चल रही थीं। फिरंगियों की आँखों के साथ मोमबत्तियाँ जल रही थीं।
सम्भाजी :: 485

प्रार्थना के बीच-बीच में साष्टी और बारदेश से समाचार भी आ रहे थे। कभी
'शापोरा' किले के हाथ से जाने की तो कभी पुर्तगालियों के 'जिये' और 'पिये'
किलों पर मराठों के जोरदार आक्रमण के समाचार आ रहे थे। आक्रमणों के समाचार
सुनकर वहाँ के लोग और भी भयभीत हो रहे थे।
एक दिन सवेरे सवेरे राजभवन के काले घोड़े चर्च के परिसर में आकर रुके।
शाही घोड़ागाड़ी से कांट साहब नीचे उतरे। उनकी हालत बहुत शोचनीय थी। रात
में जागते रहने से आँखें लाल हो गयी थीं। आँखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये थे।
दाढ़ी कुछ अधिक सफेद लग रही थी। शरीर उत्साहहीन होने के कारण चाल में
शिथिलता आ गयी थी। इस दशा में इस सद्गृहस्थ को वाइसराय के रूप में
पहचानना कठिन था। उसे देखकर लगता था जैसे वह चोर डाकुओं से लुटा हुआ
और बहुत मार खाया हुआ मुसाफिर हो।
कांट आल्होर के साथ फ्रांसिस द साँज, आर्क बिशप, प्रिमज दौ मान्युअल,
मिगेल द आल्मेदा, जैसे शहर के अनेक पादरी और उमराव वहाँ पर एकत्र हुए थे।
भयत्रस्त उन सभी अधिकारियों एवं वरिष्ठ लोगों ने मशालें जला लीं। बगल की
अँधेरी सीढ़ियों से मशाल के सहारे नीचे उतरे। उस तलघर में सेंट जेवियर का शव
रखा गया था। वहाँ के पत्थर के चबूतरे से एक बड़ी पेटी बाहर निकाली गयी।
सेंट जेवियर का शव एकदम सुरक्षित था। इसे भी एक चमत्कार माना जा रहा
था। सभी ईसाई सेंट जेवियर के नाम का जाप करने लगे। वे सभी रो रोकर कहने
लगे-“सम्भाजी की आफत से हमें मुक्त करो।”
उस महापुरुष के दर्शन-से वाइसराय भी चकित हो गया था। मोमबत्ती के
पिघलते मोम की तरह वाइसराय के आँसू उसके लाल कपोलों पर लगातार गिर रहे
थे। उसने सेंट जेवियर के सामने पूर्णतया समर्पण कर दिया। भारत में पुर्तगाली
शासन के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। उस प्रार्थना के
साथ एक आदेशपत्र भी सेंट जेवियर के पैरों के पास रख दिया। वह पुर्तगाल के राजा
द्वारा वाइसराय के रूप में नियुक्त होने का असली दस्तावेज था। कांट की आँखों से
धारासार अश्रुपात हो रहा था। उसने अपने हाथ की स्वर्ण खड्ग, अपना मुकुट,
राजदण्ड जैसी सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ और राजचिह्न सेंट जेवियर के पैरों के पास
रख दिया। रोते हुए उसने कहा-
"फादर जेवियर, आज से मैं यहाँ का गवर्नर नहीं आपका गुलाम हूँ। अपना
हिन्दुस्तान का राज्य हम आपके चरणों में समर्पित करता हूँ। हे दया सागर, हे
