छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
अधिकार में था। किन्तु अपनी बेटी के विवाह में पुर्तगाल-राजा ने अपने अँग्रेज दामाद
को भेंट कर दिया। तब से मुम्बई पर अँग्रेजों का अधिकार है। जंजीरे के सिद्दी और
अँग्रेज दोनों ही बहुत चालाक और धूर्त हैं। वे केवल अपना लाभ देखते हैं और
हमारे स्वराज के लिए संकट पैदा करते रहते हैं। किसी की बाँह में छुरा भोंक देने से
वह बेकाम की हो जाती है, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। उसी तरह मुम्बई की
बगल में थल गाँव के पास यह जो छोटा टापू है। उसी पर पिताजी ने नया किला
बनाने का निश्चय किया था। किन्तु धूर्त अँग्रेजों ने समझ लिया था कि मराठों की
सेना का यहाँ तक पहुँच जाना बगल में छुरा भोंकने जैसा ही है। मराठों के बढ़ते
समुद्री प्रभाव का सीधा मतलब था सिद्दियों के खात्मे का खतरा। यह बात सिद्दी
भी अच्छी तरह जानते थे। इसीलिए एक दिन सिद्दियों की तोपें इस किनारे पर
गोले उगलने लगीं। आग उँगलती तोपों की अग्नि वर्षा के कारण पिताजी ने किले
का निर्माण स्थगित कर दिया। "
बैठक में सभी ने शिवाजी महाराज की दूर दृष्टि की प्रशंसा की। बोलते
बोलते शम्भूराजा ने खंदेरी के पास का एक छोटा बिन्दु दिखाया। और कहा, "यह
उंदेरी है जो खंदेरी से केवल दो मील की दूरी पर है। अँग्रेजों ने मराठों का मुकाबला
करने के लिए सिद्दियों की बहुत सहायता की। इसी से सिद्दियों ने मराठों का
सामना करने के लिए उंदेरी पर अपना किला बनाया।"
इस बैठक के दौरान शम्भूराजा बहुत भावुक हो उठे थे। उन्होंने कहा,
"हमारे पिताजी ने इस जंजीरे को जीतने के लिए बहुत कोशिश की थी। मृत्यु के दो
वर्ष पूर्व भी इस जंजीरे को जीतने की पूरी कोशिश की थी। उस समय अपने प्राणों
और सेना की रक्षा के लिए सिद्दी कासिम अँग्रेजों की शरण में मुम्बई भाग गया था।
इस पर भी पिताजी जरा भी विचलित नहीं हुए थे। मुम्बई के मझगाँव बन्दरगाह में
सिद्दी कासिम की जो युद्ध सामग्री रखी गयी थी उसे ही जला देने की उन्होंने
योजना बनाई। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने पचास विश्वसनीय, वीर और
साहसी सैनिकों को भेजा था। किन्तु अचानक सावधान हुए सिद्दी ने उन सभी की
निर्मम हत्या कर दी। इस प्रकार महाराज का जंजीरा अभियान अन्तिम बार अटक
गया।"
"ऐसे कितने आक्रमण किये थे महाराज ने जंजीरा पर?"
उदासीनता भरी हँसी के साथ शम्भूराजा ने कहा, "लगातार चौबास वर्षों तक
यह नासूर महाराज के मस्तिष्क को पीड़ा पहुँचाता रहा। छोटे-बड़े कुछ आठ
आक्रमण महाराज ने जंजीरे पर किये।"
इस पूरी घटना का वर्णन शम्भूराजा बड़े लगाव के साथ कर रहे थे। इससे यह
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भी सभी अनुभव कर रहे थे कि उनके मन में कुछ उथल-पुथल चल रही है। अपने
मित्रों और बहादुर सहयोगियों से विदा लेते समय अत्यन्त भाव विह्वल स्वर में
कहने लगे—‘‘जंजीरा और उसके आसपास का समुद्र तट आयात निर्यात और
सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मेरे पिताजी ने एक बार मुझसे कहा था—
बेटा शम्भू! अगर आप जंजीरे पर भगवा झंडा फहराने में सफल हो गये तो हमारे
हिन्दवी स्वराज की सीमा को गंगा यमुना तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी।’’
दो
पहाड़ों पर अँधेरे का साम्राज्य घटने लगा था। वृक्षों और छोटी पहाड़ियों के आकार
स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। पंछियों और झरनों का कलरव स्पष्टतः सुनाई दे रहा था।
इस भोर में ही शम्भुराजा का खासा और कवि कलश का तुर्की घोड़ा तेज गति से
दौड़ रहे थे। उनके पीछे ईमानी रायप्पा का घोड़ा था और उनके पीछे चार सौ सवारों
की सेना दौड़ रही थी। पिछली रात शम्भुराजा ने पाचाड़ कोट में पड़ाव डाला था
और आज मुँह अँधेरे से ही दौड़ शुरू हो गयी थी।
देखते-देखते पहाड़ का रमणीय प्राकृतिक परिसर आ गया। चारों ओर
पहरेदारों की तरह चौकस खड़े पहाड़ और बीच में दूर तक फैली बाणकोट की
खाड़ी दिखाई दे रही थी। दौड़ते-दौड़ते घोड़ों के मुँह के झाग निकल रहे थे।
प्रातःकाल की आनन्ददायक सर्दी में भी ये जानवर पसीने के तर बतर हो रहे थे।
उनके घुटनों तक लाल मिट्टी की परत चढ़ गयी थी। पूँछ के बालों में तमाम किरचें
अटकी हुई थीं।
वाणकोट खाड़ी के किनारे दूर से ही अनेक तम्बू और छोलदारियाँ दिखाई दे
रहे थे। शम्भुराजा का नाविक दल पास आया। बाई ओर की पर्वत श्रृंखला को देखते
हुए शम्भुराजा घोड़े से नीचे उतरे। उनके घोड़े की लगाम पकड़ने के लिए पाँच छ·
कर्मचारी एक साथ आगे बढ़े।
अभी भी हवा काफी सर्द थी। शरीर पर शाल ओढ़े और घोड़ों पर कपड़े
बिछाये वृद्ध भायनाक भंडारी, दर्या सारंग, गोविन्दराव काँथे, सन्ताजी पावला,
सिद्दी मिस्त्री जैसे नौसेना के अधिकारियों ने शम्भुराजा को घेर लिया। फूल
मालाओं से उनका स्वागत किया। भायनाक को तो अपने राजा पर अत्यधिक गर्व
सम्भाजी ३३३
था। वह उत्साह भरे शब्दों में कहने लगा—"वाह राजन! सूर्य निकलने के पहले
ही आप यहाँ पहुँच गये। तबीयत बाग-बाग हो गयी।"
"देर तो नहीं हुई?" शम्भूराजा ने पूछा।
"नहीं नहीं, अभी तो सुतार कमाठी भी नहीं पहुँचे।" सन्ताजी पावला
प्रशंसा के स्वर में बोले।
शम्भूराजा खाड़ी के किनारे खड़े हो गये। खाड़ी के दोनों ओर अनेक छोटे-
बड़े आवास और यन्त्रशालाएँ दिखाई दीं। पश्चिम की ओर से आने वाली विस्तृत
खाड़ी से होकर आ रही थीं। हवा पानी के साथ अठखेलियाँ कर रही थी। पानी में
खड़ी गुराब, पाल, तरांडी, माचवे जैसी अनेक छोटी बड़ी जहाजें अपनी जगह पर
ही हिचकोले खा रही थीं। उन पर बँधे हुए भगवे झंडे तेज हवा के साथ फहरा
रहे थे।
शम्भूराजा वहीं पर स्वप्न के खोये में खड़े रहे। वे जल की सतह पर एकटक
देख रहे थे। राजा की स्तब्धता से बाकी लोग भी शान्त थे। कविराज दो कदम आगे
बढ़े और धीरे से कहा, "राजन?"
"हाँ कविराज, यही वह बाणकोट की खाड़ी है। पिताजी को समुद्र स्नान का
बड़ा शौक था। वे अनेक बार मन भर तैरने के लिए यहाँ आया करते थे। हमने तैरना
कहाँ सीखा, पता है?"
"कहाँ?"
