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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

अण्णाजी ने बहुत चिल्ल-पों मचाई किन्तु प्रधान मंडली में से कोई भी उनके
सहयोग के लिए तत्काल तैयार नहीं हुआ। अण्णाजी भी कच्चे गुरु के चेले न थे।
वे बड़े उस्ताद थे। स्वराज्य के नाम पर उन्होंने बहुत धन जोड़ रखा था। इसीलिए
अन्य प्रधान सोचते थे कि शम्भूराजा के सामने यदि अण्णाजी का कच्चा-चिट्ठा
खुलता है तो खुलने दो, हमें उससे क्या?
प्रधानों और अधिकारियों का उदासीन प्रतिसाद अण्णाजी को बहुत अखरा। वे
दाँत से ओंठ काटते हुए और अपनी नुकीली मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले, "चलो
हमें दिखाई पड़ रहा है कि आप लोगों को शम्भूराजा की चाटुकारिता करना ही
अच्छा लगेगा। आप लोग खुशी से उनकी चाकरी करो। मुझे तो यहाँ एक पल के
लिए भी चैन नहीं आएगा। उसकी अपेक्षा हाथ में कटोरा और लाठी लेकर काशी
यात्रा करना मुझे अधिक अच्छा लगेगा।"
अण्णाजी ने फिर से एकबार सब पर नजर डाली। किन्तु किसी का भी
समर्थन न मिलने से निराश हो गये। महारानी सोयराबाई की समझ में आ गया कि
बैठक में अण्णाजी अकेले पड़ रहे हैं। उन्हें लगा कि राजमाता होकर भी उनके सारे
मनोरथ टूट जाएँगे! राजमाता बनकर दरबार में बैठना तो दूर उन्हें अपने साथियों का
साथ भी नहीं मिल रहा था। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो यात्रियों के साथ से
छूटकर अकेले काशी यात्रा को निकली हों। फिर दरबारियों को आड़े हाथों लेती
हुई बोलीं, "अण्णाजी पन्त क्या केवल अपने भले के लिए यह सब कह रहे हैं?
आज महाराज के स्वर्गवासी होने से स्वराज्य के जहाज के डूबने का समय आ गया
है। ऐसे समय में भले-बुरे की चिन्ता न करने वाले शम्भूराजा के पाप में सने पैर यदि
सिंहासन पर पहुँच गये तो कैसे अनर्थ होगा? इसकी कल्पना किसी ने की है
क्या?"
स्वयं महारानी ने नेतृत्व सँभाला तो बैठक में हवा की दिशा ही बदल गयी।
वैसे सभी कर्मचारी शम्भूराजा से किसी-न-किसी कारण दुखी थे। इसलिए अब उन
सभी को शम्भूराजा में कोई-न-कोई दोष दिखाई देने लगा। जो शान्त स्वभाव के थे,
वे भी मौका देखकर शम्भूराजा की शिकायत करने लगे। न्यायाधीश प्रह्लाद निराजी
ने कहा, "बड़े महाराज मात्र पुत्रमोह के कारण उन्हें बुरा नहीं कहते थे। मैं दावे के
साथ कहता हूँ कि उनके जैसे उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति के लिए राज्य सँभालना
बहुत कठिन है।"
"इसीलिए कहता हूँ जल्दी कीजिए। औरंगजेब जैसा शत्रु दरवाजे पर खड़ा
है। आक्रमण होने से पहले राजाराम के हाथों में सारा कार्यभार सौंप दीजिए और
निश्चिन्त हो जाइए। इसी में हम सब का कल्याण है।" अण्णाजी ने सुझाव दिया।
सभी को शांत करके महारानी कड़े शब्दों में कहने लगीं-"घर की बात को
