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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

अवधि में मगरूर मोरोदादा अस्तित्वहीन हो गये।
मोरोदादा के पदच्युत होने के समाचार को रायगढ़ पहुँचने में चार दिन लग
गये। इस समाचार से अष्टप्रधानों की नींद उड़ गयी। इस बात की किसी को भी
कोई सूचना नहीं थी कि मोरोदादा को पदच्युत करने के लिए महाराज के हस्ताक्षर
और मुद्रा के साथ कोई फरमान निकाला गया था और गोवा की ओर भेजा गया था।
अष्टप्रधान पूरी तरह भौचक्के हो गये थे।
इस प्रकरण से अण्णाजी दत्तो को गहरा धक्का लगा। कुछ दिनों तक तो उन्हें
अन्न-पानी की भी सुधि न रही। उन्हें अविराम गति से कँपकँपी छूट रही थी। वे
बालाजी चिटणीस से गम्भीर स्वर में कहने लगे—"चिटणीस, मैं श्री गजानन की
शपथ लेकर कहता हूँ कि अब इसके आगे ऐसा ही होता रहेगा। अपराध की न
जाँच-पड़ताल न कोई सबूत, यह तो ऐसा ही हुआ कि जो पसन्द नहीं है उसकी
गर्दन पर बेरहमी से आरी चला दो।"
अण्णाजी को समझाते हुए चिटणीस ने कहा, "जाने दीजिए अण्णाजी! एक
सामान्य सूबेदार के पदच्युत होने से आप इतना दुखी क्यों हो रहे हो? सहयोगियों
की राय के बिना भी राजा स्वतन्त्र निर्णय लेने का अधिकारी होता है।"
"बालाजी यह इतना सरल नहीं है? इसके मूल में एक षड्यन्त्रकारी
राजनीति है। जानबूझकर मेरे आदमियों को चुन चुनकर उनके साथ धोखा किया जा
रहा है। शिवाजी महाराज के समय के सभी कर्मचारी नालायक हैं, यही सिद्ध करने
के लिए ये सारे षड्यन्त्र रचे जा रहे हैं।"
"परन्तु इसमें वास्तविक दोषी कौन है?"
"किसको दोष दिया जाये, चिटणीस? अरे भाई, उस कलुषा ने राजा को
अपने क़ब्ज़े में कर लिया है। उस लम्पट के कारण हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, सब
कुछ खतरे में पड़ गया है।"
इन दिनों हिरोजी फर्जन्द और प्रधानों के बीच उठना-बैठना बहुत बढ़ गया
था। राज्य अनेक जिम्मेदारी वाले कार्य महाराज ने हिरोजी को सौंपे थे, किन्तु
हिरोजी कुछ असन्तुष्ट दिखाई पड़ते थे। वे अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान नहीं दे रहे
थे। उनकी ये शिकायतें राजा के पास आ रही थीं।
एक दिन हिरोजी फर्जन्द शम्भू महाराज से मिलने दरबार में आए। दोपहर का
समय था। इसकी सूचना मिलते ही शम्भूमहाराज ने उन्हें अन्दर बुला लिया। पैंसठ
वर्ष के ऊँचे कद और उत्तम स्वास्थ्य वाले हिरोजी फर्जन्द ने आते ही कहा,
"शम्भूराजा कुछ हमारी सलाह भी सुन लिया करें। मौके का लाभ उठाइए।
औरंगजेब का वह छोकरा आपको पत्र पर पत्र भेज रहा है, किन्तु आपने उसकी ओर
मुड़कर भी नहीं देखा।"
268 :: सम्भाजी

"हाँ, देखेंगे।"
शम्भूराजा की इस उदासीनता से हिरोजी नाराज हो गये। वे अधीर होते हुए
बोले, "शम्भूराजा, आपकी जगह यदि हमारे शिवाजी होते और ऐसा कोई शहजादा
मदद माँगने देहरी पर आता तो मैं सौगन्धपूर्वक कहता हूँ कि ऐसा सुअवसर मिलने
पर उस बहादुर ने सारा हिन्दुस्तान पैरों के नीचे रौंद दिया होता। आप भी उठिए और
बादशाह के बेटे को साथ में लेकर दिल्ली पर आक्रमण कर दीजिए।"
शम्भूराजा ने कहा, "आपकी कल्पना बहुत भव्य और दिव्य है काका।"
शम्भू बेटा, अपना आगरा का अभियान याद है न? उस समय का हमारा
गुर्राता हुआ बच्चा आज ठंडा कैसे पड़ गया?"
"काका साहब, रायगढ़ से आगरा जाने के लिए और आगरा से बड़ी
कुशलता से बचकर दक्षिण की ओर आने के लिए पिताजी को कितनी तैयारी और
कितनी योजनाबद्ध रीति से कार्य करना पड़ा था? वे जागकर बिताई गयी अनेक रातें
और तूफानी दिन आपको याद हैं?"
शम्भूराजा के इस सीधे प्रश्न ने हिरोजी को निरुत्तर कर दिया। महाराज ने
स्पष्ट स्वर में कहा, "आपके जैसे बुजुर्गों को ही नहीं बल्कि हम सभी को विचार
करना चाहिए कि उस शहजादे का हमारे पास आने का उद्देश्य क्या है? अपने पिता
के प्रति छेड़े गये विद्रोह में सच्चाई है या केवल दिखावा?"
शम्भूराजा के इस तर्क से हिरोजी शान्त पड़ गये। वे शीघ्रता से लौट पड़े।
प्रहलाद निराजी बड़ी उत्सुकतापूर्वक हिरोजी से पूछा, "क्यों हिरोजी, क्या तय
हुआ महाराज से मिलकर? उस शहजादे का स्वागत करने के लिए क्या आप
त्र्यम्बकगढ़ तक जाएँगे?"
"तुम भी कैसा प्रश्न करते हो प्रहलाद पन्त? मुझे जाने दीजिए। मुझे यह सब
बुरा लगता है। इतना ही कहूँगा कि उस कलुषा नाम के दुष्ट मान्त्रिक ने यदि रायगढ़
का पूरा खजाना लूट लिया होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन उसने तो राजा का
दिमाग ही गायब कर दिया है, इसका क्या करें?"
शहजादा अकबर के आगमन पर शम्भूराजा ने अपनी बारीक नजर रखी थी।
उन्होंने हिरोजी फर्जन्द को त्र्यंबकगढ़ की ओर नहीं भेजा किन्तु नासिक के अपने
सूबेदार पर उसके स्वागत का दायित्व सौंप दिया था। मूल्यवान रत्नहारों की भेंट
देकर शहजादा अकबर और दुर्गादास का स्वागत किया गया। वहीं से शम्भू महाराज
की एक बड़ी सेना और तेज दौड़ने वाले गुप्तचरों का एक दल शहजादे के साथ
चलने लगा। शहजादा शीघ्रता से रायगढ़ की ओर आने के लिए निकला था। उसकी
रोज की यात्रा, रुकने के स्थान और अन्य सभी गतिविधियों की पूरी जानकारी शम्भू
महाराज को थी। एक बार दरबार के कार्य में व्यस्त शम्भू महाराज से कवि कलश ने
सम्भाजी 269