"यहीं, इसी बाणकोट की खाड़ी में। पिताजी की पीठ का सहारा लेकर हमने
पानी में हाथ पैर चलाना सीखा। उसी समय पिताजी ने एक बार मुझसे पूछा था—
'बताओ शम्भू! मछली के बच्चे तैरना कब सीखते हैं?' मैंने आँखें बन्द किये हुए
तुरन्त उत्तर दिया—'अपनी माँ के गर्भ से बाहर निकलते ही।' मेरा उत्तर सुनकर
महाराज ने मुझे गले से लगा लिया और कहने लगे—'तुम्हें भी अब जीवन के समुद्र
में हाथ पाँव चलाना सीखना चाहिए, हर समय सहाग देने के लिए बैठे थोड़े ही
रहेंगे।' तब से प्रतिदिन मैं किले मे उतरकर रायगढ़वाड़ी की अठारह यन्त्रशालाओं
का घूम-घूमकर निरीक्षण करता रहा। कभी समुद्रतट पर, कभी पहाड़ी किलों की
ऊँची मीनारों पर घूम-घूम कर अपने निरीक्षण से सीखता रहा।"
अपने नौकादल के लोगों और कर्मचारियों के साथ आगे बढ़े। तब तक दिन
निकल आया था। सूरज की किरणें धीरे धीरे पानी में उतरने लगी थीं। इसी समय
दादजी रघुनाथ देशपांडे का भूरा घोड़ा खाड़ी के तट पर पहुँचा। अपने से पहले
शम्भूराजा को वहाँ पहुँचा देखकर अधिकारियों के होश उड़ गये। जहाज बनाने वाले
कामाठी, भिश्ती आदि जल्दी-जल्दी पानी में उतर चुके थे। छोटी नौकाओं के सहारे
अपने गुराबों पर या बड़ी नावों के ऊपर उछलकर चढ़ रहे थे।
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सामने की नीली खाड़ी आँखों को लुभा रही थी। आगे पीछे, दाहिने-बायें
धान के खेत फैले थे। सूर्य की कोमल किरणों से नहाई धान की बालें सुनहरी हो
गयी थीं। धान की फसल पक कर तैयार हो गयी थी। कुछ जगहो पर कटाई का
काम चल रहा था। किन्तु खेतों में केवल स्त्रियाँ और बच्चे ही दिखाई दे रहे थे।
पुरुष अपने बाल-बच्चों को छोड़कर राजा के कार्य में लगे थे। कोली, भंडारी
आगरी जैसे अनेक साहसी और लड़ाकू जाति के लोग शिवाजी महाराज की भाँति
शम्भूराजा पर भी प्राण निछावर करते थे।
शम्भूराजा के पैरों को विश्राम नहीं था। वे ताखे से आगे बढ़ते हुए शीघ्रता से
सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे और बड़ी जहाजों के कार्य का निरीक्षण कर रहे थे। एक एक
जहाज पर पन्द्रह-बीस बड़ी तोपें चढ़ाई जा रही थीं। उन्हें उचित जगह पर स्थिर
किया जा रहा था। चिकनी, काली कलूटी काया तथा बलिष्ठ भुजाओं वाले
चालीस चालीस नाविक बड़ी जहाजों को चलाने के लिए तैयार हो रहे थे।
शम्भूराजा ने जहाज पर से किनारे की ओर देखा। बैलों की बीस-बीस
जोड़ियाँ रस्सियों और जंजीरों से बाँधकर वृक्षों के तनों को खींचकर ला रही थीं।
पास सैकड़ों बढ़ई तेजी से अपना काम कर रहे थे। काटने, तरासने और जोड़ने का
कार्य तत्परता से चल रहा था। भायनाक भंडारी का मजबूत पंजा अपने हाथों में लेते
हुए शम्भूराजा ने प्रशंमा भरे शब्दों में कहा, "इस बार दस बीस नये बड़े जहाज
पानी में तैरने चाहिए। इस महाड़ बन्दरगाह पर ऐसा काम करके दिखाओ कि लोग
यह कहना भूल जायें कि केवल कल्याण में ही अच्छे जहाज बनाये जा सकते हैं।"
"महाराज आप यहाँ की चिन्ता न करें। महाड़ में ही नहीं नीचे जैतापुर और
गजापुर में भी बहुत अच्छा काम चल रहा है।"
शम्भूराजा की गरुड़ दृष्टि बाण को चीरते हुए, समुद्र को पार करते हुए जंजीरे
पर जा टिकी। शम्भूराजा के दीर्घ निःश्वास छोड़ते ही दरियासारंग ने पीड़ा भरे स्वर
मे कहा, "कोंडाजी बाबा जैसे आदमी से ऐसी उम्मीद नहीं थी उन्होंने बहुत
गलत किया।"
"जो चले गये उनका मातम न मनाओ। यह सोचो कि जो बचे हैं उनमें
हाथी की ताकत कैसे भरी जाये।" शम्भूराजा गरजे।
टहलते टहलते शम्भूराजा अधिकारियों को जो परामर्श दे रहे थे उसे सभी
बड़े ध्यान से सुन रहे थे। नाविक अधिकारियों की ओर घूमकर वे कहने लगे-
"साथियो! क्या आप जानते हैं कि मेरे पिताजी ने सिंधु दुर्ग किस तरह
बनवाया? पानी के नीचे समतल पत्थरों में छिद्र करके उनमें पिघला लोहा डलवाया
और उसके ऊपर जोड़ाई का काम करवाया। सैंकड़ों वर्षो तक समुद्र की तूफानी
लहरें उससे टकराती रहें तो भी वह हिलने वाला नहीं है। इसी प्रकार उन्होंने
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सह्याद्रि के नदी नालों और पर्वत-घाटियों में रहने वाले लोगों को तैयार और
संस्कारित कर दिया है कि भविष्य में कितने ही आक्रमण हों वे उनका सामना करने
में सक्षम बने रहेंगे।" अपने सहयोगियों को बताते हुए उन्होंने आगे कहा, "आज
हिन्दुस्तान के तटों पर किसी भी फिरंगी की अपेक्षा हमारी सेना संख्या में अधिक है
किन्तु पुर्तगालियों और अँग्रेजों की तोपें अधिक शक्तिशाली और लम्बी दूरी तक
निशाना साधने वाली हैं। वैसा ही शक्तिशाली तोपखाना और वैसे बलवान गोलंदाज
हमारे पास भी होने चाहिए।"
"राजन! इसीलिए तो कुडाल और डिचोली में हमने बारूदों के नये कारखाने
खुलवाये हैं।" कविराज बोले।
"वही कह रहा हूँ।" भायनाक और दरिया सारंग की ओर देखते हुए
शम्भूराजा कहने लगे-"जब जहाज से गोला बाहर फेंका जाएगा, उस समय उस
धक्के से जहाज को हिलना नहीं चाहिए। अभी भी थोड़ा समय है, अपने गोलंदाजों
को प्रशिक्षण दो। तोपों की गति बढ़नी चाहिए। बारूद के गोले आसानी से बाहर
निकलने चाहिए।
बोलते-बोलते शम्भूराजा ने पास में खड़े कत्थई रंग की घनी दाढ़ी वाले
दौलत खान की ओर देखा।
शम्भूराजा से बात करते समय दौलतखान लगातार समुद्र की ओर देख रहा
था। यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी बावरी नजर किसकी प्रतीक्षा कर रही
थी। शम्भूराजा अपने सहयोगियों को बता रहे थे-"जंजीरे का सिद्दी तो हमारे
पैरों में अटका हुआ साँप है। उसे तो कुचलना ही है। किन्तु अँग्रेजों और पुर्तगालियों
की भी नीयत ठीक नहीं है।"
धूप अब बढ़ चुकी थी। हवा में ऊष्मा भी बढ़ गयी थी। एक नक्काशीदार
भागानगरी छाता हाथ में उठाये एक नौकर शम्भूराजा को छाँह दे रहा था। शम्भूराजा
का ध्यान आसपास के ग्रामीण नाविकों पर गया। धान की कटाई जोरों पर थी। पर
खेतों में काम करने वाले केवल बच्चों और महिलाओं के अतिरिक्त कोई न था।
सम्भाजी ने पूछा-"दादजी, फसल की कटाई तो किसानों और बलूतदारों की
दीवाली ही है। फिर मजदूर कैसे मिलेंगे?"