सम्भाजी :: 177

दरबार में कहना उचित नहीं है। किन्तु समय ऐसा आ गया है कि चुप बैठना पाप
होगा। हमारे सौभाग्य अलंकार बड़े महाराज ने इस विषय पर मुझसे अनेक बार चर्चा
की है। उनके विचार से शम्भू उग्र स्वभाव का ऐसा तरुण है जिसके भीतर अनेक
दुर्गुणों और व्यसनों का भंडार भरा है। वह व्यवहार में उद्धत और गैरजिम्मेदार है।
औरंगाबाद और बहादुरगढ़ पर रहकर आने के बाद उसका खान पान, आचार-
विचार, मुसलमानों की विलासी आदतें आदि उसमें भर गयी हैं। यदि ऐसी उद्धत
और विलासी प्रवृत्ति का युवक गद्दी पर आ जाय तो राज्य टूट जाएगा, डूब
जाएगा।''
सोयराबाई और अण्णाजी की कहानियों से बैठक का रूप ही बदल गया।
राजाराम को गद्दी पर बिठाकर उनके नाम से कार्यभार सँभालने का निर्णय लिया
गया।
मोरोपन्त की भूरी आँखें चमक उठीं। उन्होंने शान्त स्वर में कहा, "हमने तो
राजाजी का नमक खाया है। उन्हीं की सौगन्ध खाकर स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि
ज्येष्ठ पुत्र के जीवित होते हुए क्रिया कर्म के लिए उसे न बुलाना, उत्तराधिकार में
रोड़े अटकाना, धर्मशास्त्र के नियमों को नकारना जैसी बातें मुझे बिलकुल पसन्द
नहीं हैं।''
"सुनिए, यह किसी एक का नहीं पूरे राजमण्डल का निर्णय है।" अण्णाजी ने
क्रुद्ध होकर कहा।
"भाइयो आप जैसा भी चाहे वैसा निर्णय लेने का आपको अधिकार है।
परन्तु इस पाप कर्म में आप मुझे न घसीटें।"
मोरोपन्त की इस भूमिका से सभी के चेहरे का रंग उड़ गया। महारानी
सोयराबाई तो कुछ अधिक ही बेचैन हो उठीं। अण्णाजी को लगा कि उनके अब
तक के सारे प्रयत्नों पर पानी फिर जाएगा। अण्णाजी ने क्रोधावेश में सन्तप्त होकर
कहा, "पेशवा, आपको इस बात का ध्यान है कि आप क्या बोल रहे हैं?"
"अण्णाजी पन्त आप अपने दिमाग को शान्त रखें तो ठीक होगा।" अपने
स्वर को बिना जरा भी विचलित करते हुए मोरोपन्त ने कहा, "राजाराम का विरोध
करने का कोई कारण नहीं है। परन्तु भाइयो, यह समय कठिन परीक्षा का है। कल
यदि दिल्लीश्वर औरंगजेब की फौज पानी के पहाड़ की तरह आकर अपने राज्य पर
बरस गयी तो उसकी नाक में नकेल कौन डालेगा?"
"वाह! मोरोपन्तजी, इसका मतलब हम सभी नामर्द हैं और सिर्फ आपके
शम्भूराजा अकेले बड़े बहादुर हैं।" अण्णाजी ने उपहास करते हुए कहा।
"हाँ, हाँ, शम्भूराजा ही सच्चे बहादुर हैं। मराठी राज्य में उनकी बराबरी
178 :: सम्भाजी

२. छत्रपति पद पर राज्याभिषेक, बुरहानपुर विजय एवं स्वराज्य की सुदृढ़ता

दूसरा कोई नहीं कर सकता।'' मोरोपन्त ने बड़े विश्वास मे साफ-साफ कहा,
"यहीं मत रुकिए जरा बाहर भी झाँक कर देखिए कि वहाँ क्या चल रहा है? वहाँ
किले के बाहर मुख्य द्वार के पास पाचाड़, रायगढ़वाड़ी से लेकर महाड़ तक हजारों
की संख्या में प्रजा एकत्र हो रही है। प्रजा जोरदार माँग कर रही है कि—'शम्भुराजा