हँसते हुए कहा—
“महाराज, आप में और शहजादा अकबर में बहुत-सी समानताएँ हैं।”
“मतलब ?”
“आप दोनों की उम्र एक ही है। दोनों चौबीस वर्ष के। शहजादा अकबर
औरंगजेब की चौथी सन्तान है और आप भी शिवाजी महाराज की चौथी सन्तति हैं।
उस शहजादे की माँ तो उसे जन्म देकर दो महीने के अन्दर ही अल्लाह को प्यारी
हो गयी, किन्तु आपकी माताजी भी आपके दो वर्ष के होने पर अचानक स्वर्ग
सिधार गयीं। इतना ही नहीं—कृपया क्षमा करें। साफ बोलूँ तो बुरा न मानें—
शहजादे ने अपने पिता से बगावत की है और आप अपने पिताजी से बगावत करके
दिलेरखान से जाकर मिल गये थे।”
इन समानताओं को सुनते हुए शम्भूराजा चकित रह गये। उनका बड़ा
मनोरंजन भी हुआ। राजा को प्रसन्नचित्त देखकर कविराज धीरे-से बोले—
“राजन, राज्यशास्त्र के कुछ अलिखित सन्देश होते हैं। आपके शत्रु की ओर
से आये हुए इतने अमूल्य मोहरे की उपेक्षा ठीक नहीं है। राजनीति के पटल पर ऐसे
प्यादे का उपयोग अवसर आने पर ठीक ढंग से हो सकता है।”
“कविराज, इस प्रसंग में हमारा उतावला होना, निश्चित रूप से लाभदायक
नहीं है। इस अकबर का स्वागत अपनी सीमा पर हमारे प्रतिनिधि ने क्यों किया?
पता है? क्योंकि शहजादे के साथ राजपूताने का एक भला व्यक्ति भी है।”
“दुर्गादास राठौड़,” कविराज ने कहा।
“बिलकुल ठीक, वहाँ के हिन्दू दुर्गादास को धर्मनिष्ठ और रीति-नीति का
प्रतीक मानते हैं। इसके अतिरिक्त एक और बात है जिसका आपको पता नहीं लग
सका।”
“किस बात का, राजन ?
“औरंगजेब अपने अन्य शहजादों को तलवार की नोंक पर नचाता है। तब भी
उसका सच्चा प्रेम अकबर से ही है। कारण यह है कि उसकी माँ दिलरास बानू
शाहंशाह की लाड़ली बेगम थी। कविराज यद्यपि कि औरंगजेब जैसे दुष्ट मनुष्य
पाषाण हृदय के होते हैं। इसी औरंगजेब ने काशी के विश्वेश्वर मन्दिर, मथुरा के
केशव मन्दिर और सोमनाथ मन्दिर जैसे हमारे देवालयों को ध्वस्त किया। किन्तु ऐसे
पाषाण हृदय मनुष्यों के भी दिल के कुछ कोने नाजुक और कमजोर होते हैं।”
“वही कह रहा हूँ राजन! अब आप अधिक ‘भवति न भवति’ न करके
शहजादे के पीछे खड़े हो जाइए।”
“वैसी जल्दी करना ठीक नहीं कविराज! शहजादे ने अपने पिता के साथ
विद्रोह किया है किन्तु भविष्य में ये बाप-बेटे परस्पर कैसा व्यवहार करेंगे? इसका
270 :: सम्भाजी

ठीक-ठीक अनुमान लगा लेना भी आवश्यक है। तब तक भट्ठी में जलते लोहे को
उँगलियों से उठाने की धृष्टता क्यों की जाए? अभी तो चिमटे का उपयोग करना ही
ठीक है।"
शहजादे के भिवंडी और कल्याण तक पहुँचने की खबर मिली। तब
शम्भूराजा ने शहजादे के साथ चल रही अपनी सेना को गुप्त आदेश भेजा कि खाड़ी
पार करने के बाद सुधागढ़ के पास शहजादे को रोका जाये।
एक सुबह शम्भूराजा ने हिरोजी फर्जन्द को बुलाया। उन्हें शहजादे अकबर
की यात्रा की यथोचित जानकारी देकर शम्भूराजा ने कहा, "अब आप शीघ्रता से
सुधागढ़ की ओर निकलिए, अपने उस लाड़ले शहजादे के स्वागत के लिए।
हिन्दवी स्वराज्य के वकील के रूप में हमने आपका चयन किया है। रत्नशाला में से
आवश्यक जवाहरात ले लीजिए। हिन्दवी स्वराज्य के प्रतिनिधि की शान के अनुरूप
शहजादे का स्वागत करें।"
फर्जन्द खुशी-खुशी बड़ी शीघ्रता से बाहर निकले। तब येसूबाई ने कहा,
"अच्छा महाराज आपने बड़े धैर्य से और बहुत सोच विचार कर इस शहजादे के
सम्बन्ध में निर्णय लिया है?"
"हाँ येसू, व्यर्थ के अति उत्साह का क्या काम? पागल भेड़ भेड़िये के पीछे
दौड़े जैसा बर्ताव राजा का नहीं होना चाहिए।
आठ
किसी का भाग्य कहाँ चमकेगा और कहाँ गोता खा जाएगा, कहा नहीं जा सकता।
कुछ लोग सोने का चम्मच मुँह में लेकर पैदा होते हैं तो कुछ लोग अपने परिश्रम से
या किसी आकस्मिक घटना से शाहंशाह बनते हैं। किन्तु जब कोई राजपुत्र के रूप में
जन्म लेता है और ऐन तरुणाई में भिखारी बन जाता है तब उसके दुख-दैन्य की कोई
सीमा नहीं रहती।
वह भी एक शहजादा था। दिल्ली के बादशाह का शहजादा। परियों जैसी
दासियों का मेला उसके संकेत की प्रतीक्षा में खड़ा रहता था। वे मदनिकाएँ,
वह विलास, सब कुछ चला गया। आज उसकी तकदीर उसे दक्षिण के पथरीले
जंगलों में खींच ले आयी थी, जहाँ वह जानवरों के तबेले जैसे एक बड़े घर में अपने
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दिन काट रहा था।
वह एक चौबीस वर्ष का तरुण था। एक मध्यम ऊँचाई का चुस्त दुरुस्त,
सुदर्शन शहजादा। अभी उसके गले में मोतियों की माला उसी तरह चमक रही थी।
दिल्ली के मीना बाजार में शाही दर्जी द्वारा किया गया उसका मखमली लिबास
अभी भी उसके शरीर पर था। किन्तु उसका मन भीतर ही भीतर रो रहा था। जो
औरंगजेब खजाने के हीरे जवाहरात खुले हाथ लुटाता था, उसी औरंगजेब का
लाड़ला शहजादा अकबर दक्षिण में पागलों की तरह भटक रहा था।
औरंगजेब के लाड़ले शहजादे के रूप में जब वह आरामदेह नरम बिस्तर में
लेटता था और पक्षियों की तरह अपनी आँखें धीरे-धीरे खोलता था तब उसके
आदेश की प्रतीक्षा में सैकड़ों सुन्दर दासियाँ खड़ी रहती थीं। उसके शरीर की
मालिश करने वाली पीली आँखों वाली कमनीय तिलोत्तमाएँ थीं। शहजादे के तैरने
के लिए स्वच्छ नीले पानी का सरोवर था। थोड़ी भी थकान या शिथिलता आने पर
उसका मन बहलाने के लिए मदमस्त लखनवी नृत्यांगनाएँ, स्वर्गीय संगीत की
लहरें, खुशमिज़ाज मसखरों और विदूषकों की हास्य की बहारें, वह सुख का स्वर्ग
कहाँ चला गया ?
औरंगजेब के दरबार में नृत्य-संगीत, गायन वादन आदि पर प्रतिबन्ध था।
किन्तु शहजादे अकबर के दीवानखाने और दिल में प्रवेश करने के रास्ते नृत्यांगनाएं
और उनके साजिन्दे खोज ही लेते थे। शहजादा आजम, मुअज्जम और कामबख्श
की अपेक्षा औरंगजेब को अकबर से अधिक प्रेम था। इसलिए भावी शहंशाह के रूप
में लोग उसी का अनुमान लगाते थे और उसी के अनुरूप उसका आदर करते थे।
बड़े-बड़े राजपूत, तुर्क, अफगान सरदार उसके आगे सिर झुकाते थे। शहजादे की
उम्र अभी लगभग दो महीने की ही रही होगी कि उसकी माँ दिल्लाराम बानू
अल्लाह को प्यारी हो गयी। अपनी लाडली बेगम के आकस्मिक निधन से बादशाह
बहुत दुखी हुआ। जिस प्रकार चिड़िया अपने घोंसले में लाड़-प्यार से बच्चे को
पालती है, उसी प्रकार औरंगजेब ने इस नवजात शिशु को हृदय से लगा लिया।
आज उसी शहजादे की सुबह एक अजीबोगरीब गाँव में भेड़-बकरियों की
'बेंऽऽ बेंऽऽ' की आवाजों के साथ हो रहा था। पहले वह अपनी गजदन्ती
खिड़कियों से मस्जिद की ऊँची मीनारें और राजमहल की भव्य मेहराबें देखा करता
था। परन्तु अब सुभाग पाली के परिसर में इस अपरिचित घने जंगल को देखते हुए
उसका मन कुछ विचित्र-सा हो रहा था। जब वह शहजादा अपने पिता के साथ
अभियान पर निकलता था तो उसकी और शाहंशाह की जनानियों का खेमा तीन
मील में फैला रहता था। किन्तु अब वह घास-फूस से बने एक घर में किसी प्रकार
दिन काट रहा था। उसमें घर के चारों ओर कूड़ा-करकट था और घर के भीतर
272 संभाजी