"देखिए सरकार! बढ़ई, लुहार, चमार आदि प्रजा वर्ग के सभी लोग तो आप
के यहाँ काम कर रहे हैं। फसल की कटाई के मौसम में प्रजा वर्ग को दस गुना
मिलता है किन्तु वह सब छोड़कर ये सारे लोग यहाँ आये हैं। स्वराज्य के निर्माण में
हिस्सा लेने।" दादजी ने सूचित किया।
दोपहर को सभी सवार, सरदार, दरिया सारंग, नाविक आदि भोजन के लिए
एकत्र हो आए। बड़े जहाज पर सभी एक ही पंक्ति में बैठे कामाठी और नाविकों की
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पंक्ति में ही रायगढ़ नरेश भी बैठे थे। पत्तल पर मासाड किस्म का चावल और
मछली का सालन परोसा गया था। सम्भाजी राजा के साथ पंक्ति में बैठकर भोजन
करते समय सभी के सीने तने हुए थे।
शाम का समय था। खाड़ी पर एक बड़ा जहाज आता हुआ दिखाई दिया। उम
पर हरा झंडा फहरा रहा था। उस पर एक विचित्र प्राणी का चित्र बना था। उस बड़े
जहाज को उथले पानी में ले जाने की कठिनाई के कारण गहरे हिस्से में ही रोका
गया। सीढ़ियाँ लटका दी गयीं। उस जहाज की ओर भयानक और दौलत खान ने
बड़े अभिमान से देखा। शम्भुराजा भी प्रसन्न दृष्टि से देख रहे थे। एक छोटी नाव
लेकर मराठा सैनिक पानी में उतर पड़े। आगत अतिथियों का स्वागत करने के लिए
दौलत खान और भयानक भंडारी आगे बढ़े। उस जहाज से उतरकर हष्ट-पुष्ट
महाकाय सेनानी उतरकर आया। उसने कमर तक झुककर सम्भाजी राजा का
अभिवादन किया।
"आइए जंगेखान। हमें आपका ही इन्तजार था।" ऐसा कहते हुए शम्भूराजा
ने जंगेखान को अपनी बाँहों में भर लिया। वे अपने सहकारियों को गर्व से देखते हुए
बोले, "ये हैं अरबों के सेनाधिकारी जंगेखान, हमारे स्वराज्य के मित्र। इन्हीं के
मार्गदर्शन में हमारे गोलंदाज अचूक निशाना लगाने और समुद्री युद्ध का प्रशिक्षण
लेने वाले हैं।" सभी ने उत्साहपूर्वक जंगे खान का स्वागत किया। जंगेखान अपनी
सेना के साथ अरब सागर में हमेशा घूमता रहता था। विशेष रूप से अरब देश से
हिन्दुस्तान आने वाले जहाजों को संरक्षण देना और अपने राज्य के व्यापारिक हित
की रक्षा करना उसी की जिम्मेदारी थी। अरब के सुल्तान ने यह कार्य उसी को सौंपा
था। शाम के समय एक सजे-सजाये विशेष कक्ष में सम्भाजी और जंगे खान की
बातचीत चल रही थी।
"आपका दोस्त जंजीरे का सिद्दी क्या कहता है?" सम्भाजी ने हँसते हुए
पूछा।
"उसकी और हमारी जाती दुश्मनी के कारण ही तो हम आप दोस्त बने
हैं।" जंगे खान ने सोत्साह कहा। चर्चे के दौरान जंगे खान ने सूचित किया-
"राजन! सारे परदेशियों-फिरंगियों में बहुत से आपसी मतभेद और झगड़े
हैं। किन्तु मराठों की बड़ी सेना संगठित न करने देने के मुद्दे पर सभी एक हो जाते
हैं।"
"उसकी जानकारी मुझे है।" सम्भाजी राजा ने कहा।
जंगेखान कोंकण के तट पर कुछ दिन और रुकने वाला था। उसके साथी
कारीगर कम समय में बड़े जहाज किस प्रकार तैयार कर लेते हैं। इसका प्रशिक्षण
वह मराठी लुहारों और सुनारों को देने वाला था। सात समुद्रों का खारा पानी पचाने
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वाली और पालों को फाड़ देने वाली तेज हवा का मुकाबला करते हुए अरबी जहाजें
आसानी से सफर कर रहे थे। साथ ही दूर तक निशाना साधने वाली तोपों को बिठाने
और निशाने पर दागने का प्रशिक्षण भी ये लोग देने वाले थे। इसलिए मराठा नाविक
दल बहुत उत्साहित था।
शाम को जंगेखान ने आग्रहपूर्वक सम्भाजी राजा को अपने अरबी जहाज पर
अरबी भोजन के लिए आमन्त्रित किया। अरबी जहाज पर चलते समय सम्भाजी
राजा ने एक अँधेरे कोने में कुछ हलचल अनुभव की। उन्होंने मशालची को बुलाया।
प्रकाश में उन्होंने देखा कि दो-ढाई सौ नंग-धड़ंग आदमी उस अँधेरी कोठरी में
बन्द हैं। प्रकाश पड़ते ही ये सभी भेड़-बकरियों की तरह सहमकर काँपने लगे।
उनकी दाढ़ी और सिर के बाल बढ़े हुए थे। उनके नंगे शरीर पर जख्मों के निशान
दिख रहे थे। कई दिनों से स्नान न करने के कारण उनके शरीर से दुर्गन्ध आ रही
थी।
"चलिए राजन! इन्हें छोड़िए। ये तो हमारे गुलाम हैं।" जंगेखान ने कहा।
चलते-चलते शम्भूराजा खड़े हो गये। उन्होंने जंगेखान से पूछा-
"खान साहब आप कमाठी मजदूरों का उपयोग क्यों नहीं करते?" आप इन
गुलामों को ही अपने पास क्यों रखते हैं?"
"राजन अपने तबेले के घोड़ों और बाजार के टट्टुओं में अपने लिए अधिक
काम का कौन है? अपना घोड़ा अपने बैल। वैसे ही ये अपने गुलाम हैं। हमारे
गुलाम कितना भी बोझ उठा सकते हैं।"
"लेकिन खान साहब घोड़े, कुत्ते और इनसान की औलाद में कुछ फर्क होता
है कि नहीं?"
"लेकिन राजन, ऐसे फालतू विषय पर यानी गुलामों पर आप इतना क्यों
सोचते हैं?" कुछ याद करते हुए जंगेखान ने कहा, "हाँ अब समझ में आयी बात।
आप तो शायर हैं न?"
"यहाँ शायरी का सवाल नहीं है, खान साहब। ये किसी मजबूरी में भगाए
गये और भेड़-बकरियों की तरह बेचे गए गुलाम किसी के पुत्र हैं और मुम्बई के
बाजार में बिकने वाले गुलाम हमारे हिन्दवी स्वराज्य के ही बच्चे होते हैं। इसीलिए
हमारा हृदय पसीजता है।"
शम्भूराजा एक पल रुके और दूसरे ही क्षण जंगेखान की राय जाने बिना
उन्होंने कविराज को आदेश दिया—"कविराज, जंगेखान को सरकारी खजाने से
जितना चाहे उतना धन दीजिए पर कल इन सभी गुलामों की मुक्ति होनी चाहिए।"
"जैसी आज्ञा राजन!" कविराज ने गर्दन हिलाई।
उन्होंने आगे कहा, "हमारे पिताजी मनुष्य के साथ गुलामों जैसा व्यवहार
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करने के खिलाफ थे। अंग्रेजों पर भी उन्होंने गुलामो के लिए चार गुना चुंगी लगाई
थी। हमें भी इस अमानवीय जुल्मी प्रथा से घृणा होती है। "
अरबों के जहाज पर स्वादिष्ट मांस मटन की बहुतायत थी। कीमती मदिरा
की बोतलें भी भरी पड़ी थीं। जंगेखान के विशेष आग्रह के कारण शम्भूराजा और
कवि कलश ने थोड़ी-थोड़ी मदिरा ली। मदिरा के प्याले को मुँह से लगाते हुए
शम्भूराजा ने कहा, "जवानी में हम भी मदिरा के शौकीन थे, नृत्य संगीत मे भी हमें
अरुचि न थी किन्तु पिताजी के स्वर्गवास के बाद से हमें एक ही नशे ने घेर रखा है
और वह है पिताजी के अधूरे स्वप्नों को पूरा करना। सिद्दी, पुर्तगालियों को उनकी
जगह दिखाना तथा औरंगजेब नाम के बन्दर को जीवित कैद करना।"
"वाह! बहुत खूब!" जंगेखान गरजे।
"हमारे देश, धर्म और संस्कृति की गर्दन पर छुरा रखने वाले इस जानवर को
मैं निश्चय पराजित करूँगा। जिस तरह मदारी बन्दर को रस्सियों मे बाँधकर घसीटता
हुआ ले जाता है, उसी प्रकार यहाँ की ऊबड़ खाबड़ जमीन पर घसीटते हुए
औरंगजेब की बारात निकालने की हमारी हार्दिक इच्छा है। माँ भवानी इस शम्भू को
इतनी सामर्थ्य दे।" शम्भूराजा हाथ जोडकर माँ भवानी का स्मरण करने लगे।
तीन
शम्भूराजा और महारानी येसूबाई बैठक मे उपस्थित थे। किसी बड़े आक्रमण की
योजना की चर्चा हो रही थी। इसी बीच 'जय जय रघुवीर समर्थ' का मन्त्र घोष
सुनाई पड़ा। सम्भाजी राजा ने चौंक कर सिर उठाया तो सामने वेद मूर्ति दिवाकर भट
दिखाई पड़े। सवेरे सवेरे समर्थ रामदास के पट्ट शिष्य को आया देखकर शम्भूराजा
बहुत आनन्दित हुए।
शम्भूराजा ने बड़े उत्सह से दिवाकर भट का स्वागत किया। "आइए आइए
शास्त्री दिवाकर भट जी। यहीं हमारे पास बैठिए। शम्भूराजा ने दिवाकर भट को
अपने पास ही बिठा लिया। पति-पत्नी ने समर्थ रामदास के शिष्य को आदरपूर्वक
प्रणाम किया। सेवक वर्ग सक्रिय हो उठा। फलाहार आया। यह जानकर कि
सज्जनगढ़ से समर्थ रामदास के पट्ट शिष्य मिलने आये हैं, कर्मचारी अपना कार्य
छोड़कर कुछ समय के लिए बाहर चले गये।
सम्भाजी : 339
इस नितान्त व्यक्तिगत बैठक में बातें चलने लगीं। शम्भुराजा ने ही विषय
छेड़ा—"शास्त्री जी! राज्याभिषेक के समारोह में समर्थ स्वामी यदि स्वयं पधारे
होते तो हमें बहुत आनन्द आता।"
"नहीं राजन! स्वामी जी के मन में ऐसा कुछ नहीं है। आजकल उनका
स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इसीलिए उन्होंने समारोह में दिवाकर गोसावी को भेजा
था।"
"सन्तपीठ और सत्तापीठ का रिश्ता ही कुछ विचित्र होता है, शास्त्री जी!"