को ही गद्दी पर बिठाइए।' सेना में तो युवराज का ही हुक्म चलता है। समय की
माँग को पहचानिए, अपनी बुद्धि को ठिकाने रखिए।''
मोरोपन्त के स्पष्ट कथन से अण्णाजी के पक्षधर घबरा गये। इसी समय एक
गद्दी पर बैठे हुए बालाजी पन्त चिटणीस आगे बढ़े और उत्साहित होकर कहने लगे,
"अब सच ही कहना है तो ''
अण्णाजी पन्त ने बालाजी को बीच में ही रोकते हुए कहा, "रुकिए, आप
कुछ मत बोलिए। हमें सब मालूम है।'' उन्होंने मोरोपन्त की ओर रुख करके कहा,
"तो पन्त आपको सेना का डर है। आप भूल गये क्या? सोयराबाई के छोटे भाई
हंबीरराव मोहिते हमारे सेनापति हैं।
"किले पर जो करोड़ों का रत्न भंडार और खजाना है वह हमारे अधिकार में
है। सेनापति हमारे हैं। महारानी भी हमारे पक्ष में हैं। यह सब छोड़कर पन्तजी आप
जाएँगे कहाँ ? उस कवि कलश के पास ?'' अण्णाजी ने कहा।
अण्णाजी एक मंजे हुए अभिनेता की भाँति अपनी भूमिका निभा रहे थे। बात
करते करते कभी अपनी आँखों को वर्तुलाकार घुमाते कभी माथे की पगड़ी को
उतार कर जमीन पर फेंकते। इस बीच उन्होंने दो बार अपनी शिखा को खोला और
फिर से बाँधा। उन्होंने राजाराम के गद्दी पर बैठने के फायदों को फिर से दुहराया।
संभाजी के दुर्व्यवहार, बुरी आदत और क्रोधी स्वभाव का पहाड़ा एक बार फिर
दोहराया। एक बार पुनः कवि कलश के सम्बन्ध में उन्होंने कहा—
"अरे, एक बार शम्भुराजा के उस बदमाश कवि कलश को रायगढ़ पर आने
तो दो। वह जादूगर जब भैंस की गीली खाल पर बैठकर नराधम की तरह
जारण मारण क्रिया करता रहेगा, मन्त्र-तन्त्र के आवेश में सुई और आलपिन से
खाँसी काली गुड़िया की तरह थिरक थिरक कर नाचने लगेगा तब तुम लोगों का
मस्तिष्क ठिकाने पर आएगा।''
कवि कलश से जुड़े अज्ञात भय से सभी घबरा गये। अन्त में बड़ी मेहनत के
बाद अण्णाजी ने अपना वांछित फल अपनी झोली में डाल लिया। उनके प्रस्ताव पर
अन्ततः मोरोपन्त ने भी हामी भर दी।
अण्णाजी पन्त और महारानी सोयराबाई ने अन्ततः चैन की साँस ली। सारी
राजनीति अन्त में उनके मनोनुकूल हो गयी थी। उन्हें लगा कि अब सब ठीक हो
गया है। राजाराम का राज्यारोहण प्रायः निश्चित हो गया था। परन्तु सभी के सामने
सम्भाजी :: 179

गम्भीर प्रश्न यह था कि शम्भूराजा का क्या किया जाय? उनको बन्दी बनाये बिना
एक दिन भी राज्य चलाना सम्भव नहीं था।
"लिखिए पन्त, अभी का अभी लिखिए।" महारानी सोयराबाई ने कहा,
"जनार्दन पन्त सुमन्त को आदेश भेजिए कि वे युवराज को पकड़कर वहीं पन्हाला
के बन्दीगृह में डाल दें। उस काँटे को व्यर्थ में यहाँ ले आने की आवश्यकता नहीं
है।"
मोरोपन्त ने सभी की ओर दृष्टि घुमाई फिर मीठी मुस्कान बिखेरते हुए
उन्होंने अण्णाजी से कहा, "अण्णाजी पन्त! आप अपनी उतावली में राज्य के कानून
भी भूल गये हैं क्या? कोई भी किलेदार या सूबेदार बालाजी आवजी चिटणीस के