केलिको के पर्दे लगे थे। बैठने के लिए एक जाजिम था। शहजादा अकबर के साथ
उत्तर से चार सौ घोड़े, थोड़े से पैदल और ढाई सौ ऊँट आये थे। यह छोटा सा दल
दिल्ली के बादशाह के शहजादे को नहीं किसी गुमाई को ही शोभा दे सकता था।
इस परिसर ने शहजादे का मन खराब कर दिया था। जब वह पाली के पास
आया तब उसका स्वागत रिमझिम बरसात ने किया था। बरसात के रुकने पर झुके
हुए बादल उसे बेचैन कर देते थे। अनेक बार पड़ोसी के बच्चों की तरह बादल
उसके घर में घुस आते थे। पन्द्रह पन्द्रह दिन तक सूर्य के दर्शन ही नहीं होते थे।
कड़ाके की ठंड और तेज हवा थी। बिच्छू और साँप भी वहाँ थे। इन सब चीजों से
शहजादे का जीना हराम हो गया था। वहाँ रहते कुछ महीने बीत गये थे। शहजादे ने
संभाजी महाराज से निवेदन भी किया था। पत्र पर पत्र भेजे थे। परन्तु रायगढ़ से
मिलने वाले उदासीन प्रतिसाद से अकबर बहुत बेचैन हो गया।
आज शहजादे की स्थिति बहुत खराब हो गयी थी। उत्तर से साथ आये
दुर्गादास पर वह एकदम उखड़ गया—“दुर्गादास, यह न भूलिए कि मैं हिन्दुस्तान
का बादशाह हूँ। मैं उस संभाजी से बहुत असन्तुष्ट हूँ। अपना सारा काम छोड़कर
उसे मुझे सलाम करने के लिए भागते हुए यहाँ आना चाहिए था। अभी कल तक
सोच रहा था कि जब मैं दिल्ली का बादशाह बनूँगा तो दक्षिण की सूबेदारी शम्भू को
दूँगा। पर अब यह नहीं होगा। यदि आप सिफारिश करेंगे तो भी सम्भव नहीं है।"
बहुत देर से दुर्गादास अपनी हँसी रोकने का प्रयास कर रहे थे। शहजादा
अकबर ने कहा, "दुर्गादास, ऐसी बेअदबी आपको शोभा नहीं देती।"
शहजादे के रोष की चिन्ता न करते हुए दुर्गादास ने कहा, "यदि किसी के
पास तख्त, ताज, जमीन और प्रजा न हो तो नौटंकी के नकली बादशाह जितनी भी
उसकी इज्जत नहीं होती। शहजादे आज का यथार्थ क्या है? इसको समझना
आवश्यक है।"
"लेकिन वह दुष्ट संभाजी तो हमारी ओर ध्यान देने के लिए तैयार ही
नहीं है।"
"और कितना ध्यान दें? आपके स्वागत के लिए मराठी राज्य के वरिष्ठ
वकील और संभाजी के प्रतिनिधि के रूप में हिरोजी फर्जन्द स्वयं यहाँ आये थे।
हीरों जड़ा कंठहार, आपकी टोपी के लिए रत्न कलंगी और विविध प्रकार के
जवाहरातों का कितना मूल्यवान उपहार उन्होंने आपको भेंट किया। आपकी सुरक्षा
के लिए उन्होंने पाँच सौ सैनिकों की सेना दी है। एक राजा ने दूसरे राजा के साथ
राजा जैसा ही बर्ताव किया है। शहजादे, आपको और क्या चाहिए?"
शहजादा अकबर बिफर कर बोला, "आजकल मेरी इस फूटी तकदीर को
क्या हो गया है? यही नहीं समझ में आ रहा है।"
"शहजादे, दूसरों को दोष देने की जगह अपनी निष्क्रियता और विलासी
सम्भाजी :: 273

वृत्ति को दें। आपके गले में विजय की माला पहनाने के लिए 'विजयश्री' अजमेर के
पास राजपूताने की बालू में लगातार दस दिन तक खड़ी रही। किन्तु ऐन मौके पर
आप सुख की नींद सोते रहे। आपकी ढिलाई का फायदा उठाने में औरंगजेब
सचमुच आपका बाप निकला। इसमें किसका दोष है?"
अकबर बिना कुछ बोले उदास भाव से दुर्गादास की ओर देखता रहा। तब
दुर्गादास ने उससे पुनः कहा, "क्या बड़ा तो दम बड़ा। आज पूरे हिन्दुस्तान में
औरंगजेब जैसी प्रचंड शक्ति वाले बादशाह का तुम्हारे लिए मुकाबला करने वाला
शंभूराजा के अतिरिक्त कोई और साहसी नहीं है।"
दुर्गादास की बात शहजादे अकबर को ठीक लगी। शिवपुत्र संभाजी तरुण हैं।
युद्ध क्षेत्र में घुड़सवार सिपाही उस पर जान देते हैं। ये सारी बातें शहजादे की समझ
में आ गयीं। फिर भी शहजादे के मन के घोड़े किसी और दिशा में दौड़ रहे थे।
उन्होंने दुर्गादास को अपने पास बुलाया। उनके कान के समीप लगकर बोला-
"दुर्गादास थोड़ी और हिम्मत करें तो? हिरोजी फर्जन्द जैसे सम्भाजी के आदमी को
फोड़कर एक नयी फौज बनाने की कोशिश करें तो?"
शहजादे की उस निरर्थक कल्पना पर दुर्गादास को बहुत क्रोध आया। वे
कहने लगे- "शहजादे, इस प्रकार के व्यर्थ के विचारों को अपने मन में लाकर
पागल मत बनो। एक बात हमेशा ध्यान में रखो। मराठों के ये बलशाली किले और
फौलादी शक्ति वाले सम्भाजी के वफादार सरदार कभी भी फूटने वाले नहीं हैं।"
दुर्गादास की बात पर शहजादा जोर मे हँसा। वह कहने लगा- "मराठों के
दुर्ग और किले आसानी मे जीते नहीं जा सके, यह मैं मानता हूँ लेकिन वफादारी का
स्वाँग करने वाले मराठा सरदारों की वफादारी को प्रशंसा तो मेरे सामने नहीं ही
कीजिए। जब समय आएगा तब सारी बातें मैं खोलकर बताऊँगा।"
नौ
चिराग के मद्धिम प्रकाश में अण्णाजी दत्तो का तैलीय स्याह चेहरा उजला दिख रहा
था। उनकी तेज और बोलती आँखों में नया निखार आ गया था। पिछले दो महीने
से शम्भूराजा का डेरा पन्हालगढ़ पर पड़ा था। वहीं से वे राज्य का कार्यभार संभाल
रहे थे। आज राजधानी में अनुपस्थित रहना पन्त को आपत्तिजनक लग रहा था।
274 :: सम्भाजी