"निःसन्देह, शम्भुराजा! बड़े महाराज से स्वामी जी का बड़ा स्नेह था ही
साथ ही प्रहलाद निराजी, निलो सोनदेव, रामचन्द्र नीलकंठ और विशेष रूप से
बालाजी भावजी चिटणीस आदि सभी का, स्वामी का बड़ा शिष्य वर्ग था।"
दिवाकर भट ने बोलते-बोलते बालाजी आवजी चिटणीस के नाम पर बल
दिया। इससे शम्भुराजा का दम फूलने लगा। उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में कहा, "हमें
पता है। आजकल समर्थ स्वामी हम पर बहुत नाराज हैं।"
"ठीक है महाराज! अपने किसी गुणी ज्ञानी सहायक को हाथी के पैर के
नीचे कुचलवा देना और किसी परदेशी पाखंडी को सिर पर बिठा लेना किसी राजा
को शोभा देता है क्या?"
दिवाकर भट ने आरम्भ में ही अपने मन की भड़ास निकाल दी। महारानी
येसूबाई शम्भुराजा की ओर भयभीत दृष्टि से देखने लगीं। दिवाकर भट ने इधर-
उधर देखते हुए इसी स्वर में प्रश्न किया—"कहाँ है वह कलश? दिखाई नहीं दे
रहा है। सुना है वह भोंदू हर घड़ी, हर क्षण यहीं बैठा रहता है।"
सम्भाजी राजा विचित्र हँसी हँसते हुए बोले, "कवि कलश कल ही
सागरगढ़ और कोथलागढ़ के लिए गये हैं। मैंने उन्हें अष्टागार और कल्याण की
बगल में रसद और बारूद की देखभाल करने और चौकियों के पहरों के निरीक्षण के
लिए भेजा है। कभी ऐन वक्त पर आवश्यक होने पर उन्हें तलवारबाजी के लिए भी
भेज देते हैं।"
"क्या कहते हो? उस पाखंडी को लड़ना भी आता है?"
"आता ही नहीं, वे विजयी भी होते हैं।"
"ऐसा!"
"वही तो कह रहा हूँ शास्त्री जी! अभी-अभी आपने जिन प्रधानों के हाथी
के पैर के नीचे कुचले जाने पर खेद व्यक्त किया, उनमें बालाजी आवजी और उनके
अभागे पुत्र को छोड़कर शेष सभी स्वराज्य द्रोही थे। शरीर में फैला हुआ साँप का
विष और राजद्रोह का समय पर उपचार नहीं किया गया तो क्या आदमी और क्या
राज्य, विनष्ट होने में अधिक विलम्ब नहीं होता।"
340 :: सम्भाजी
शम्भूराजा के इस प्रतिपादन से दिवाकर भट कुछ लज्जित हुए। उन्हें लगा कि
शम्भूराजा के प्रशासन से सम्बन्धित जो शिकायतें सज्जनगढ़ तक आयीं थीं, वे
सबकी सब सही नहीं थीं ! विषय को अधिक न बढ़ाते हुए शास्त्री जी ने एक रेशमी
फीते से बँधी थैली शम्भूराजा के सामने रखी। उन्होंने कहा, “स्वामी जी ने अपने
हाथ से लिखकर यह सन्देश आपके पास भेजा है। इसे आराम से पढ़ें।”
उस दोपहर को शम्भूराजा बैठक से बाहर नहीं निकले। उन्होंने सारे
महत्त्वपूर्ण कार्य आगे के लिए टाल दिया। येसूबाई और शम्भूराजा स्वामी जी के पत्र
को एक साथ पढ़ रहे थे। कभी एक साथ पढ़ते, कभी पढ़कर एक-दूसरे को सुनाते,
कभी उत्सुकतावश एक-दूसरे के हाथ से खींचते। उस काव्यमय पत्र ने दोनों का मन
मोह लिया था। पत्र आठ-दम बार पढ़ा गया। इसके बाद शम्भूराजा की आँखें पत्र
की अन्तिम पंक्ति पर टिक गयीं—
स्मरण करो शिवराय को तृण सम जीवन जान
तरे लोक परलोक को चढ़े कीर्ति के यान
याद करो शिव रूप को उनके प्रबल विरोध
वह प्रताप जग व्याप्त जो तज सारे अवरोध
चलना, हँसना, बोलना और जगत व्यवहार
सीखो सब शिवराय से मन के परम उदार
सभी सुखों को त्याग कर साधा अविचल योग
राज्य सदा रक्षित रहे, कितने किये प्रयोग
किसी पवित्र ग्रन्थ की भाँति ही शम्भूराजा ने उस पत्र को हृदय से लगाया,
ईश्वर का स्मरण किया। उन्होंने अभिभूत होकर कहा—“युवराज्ञी सीधे सादे शब्दों
का अर्थ हम आप आसानी से समझ लेते हैं पर महापुरुषों और सन्तों के शब्दों से
अमृत की वर्षा होने लगती है। स्वामी रामदास ने इन शब्दों द्वारा पिताजी के विराट
व्यक्तित्व का दर्शन कराया है।”
“सत्य है स्वामी।” महारानी ने कहा।
“येसू श्रीमान योगी, ज्ञानी राजा जैसी अमर विरुदावली इस महायोगी ने
केवल शिवाजी महाराज के लिए ही गढ़ी है। ये विरुदावलियाँ इतनी सटीक हैं कि
यदि अन्य व्यक्ति इन विरुदावलियों का धारण करे तो उपहास का पात्र हो
जाएगा।”
उन काव्य पंक्तियों में रायगढ़ नरेश और महारानी इतने विभोर हो गये कि
आधी रात कब बीत गयी उन्हें पता ही नहीं चला। एक बार पुनः दोनों ने उस पत्र
का वाचन आरम्भ किया। तब काव्य की अन्य पंक्तियाँ उन्हें आकर्षित करने लगीं—
सम्भाजी :: 341
सावधान नित ही रहो दुविधा करो न एक
बैठ मुक्त चिन्तन करो राखो अपनी टेक
छोड़ उग्रतावृत्ति को सौम्य बनो मन साध
औरों की चिन्ता करो क्षमा करो अपराध
कार्यभार नित सौंपकर राखो अपने साथ
सुखी आश्रित जन करो सबल बनेंगे हाथ
शम्भूराजा पढ़ते-पढ़ते रुके। येसूबाई ने पत्र अपने हाथ में ले लिया। वे धीर-
गम्भीर स्वर में आगे की पंक्तियाँ पढ़कर सुनाने लगीं-
अटका प्रवाह तो पानी रुक जाएगा
जन मन की गाँठ से अवरोध बन जाएगा
जन मन की प्रीति से प्रवाह चलता रहे
तो सारा कार्य भी निरन्तर बनता रहे
जन मन की गाँठ से उपेक्षा आपकी होगी
आपस में लड़ने से जीत शत्रु की होगी
समय की गति देख क्रोध को निवारिये
क्रोध आये तो भी निज अन्तर में राखिये
उन पंक्तियों का अनेक बार वाचन और मनन किया गया। सम्भाजी राजा और
महारानी उसी प्रकार बहुत समय तक बैठे रहे। एक अलग पंक्ति ने मस्तिष्क में
हलचल मचा दी थी।
बहुत समय के बाद येसूबाई ने कहा, "औंढ़ा के पठार पर घटित घटना का
समाचार अनेक बार सुनने में आया था। जिन लोगों की हत्या की गयी थी उनके
स्वजन सज्जनगढ़ जाकर स्वामी जी से मिले थे।
"वे सारी शिकायतें मैंने सुनी हैं। इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना है कि
शिवाजी का पुत्र अपने पिता जैसा नहीं निकला। वह बददिमाग है, कान का कच्चा
है, विलासी और पागल है। राज्य डूबेगा, विनष्ट होगा। और कुछ?"