हस्ताक्षर और उनकी मुद्रा देखे बिना हुक्म की तामील नहीं करेगा।"
मोरोपन्त की बात सुनकर अण्णाजी का सिर घूमने लगा। उन्हें पसीना छूट
गया। सोयराबाई की दृष्टि बैठक में बालाजी आवजी को ढूँढ़ने लगी। परन्तु बालाजी
बैठक से कब के जा चुके थे। यह बात ध्यान में आते ही सभी चिन्तित हो गये।
छह
महल के चिराग जल रहे थे। रनिवास से थोड़ी दूरी पर जो जंगली झाड़ियाँ और
पेड़ पौधे थे उनसे होकर जोर की हवा चल रही थी। हिरकणी बुर्ज से झींगुरों की
किर्रऽऽ किर्रऽऽ सुनाई पड़ रही थी। रनिवास के बाहर बैठक में केवल अण्णाजी
पन्त और सोयराबाई बैठे थे। दोनों बहुत तनावग्रस्त थे। अण्णाजी दत्तो ने रुष्ट होकर
कहा, "इस बालाजी चिटणीस के गले यह निर्णय कौन उतारेगा? उन्हें तो पहले से
ही शम्भूराजा से बहुत लगाव है।"
सोयराबाई बेचैन हो गयीं। उन्होंने कहा, "उन्हें आने के लिए सन्देश भेजा है
न? मुझे विश्वास है कि मेरा आदेश वे अवश्य मानेंगे।"
थोड़ी ही देर में ताड़ की तरह लम्बे बालाजी पन्त बैठक में प्रविष्ट हुए।
उन्होंने झुककर सोयराबाई का अभिवादन किया। सोयराबाई ने राज्य की कठिनाइयों
का पहाड़ा बड़े मीठे शब्दों में पढ़ा और कहा-'चिटणीस! आपके हस्ताक्षर का पत्र
जाना चाहिए।'
बालाजी ने कहा, "जब तक हमारी जान में जान है, यह सम्भव नहीं है।"
180 :: सम्भाजी

"किन्तु यदि आपकी मुहर के साथ पत्र नहीं जाएगा तो कोई भी किलेदार
शम्भूराजा को कैद करने का साहस नहीं करेगा।"
सोयराबाई ने चिटणीस से बार-बार प्रार्थना की। किन्तु सोयराबाई की
प्रार्थनाओं और धमकियों का बालाजी आवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। महारानी से
क्षमायाचना करते हुए उन्होंने बड़े आदर से कहा, "हम इस प्रकार कैसे लिख सकते
हैं? हमने तो सरकार का नमक खाया है। संभाजी राजा तो हमारे स्वामी हैं।"
"फिर भी हम जैसा कहेंगे वैसा हुक्मनामा आपको लिखना पड़ेगा।"
अण्णाजी और सोयराबाई ने कठोर स्वर में कहा।
"आप हमारे ऊपर व्यर्थ दबाव न डालें। हमारी ओर से यह पाप कभी न
होगा।" बालाजी ने स्पष्ट रूप से अपनी अस्वीकृति व्यक्त की। महारानी जी यह
सारा मामला हमारी परम्पराओं के विरुद्ध है।
बालाजी पन्त आदेश लिखने के लिए तैयार नहीं हुए। वे अपने निर्णय से टस
से मस नहीं हो रहे थे।
रात समाप्त होने को आयी। समय बीतता जा रहा था। किन्तु बालाजी कुछ
भी सुनने को तैयार न थे। तब सोयराबाई ने अत्यन्त कठोर स्वर में पूछा,
"चिटणीस! युवराज को कैद करने का आदेश आप लिख रहे हैं या नहीं?"
अण्णाजी दत्तो मर्म पर आघात करते हुए बोले, "बालाजी पन्त अब आप बूढ़े
हो चुके हैं। आपके निलोबा, खंडोबा जैसे दो छोटे बच्चे हैं। वे फिर से जंजीरे पर
जाकर चाकरी तो नहीं करेंगे। उनकी रोटी तो रानी जी के ही हाथ में है। क्यों व्यर्थ
में टाँग अड़ा रहे हो? अपने ही हाथों अपने भोजन में मिट्टी मिला रहे हो?"