बगल में बैठे रांगड़े हिरोजी से अण्णाजी ने कहा, "हिरोजी, तू कुछ भी कह,
शिवाजी के जमाने में हम आठ प्रधानों का कोई स्थान था। आज वह सारा सम्मान
और दर्जा चला गया।"
"मारा कार्य भार सम्भाजी और येसूबाई के हाथ में चला गया है। दूसरे किसी
के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं रखा है।" सम्भाजी दत्तो ने कहा।
"भूल कर रहे हो सोमा जी। अरे यहाँ के नाटक का तीसरा पात्र तो
महाजालिम है। हमारे स्वराज्य की छाती पर सवार वह जनम-जनम का शाक्तपन्थी
पिशाच। उसे कैसे भूलते हो?" धोती से हवा करते हुए अण्णाजी ने कहा।
राहुजी सोमनाथ के बीच में ही हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, "इसका
मतलब यह कि पिछले पन्द्रह दिनों में पन्हालगढ़ पर जो घटनायें घटीं उसका
आपको पता नहीं है।"
"क्यों जी? क्या हो गया?" सबने एक साथ पूछा।
"वह हरसूल का कमबख्त सैफुद्दीन, मतलब अपना गंगाधर कुलकर्णी- "
"उसका क्या हुआ?" अण्णाजी भयभीत होकर पूछने लगे।
"वह सैफुद्दीन गंगाधर यहाँ गढ़ पर कुत्ते की तरह भटक रहा था और अन्त में
शम्भुराजा से जाकर मिला।" महाराज से कहने लगा—"'गरीब ब्राह्मण को फिर
हिन्दू धर्म में ले लीजिए।" राहुजी ने बताया।
"फिर राजा ने क्या कहा?"
"अण्णाजी वह तो हिन्दुओं के देवता बनने निकले हैं। बहुत बड़े धर्मवीर
बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा, "बजाजी निम्बालकर और नेताजी पालकर का यदि
शुद्धीकरण हो सकता है तो इस गरीब ब्राह्मण को क्यों सताते हो?"
अण्णाजी का चेहरा देखने लायक हो गया। सोमाजी ने तो अपने सिर की
पगड़ी उतार ली और क्रोध में चार-पाँच बार अपना सिर पीटा। उन्होंने कहा,
"शिव, शिव, शिव ! सुना आप लोगों ने ? गंगा के किनारे का यह भिखारी, पेशे से
पुरोहित और उसका ऐसा व्यवहार ? अब यह दुष्ट हमें धर्मशास्त्र और शुद्धीकरण का
मतलब समझाने निकला है ? इस तरह के पाप पूर्ण जीवन जीने से तो अच्छा है,
पहाड़ की चोटी से कूदकर आत्महत्या कर लेना।
सैफुद्दीन गंगाधर ने सोमाजी से वादा किया था कि यदि उसे पुनः हिन्दू धर्म में
ले लिया जाएगा तो वह अपने अधिकारी के चार एकड़ का नारियल का बाग
सोमाजी को सौंप देगा। यह एक प्रकार की रिश्वत थी। अण्णाजी की पीड़ा अलग
थी। डिचोली के मोरोदादा पर शम्भू महाराज ने अभियोग लगाया था। इसलिए
अण्णाजी चोरी से चलने वाले आर्थिक सम्बन्ध धोखे में आ गये थे। मोरोपन्त दादा
के हवाले से सावंतबाड़ी और पणजी में दिया गया उनका गुप्त धन लगभग डूब ही
सम्भाजी :: 275

गया था। राहुजी सोमनाथ के हाथ में पहले जमादारखाने की चाभियाँ रहा करती थीं।
किन्तु येसूबाई की कड़ी निगरानी में सबको रहना पड़ता था। समय बहुत कठिन था
और दिन हानिकारक थे।
हिम्मत बटोरकर राहुजी सोमनाथ ने कहा, "देखिए अण्णाजी, पिछले दो
तीन महीनों से शम्भूराजा गढ़ पर नहीं हैं। इस अवसर का लाभ उठाया जाना
चाहिए। सही समय पर शिकार कीजिए।"
बहुत देर से चुप बैठे हिरोजी फर्जन्द भी आगे आ गये।
"दूरदृष्टि की बात करें तो इस सम्भाजी को उसका पता तक नहीं है।"
"जाने दीजिए न इस विलासी और मनचले शम्भूराजा से क्या अपेक्षा रखते
हो?" राहुजी ने कहा।
"गोब्राह्मण के प्रतिपालक शिवाजी महाराज के चिरंजीव ही अधर्म मचाने
लगे हैं। शम्भूराजा को बचपन से ही दलितों के साथ खेलने कूदने की गन्दी आदत
थी। उस काजी मुल्ला हैदर को अनावश्यक महत्त्व क्यों देते हैं, उस केलशी के
मुसलमान याकूब बाबा को गुरु के रूप में क्यों मानते हैं? इधर उधर बच्चों को
इनाम देने का अधर्म क्यों करते हैं?"
"पन्त यह कुछ अधिक ही हो रहा है। ऐसा नहीं लगता क्या?" बीच में ही
जवान निम्बालकर ने कहा।
"मुल्ला हैदर को तो शिवाजी महाराज ने ही काजी बनाया था न? तुकाराम
और रामदास के साथ याकूब औलिया बाबा को स्वयं शिवाजी महाराज गुरु मानते थे
न? फिर यूँ ही बुद्धिभेद की यह भाषा आप जैसे बुजुर्ग द्वारा क्यों बोली जा रही
है?" सोमाजी को निलोपन्त पर बहुत क्रोध आया। वे गुराये थे-
"पिताजी के पुण्य के कारण महाराज ने आपको पेशवा बना दिया तो आप
बड़े बुद्धिमान हो गये? चिरंजीव निलोपन्त! बैठिए, नीचे बैठिये।"
अब अण्णाजी पन्त से रहा नहीं गया। शिखा टूटे या सिर इससे निश्चिन्त
होकर उन्होंने अपनी भड़ास निकालने लगे। वे बहुत क्रुद्ध थे। उनकी साँसों की
गति बढ़ गयी थी। दाँत पीसते हुए उन्होंने कहा, "भाइयो, इस राजा ने मेरी बेटी को
भ्रष्ट किया। उसकी जिन्दगी समाप्त कर दी। इसका हमें उतना दुख नहीं होता ऐसा
भी नहीं है कि मैं अपने स्वार्थ के लिए बोल रहा हूँ। पर इस शम्भूराजा के कारण
हमारा हिन्दू धर्म संकट में पड़ गया है और लगता है कि भविष्य में वह पूरी तरह
नष्ट हो जाएगा। इसी का मुझे अत्यधिक कष्ट है।"
सभी भी निगाहें अण्णाजी की ओर मुड़ीं। अपने को सँभालते हुए अण्णाजी
बोले, "गागा भट्ट ने अच्छे विधि विधान से राज्याभिषेक किया था फिर भी हमारे
शिवाजी महाराज ने दूसरे राज्याभिषेक के समय उस तान्त्रिक निश्चल गिरि को
276 :: सम्भाजी

बुलाया ही न? माफ कीजिए अन्नदाता के सम्बन्ध में बोलते समय जबान भारी हो
जाती है—पर हिन्दू धर्म की अस्तित्व रक्षा का प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है। बड़े
महाराज बस वही एक भूल हुई थी किन्तु उनके चिरंजीव ने तो उस गोड़ बंगाली
शाक्तपन्थी भड़भूजे को सिर पर चढ़ा रखा है। उसका महत्त्व दिनोंदिन इतना बढ़ने
लगा है कि वैदिक ब्राह्मण को भविष्य में यहाँ आश्रय ही नहीं मिल पाएगा।
अण्णाजी की बातों से दरबार का रुख ही बदल गया। निलोपन्त पेशवा
अत्यन्त चिन्तित होकर उनकी ओर देखने लगे। उनके कान क्रोध से लाल हो गये।
अण्णाजी ने गरजते हुए कहा, “कहो तो हम लिखकर देते हैं कि इस राजा
की वजह से हमारा धर्म और हमारे देवता संकटग्रस्त हैं क्यों निलोपन्त ? अण्णाजी
ने ऊँची आवाज में फिर कहा, “इस तरह मेरी ओर क्या देख रहे हो? यदि आपके
पिता मोरोपन्त इस समय यहाँ होते तो शान्त बैठे रहते?”
निलोपन्त को यह प्रश्न अच्छा नहीं लगा। वे क्रोध के आवेश में बोले—
“मुजूमदार अपने ही धर्मबन्धु हैं। उन्हें परधर्मियों ने डुबाया। अपने भाई
होकर वे न्याय के लिए ‘कलश’ के दरवाजे पर क्यों जाते हैं? इसमें तो आपकी
पराजय है।”
“क्यों जाता है ?”
“इसलिए कि आपकी दक्षिणा इतनी अधिक है। कपोलकल्पित पाप के
प्रक्षालन के मुकाबले इतनी अधिक है कि लोगों को धर्म की अपेक्षा मरना बेहतर
लगता है।”
“निलोबा, तुम बहुत अधिक बोल रहे हो।”
“झूठ तो नहीं बोल रहा हूँ न? राज्य के साढ़े तीन सौ किलों पर जो
कायस्थ, ब्राह्मण और मराठा अधिकारी थे और जो शिवाजी महाराज के समय से
चले आ रहे थे उनमें शम्भूराजा ने कोई बदलाव किया? उनके आसपास जैसे सेना में
मुसलमान हैं, वैसे प्रशासन में ब्राह्मण हैं, किले पर प्रभु हैं, वतनदसि में पहले की
तरह बन्दी हैं। महाराज से केवल एक ही भूल हुई है।” निलोपन्त सभी की ओर
अपनी दृष्टि घुमाते हुए बोले, “राजद्रोह जैसे भयानक गुनाह करने पर भी राजा ने
आप पर दया दिखाई, फिर से पद पर आसीन किया। आपको प्रतिष्ठा दी। यही
उनका दोष है।”
किसी की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बिना निलोपन्त वहाँ से उठ कर चले
गये। उनके चले जाने से अण्णाजी ने राहत महसूस की। उन्होंने अपने लम्बे गमछे
से गंजे सिर पर पड़े धर्म के छींटों को पोंछ डाला।
शम्भूराजा जब से सिंहासनारूढ़ हुए तभी से हिरोजी के मन में एक चिन्ता घर
कर गयी थी। राहुजी सोमनाथ फर्जन्द ने उनसे बहुत पहले कहा था—‘‘हिरोजी।
सम्भाजी 277