शम्भूराजा की मुद्रा अत्यन्त कठोर हो गयी थी। उसी समय येसूबाई ने धीरे से
कहा, "विशेष रूप से बाला जी आवजी स्वामी जी के बहुत समीपी और प्रिय
शिष्य थे। किन्तु राज्याभिषेक के पहले पन्हाला और रायगढ़ पर जिन लोगों ने खुले
आम विद्रोह किया और जिन्हें हमारे लोगों ने परास्त किया, उन सभी के स्वजनों ने
स्वामी जी के पास जाकर खूब शिकायतें की हैं।"
शम्भूराजा कुछ समय तक मौन भाव से बैठे रहे। तब फिर पत्र को अपनी
आँखों के सामने ले आने हुए येसूबाई ने कोमल स्वर में कहा-
342 :: सम्भाजी
"जो भी हो पर इतना तो सत्य है कि इस पत्र को भेजने में स्वामी जी का
उद्देश्य मांगलिक और पवित्र ही होगा? इन पंक्तियों को सुनें—
जन जन को एकत्र करो और सबमें भर दो ऐक्य विचार
टूट पड़ो यवनों पर मिलकर राष्ट्र प्रेम का हो विस्तार
जो है उसकी रक्षा कर लो जोड़ो और करो विस्तार
उन तरल, पवित्र और मरस पंक्तियों ने शम्भूराजा के मन को फिर से
उल्लसित कर दिया। मुख पर से विषाद की छाया मिट चुकी थी। उन्होंने भावुक
होकर कहा—"आपकी बात सच है रानी। औरंगजेब के साथ हमारा महासंग्राम
चल रहा है। स्वामी जी वहाँ अपने ध्यान, चिन्तन और परमेश्वर की सेवा में लगे हैं।
यहाँ के सारे समाचार उन्हें किस प्रकार पहुँच सकते हैं? जिन्हें युद्ध भूमि ही नहीं,
किसी भी प्रकार का कोई कार्य ही नहीं है वे ही समय-समय पर उल्टी-सीधी बातें
करते रहते हैं। महागनी, मुझे लगता है कि हमें भी अपने मन की बात पत्र द्वारा
स्वामी के पास भेजना चाहिए।"
"वाह! बहुत खूब!"
तब तक भोर बीत चली थी। एक खिड़की से कावले का पहाड़ और दूसरी
खिड़की से दूरी पर स्थिर जगदीश्वर के मन्दिर का कलश दिखाई दे रहा था।
शम्भूराजा ने उसी समय स्नान, पूजा, अर्चना आदि समाप्त किया। वस्तुतः शयनकक्ष
में बगल में पड़ी दुलाई की तरह नींद भी रातभर अलग ही धरी रह गयी थी। खंडो
बल्लाल को पहले ही सन्देशा भेजा जा चुका था। पूजा के कपड़ों में शम्भूराजा अपने
मन्त्रणा कक्ष में बैठ गये। माथे पर लगा अष्टगन्ध का तिलक अभी ताजा था। गले
की तुलसी माला पर हाथ फेरते हुए बल्लाल को एक-एक शब्द बोलने लगे—
"प्रति पुण्य श्लोक सन्त रामदास स्वामी गोसावी को क्षत्रिय कुलावतंस
शम्भूराजा छत्रपति की ओर से सादर अभिवादन।
मराठों को संगठित करने और महाराष्ट्र का विकास और विस्तार करने की
आपकी प्रबल इच्छा है। अपने हिन्दवी स्वराज्य और कैलासवासी मेरे पिताजी के
प्रति स्वामी जी को अत्यधिक स्नेह था। इसके लिए हम स्वामी जी के प्रति सदैव ही
ऋणी रहेंगे। जिन उदात्त शब्दों से स्वामी जी ने पिताजी को गौरवान्वित किया है
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सटीक शब्द, गहन भाव और हृदय का माधुर्य
शब्दों में इस प्रकार प्रवाहित होता है जैसे केवड़े के पुष्प से सुगन्ध प्रवाहित होती
है। स्वामी जी ने जिन गरिमामय शब्दों में बड़े महाराज गौरवान्वित है उसके आगे
तो कालिदास और भवभूति भी फीके लगते हैं।
अच्छा हुआ जो आपका पत्र समय पर मिल गया। उस समय हम बड़े समुद्री
सम्भाजी ३५३
युद्ध की तैयारी में पूरी तरह संलग्न हैं। शिवाजी महाराज के समय के कुछ वरिष्ठ
और अनुभवी अष्ट प्रधानों तथा अधिकारियों की हमारे हाथों हत्या हुई है। यह सच
है। किन्तु उनके परिजनों द्वारा हत्या के कारणों के जो आरोप मुझ पर लगाये गये हैं,
वे सभी बेबुनियाद हैं। हिरोजी काका अन्नाजी दतो जैसे अनुभवी पुरुषों की उँगली
पकड़कर हम बड़े हुए हैं। एक समय ये सभी स्वराज्य आधार स्तम्भ रहे हैं। हम
बचपन में जब महल में या दरबार में घूमते थे तो उन्हें अपने सगे चाचा के रूप में ही
देखते थे।
एक ओर हमारे पुण्य प्रतापी पिताजी स्वर्गवासी हो गये थे। दूसरी ओर पागल
हाथियों के झुंड की भाँति औरंगजेब हिंदवी स्वराज्य पर आक्रमण कर रहा था। उस
समय हमें सहारा देने की जगह अपने-अपने स्वार्थों और अपनी छोटी-मोटी
आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये कर्मचारी और अधिकारी राजद्रोह पर उतर आये।
नौ-दस वर्ष के बच्चे को राजगद्दी पर बिठाने की इनकी मूर्खता मैंने देखी। फिर भी
मैंने इन्हें राजद्रोह की सजा नहीं दी। उन्हें निष्कासित करने का सरल रास्ता नहीं
अपनाया। उल्टे हमने उन्हें हँसते-हँसते प्रधान पदों की मालाएँ पहना दीं। उन्हें
पदभार का सुवर्ण कंगन पहना दिया। उन्हें जिस घोड़े से उतारा था, उसी पर फिर
बिठा दिया। राज्य शास्त्र के अनुसार राज्यद्रोह जैसे अक्षम्य अपराध के लिए हमने
उन्हें ऊँचे पहाड़ से कूदने के लिए विवश नहीं किया। किन्तु उन्होंने एक बार नहीं
बार-बार हमारी थाली में जहर घोला। उनके अपराध के आगे भी राजा को झुक
जाना चाहिए क्या ?