हुक्मनामा लिखे बिना अण्णाजी और महारानी उठने को तैयार ही न थे। रात्रि
के बीतने के साथ बालाजी पर भावनात्मक और मानसिक दबाव बढ़ रहा था। वे
हाथ जोड़कर धीर-गम्भीर स्वर में बोले, "आप लाख समझाइए किन्तु ये बातें
हमारी समझ में नहीं आतीं। यह पाप मुझसे नहीं होगा।"
बातें करते-करते बालाजी के सामने अतीत का दृश्य प्रस्तुत हो गया। राजापुर
में बेरोजगारी का दिन काटते हुए बालाजी नामक युवक का वह पत्र याद आया। उस
पत्र की लिखावट याद आयी जिसने शिवाजी महाराज का मन मोह लिया था। उस
स्मृति के सगुण-साकार होते ही बालाजी पन्त गद्गद हो गये। आँखों के आँसू
पोंछते हुए उन्होंने कहा, "जिन अक्षरों ने मेरे जैसे अनाथ को हिन्दवी स्वराज्य के
चिटणीस पद की ऊँचाई तक पहुँचाया, उन्हीं अक्षरों से धोखा कैसे करूँ? साक्षात्
शिवपुत्र संभाजी राजा को कैद करने का हुक्म लिखने का पाप कैसे करूँ? नहीं, नहीं
ऐसा नहीं होगा। अण्णाजी पन्त आप भले ही मेरे हाथों की अँगुलियों को काट
डालिए पर ऐसे गलत काम के लिए हमारी कलम नहीं चलेगी।"
आधी रात को अण्णाजी दत्तो ने बालाजी को ही गिरफ्तार कर उनकी जायदाद
सम्भाजी :: 181

को जब्त कर लेने की धमकी दी। परन्तु बालाजी उस धमकी से भी नहीं डरे। अन्त
में अण्णाजी ने अपनी कूटबुद्धि का उपयोग किया। मध्यममार्ग का सुझाव दिया। तब
आँखों के आँसू पोंछते हुए बालाजी ने कहा, "ठीक है, अण्णाजी ! आप का इतना
हठ है तो मेरे बेटे से आवजीबाबा के अक्षरों में पत्र लिखवाइये। परन्तु इस प्रकार की
गद्दारी भी मुझे ठीक नहीं लगती। शम्भुराजा हमारे ऊपर कितना विश्वास करते हैं।
उनके हृदय को, मन को कैसा लगेगा?"
सात
शम्भुराजा की दृष्टि जब सामने वाली सज्जा कोठी की ओर जाती तो उन्हें सामने
वाली प्रचंड खाई दिखाई पड़ती। उन्हें तत्काल शिवाजी महाराज का स्मरण हो
आता। पिता की चिन्ता में उनके पेट में बल पड़ने लगते।
आज उन्हें लग रहा था कि सज्जा कोठी ने मन को घेर लिया है। इसलिए
उन्होंने अपना घोड़ा बाहर निकाला। कवि कलश और जोत्याजी केसकर के घोड़े
उनके साथ दौड़ते हुए निकले। ये तीनों घोड़े दौड़ाते हुए बाघ दरवाजे की ओर गये।
समीप के एक बुर्ज के पास पत्थर की एक बड़ी शिला देखकर तीनों व्यक्ति वहीं
रुक गये। दूर की ढलान से एक सर्पिल पगडंडी ऊपर आती थी। रास्ते के दोनों ओर
झाड़ियों के अनेक झुरमुट बिखरे पड़े थे। ऊपर खड़े शम्भुराजा की दृष्टि सहज भाव
से नीचे की ओर गयी। उन्हें निचली पगडंडी से दो व्यक्ति ऊपर की ओर आते
दिखाई दिये। खड़ी चढ़ाई पर चढ़ते घोड़ों का दम फूलता था इसलिए दोनों अपने
अपने घोड़ों की लगाम पकड़े धीरे-धीरे किन्तु बड़े इतमीनान से ऊपर चढ़ रहे थे।
बीच का एक घास का मैदान समाप्त हुआ। पहाड़ का अधिकांश हिस्सा
चढ़कर वे दोनों ऊपर पहुँच रहे थे। अब उन दोनों की आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई दे
रही थीं। संभाजी राजा अपनी पारखी नजर से उन दोनों को देखने लगे। उनमें से
एक था खंडोजी नाइक और दूसरा गणोजी कावले। वे दोनों ही मँजे हुए जासूस थे।
पन्हाला, विशाल गढ़ से रायगढ़ तक उनका निरन्तर आना-जाना लगा रहता था।
युवराज को पक्का विश्वास था कि वे आज निश्चित रूप से रायगढ़ की ओर से आ
रहे होंगे।
किसी तरह चढ़ाई समाप्त हुई। दोनों जासूस दम लेते हुए सामने देखने लगे।
182 सम्भाजी

उनके सामने शम्भूराजा और कवि कलश भयंकर दैत्य की तरह खड़े दिखाई पड़े। वे
दोनों घबरा गये। उनके पैर काँपने लगे। वे क्या बोले, कुछ समझ में नहीं आ रहा
था। तब शम्भूराजा ने ही उनसे पूछा, "कल दोपहर को ही रायगढ़ से निकले हैं
न?"
