छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंलगाकर देखने लगे। उनकी अवस्था ऐसी हो गयी थी जैसे पंछी शिकारी के हाथ आ
गया हो। शेष सभी का विचार दृढ़ था। अण्णाजी के इस प्रस्ताव से सोयराबाई
प्रसन्न थीं। कुछ विमुग्ध भी हो गयीं थीं। उनका कंठावरोध हो गया था। उन्होंने
कहा, "आज हृदय को शान्ति मिली। क्या कहूँ? मुझे एक सामान्य गुलाम की तरह
जीना पड़ रहा है। मुझे जीजामाता जैसी कठोर स्वभाव की सास मिली थीं। लेकिन
उन्होंने भी कभी मुझे नीचा नहीं दिखाया। कल की छोरी इस येसूबाई के ठाट तो
देखो। 'श्री सखी रानी जयन्ती ऐसी मुहर बनवायी हैं।' बुजुर्गों पर हुक्म चलाती हैं
निस पर हमारे ये शम्भूराजा स्वयं को बाघ का बच्चा कहलाते हैं और बर्ताव स्त्री की
तरह करते हैं। नहीं-नहीं इस जीने से तो मर जाना ही अच्छा है। मेरे सगे भाई
हंबीरराव भी शत्रु से मिले हैं। अपनी तकदीर को हम क्या कहें?"
सोयराबाई की यह अवस्था अण्णाजी से देखी न गयी। वे हाथ जोड़कर
बोले, "रानी साहब यहाँ का अत्याचर अब सहा नहीं जाता। यहाँ शिवाजी महाराज
की दुर्दशा हो जाये और वहाँ निरंकुश अविवेकी राजा अपना हुक्म चलाकर राज्य को
नष्ट कर दे। वहाँ कन्नौज का एक नालायक मान्त्रिक 'कलाश' कुछ मन्त्र फूँके और
मन्त्रों के बल पर सारे दरबार पर जादू-टोना करता रहे। यह अब सहा नहीं जाता।"
"आपको क्या करना है, पन्त?" उत्तर मालूम होने पर भी सोयराबाई ने प्रश्न
किया।
"रानी साहिबा, अभी समय बीता नहीं है। अभी भी हम हारी हुई लड़ाई को
फिर से जीत सकते हैं।" अण्णाजी ने कहा।
"किसकी सहायता से?"
"शहजादा अकबर नाम का एक बड़ा जादूगर आया है न, अपने राज्य में।
वह किसी सामान्य जमींदार का बेटा नहीं है। वह पृथ्वीपति औरंगजेब का बेटा है।
यह अच्छा अवसर है। सम्भाजी वहाँ दूर पन्हालगढ़ पर अपने कामकाज में अटके
हैं। तब तक हम अपना काम निपटा लेंगे।" अण्णाजी ने स्पष्ट किया।
"भगवान अपने पीछे खड़े हैं। किन्तु पिछली बार की तरह इस बार नहीं
होना चाहिए। इस कान की खबर उस कान को नहीं होनी चाहिए।"
"महारानी आप चिन्ता न करें। ग्रह अच्छे हैं।" अण्णाजी ने कहा, "देखिए
न इस बालाजी का विचार भी अपने जैसा ही है। ये अपने पुत्र को भी साथ लेकर
आये हैं।"
सोयराबाई ने एक बार पुनः अविश्वास की दृष्टि से देखा। उन्होंने पूछा-
"क्यों चिटणीस जी, बहुत देर से आप कुछ बोल नहीं रहे हैं?"
जैसे किसी भेड़िये की दृष्टि खरगोशों के झुंड पर पड़ जाये और खरगोशों के
प्राण उनकी आँखों में उतर आयें और वे कातर दृष्टि से देखने लगें वही स्थिति
पिता-पुत्र की हुई। सभी की नजरें उन्हें चीरने लगीं। उनके गले सूख गये।
282 :. सम्भाजी