स्वामी जी, आप कभी भी रायगढ़ पर पधारें। स्वयं सभी प्रकार के कागजात
देखें। यदि किसी प्रकार दोष हो तो हमें बतायें। जीजामाता की तरह की युग निर्मात्री
स्त्री हमें आजी के रूप में मिलीं। उनके सामने पिताजी के आशीर्वाद से बहुत कम
उम्र में ही हमने रायगढ़ का कार्यभार चार वर्ष तक स्वतन्त्र रूप से संभाला। ब्राह्मण
होने के नाते कौन लिहाज करता और मराठा होने के नाते कौन चिन्ता करता है ? ऐसे
विवेकशील पिता की सन्तान होने का मुझे सौभाग्य मिला। रामायण महाभारत का
अध्ययन किया। कालिदास, भवभूति जैसे नाटककारों के नाटकों का पठन किया।
देव भाषा आत्मसात की और कोमल ब्रजभाषा के रस सागर में भी डुबकी लगायी।
केवल बालाजी पन्त भूल से मारे गये। उस दुख से मुझे इस जन्म में मुक्ति
मिलने वाली नहीं है। उस अपराध को तो हम स्वीकार करते ही हैं। किन्तु उनके
परिवार को महल में आश्रय देकर उन्हें अपने परिवारजन की तरह ही पाल-पोस रहे
हैं। अन्य राजद्रोहियों की बात अलग थी।
स्वामी जी, अब तो हिन्दवी स्वराज्य के सीने पर हमारा जन्म-जन्मान्तर का
शत्रु औरंगजेब आ बैठा है। उसके साथ पाँच लाख पैदल और चार लाख हाथी-
घोड़ों की सेना है, ग्यारह पीढ़ियों की तैमूरों की दौलत भी। फिर भी हम अपने छोटे
344 सम्भाजी
से नवनिर्मित स्वराज्य बचाने के लिए दिन-रात यथासम्भव प्रयत्न कर रहे हैं। आज
औरंगजेब की मुगल सेना के प्रचंड प्रवाह को रोकना अपनी छोटी सेना के साथ
स्वराज्य की रक्षा करना और अवसर मिलते ही औरंगजेब को समाप्त करना ही
हमारा परम धर्म है। यदि इस कालसर्प को समय पर रोका नहीं गया तो इस प्रदेश के
गाँवों और गली-मुहल्लों में उसका विष फैलने लगेगा और हमारे पिताजी शिवाजी
महाराज के सपनों का महाराष्ट्र टिक नहीं पाएगा।
देश धर्म और मिट्टी के ईमान के लिए हम रात-दिन एक कर रहे हैं।
अकर्मण्य प्रमादी पुरुषों की भाँति कुटिल और विलासी खेल खेलने का समय
किसके पास है? औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर हमारी शरण में आये हैं। उनके
साथ मारवाड़ के दुर्गादास राठौर भी हैं। औरंगजेब के विरुद्ध स्वदेशियों को
पंक्तिबद्ध करने के लिए हम रात दिन विचार-विमर्श कर रहे हैं। हरसम्भव प्रयास
कर रहे हैं। अम्बर के राजा राम सिंह के साथ भी हमारा पत्राचार हो रहा है। इस
दिशा में सफलता मिलते ही सबसे पहले आपको सूचित करूँगा।
स्वामी जी, वस्तुतः पिछले आठ वर्षों से अपने शरीर में बारूद का भस्म लपेटे
हम रणचंडी की पूजा कर रहे हैं। आप अपने मठ के भीतर परमेश्वर के चिन्तन
मनन में व्यस्त हैं। बीच में बिलबिलाने वाले कीड़ों का क्या विश्वास करना। मुझे
पहाड़ जैसी समस्याओं और दुर्दान्त शत्रुओं का जरा भी भय नहीं लगता। किन्तु आप
जैसे महान साधक और पहुँचे हुए सन्त के कानों तक पहुँचने वाले कनखजूरों से मैं
बहुत भयभीत होता हूँ।
स्वामी जी, हमारे इस धर्मयुद्ध के लिए अपना आशीर्वाद दें। जिन
अधिकारियों और कर्मचारियों को दंडित होने से स्वामी जी को इतना दुख पहुँचा है,
उनके बारे में हम इतना ही कहेंगे कि हमारी हर साँस के साथ आज भी हमारा हृदय
तड़पता है, रोता है। उन सहकर्मियों की काली करतूतों के कारण विवश होकर
बार बार उनके द्वारा राजद्रोह किये जाने के कारण उन्हें हाथी के पैरों तले
कुचलवाना पड़ा। "
चार
ताड़वनों में कौवे चिल्ला रहे थे। नागोठण की खाड़ी के पास शम्भूराजा और कवि
कलश का डेरा पड़ा था। शम्भूराजा की प्रातःकाल से ही बहुत देर तक पूजा चलती
सम्भाजी :: 345
थी। उनके राजदरबार में आने से पूर्व कवि कलश नियमित रूप से दरबार में आते
थे। अपने नियम के अनुसार आज भी वे दरबार में पहले आ गये थे। खाड़ी के
निचले हिस्से में शहजादा अकबर का बड़ा तम्बू खड़ा किया गया था। शहजादे को
बहुत विलम्ब से जागने की आदत थी। इसलिए उसके नौकर भी देर से ही उठते
थे। किन्तु दुर्गादास नित्य की भाँति तम्बू के पास आकर बैठ गये थे। वह शहजादे से
बार-बार कहते—
"अरे अकबर! कम से कम युद्ध भूमि में जल्दी उठा करो। इन मराठों
को देखो, किस तरह घोड़ों पर चलते-चलते रोटी खाते हैं। हर समय युद्ध के लिए
तैयार रहते हैं।"
"क्या करूँ दुर्गादास ? मेरे शरीर में बादशाही खून है। ये मराठे बंजारों की
तरह भटकने वाले लोग हैं। ये किसी भी तरह जी सकते हैं किन्तु बादशाह को तो
अपनी शान के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए।"
"शहजादे! ये सम्भाजी राजा अपनी सुख सुविधा, अपनी व्यवस्था का
कितना ध्यान रखते हैं? उनसे तो सीखो!"
दुर्गादास जब भी ऐसा कुछ कहते अकबर हँसकर कहता, "दुर्गादास! आप
हिन्दू हो इसलिए इस शम्भूराजा—जमींदार के लड़के के लिए आपके मन में इतना
आदर है। लेकिन मैं भविष्य में शम्भूराजा या किसी का भी कोई अहसान अपने ऊपर
नहीं रखूँगा। कल जब मैं हिन्दुस्तान का बादशाह बनूँगा, इस बेचारे शम्भू को एक के
बदले दो सूबे इनाम में दूँगा।"
अकबर इस प्रकार व्यर्थ और फालतू बातें करता तो दुर्गादास अपना सिर पीट
लेते थे।
कवि कलश फौजी दरबार में बहुत देर से शम्भूराजा की प्रतीक्षा कर रहे थे।
शम्भूराजा ने महाड़ के दादाजी प्रभु देशपांडे को प्रातःकाल ही बुलाया था। इसी
समय मस्तक पर अष्टगन्ध तिलक धारण किये, तेईस वर्ष के गोरे चिट्टे, पौरुषेय
मुद्रा वाले शम्भूराजा फौजी दरबार में पहुँचे। पहरेदारों और दरबारियों ने तत्परता से
उनका अभिवादन किया। दरबार में बैठते सम्भाजी राजा की नजर दादजी देशपांडे
पर जा टिकी। उन्हें बिना कुछ बोलने का अवसर दिये, शम्भूराजा ने कहा,
"देशपांडे काका अपने स्वराज्य के अष्ट प्रधानों में एक सम्मानित स्थान मैंने आपके
लिए सुरक्षित रखने का निश्चय किया है।"
शम्भूराजा के इस उद्गार से देशपांडे उल्लसित हो गये। दादजी देशपांडे को
बड़ी लालसा थी कि अष्ट प्रधानों में उन्हें भी कोई सम्मानित स्थान मिले। दादजी ने
कृतज्ञता से शम्भूराजा को नमन किया। शम्भूराजा बोले, "प्रधानों के इस आसन तक
पहुँचने के लिए एक आश्वासन देना होगा।"
346 :: सम्भाजी
"कौन-सा आश्वासन महाराज ?"
"कोंकण का यह टेढ़ा-मेढ़ा समुद्र तट, यहाँ के बन्दरगाह, यहाँ की
खाड़ियाँ, यहाँ की ऊँची-ऊँची लहरें और लहरों को चीरते हुए जाने वाले यहाँ के
रास्ते आपके परिचित हैं। आपसे अधिक उन्हें और कोई नहीं जानता। इसलिए आप
बिना विलम्ब किये तैयार हो जाएँ। जंजीरे पर आक्रमण करके उस सिद्दी को
समाप्त करें। स्वराज्य की इस महान सेवा से स्वयं को पवित्र करें।"
दादजी देशपांडे उलझन में पड़ गये। वे कुछ काँपते हुए स्वर में बोले-
"महाराज पानी में तो क्या ? आप यदि आग में भी कूदने को कहेंगे तो हम रंचमात्र
भी नहीं हिचकेंगे। परन्तु इस अवसर पर एक और बात का ध्यान रखना आवश्यक
है। अन्यथा धोखा हो जायेगा।"
"कौन सी बात ?"