"हाँ जी!" खंडोजी ने किसी प्रकार उत्तर दिया।
खंडोजी और गणोजी की चोर नजर काँप उठी। खंडोबा ने अपनी कमर में
बँधा दुपट्टा खोला। उसमें से निकालकर एक पत्र शम्भूराजा को दिया। शम्भूराजा ने
वहीं पर रेशमी गाँठ खोली। खड़े खड़े ही पत्र को पढ़ा। एक कल्पित आह्लाद के
अतिरिक्त उसमें कोई और बात नहीं थी। किन्तु उसकी लिखावट हमेशा की तरह
बालाजी आवजी चिटणीस के हाथों की नहीं थी। आवजी की लिखावट उनके
अक्षर को सभी दरबारी और युवराज अच्छी तरह पहचानते थे।
"सरकार हमें जल्दी है, हम निकलते हैं।" ऐसा कहकर दोनो गुप्तचर बाले
किले की ओर चलने को हुए। शम्भूराजा को पूरा मामला कुछ विचित्र सा लग रहा
था। उन्होंने उन गुप्तचरों को रोका- "अरे! रुको, रुको आपको इतनी भी क्या
जल्दी है?"
"दिन के उजाले में ही किलेदार को मिलना है।" खंडोजी ने सूचित किया।
शम्भूराजा ने अपनी भेदक दृष्टि दोनों पर डाली। उन्हें अँगुलियों के संकेत से अपने
पास बुलाया। दोनों जासूस यन्त्रवत् वापस लौटे। भय से काँपते हुए उन्होंने युवराज
का पुनः अभिवादन किया और खड़े हो गये। दोनों को पसीना छूट रहा था।
शम्भूराजा ने डाँट कर पूछा, "कावले! अपनी कमर में क्या खोंसा हुआ है?"
"कुछ नहीं जी! कुछ नहीं। यह तो अपनी प्रतिदिन की डाक है। किलेदार
के नाम से भेजी गयी है।" गणोजी बात धैर्यपूर्वक कर रहा था। किन्तु उसके
थरथराते पैर उसे धोखा दे रहे थे।
संशय अधिक गहराने पर युवराज ने अपने साथियों को संकेत किया। कवि
कलश और जोत्याजी ने जासूसों के सारे कागजात हस्तगत कर लिए। उसमें एक पत्र
किलेदार विट्ठल त्र्यम्बकजी के नाम था और दूसरा हवलदार बहिर्जी नाइक के नाम।
शम्भूराजा की दृष्टि पत्र के गूढ़ शब्दों पर घूमने लगी।
"यहाँ स्थिति बहुत चिन्ताजनक है। जैसा बन्दोबस्त होगा वैसी सूचना आपको देते
रहेंगे। परन्तु किसी भी स्थिति में शम्भुमहाराज को किले से बाहर न निकलने देना।
युवराज को बन्दी बनाकर बड़ी सावधानी से रहिए। यहाँ का कोई समाचार महाराज
तक नहीं पहुँचना चाहिए। आगे समय पर यथायोग्य आदेश मिलते रहेंगे।"
शम्भूराजा के क्रोध का पारा एकदम चढ़ गया। उनकी सन्तप्त आँखों का
सामना करने का साहस जासूसों में नहीं था। घबराहट के कारण वे और भी सहम
सम्भाजी : १०३

गये। युवराज ने उनसे कठोर शब्दों में पूछा, "सच-सच बताइए वहाँ रायगढ़ पर
क्या चल रहा है? मुझे बन्दी बनाने के षड्यन्त्र का सूत्रधार कौन है? हमारी पूजनीया
माताजी या निष्ठावान अण्णाजी दत्तो?" उसी समय शम्भूराजा को अपने पिताजी का
स्मरण हो आया। उन्होंने कातर स्वर में पूछा, "बताइए हमारे पिताजी की कैसी
स्थिति है?"