आप जारज सन्तान हैं फिर भी आपके शरीर में भोसलों का रक्त है। आपकी स्थिति
विदुर की है।'' इसी तरह के अनेक ताने देकर सोमनाथ ने हिरोजी के मन में
विषारोपण कर दिया था। अपने वंशजों का जारज की सन्तान कहा जाएगा और मुझे
स्वयं में भी राजगद्दी मिलने की आशा नहीं है। ऐसे विचारों के कारण हिरोजी के मन
में शम्भूराजा के प्रति कटुता और तिरस्कार की भावना निर्मित हो गयी थी।
"एक बार फैसला हो जाना चाहिए-" ऐसा कहकर हिरोजी क्रोधावेश में आ
गये। उन्होंने अण्णाजी से कहा, "स्वयं राजगद्दी प्राप्त करने के लिए जो पिता की
मृत्यु की कामना करता है। गद्दी के लिए जो कलशाभिषेक जैसा राक्षसी अनुष्ठान
करता है, ऐसे शम्भूराजा से न्याय और नीति की अपेक्षा क्यों की जाये? अण्णाजी
आप बिलकुल चिन्ता न करें। मैं आपके पीछे खड़ा हूँ।"
"वाह हिरोजी लाख रुपये की बात कही। अण्णाजी विजयी मुद्रा में चारों
ओर देखने लगे। अचानक कुछ स्मरण करके अण्णाजी दत्तो ने हिरोजी से पूछा-
"अरे फर्जन्द जी, उस शहजादे के स्वागत के लिए सम्भाजी ने आपको भेजा
था। पानी के साथ लकड़ी भी सड़ जाती है। इतने दिनों के साहचर्य में आपको कम
से कम शहजादे को तो अपनी ओर कर लेना था।
फर्जन्द ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा, "उसकी बात छोड़िए। उसको तो
मैंने इतना प्रसन्न कर लिया है कि चुटकी बजाते ही वह पाली मे दौड़कर रायगढ़
आ जाएगा, हमारे लिए।"
फर्जन्द की इस बात मे अण्णाजी गम्भीर हो गये। उनकी आँखों में प्रतिशोध
का भाव झलकने लगा। उनके चहरे का रंग बदल गया। अपने कान की बाली को
खींचते हुए उन्होंने प्रश्न किया- "हिरोजी क्या तुम विश्वास के साथ कह सकते
हो कि शहजादा हमारी बात सुनेगा?
"बिलकुल, चिन्ता क्यों करते हैं? आप बस निर्णय लीजिए, वह भी जल्दी
से।" हिरोजी की बात सुनकर अण्णाजी भाव विह्वल हो गये। उन्होंने अपने दाँतों
और ओठों को चबाते हुए कहा, "हिरोजी आपकी बात बिलकुल सच है। शहजादा
अगर हाँ कहता है तो अब हम क्यों रुकें? जिसने हमारी जीवन भर की कमाई छीन
ली, हमेशा हमें भ्रष्ट और चोर सिद्ध करने की कोशिश की, अपनी रानी को हीरे-
जवाहरात के साज-शृंगार के बदले हमारे हिसाब में ताक झाँक करने के लिए बिठा
दिया, दान-धर्म छोड़कर एक स्त्री को हमारे सिर पर बिठाकर हमें अपमानित किया,
हमारी बेटी की इज्जत लूटी, हमें कैदी बनाकर पन्हाला से रायगढ़ तक हमारी
छीछालेदर की। ऐसे घमंडी हृदयहीन, अविचारी, अन्यायी युवराज को भगाने का
अवसर आ रहा है और उसके लिए अकबर भगवान का दूत बनकर यहाँ आया है तो
हम कहते हैं कि ऐसा सुनहग अवसर हम क्यों छोड़ें?"
278 · सम्भाजी

केवल उस कल्पना से ही अण्णाजी को बड़ी राहत मिल रही थी। "परन्तु
अण्णाजी यह सब होगा कैसे ?" हिरोजी आगे सरक आये। पन्त के कान के पास
जाकर बोले, "फिर से पहले जैसा खेल खेलेंगे। सम्भाजी को जेल भेजेंगे और उस
बच्चे राजाराम को गद्दी पर बिठायेंगे।"
सारी बात अच्छी तरह निश्चित हो गयी। आखिर शहजादा अकबर कोई
ऐरा-गैरा आदमी था। वह बादशाह का बेटा था। आज नहीं तो कल वह दिल्ली की
गद्दी पर बैठेगा ही। उसकी सहायता से सम्भाजी को हटाने का निर्णय लिया गया।
बात चीत के दौरान अण्णाजी का चेहरा क्रोध से तमतमा गया। उन्होंने कहा-
"अब स्वराज्य में देवताओं और ब्राह्मणों के दिन नहीं रहे। इन शाक्तपन्थियों
ने यहाँ का सारा वातावरण भ्रष्ट कर दिया है। मदिरापान, मांसभक्षण। छी. छी.
जितना कहा जाये कम ही होगा। वह शम्भूराजा का मित्र है इसलिए हम उसे
कितना सहें ? उसके लिए यहाँ रायगढ़ में नये महल की व्यवस्था, वहाँ गोवा के
पास डिचोली में अपने साथ साथ इस लफंगे के लिए फिरंगियों से नया महल
खरीद लिया। और अब उस मलकापुर में अपने साथ ही उसका महल बनना शुरू
है। अरे मैं कहता हूँ, कौन है यह टिक्कोजी राव ? न अपनी जाति का न धर्म का ?
फर्जन्द गणेश की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, इस अमंगलमय वातावरण में हमारी
जीने तक की इच्छा नहीं होती।"
हिरोजी ने अण्णाजी को स्मरण दिलाते हुए कहा, "जितना भी सत्यानाश
होना है एक बार हो जाने दीजिए। परन्तु पिछली बार की तरह हमें राजद्रोही ठहराने
की नौबत न आए।"
फर्जन्द की बात पर अण्णाजी बहुत क्रुद्ध हुए। वे गर्म सीसे की तरह तड़कते
हुए बोले, "राजद्रोह शब्द का अर्थ कौन और किस तरह सिखाएगा ? यह सम्भाजी
जो दिलेर खान के पास भाग गया था और जिसने शिवाजी जैसे पिता की आँख से
आँसू गिराये-वह कुलकलंक ?"
रात बीतती जा रही थी। बाहर तेज हवा चल रही थी। चिरागों में दो-दो बार
तेल डाला गया। फिर भी बात समाप्त नहीं हो रही थी। ईश्वर को साक्षी मानकर
सौगन्धें ली गयीं। बीच में किसी ने सोयराबाई के अपने पक्ष में आने के प्रति आशंका
व्यक्त की। इस पर अण्णाजी ने धोती फटकारते हुए कहा, "यूँ ही किसी स्त्री को
राजमाता का पद मिल रहा हो तो उसे बुरा लगेगा ? और सोयराबाई के सम्बन्ध में तो
कहना ही क्या है ?"
कुएँ के तल से निकलती हुई सी राहुजी सोमनाथ की आवाज आयी-
"लेकिन बालोबा चिटणीस का क्या है ?"
इस नये प्रश्न से अण्णाजी का खिला हुआ चेहरा एकदम उदास हो गया।
सभी लोग घबराये हुए एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
सम्भाजी : 279