महामानव ! हमारी रक्षा करनी है या नहीं ? इसका निर्णय अब आप ही करें।"
वाइसराय, सारे पादरी और प्रजाजन कई दिनों तक उसी तरह प्रार्थना करते
रहे। वहीं पर सोना और जो कुछ मिल जाये भोजन वहीं पर होता रहा।
486 .. सम्भाजी

एक दिन वाइसराय ने अपने सचिव से कहा, "बन्दीखाने के दरवाजे खोल
दो। मराठों के उस वकील येसाजी गम्भीरराव को मुक्त कर दो। उसे सम्भाजी के
पास भेज दो। सम्भाजी को सन्देश भेजो कि 'सन्धि की शर्तों को आप स्वयं
निश्चित करें, जैसा चाहें मसौदा तैयार कर लें। हम उस पर हस्ताक्षर करने को तैयार
हैं। परन्तु हमें इस विपत्ति से छुटकारा देने की कृपा करें। अब हमें और अधिक न
सताएँ'।"
गोवा पर शम्भू महाराज का दबाव बढ़ता जा रहा था। माष्टी और बारदेश पर
मराठों का अधिकार हो गया था। इसके साथ आग्वाद, रोशमाग़ोश, शापूरा जैसे
फिरंगियों के छोटे मोटे किले भी मराठों के अधिकार में आ गये थे। मडगाँव में
मराठों की एक हजार की थल सेना प्रवेश कर गयी थी। सांमिगेल और सांत
क्रिस्टोहांव आदि सभी किलों पर आक्रमण हो रहे थे।
गोवा की चर्चों में अब मोमबत्तियों की भी कमी होने लगी थी। वाइसराय
आने वाले एक एक दिन को गिन गिन कर काट रहा था। किसी प्रकार से इस
विपत्ति से मुक्त होने के लिए वह छटपटा रहा था। फिरंगियों के वकील बार बार
आकर अपने लम्बे हाथों से शम्भू महाराज को सलाम कर रहे थे। किन्तु महाराज
किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
बाईस दिन बीत चुके थे। फिरंगियों की कमर टूट चुकी थी। सेंट जेवियर चर्च
में बैठे बैठे वाइसराय का दम घुटने लगा था। उसकी पसलियों का घाव अब कुछ
कुछ भर गया था। परेशान होकर कांट द आल्होर ने अपने राजा को आखिरी सन्देश
भेजा, "प्रलय की स्थिति बन गयी है। हमारा इससे उबर पाना असम्भव है। तोपों
को चलाने वाले बहादुर सैनिक बच नहीं पाये और गोला बारूद भी लगभग समाप्त
हो चुका है। जिस प्रकार टूटा हुआ जहाज पानी में गोते लगाता है, उसी तरह
फिरंगीराज हिन्दुस्तान में अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है।"
एक दिन चमत्कार हुआ। सबेरे सबेरे चर्च में समाचार आया कि रात में
मराठों ने अपना मोर्चा उठा लिया। किसी को बिना कोई हानि पहुँचाए वे अपनी
फौज के साथ एकाएक चले गये।
यह समाचार सुनते ही सभी लोग सेंट जेवियर के चरणों में अपना माथा
झुकाने लगे। आनन्दातिरेक से सभी फिरंगी नाचने लगे। फिर भी फिरंगियों के मन
में मराठों का डर बना हुआ था। 10 जनवरी, 1684 को गोवा राज्य सलाहकार
मंडल की बैठक बुलाई गयी। गोवा पर मराठों के आक्रमण की सम्भावना से उन्होंने