"महाराज ! उस जंजीरे की तटबन्दी शिवाजी महाराज जैसे प्रतापी राजा के
सामने भी नहीं झुकी। उसे मुगल दूर से सलाम करते हैं। पुर्तगाली और अँग्रेज जैसे
फिरंगी भी उससे आतंकित हैं। ऐसे खतरनाक अभियान पर निकलना, इस तरह की
खतरनाक योजना बनाना शेर का शिकार करने जैसा है।"
"हाँ, मुझे वह सब पता है।" सम्भाजी ने हँसते हुए कहा।
"सूबेदार ! जंगल के अनेक प्राणी शरीर से बहुत बलशाली होते हैं। किन्तु
उनमे से कितनो की जान उनकी छोटी सी पूँछ में बसती है।" देशपांडे की आँखें
चमकीं। उन्होने बीच में ही शम्भुराजा से पूछा—"कौन है जंजीरे की पूँछ ?"
"उंदेरी का टापू। कुलाबा के पास का। उसके लिए जितना धन लगे लीजिए।
फौज ले जाइए। कुछ भी कीजिए। लेकिन उंदेरी यह पूँछ रौंद दीजिए।"
अपनी जरी के रूमाल से सिर का पसीना पोंछते हुए महाड़कर देशपांडे हँसते
हुए बोले, "महाराज यह पूँछ भी बहुत विषैली है। उस थल गाँव के किनारे खूब
मजबूत किला है। उस किले में ही अंग्रेजों का बारूदखाना है। वहाँ से पानी में एक
मील पर उंदेरी टापू है। कोई भी प्रसग उपस्थित होने पर ये अँग्रेज उन हब्शियों की
सहायता के लिए खड़े हो जाते हैं। अभी भी खड़े रहेंगे।"
सम्भाजी राजा कुछ गम्भीर हो गये। आगे बढ़कर उन्होंने देशपांडे के हाथ में
पान, सुपारी, नारियल दिया। उसे अपने माथे से लगाते हुए देशपांडे ने शम्भुराजा को
सम्मानपूर्वक प्रणाम किया। तब उनका हाथ अपने हाथ में लेकर शम्भुराजा अवरुद्ध
कंठ से कहने लगे—"काका ! यह राजपुर की घाटी बाजी प्रभु देशपांडे द्वारा पवित्र
की गयी धरती है। इन सारी बातों को आप भली-भाँति जानते हैं। हम नया क्या
बता सकते हैं? किन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि यदि आपने उंदेरी पर विजय पताका
सम्भाजी · 347
फहरा दी तो कोंकण तट पर भी एक पवित्र नवीन घाटी .की स्थापना होगी। ''
अपने साथियों में उत्साह भरने के शम्भुराजा के ढंग से कवि कलश बहुत
प्रसन्न हुए। उंदेरी पर आक्रमण करने का अर्थ था आग से खेलना। इसलिए दादाजी
देशपांडे कुछ चिन्तित दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु शम्भुराजा केवल देशपांडे पर
जिम्मेदारी डालकर चुप नहीं बैठे। वे स्वयं भी इस अभियान की तैयारी में लग गये।
शस्त्रास्त्र, तरांडी, छोटी-बड़ी नौकाएँ आदि छोटी-छोटी बातों पर पूरा ध्यान दे रहे
थे। समुद्रीतट पर भावी युद्ध का अनुमान शम्भुराजा को पहले ही हो चुका था।
इसलिए उन्होंने शिवाजी महाराज द्वारा बनवाई गयी कुलाबा की तटबन्दी का बचा
खुचा महत्त्वपूर्ण कार्य छ: सात महीने में पूरा कर लिया था। वहीं पर बारूद का
समृद्ध भंडार बनाया गया था। इसके अतिरिक्त सागरगढ़ पर भी अनाज और बारूद
की गोदामों को खचाखच भर दिया गया था। नागोण्णा और रोध्या की खाड़ी में
बाइस गलवतें तैयार की गयी थीं। दरिया सारंग, दौलतखान और भायनाक भंडारी
साथ में थे ही। चार हजार सैनिक तैयारी में जुटे थे। सैनिकों को प्रोत्साहित करने के
लिए उन्हें दो महीने का वेतन पहले ही दे दिया गया था।
अभियान की तैयारी चल रही थी। उसी समय कवि कलश ने शम्भुराजा से
धीमे स्वर में कहा, ''राजन, किसी किसी व्यक्ति की चालाकी का अनुमान लगाना
भी कठिन है। ''
''किसके सम्बन्ध में कह रहे हैं आप?''
''अपने कोंडाजी बाबा फर्जन्द। उनकी उम्र पैंसठ वर्ष है। दिखते पचास के
हैं। शरीर से स्वस्थ और बलिष्ठ हैं। फिर भी इस उम्र में इस प्रकार की
अशिष्टता ?'' कवि कलश व्यथित स्वर में बोले।
''हुआ क्या है? कविराज ! आपको जो कुछ कहना है साफ साफ कह दें। ''
''राजन, समुद्र पार के देशों से हीरे जवाहरात इकट्ठा करने का शौक तो इन
सिद्दियों को है ही साथ ही दुनिया की सुन्दरतम ललनाओं का शौक भी इन
हब्शियों को कम नहीं है। सुना जाता है कि जंजीरे पर इन लोगों ने दुनिया भर की
गोपियों का गोकुल बना रखा है। ''
''होगा। ''
''ऐसी बात नहीं है—किन्तु अब वहाँ मराठों नाते रिश्ते बन रहे हैं। इसलिए
कहता हूँ।''
''मतलब ?''
''वहाँ पर नवाब सिद्दी कासिम की तीन अति सुन्दर रक्षिताएँ हैं। इन्हीं में
एक नीली और पीताभ आँखों वाली ईरानी युवती दिलरुबा है। उसी पर हमारे कोंडी
348 :: सम्भाजी
३. औरंगजेब की विशाल सेना का दक्षिण अभियान, ९ वर्षों का अपराजित प्रतिरोध
बाबा की नजर पड़ गयी। कोंडी बाबा पर कासिम का इतना भरोसा है कि वह उसके
गले का हार बन गया। सिद्दी कोंडाजी पर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्हें दिलरुबा का
हाथ पकड़ा दिया। यही नहीं दोनों के लिए अपना एक महल भी दे दिया। "
शम्भुराजा ने कवि कलश की तरफ घूरकर देखा और सीधा प्रश्न किया-
"क्यों कविराज, जंजीरे की सेवा में जाने का विचार तो नहीं है न ?"
शम्भुराजा के इस प्रश्न पर दोनों खुलकर हँसे। किन्तु हँसते-हँसते शम्भुराजा
एकाएक गम्भीर हो गये। उन्होंने कहा, "कविराज इस सारे प्रकरण में मुझे तो कुछ
दाल में काला दिखाई पड़ रहा है। अन्यथा उस सिद्दी कासिम जैसा पत्थरदिल
आदमी हमारे कोंडाजी को इतना क्यों चाहता है ?"