सोमाजी दत्तो ने कहा, "वह बालाजी चिटणीस सम्भाजी का पक्का पक्षधर
है। परन्तु इस नयी योजना में यश प्राप्ति की सम्भावना है तो चिटणीस को अपने पक्ष
में किये बिना कोई उपाय नहीं है।"
राजा के सेनापति की अनुपस्थिति में युद्ध करने का निर्णय पक्का किया गया
था। किन्तु चिटणीस का बीच में आना धोखादायक था। हिरोजी ने कहा, "मेरी
सुनिए, यह चिटणीस मर जाएगा लेकिन हमारे साथ नहीं आएगा।
"उसकी जाति कौन-सी है? आप लोगों को पता है?" फर्जन्द ने प्रश्न
किया।
"यहाँ जाति का क्या सम्बन्ध है?"
"अरे, वही तो महत्त्वपूर्ण है। शिवाजी के जमाने से प्रत्येक किले के
अधिकारी का पद 'प्रभु' लोगों को ही मिलता रहा है। वे सभी बालाजी का बड़ा
सम्मान करते हैं। बालाजी को हाथ लगाया तो किले के प्रभु लोग आपके पीछे पड़
जाएँगे। इसीलिए मैं कहता हूँ कि थोड़ी शान्ति से काम लीजिए। थोड़े प्रेम से, थोड़ी
मिठास से उस चिटणीस को अपने क़ब्ज़े में कीजिए।"
फर्जन्द की वह सलाह सुनकर अण्णाजी होश में आये। वे प्रसन्न होकर
बोले, "हिरोजी सच कह रहे हो। कुछ भी करके बालाजी को हमें अपनी ओर
करना है। उसी के हस्ताक्षर से शहजादा अकबर को पत्र लिखेंगे। सभी मिलकर
औरंगजेब के बेटे के पास जाएँगे और उसके पैरों पर नाक रगड़कर कहेंगे- 'बाबा
रे एक बार हामी भर दो। परन्तु जब राज्यक्रान्ति सफल हो जाएगी, तब हम सबके
भाग्य खुलेंगे।" बोलते-बोलते अण्णाजी की आँखें भर आयीं।
दस
पुण्य मनुष्य को एक बार आलसी बना सकता है किन्तु पाप उसे किसी भी समय
सोने नहीं देता। आधी रात बीते एक घंटा हो चुका था, किन्तु राज्य कर्मचारियों की
आँखों में नींद का नाम नहीं था। वे साहस करके उठे और साहस करके पीछे की
ओर चिटणीस के घर की ओर चले गये, दूर कहीं पर एक कुत्ता रो रहा था।
आकाश में बादल छाये थे। इसलिए एक भी तारा दिखाई नहीं पड़ रहा था। रक्षकों
280 : सम्भाजी

के जोर से आवाज देने पर बालाजी चिटणीस चौंककर उठे। आँख मलते-मलते
बाहर के दरवाजे तक आए।
आँखों पर जोर देकर बालाजी पन्त ने अविश्वासपूर्वक सामने देखा। चिराग के
उजाले में कारभारियों का चेहरा साफ नजर आ रहा था। वे सभी तुलसी वृन्दावन के
पास ऐसे खड़े थे जैसे उनके पैर काँटों पर हों। चिटणीस की ओर देखकर अण्णाजी
पन्त ने सूचित किया कि सोयराबाई ने उन्हें तत्काल बुलाया है।
चिटणीस ने जल्दी-जल्दी जूते पहने। उन्होंने सोचा पन्हालगढ़ से राजा का
कोई सन्देशा आया होगा। कोई-न-कोई आवश्यक कार्य अवश्य होगा। अन्यथा ये
प्रधान लोग आधी रात को क्यों आते? चिटणिस ने कपड़े पहने। इसी बीच सोये हुए
आवजी को भी अण्णाजी ने जगा लिया था। उन पिता-पुत्र को साथ लेकर सभी
लोग शीघ्रता से महल के बाहर निकले। इन अधिकारी कर्मचारियों को इतनी रात
गये दरवाजे पर देखकर पहरेदार डर गये। उनकी किसी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये
बिना अण्णाजी ने उन्हें डाँटा—
"ऐसे क्यों देख रहे हो? जाकर रानी साहब को उठाओ। उनसे कहो कि
आपके आदेशानुसार सभी लोग आये हैं।
सोयराबाई थोड़ी ही देर में बाहर आ गयीं। चिराग के प्रकाश मे उन्होने
कर्मचारियों को देखा, बालाजी आवजी को भी ध्यान से देखा। दृश्य अविश्वसनीय
था पर सच था। अण्णाजी दत्तो के चेहरे पर विजय का उन्माद छिप नहीं पा रहा था।
सोयराबाई ने इस समझा। जब सभी पहरेदार और परिचारक बाहर चले गये तब
उन्होंने दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया। मुँह का पसीना आँचल से पोंछते हुए बैठ
गयीं।
सोयराबाई ने एक बार पुनः सभी की ओर ध्यान से देखा और शीघ्रता से पूछा,
"पन्त, इस बार तो आप सब एक मत होकर आये हैं न?"
"महारानी, आप अब रायगढ़ की राजमाता होने वाली हैं। इस तरह डरने से
कैसे चलेगा?" अण्णाजी ने शिकायत करना आरम्भ किया—"क्या कहें रानी
साहब शिवाजी महाराज जैसे प्रतापी राजा के साथ हमने काम किया है। पर
आजकल यहाँ राजधानी में इतनी गड़बड़ी मची हुई है कि क्या कहें? बहुत सह
लिया। बहुत हो चुका। इसीलिए आपसे प्रार्थना है कि इस राज्य को आप बचा लें।
राजाराम साहब को फिर से गद्दी पर बिठाएँ।"
"पन्त जरा धीरे बोलिए।"
"जाने दीजिए, हम किसी से डरते नहीं। जो भी होना है हो जाये।"
अण्णाजी बहुत आवेश में आ गये थे।
आँखों के सामने यह सब घटित होते देखकर बालाजी चिटणीस का सारा
शरीर पानी-पानी हो गया। आवजी भी घबराकर अपने पिता की ओर टकटकी
सम्भाजी :: 281

लगाकर देखने लगे। उनकी अवस्था ऐसी हो गयी थी जैसे पंछी शिकारी के हाथ आ
गया हो। शेष सभी का विचार दृढ़ था। अण्णाजी के इस प्रस्ताव से सोयराबाई
प्रसन्न थीं। कुछ विमुग्ध भी हो गयीं थीं। उनका कंठावरोध हो गया था। उन्होंने
कहा, "आज हृदय को शान्ति मिली। क्या कहूँ? मुझे एक सामान्य गुलाम की तरह
जीना पड़ रहा है। मुझे जीजामाता जैसी कठोर स्वभाव की सास मिली थीं। लेकिन
उन्होंने भी कभी मुझे नीचा नहीं दिखाया। कल की छोरी इस येसूबाई के ठाट तो
देखो। 'श्री सखी रानी जयन्ती ऐसी मुहर बनवायी हैं।' बुजुर्गों पर हुक्म चलाती हैं
निस पर हमारे ये शम्भूराजा स्वयं को बाघ का बच्चा कहलाते हैं और बर्ताव स्त्री की
तरह करते हैं। नहीं-नहीं इस जीने से तो मर जाना ही अच्छा है। मेरे सगे भाई
हंबीरराव भी शत्रु से मिले हैं। अपनी तकदीर को हम क्या कहें?"
सोयराबाई की यह अवस्था अण्णाजी से देखी न गयी। वे हाथ जोड़कर
बोले, "रानी साहब यहाँ का अत्याचर अब सहा नहीं जाता। यहाँ शिवाजी महाराज
की दुर्दशा हो जाये और वहाँ निरंकुश अविवेकी राजा अपना हुक्म चलाकर राज्य को
नष्ट कर दे। वहाँ कन्नौज का एक नालायक मान्त्रिक 'कलाश' कुछ मन्त्र फूँके और
मन्त्रों के बल पर सारे दरबार पर जादू-टोना करता रहे। यह अब सहा नहीं जाता।"
"आपको क्या करना है, पन्त?" उत्तर मालूम होने पर भी सोयराबाई ने प्रश्न
किया।
"रानी साहिबा, अभी समय बीता नहीं है। अभी भी हम हारी हुई लड़ाई को
फिर से जीत सकते हैं।" अण्णाजी ने कहा।
"किसकी सहायता से?"
"शहजादा अकबर नाम का एक बड़ा जादूगर आया है न, अपने राज्य में।
वह किसी सामान्य जमींदार का बेटा नहीं है। वह पृथ्वीपति औरंगजेब का बेटा है।
यह अच्छा अवसर है। सम्भाजी वहाँ दूर पन्हालगढ़ पर अपने कामकाज में अटके
हैं। तब तक हम अपना काम निपटा लेंगे।" अण्णाजी ने स्पष्ट किया।
"भगवान अपने पीछे खड़े हैं। किन्तु पिछली बार की तरह इस बार नहीं
होना चाहिए। इस कान की खबर उस कान को नहीं होनी चाहिए।"
"महारानी आप चिन्ता न करें। ग्रह अच्छे हैं।" अण्णाजी ने कहा, "देखिए
न इस बालाजी का विचार भी अपने जैसा ही है। ये अपने पुत्र को भी साथ लेकर
आये हैं।"
सोयराबाई ने एक बार पुनः अविश्वास की दृष्टि से देखा। उन्होंने पूछा-
"क्यों चिटणीस जी, बहुत देर से आप कुछ बोल नहीं रहे हैं?"
जैसे किसी भेड़िये की दृष्टि खरगोशों के झुंड पर पड़ जाये और खरगोशों के
प्राण उनकी आँखों में उतर आयें और वे कातर दृष्टि से देखने लगें वही स्थिति
पिता-पुत्र की हुई। सभी की नजरें उन्हें चीरने लगीं। उनके गले सूख गये।
282 :. सम्भाजी