अपनी राजधानी को मार्मा गोवा में स्थानान्तरित कर दिया।
शम्भू महाराज को मिला हुआ समाचार सच था। शहजादा मुअज्जम एक
लाख की फौज लेकर रामदरा घाट पार करते हुए आगे बढ़ रहा था। फौज गोवा के
सम्भाजी :: 487

रास्ते में पहुँच जाती तो मराठों का फिरंगियों और मुगलों के बीच फँस जाना
निश्चित था। इसलिए सावंतवाड़ी की ओर जल्दी-जल्दी निकल जाना आवश्यक
था।
नौ
बड़े परिश्रम से फौज पहाड़ की घाटी पार करके आगे बढ़ी। महाराज की सेना
चांभार घाटी पार करके रायगढ़ की ओर मुड़ गयी। नाते गाँव के खेतों में अंग्रेजों का
एक दल रुका हुआ था। उन्होंने उस जंगल में ही अपने दस-बारह तम्बू खड़े कर
लिए थे। वकीलों के साथ आये पाँच सौ बन्दूकधारी सैनिक उनके चारों ओर पहरा
दे रहे थे। मुम्बई में पैदा हुए आलीशान घोड़ों पर गहरे लाल रंग के टोप लगाए,
कम्पनी सरकार के सैनिक डटकर पहरा दे रहे थे।
शम्भू महाराज की विशाल सेना पहुँचते ही अंग्रेजों का वकील स्मिथ साहब
झट से बाहर आया। अपने हाथ में टोपी को पंखे की तरह हिलाकर उसने शम्भू
महाराज का झुककर अभिवादन किया। पिछले कई दिनों से वह शम्भू महाराज की
प्रतीक्षा कर रहा था।
स्मिथ के आग्रह पर शम्भू महाराज कुछ समय के लिए वहाँ रुके। स्मिथ के
डेरे में विचार-विमर्श आरम्भ हुआ। रामचन्द्र शेणवी दुभाषिये का कार्य कर रहे थे।
स्मिथ साहब ने कहा, "महाराज, आप गोवा में अटक गये और हमें मुम्बई में
अटका दिया।"
"सो कैसे?"
"अब क्या सब कुछ मुझे ही कहना पड़ेगा महराज? आपके दरिया सारंग,
भयानक भंडारी और निलोपन्त पेशवा ने कई जहाजों के साथ एक बड़ी नौ सेना
खड़ी कर ली है। आप तो इस समय मुम्बई पर भी आक्रमण करने की बात सोच रहे
हैं।"
"इस बात का मुझे कुछ भी पता नहीं है।" ऐसा कहकर महाराज ने बात को
टालना चाहा।
"महाराज! आपसे पूछे बिना वे एक भी कदम समुद्र में नहीं बढ़ सकते।
वकील होने के नाते इसकी थोड़ी बहुत कल्पना तो है। हमारे मालिक कमिश्नर
488 :. सम्भाजी

चाइल्ड और वॉर्ड को भी इसकी जानकारी है। महाराज हम आपसे विनती करते
हैं—प्रार्थना करते हैं—"
महाराज कुछ समय के लिए चुप हो गये। फिर उन्होंने रुष्ट होकर स्मिथ से
कहा, "हमसे कैसी प्रार्थना? आपके स्वामी तो सिद्दी हैं जो जंजीरे पर बैठे हैं।
उन्हीं के चरणों पर अपना माथा टेक दो।"
"सिद्दी के पास जाकर हम क्या करेंगे? वहाँ तो सिर्फ पत्थर ही पत्थर है।
धन धान्य और रसद की फसल तो आपके स्वराज्य में ही पकती है।"
"फिर भी, ये सिद्दी हमारे ही बच्चों को उठा ले जाते हैं और आप उन्हें
ऊँची कीमत पर खरीदते हैं। इतने पर भी आप समझौते के लिए हमारे पास आने
हैं?"
