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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 793 में से

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पृष्ठ 482

कि यदि मराठे हार गये तो आप भी बच नहीं पाएँगे। इस स्थिति पर गम्भीरता से
विचार करो और साथ देने का वचन दो। "
उसी समय महाराज ने हैदराबाद के दीवान मादण्णा को भी पत्र लिखवाया-
"आपके कुतुबशाह जितनी समृद्धि, संत्ति हमारे पास होती तो हम सीधे दिल्ली
पर आक्रमण करके उस औरंगजेब को यमुना में डुबो-डुबोकर समाप्त कर देते। घर
में शान्त बैठकर वास्तविक शान्ति का अनुभव न करो। अन्दर छिप जाने से बाहर का
तूफान शान्त नहीं होगा।"
दोपहर को एक हरकारा डिचोली पहुँचा। वह एक दुखद समाचार लेकर
आया था। उस समाचार से शम्भूराजा के साथ सभी के हृदय दहल गये। गाँव में
कृष्णाजी कंक के घाव फूट गये। वे भगवान को प्यारे हो गये। वह समाचार सुनकर
येसाजी अपने को सँभाल नहीं पाये। वे जोर-जोर से रोने लगे। शम्भूमहाराज की
आँखों से भी अश्रुपात होने लगा। उन्होंने येसाजी को अपनी बाँहों में भरकर उन्हें
सांत्वना देने का प्रयास किया।
"महाराज जो कुछ हुआ वह सब प्रभु की लीला थी। किन्तु मुझे एक ही बात
का दुख है।" येसाजी ने कहा, "मैं तो सूखा हुआ पीला पत्ता हूँ। आपकी सेवा में
कभी भी टूट कर गिरूँगा और धन्य हो जाऊँगा। किन्तु आपके कन्धे से कन्धा
मिलाकर लड़ने के लिए हमारे कृष्णाजी को रहना चाहिए था।"
उस रात डिचोली में अनेक मराठा घुड़सवार एकत्र हुए थे। शम्भूमहाराज ने
येसाजी को अपने समीप ही बिठाया था। उन्होंने येसाजी के हाथ को अपने सीने मे
लगाया। आकाश की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "येसाजी, आपका कृष्णाजी
अब कभी वापस आने वाला नहीं है। इसलिए अब अधिक दुखी न हों। स्वराज्य की
सेवा में जो अपने प्राण अर्पित करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। वह एक
सितारा बन जाता है। और ध्रुवतारे की भाँति चमकता रहता है। कृष्णाजी भी अब
आकाश का एक सितारा बन गया है।"
शम्भूमहाराज ने कवि कलश और अन्य कर्मचारियों को पहले ही बुला लिया
था। महाराज ने कृष्णाजी के तीन वर्ष के पुत्र के नाम एक सूबा लिख दिया। कंकवंश
के लिए उन्होंने प्रत्येक वर्ष पर्याप्त धन मिलने की व्यवस्था कर दी। शम्भूमहाराज के
इस तात्कालिक निर्णय और असीम औदार्य से सामान्य सैनिक भी दंग रह गये।
येसाजी ने रोते रोते ही शम्भू महाराज को अपनी बाँहों में भर लिया और
कहा, "सच कहूँ महाराज! आपके साथ रहने से हमें यह भान ही नहीं होता कि
शिवाजी महाराज हमें छोड़कर चले गये हैं।"
480 :: सम्भाजी