चिटणीस घबराकर बोले—
"आपकी आज्ञा सिर आँखों पर, रानी साहब।"
"देख लीजिए चिटणीस। आप और शम्भुराजा में बहुत मेल है। आपके बच्चे
उन्हीं के महल में पड़े रहते हैं। वह येसू आपके खंडो और निलो को अपने पुत्र की
तरह मानती हैं।"
"पर रानी साहब पहले का समय अब नहीं रहा।"
राहुजी सोमनाथ बीच में ही बोल पडे—
"वह कैसे?"
"महाड का वह हरामजादा दादजी रघुनाथ देशपांडे पन्हाला में जाकर बैठा
है। उसे शम्भुराजा से चिटणीस पद चाहिए।"
"क्या करते हो? बालाजी को निकालकर?" सोयराबाई ने कहा।
"जी हाँ। दादजी कलश का मित्र है।" राहुजी ने कहा।
पहले तो पिता पुत्र लोगों की गहरी नजर से दब गये थे। उसमें अब एक
और जानकारी मिल रही थी। इस प्रकार बहाना करके उन्होने अपना पक्ष रख दिया।
परन्तु सोयराबाई को उन पर भरोसा नहीं था। बालाजी ने पुनः कहा, "पन्हाला मे
महाराज को कैद करने का पत्र हमारे आवजी ने लिखा था। तभी से हम उनके कोप
भाजन बन गये। आपकी सूचना सही हमारा यह चिटणीस पद कितने दिन टिकेगा?
भगवान ही जाने।"
बालाजी चिटणीस आँखे फाडकर देखने लगे। उन्होंने लम्बी साँस लेकर
कहा, "शम्भुराजा के साथ हमारी मैत्री हमारा भूतकाल है। पर आजकल राजा का
बर्ताव कुछ ठीक नहीं है। उनकी अपेक्षा हमारे रायराम साहब ही क्या बुरे हैं?"
सोयराबाई और अण्णाजी दत्तों के साथ सभी लोग चिटणीस की ओर
प्रसन्नता से देखा।
ग्यारह
पन्हालगढ़ की हवा बडी आनन्ददायक थी किन्तु उतनी ही भयानक भी। सवेरे
सवेरे कवि कलश ने शम्भूराजा का अभिवादन किया। राजा ने मुड़कर कवि कलश
की ओर देखा। उनकी मुद्रा बहुत डरावनी लग रही थी। उनके चेहरे पर स्पष्ट दिख
रही थी कि कोई न कोई भयानक घटना अवश्य घटी है।
सम्भाजी 283

कवि कलश को अधिक प्रतीक्षा न करवाकर सम्भाजी ने सीधा प्रश्न किया—
"कविराज, यदि कोई सामान्य कर्मचारी या लेखक राजद्रोह का अपराध करे
तो धर्मशास्त्र के अनुसार उसे क्या दंड मिलना चाहिए?"
"राजन, ऐसे गुनाह के लिए देहान्त प्रायश्चित के अतिरिक्त दूसरा कोई दंड
धर्मशास्त्र में नहीं है।"
"और यदि यह अपराध किसी प्रधान या मन्त्री ने किया हो तो?" राजा ने
कविराज की ओर घूरते हुए देखा।
शम्भुराजा के दूसरे प्रश्न से कविराज एकदम चौंक गये।
धर्मशास्त्र के जटिल नियमों को बताते हुए उन्होंने कहा—
"कोई गरीब सेवक थोड़े से लोभ के कारण दुर्भाग्यवश ऐसे अपराध में फँस
सकता है। राजा के विवेक के कारण ऐसा व्यक्ति दया का पात्र भी हो सकता है।
किन्तु शत्रु के साथ मैत्री करने वाला व्यक्ति बहुत घातक होता है। शत्रु से हाथ
मिलाने वाला व्यक्ति प्रधानमन्त्री या उनके स्तर का अधिकारी हो तो यह भयानक
दायित्वहीनता होती है। ऐसे व्यक्ति की यदि राजा ने कठोर से कठोर दंड न दिया
तो राजा और खेत में खड़े किए गये बिजूका में कोई अन्तर ही नहीं रहेगा।"
अपने द्वारा दिये गये उत्तर से कविराज स्वयं चौंक गये। किन्तु शम्भुराजा
उनसे नाराज नहीं हुए। उन्हें झेंप आ रही थी। वे दुविधा में पड़ गये कि अगला प्रश्न
पूछें या न पूछें? फिर भी उन्होंने पूछा—
"मान लीजिए बाल-बच्चों का विचार करके किसी प्रधान को इस प्रकार के
अपराध के लिए एक बार क्षमा कर दिया, फिर भी उसी प्रधान ने इसी प्रकार के
अपराध की पुनरावृत्ति की तो?"
"तो- ? राजा यदि इस प्रकार रोज क्षमादान की मिठाई बाँटता रहेगा तो उस
राजा को राज्य का कार्य भार छोड़कर पशुओं को सँभालना अधिक अच्छा होगा।"
राजा से बात करते-करते कविराज सावधान हुए। पीछे शीशे के खम्भे के
समीप एक ऊँचे कद का गजपूत खड़ा था। उसकी छँटी हुई दाढ़ी और महीन
जालीदार कुर्ता-उसके व्यक्तित्व को अलग गरिमा प्रदान कर रहे थे। कविराज से
उसका परिचय कराते हुए शम्भुराजा ने कहा—
"यह गौरव सिंह हैं।"
"कहाँ से आये?"
"पाली के जंगल से। शहजादा अकबर और दुर्गादास राठौड़ ने विशेष रूप से
इन्हें यहाँ भेजा है।"
कविकलग्र आगे के आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहे। उसी समय शम्भुराजा ने
ग्लानिग्रस्त स्वर में कहा—
284 :: सम्भाजी

"कविराज, बहुत-बहुत विपरीत घट चुका है। एक बार नहीं अनेक बार ऐसा
हो चुका है।"
"स्वामी के भोजन के साथ मछली में विष मिलाने की वह घटना?"
"हाँ कविराज ! छोटे बच्चे सचमुच ईश्वर के स्वरूप होते हैं। उन्हें न स्वार्थ
होता है न किसी चीज की इच्छा। विष डाले हुए उस मछली के टुकड़े का मैं जैसे
मुँह के पास ले गया वैसे ही रसोईघर में एक छोटी-सी बच्ची बड़े जोर से चीखी।
उस पर किसी का गहरा दबाव था। उसने स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं। किन्तु
उसकी घबराहट और हड़बड़ी से मुझे जो समझना था मैं समझ गया। मैंने मछली के
टुकड़े कुत्ते के सामने फेंक दिये। कुछ ही क्षणों में वह बेचारा कुत्ता तड़पते हुए मर
गया।"
"मेरे विचार से विष का षड्यन्त्र रचने वाले सामान्य सैनिक ही रहे होंगे ?"
कविराज ने कहा।
"सामान्य आदमी का लोभ होता कितना है, कविराज ? राजा की मृत्यु मे
उन्हें क्या लेना देना?" शम्भूराजा ने मुस्कराते हुए कहा।
"मतलब यह राज्य के अधिकारियों का ही षड्यन्त्र था?"
"बिल्कुल, यह घटना यहाँ पन्हाला पर घटी किन्तु इसके सूत्रधार रायगढ के
ही थे। कविराज इस सारी घटना का स्मरण करके मेरा मन एक अन्य कारण से
सन्तप्त होता है। हमने मनुष्य जाति की बेईमानी को सिद्ध करने के लिए अपने
वफादार कुत्ते की जान ले ली, कविराज।"
शम्भूराजा ने अकबर द्वारा भेजा गया पत्र कविराज को दिया। कविराज की
आँखें उस पत्र के अक्षरों पर घूमने लगीं। कविराज ने पास रखी सुराही से पानी
पिया। पत्र का विषय ही पसीना छुड़ाने वाला था। उस पर महारानी सोयराबाई,
हिरोजी फर्जन्द, बालाजी, आवजी चिटणीस और अण्णाजी दत्तो के हस्ताक्षर थे।
कवि कलश बार बार पत्र को आँख फाड़ फाड़कर देख रहे थे।
बादशाह ए हिन्दुस्तान अकबर साहेब।
आपकी कीर्ति बहुत सुनी है। उससे हम कृतार्थ हो गये हैं। हमारे हिरोजी
फर्जन्द बाबा से पेड़से में आपकी भेंट हो चुकी है। उस समय मशारनिल्हे ने आपसे
हमारी बात का संकेत किया था। किसी समय हम शिवाजी महाराज के वफादार
सेवक थे। आज हम चींटी जैसी जिन्दगी जी रहे हैं। सूरज की गोद में जिस तरह
शनिश्चर उसी तरह शिवाजी की गोद में संभाजी। इस उद्दंड, तामसी, बदमिजाज
व्यक्ति ने हमारे जैसे एकनिष्ठ सेवकों के प्राण संकट में डाल दिये हैं। हमारे
अनुभवहीन राजा की छाया में कन्नौज का वह पापी कलश यहाँ रहता है। उस
शाक्त मूर्ख मान्त्रिक ने हम सभी को नरक के द्वार पर धकेल दिया है। यदि आप मन
सम्भाजी :: 285