"माफ करें हुजूर, भविष्य में ऐसी कोई भूल हमसे नहीं होगी। हम सिद्दियों
की कोई सहायता नहीं करेंगे।"
"हम भी आक्रमण कहाँ करना चाहते हैं?" कवि कलश की ओर संकेत
करते हुए महाराज ने कहा।
"ऐसा कैसे हो सकता है? आपने थाना की खाड़ी से ही अपनी फौजें लगा
दी हैं। शिव बन्दरगाह पर अधिकार कर लिया है। इससे हमारे साहब लोग बहुत
घबरा गये हैं। सूरत के अँग्रेजों का भी हमारे साहबों पर दबाव बढ़ रहा है। वे भी
आग्रह कर रहे हैं कि शम्भू महाराज से समझौता करो। हमें अरबों से भी कठिनाई
हो रही है।" स्मिथ ने कहा।
"मैंने भी सुना है कि उन्होंने आपके 'प्रेसिडेंट' या ऐसे ही किसी जहाज को
डुबाने का प्रयास किया था।"
महाराज की बात सुनते ही स्मिथ और रामचन्द्र शेणवी हँसने लगे। किन्तु
महाराज चकित हुए। स्मिथ ने कहा, "सम्भाजी महाराज, जिस समय उस जंगेखान
ने हमारे शक्तिशाली जहाज को डुबोने का प्रयास किया था उस समय आपने ही
उसकी सहायता की थी। यह बात हमें मालूम है।"
वकील की बात सुनकर महाराज और कवि कलश को हँसी आयी। किन्तु
तत्काल स्मिथ ने कहा, "महाराज अब हमारी अधिक परीक्षा न लेकर मुम्बई के
चारों ओर फैली अपनी जहाजों को पीछे हटा लें। समझौता आपके अनुसार होगा।
हम अपनी गोदियों में केवल व्यापार करते हुए बैठे रहेंगे। हमारे कमिश्नर ने भी हमें
ऐसी ही हिदायत दी है।"
चर्चा समाप्त हो गयी। महाराज ने कोई स्पष्ट निर्णय नहीं सुनाया। उन्होंने
स्मिथ को फटकारते हुए कहा, "हमारे निर्णय की प्रतीक्षा कीजिए और अपनी
सम्भाजी :. 489

सीमाओं का उल्लंघन न करना।"
सन्ध्या समय किले पर ऊपर चढ़ते हुए कविराज ने महाराज से पूछा—
"राजन! तैयारी हो गयी है तो मुम्बई पर आक्रमण ही क्यों न कर दिया
जाय?"
"कविराज मेरी भी हार्दिक इच्छा यही थी। परन्तु एक औरंगजेब जैसा
शक्तिशाली शत्रु स्वराज्य का काल बनकर आगे बढ़ रहा है। बीच बीच में हमारे
अपने लोग भी धोखा देने के लिए सिर उठाते रहते हैं। हमारी स्थिति तो आप जानते
ही हैं। बाहर के शत्रुओं ने तो परेशान कर ही रखा है, कम-से कम घर वालों ने तो
छोड़ दिया होता—तो...तो हमने अँग्रेजों के गर्वनर को कब का रायगढ़ बुला लिया
होता और रोजन्दारी पर उससे सेवा करवाता।"
490 :: सम्भाजी

घमासान युद्ध
एक
अहमदनगर के किले में औरंगजेब बहुत बेचैन था। कोंकण में पहुँचे शहाबुद्दीनखान
और गोवा की ओर गये मुअज्जम दोनों के रास्ते में उसकी आँखें टकटकी लगाए
थीं। घोड़ों और साँड़िनियों के सवार जल्दी जल्दी समाचार ले आ रहे थे। उद्विग्न
बादशाह अपने महल के ऊपरी छत के पास की दालान में बैठा रहता था। वहाँ से
किले का सिंहद्वार दिखाई पड़ता था। जब कोई हरकारा या साँड़नी द्वार पर आये
और तब उसका सन्देशा ऊपर पहुँचाया जाय, इतनी प्रतीक्षा का धैर्य बादशाह में नहीं
था। इसलिए बादशाह के नौकर आये हुए हरकारों को तत्काल ऊपर भेजने के लिए
नीचे दौड़ते हुए जाते थे।
बादशाह को दृढ़ विश्वास था कि इस तीसरे आक्रमण में शहाबुद्दीन अवश्य
ही विजयी होगा।
रात में बादशाह ने बहुत देर से खाना खाया। उससे पहले दूर दूर से आये
गुप्तचरों से प्राप्त समाचारों पर सूक्ष्मता से चिन्तन करता रहा। अपने मुलायम बिस्तर
पर लेटते ही वह गहरी नींद में सो गया। वह बहुत देर से अचानक उठा। निचली
मंजिल से कुछ शोरगुल सुनाई पड़ा। बादशाह बड़ी चपलता से छोटे बच्चे की तरह
बिस्तर से नीचे कूदा और पास में रखी धारदार नंगी तलवार लेकर घबराया हुआ
झरोखे से नीचे देखने लगा।
हाथ में कोई बहुत महत्त्वपूर्ण लिफाफा लिये असदखान खड़ा था। वह मुख्य
दरवान से बादशाह का जगाने का आग्रह कर रहा था।
“यह कैसे मुमकिन है, वजीरे आजम ? बादशाह के इतने शहजादे पैदा हुए,
उस समय भी यह खुशखबरी देने के लिए उनकी नींद खराब करने की हिम्मत
किसी ने नहीं दिखाई—और आप ....?”