जब दादजी देशपांडे की सेना खाडी से बाहर निकलने लगी तो शम्भुराजा
चिन्तित स्वर में कहने लगे- "काका देशपांडे शीघ्रता कीजिए। खबर है कि वह
औरंगजेब शीघ्र ही दक्षिण में पहुँचने वाला है। उसके आने से पहले हमें इस सिद्दी
को पानी में डुबाकर मारना है। एक बार इस उंदेरी का काम तमाम हो जाये तो उसके
बाद आपको जंजीरे पर भी आक्रमण करना है।"
"जैसी आज्ञा महाराज।"
"जंजीरे का यह अभियान सफल होने के साथ ही रायगढ़ पर अष्ट प्रधान
मंडल में एक सम्मानित स्थान आपकी प्रतीक्षा कर रहा होगा।"
रोध्या से शम्भुराजा तुरन्त रायगढ़ लौट आये। राजनैतिक गतिविधियों में पुनः
सक्रियता आ गयी। शम्भुराजा के अनेक सरदार मुल्हेर, सोलापुर, अहमदनगर जैसे
मुगल शासित प्रदेशों में गये थे। उनकी पचीस-तीस हजार की फौज मुगलों पर
आक्रमण कर रही थी। लूट-पाट भी चल रही थी। हंबीरराव के नेतृत्व में मराठों की
फौज एक बार पुनः बुरहानपुर पर आक्रमण कर रही थी। उसी समय दादजी के
सबल नेतृत्व में उंदेरी पर आक्रमण किया गया था। शम्भुराजा को एक ही समय में
अनेक स्थानों पर ध्यान देना पड़ रहा था। अलग-अलग जगह भेजी जाने वाली
रसद, बारूद आदि का हिसाब रखना पड़ता था। अनेक स्थानों से गुप्तचर रायगढ़ पर
आते थे। समाचार प्राप्त किये जाते थे। फिर नयी सूचनाओं के लिए गुप्तचरों को
यथावसर भेजा जाता था।
इस समय राजकीय कार्य-व्यापार का भार येसूबाई ने अपने हाथ में ले लिया
था। अष्ट प्रधान और अन्य सहायक तो साथ में थे ही। शिवाजी महाराज के शासन
काल में जिस प्रकार जीजामाता सारी राजनैतिक गतिविधियों पर ध्यान रखती थीं
उसी प्रकार येसूबाई की निगाह भी प्रत्येक गतिविधि को बारीकी से देखती रहती
थी। जहाँ कहीं भी जरा-सी चूक होती, वे तत्काल पकड़ लेती थीं। इसलिए सभी
कर्मचारी और अधिकारी उनसे भयभीत रहते थे।
सम्भाजी 349
एक दिन सुबह-सुबह गुप्तचर रायगढ़ पर आये। खबर की गम्भीरता का
अनुमान कर महारानी येसूबाई ने स्वयं दरवाजा खोला। गुप्तचर बिना कुछ बोले
चुपचाप खड़े रहे। राजमहल का समाचार बारूदखाने तक पहुँच गया। तेज कदमों से
चलते हुए शम्भुराजा वहाँ पहुँच गये। सभी के उदास चेहरे देखकर उन्होंने अनुमान
लगा लिया था। उन्होंने खड़े-खड़े ही समाचार पढ़ा। उंदेरी की लड़ाई में मराठी
सेना का सर्वनाश हो गया था।
क्रोध से झुँझलाते हुए सम्भाजी बोले, "मैंने बार-बार समझाया था कि बड़ी
सावधानी और चतुराई से युद्ध लड़ना है।"
गुप्तचर कहने लगा— "दादजी की योजना एकदम ठीक थी। उन्होंने आस-
पास की सभी खाड़ियों की नाकाबन्दी कर ली थी। आरम्भ में ही तोप के गोले से
तटबन्दी में एक बड़ी सुराख बना ली थी। उसमें से दो सौ बहादुर मराठे सैनिक
दुश्मन की गोलियाँ झेलते हुए भीतर जाने में सफल हो गये थे।"
"फिर कठिनाई कहाँ पैदा हुई?"
"समुद्र के किनारे थल गाँव के पास 'खूबलढ़ा' नाम का एक किला है।
उसमें अँग्रेजों का बहुत बड़ा बारूदखाना है। वहीं से फिरंगी अँग्रेज ऐन समय पर
हब्शियों की सहायता के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने अपनी तोपों से भयानक आक्रमण
किया। सब समाप्त हो गया।"
"समाप्त हो गया? मतलब ?" शम्भुराजा की आँखों के गोलक घूमने लगे।
"अनेक मराठों ने लड़ते-लड़ते उन्देरी पर अपने प्राण दिये। दुर्देव से अस्सी
जीवित मराठा सैनिक शत्रु के हाथ लग गये। उस दानव कासिम ने बाँस की तरह
उन अस्सी मराठों के सिर बेरहमी से काट दिये। उनके शरीर ऊपर किले से पानी में
फेंक दिये गये। अस्सी सिरों को चार बड़ी-बड़ी गठरियों में बाँधकर कासिम उन्हें
लेकर जाने कहाँ चला गया।"
"और अपने दादजी देशपांडे कहाँ हैं?"
"उस प्रभुवीर ने बहुत पराक्रम दिखाया। उनके हाथ की खूनी तलवार
छपाछप चल रही थी। किन्तु इसी समय तोप का एक गोला उनकी बाईं टाँग को
छूता हुआ निकल गया। गन्धक के कुछ टुकड़े उनके पैर में धँस गये और दादजी तट
के नीचे आ गिरे। अपने पुण्य प्रताप से वे नीचे खड़े जहाज में गिरे। अपने सिपाही
उन्हें चेऊल ले गये हैं। वहीं उनका उपचार हो रहा है।"
शम्भुराजा बहुत उद्विग्न हो गये थे। वे इस प्रकार तिलमिलाये जैसे किसी ने
बाँस से उनके सिर पर वार कर दिया हो।
चार दिनों में ही गुप्तचरों ने मुम्बई से मराठी वकील का सन्देश दिया। उसे
खंडो बल्लाल ने पढ़ा और घबराई हुई स्थिति में वे शम्भुराजा के पास आ खड़े हुए।
350 :: सम्भाजी
उनके चेहरे की घबराहट देखकर शम्भूराजा ने पूछा—“क्या हुआ खंडोजी?”
“वह हैवान सिद्दी अस्सी मराठा सैनिकों के सिर लेकर मुम्बई गया था।”
“तो?”
“मझगाँव के बन्दरगाह में ले जाकर उस हरामखोर ने उनका बड़ा उपहास
किया। भालों की नोकों में उन खोपड़ियों को खोंसकर उसने जुलूस निकाला। शराब
के नशे में धुत सैनिकों ने ढोल-तासे बजाते हुए जुलूस निकाले।”
“क्या कह रहे हो खंडोजी?”
“जी हाँ! महाराज। यह तो कुशल हुई कि इसकी सूचना अँग्रेज गवर्नर को
मिल गयी। उसने सिद्दी के इस जुलूस पर रोक लगा दी। इससे आगे होने वाला
अपमान टल गया।”
शम्भूराजा अचानक खड़े हो गये। उनका सिर चकराने लगा। आँखों से अंगारे
फूटने लगे। क्रोध में उन्होंने पैर को जमीन पर दबाते हुए हाथ से दीवार में लगी
खूँटी को खींचा। उनका आवेश और सन्ताप इतना अधिक था कि खूँटी उखड़कर
हाथ में आ गयी। उस दिन सम्भाजी ने अन्नजल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वे
मन्दिर की ओर भी नहीं गये। किन्तु उनकी अंगारों-सी दहकती आँखें और उनकी
हर साँस तथा उनका हर कदम, सभी को यह मूक सकेत दे रहे थे कि ‘अब रुकना
नहीं है। अब नहीं रुकना है।’
शम्भूराजा के बिना कहे ही सारे घुड़सवार और सैनिक उनके आसपास
इकट्ठे हो गये। अधिकारी भी जमा हो गये। दरवाजे से बाहर निकलते हुए कुछ
स्मरण करके वे एकाएक मुड़े और राजगृह के मन्दिर की ओर चले गये। वहाँ पर
उन्होंने किसी देव प्रतिमा की ओर देखा तक नहीं। देवालय के सामने वाले हिस्से में
लाल कपड़े में लपेट कर रखी गयी पादुका को उठाकर अपने माथे से लगाया।
शिवाजी महाराज को स्मरण करते बैठ गये। उनके पीछे पीछे वहाँ पहुँची येसूबाई ने
कहा—
“ऐसा नहीं लगता कि जजीरा इतनी सरलता से हाथ में आ जाएगा।”
“आपका कहना ठीक है महारानी। इन पुर्तगाली, डच, अँग्रेज और सिद्दी
फिरंगियों को यह सह्य नहीं है कि जंजीरा मराठों की झोली में आ जाये, क्योंकि
जंजीरे पर मराठी ध्वज के फहराने का अर्थ है महासागर पर मराठों की अपराजेय
सत्ता। इस तथ्य को वे भली प्रकार जान चुके हैं।”
शम्भूराजा ने शिवाजी महाराज के स्मृति चिह्नों को माथे से लगाया। उनके
मुँह से शब्द निकले—
‘पिताजी अब प्रतीक्षा समाप्त हुई। मैं स्वयं जंजीरे के महाभयानक मगरमच्छ
के मुँह में हाथ डालने जा रहा हूँ। अब देखना है कि कौन किसको निगलता है?’
सम्भाजी : 351