से चाहेंगे तो इन दोनों को अवश्य नष्ट कर देंगे।
इस समय तो आप इस दुष्ट राजा को जीवित पकड़ें या उसकी हत्या करें, पर
हमें मुक्ति दिलाएँ। उसके बदले में हम अपना आधा राज्य आपके कदमों में सौंपने
को तैयार हैं। अन्त में हम यही चाहते हैं कि बालक राजाराम, महारानी सोयराबाई
और हम कर्मचारियों को अपनी जगह तथा गरीब ब्राह्मणों एवं नेक मराठों को अपनी
पूर्व सम्पदा के साथ उनका वतन वापस मिल जाये। हे दिल्लीपति! कुछ भी करके
हमारे इस संकटकाल में दौड़कर आइए। सम्भाजी की कैद से हमें बचाइए। बाकी
देन-लेन की बात बाद में मिलने पर निश्चित करेंगे।
कवि कलश ने एक साँस में उस पत्र को दो बार पढ़ लिया और आगे के
आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। राजा ने कहा—
"उस शहजादे को सुबुद्धि आयी तभी तो यह गुप्त पत्र हमारे पास तक
आ सका।"
"ये षड्यन्त्रकारी हैं कहाँ? कहीं भाग तो नहीं गये?'' कविराज ने चिन्ता
प्रकट की।
"नहीं, नहीं, शहजादे ने उनसे मीठी मीठी बातें करके उन्हें सुधागढ़ के
महल में रोक रखा है।"
"और सोयराबाई कहाँ है? महारानी?"
"वे रायगढ़ पर ही रुकी हैं। यदि यह योजना असफल हो गयी तो अपने को
निर्दोष सिद्ध करने के लिए कहेंगी इसमें उनका कोई हाथ नहीं है।"
शम्भूराजा के सिर में पीड़ा उठ गयी थी। राज्य में ऐसी कोई घटना नहीं घटी
थी कि कर्मचारी इस प्रकार प्राण के भूखे हो जाएँ, इतनी भयंकर योजना बनाएँ।
पिछले वर्ष सम्भाजी ने राज्य का कार्यभार बहुत अच्छी तरह सँभाला था।
कर्मचारियों के अपराधों को क्षमा करके उन्हें उनके पद वापस दे दिये थे। क्रोध से
अपनी मुट्ठी बगल के खम्भे पर मारते हुए शम्भूराजा ने कहा—
"कविराज देखिए! आँखें फाड़कर देखिए। हस्ताक्षर पहचाना? बताइए! इस
पत्र पर किसके हस्ताक्षर हैं?"
"चिटणीस का हस्ताक्षर है।" कविराज का हाथ काँप गया।
"देखा कविराज यह योजना कितनी बड़ी है? चिटणीस जैसा बुद्धिमान और
हमारा परमप्रिय व्यक्ति भी इस भयंकर योजना में सम्मिलित है। इसका क्या
मतलब? यह हवा का झोंका नहीं तूफान है। इसे समय पर नियन्त्रित नहीं किया
गया तो हम स्वयं पत्तों की तरह उड़ जाएँगे, कविराज!"
"अब पन्हालगढ़ पर अधिक समय रुकना व्यर्थ है। उसी रात को वहाँ से
निकलना निश्चित किया गया। लम्बी दौड़ लगाकर संभाजी और कवि कलश
286 :: सम्भाजी

सुधागढ़ की दूसरी ओर पहुँचे। दो दिन की यात्रा करके उनके घोड़े घोडसे के क्षेत्र
में पहुँच गये। वह भाद्रपद पूर्णिमा से पहले का दिन था। आसमान में तारे जगमगा
रहे थे। हल्की हवा में सागौन पत्तों से संगीत मुखर हो रहा था। शम्भूराजा की दृष्टि
सुधागढ़ की ओर गयी। वहीं पर राजद्रोहियों को रोका गया था, ऐसा उन्हें बताया
गया था।
घोडसा में अन्दर की ओर एक बड़े घर में शहजादा अकबर ठहरा हुआ था।
शम्भूराजा घोड़े पर से कूद गये। उसी समय एक चिराग की रोशनी के साथ शहजादा
और दुर्गादास राठौड़ शम्भूराजा के सामने आ गये। दोनों राजा से गले मिले। उनका
हाथ पकड़कर राजा ने भावुक होकर कहा, "शहजादे और दुर्गादासजी आपके
उपकार मैं कम से-कम इस जन्म में तो नहीं भूलूँगा।"
"सम्भाजी महाराज आपके पिता का—शिवाजी महाराज का यह राज्य
वस्तुतः सभी धर्मावलम्बियों के लिए अपना देव मन्दिर है। इसलिए यह राजस्थानी
दुर्गादाम एक मुसलमान शहजादे को लेकर आश्रय के लिए आया है।'' दुर्गादाम ने
कहा।
"परन्तु अपनी भेंट का यह समय कितना दुर्भाग्यपूर्ण है?" लम्बी साँस
लेकर सम्भाजी ने कहा, "दुर्गादास, राजस्थान और दिल्ली मे कितनी बड़ी आशा
लेकर आप यहाँ मराठों के आश्रय में आये हैं। किन्तु उसी ममय हमारे राज्य के
अच्छे अष्ट प्रधान अपने राजा से गद्दारी करके आपके सामने सहायता के लिए घुटने
टेक रहे हैं। कितनी शर्म की बात है?"
उसी जंगल में दो-तीन दरियाँ बिछाकर बैठक तैयार की गयी। दो दिनों की
यात्रा से शम्भूराजा बहुत थक गये थे। सैनिकों ने उनके हाथ में नारियल का पानी
दिया। राजा का ध्यान कहीं और था। वे बार बार सिर उठाकर सुधागढ़ की ओर
देख रहे थे। अब चन्द्रमा आसमान के बीचोंबीच आ गया था। शम्भूराजा की बेचैनी
देखकर शहजादा अकबर ने कहा, "महाराज आप चिन्ता न करें। हमने आपके
गद्दार कर्मचारियों को ऊपर गढ़ पर इतनी अच्छी तरह रखा है कि वे जान ही नहीं
पाएँगे कि तीर कहाँ है और सिर कहाँ?"
परन्तु राजा फिर भी चिन्तित थे। उन्होंने उन दोनों से धीमी आवाज में कहा,
"सुबह होने की प्रतीक्षा न करो। आधी रात को ही किसी को गढ़ पर भेज दीजिए।
उनसे मीठी बातें करके सवेरा होने से पहले ही यहाँ नीचे ले आइए।"
"आपकी जैसी आज्ञा, महाराज।" शहजादे ने सिर हिलाया।
आधी रात को किले पर भेजे गये सिपाही नीचे उतर रहे थे। उनके हाथ की
मशालें धुआँ उड़ा रही थीं। उस दल के साथ राजा ने जानबूझकर अपने पचास
सैनिक भेजे थे। सैनिक नीचे उतरते हुए जोर जोर से चिल्लाने लगे—"महाराज,
सम्भाजी :: 287