“क्या बात है वजीरे आज़म ?” बादशाह ने कड़कते हुए पूछा।
सम्भाजी :: 491

"एक बहुत महत्त्वपूर्ण सन्देश-शहाबुद्दीन के पास से।"
"आवो, ऊपर आ जावो।"
बादशाह का संकेत पाते ही वजीर शीघ्रता से बादशाह के शयनकक्ष में पहुँच
गया। तब तक बेगम उदयपुरी और दूसरी बहू बेटियाँ वहाँ पहुँच गयी थीं।
बादशाह की दृष्टि जल्दी-जल्दी पत्र पर घूम गयी। वह खुशी से हँसा। उसने सोचा
कि इस समाचार को राजपरिवार के अन्य लोगों को बताने में कोई हर्ज नहीं है।
इसलिए उसने पत्र वजीर को दे दिया। वजीर ऊँची आवाज में पढ़ने लगा-"मेरे
आका यह केवल बादशाह और खुदा की रहमत है। मैं सह्याद्रि की कठिन घाटी
देवघाट को पार करने में सफल हो गया हूँ। रास्ते में सम्भाजी की गश्त लगाने वाली
सेना की टुकड़ियों को मैंने जलाकर खाक कर दिया है। सैकड़ों मरगट्ठों और उनके
जानवरों का कूर्मा बना दिया है। राहेरी की वाड़ी में यह शैतान सम्भा छुपा है, यह
खबर मुझे मिली। तुरन्त मैं उस जहन्नमी का पीछा करते हुए उस ओर बढ़ा। मराठों
के किले की तलहटी में बसी बस्ती को मैंने दिन में ही जला दिया। यह मुसीबत
उसका अन्त कर देगी यह मूर्ख सम्भा के ध्यान में आ गया। वह काफिर तुरन्त
बनबिलाव की तरह उछलकर भाग गया। अपनी जान किसी तरह बचाते हुए सम्भा
रायगढ़ किले पर भाग गया है।"
बादशाह को बड़ा सन्तोष मिला। इस सन्दर्भ में उसने अपने शाही बावर्ची को
सभी के लिए शर्बत और ठंडाई ले आने के लिए आदेश दिया। यह इस तरह के
पेयपान का समय नहीं था। किन्तु शहंशाह की खुशी ही तो खुदा की मेहरबानी थी।
सभी ने शर्बत ग्रहण किया। बांदशाह की आँखें आनन्द से चमक रही थीं। उनमें
नशा छाया हुआ था। उसके मन की आँखों के आगे कुहरे में ढके रायगढ़ की कठिन
चढ़ाई और साहसपूर्वक चढ़ते हुए शहाबुद्दीन के बहादुर सिपाही दिखाई देने लगे।
उसने प्रसन्न होकर सभी को सम्बोधित किया-"शहाबुद्दीन हमारे खजाने का रत्न
है। उसको हम इसी समय 'फिरोजजंग' अर्थात् 'युद्धरत्न' की उपाधि देते हैं।"
बादशाह की इस घोषणा से सभी प्रसन्न हो गये।
अगले चार-पाँच दिनों में शहाबुद्दीन का दूसरा पत्र आया। "मैंने पाचाड़,
रायरी आदि पर आक्रमण करके अब रायगढ़ से केवल दो कोस की दूरी पर डेरा
डाल दिया है। सम्भा ने शक्तिशाली सरदार रूपा भोसले और हंबीरराव को बहुत
बड़ी फौज के साथ भेजा था। बाण और बन्दूकों की भयंकर लड़ाई हुई। हमारे
जोरदार आक्रमण से शत्रु सेना भाग खड़ी हुई। हमने सात कोस तक उनका पीछा
किया। अन्त में बादशाह की फतह हुई।"
इस पत्र को सभी के सामने पढ़ा गया। बादशाह ने सभी को इस खुशी का
आनन्द मनाने दिया। बादशाह ने तकलीया' कहकर बैठक समाप्त की और सभी को
492 :. सम्भाजी

जाने का संकेत किया। केवल असदखान को रुकने का संकेत किया।
"वजीरे-आज़म आपको क्या लगता है?"
"हजरत, आने वाली खबरें इतनी अच्छी हैं कि मुझे भी लग रहा है कि यदि
हम इसी गति चलते रहे तो पन्द्रह दिनों में हम अगली बैठक रायगढ़ पर ही
बुलाएँगे।"
बादशाह की कठोर मुद्रा और आशंकित भाव को देखकर वजीर ने अपनी
जीभ काट ली। औरंगजेब ने बेचैन होकर कहा, "तुम लोग मुझ पर हमेशा इल्जाम
लगाते हो कि बादशाह को खुशखबरी पर भी शंका होती है। इस सारे मामले में मुझे
दो शंकाएँ हो रही हैं।"
"हजरत ?"
"हाँ, पागल शहाबुद्दीन कहता है कि रायगढ़ से दो कोस की दूरी पर डेरा
डाल रखा है। उसी खत में यह भी कहता है कि दुश्मन का सात कोस तक पीछा
किया। कभी कहता है राहेरी गाँव जलाया कभी पाचाड़। अगर वह रायगढ़ के द्वार
पर पाचाड़ जला रहा था तो रायगढ़ में मराठों की फौज क्या ढोल तासे बजा रही
थी?"
"हाँ, और वह हंबीर मोहिते! वह तो किसी दूसरे ही इलाके में है। ऐसी
खबर मिली थी। यह खबर पक्की है। मुझे तो कुछ दाल में काला लग रहा है।
वजीरे आज़म आप इन बातों की फिक्र छोड़ दीजिए। इस पहेली को मैं अपने ढंग
से सुलझाना चाहता हूँ।"
चार दिनों के अन्दर ही अबूमुहम्मद, रात-दिन एक करके, रायगढ़ के इलाके
में घूमकर आया था। वह बादशाह से मिलने के लिए बेताब हो रहा था। औरंगजेब
की आँखें भी उसी के रास्ते पर अटकी हुई थीं। अबूमुहम्मद आते ही बादशाह के
महल में पहुँच गया। एक साँस में ही उसने बता दिया, "हजरत, आपके बहुत से
शक एकदम सही हैं। खुशी से पागल होने जैसा अभी वहाँ कुछ हुआ ही नहीं है।"
"वह शहाबुद्दीन तो बार-बार कह रहा है कि उसने रायगढ़ की तलहटी में
अनेक गाँव जला दिये!" बादशाह ने कहा।
"जहाँपनाह! वह रायगढ़ किला बहुत मजबूत है। उसकी रक्षा पर्वत और
नदियों की विस्तीर्ण घाटियाँ करते हैं। कम-से-कम तीन दिशाओं से ऐसा दिखता है
जैसे अपने मजबूत पैरों को मोड़कर, सूंड़ को आसमान की ओर उठाए कोई ब्राह्मी
हाथी बैठा हो। इसलिए आसपास दस कोस तक के गाँवों को लगता है कि वे उसके
पास ही बसे हैं।"
"और वह रायगढ़वाड़ी?"
"किले के नीचे है। वहाँ संभा के अठारह कारखाने हैं। वहाँ बगल के मैदान
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