युवराज ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। दोनों जासूसों का धैर्य छूट गया। दोनों
शक्तिहीन होकर धरती पर गिर पड़े। दोनों बैठ गये। उन्होंने मन में सोचा कि वे
स्वराज्य के भावी अधिकारी से एक बुरी खबर छुपाकर भयानक अपराध कर रहे हैं।
झूठ बोलने के अपराध का बोध होते ही वे छोटे बच्चों की तरह रोने लगे।
शम्भूराजा के पैर पकड़कर दया की भीख माँगने लगे- "सरकार, आप बड़े लोग हैं
परन्तु आपके झगड़ों में हम गरीबों की जान आफत में है।"
शम्भूराजा ने गश्त लगाने वाले सैनिकों को संकेत किया। वे दौड़ते हुए आए।
दोनों जासूसों को वहीं पर कैद कर लिया गया। युवराज जल्दी ही दरबार में आ
गये। पन्हाला के किलेदार विट्ठल त्र्यम्बक, हवलदार बहिर्जी नाइक, जनार्दन पन्त
सुमन्त जैसे अधिकारियों को तत्काल दरबार में बुला लिया गया। गुप्त पत्र को सबके
सामने पढ़ा गया। जासूसों की तलाशी ली गयी। शम्भूराजा ने अनुभव किया कि इस
सम्पूर्ण घटना के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक षड्यन्त्र है। शम्भूराजा ने जासूस
खंडोवा से पूछा, "खंडोवा, अब बिना कोई नाटक रचे, जो है, उसे सच सच
बताओ? हमारे पिताजी का स्वास्थ्य कैसा है?"
जासूस भय से काँपने लगे। जो खबर उन्होंने अब तक छुपाई थी वह इतनी
भयंकर थी कि उसे बताते हुए उनका गला रुँध गया। वे जोर-जोर से रोते हुए कहने
लगे, "युवराज ईश्वर ने बड़ा भारी आघात किया है। बड़ा धोखा हो गया है। बड़े
महाराज हमें अनाथ छोड़कर चल बसे।"
इस भयंकर समाचार से मानो सभी पर आसमान टूट पड़ा। पूरे रजवाड़े में
तहलका मच गया। सभी दहाड़ मारकर रोने लगे। विट्ठल त्र्यम्बक जैसे लोग जो
षड्यन्त्र में सम्मिलित थे, उन्हें आँसू रोक पाना कठिन हो गया। सेवक, नौकर,
दास-दासी सभी दुख के सागर में डूब गये। इस समाचार का शम्भूराजा पर कुछ
अलग ही प्रभाव पड़ा। वे न दहाड़ मारकर रोये और न ही क्रुद्ध हुए। परन्तु जैसे
अपने स्थान से कोई पाषाण मूर्ति गिर जाय, वैसे ही शम्भू महाराज भी गिर गये।
लगा जैसे उनके पैर थे ही नहीं। वे मूर्छित हो गये। उनकी आँखें खुली थीं, कि
शरीर में कोई हरकत नहीं थी।
सभी लोग घबराहट में इधर उधर भागने लगे। कटा हुआ नींबू और प्याज
184 सम्भाजी

का छिलका उनकी नाक के पास रखा गया। बहुत देर बाद एक घायल शेर की भाँति
दहाड़ते ऊँची आवाज में चिल्लाये—'पिताजी'। कवि कलश के साथ अनेक सरदार
उन्हें संभालने में लगे थे। परन्तु शम्भूराजा एक भयंकर तूफान की तरह उठ खड़े
हुए। अपनी सशक्त भुजाओं से सभी को ढकेलते हुए उन्होंने छलाँग लगाई। दोनों
भुजाओं में न समाने वाले मोटे गोलाकार पत्थर को पकड़कर उस पर अपना सिर
धुनते हुए वे करुण चीत्कार करने लगे—'पिताजीऽऽ, पिताजीऽऽ।' ऐसा लगा कि
वह पत्थर का खम्भा न होकर पंढरपर के पांडुरंग ही खम्भे के रूप में अवतरित हो
गये हों और शम्भूमहाराज उनके कन्धे पर सिर रखकर रुदन कर रहे हों। यह दृश्य
सभी को मर्माहत कर गया।
बहुत देर बाद युवराज कुछ शान्त हुए। उन्हें जलपात्र से पानी पिलाया गया।
भावना का पहला ज्वार उतर गया। जासूस रायगढ़ का समाचार बता रहे थे। वह
बता रहा था कि रायगढ़ की नाकाबन्दी किस प्रकार की गयी थी। नाकाबन्दी के
कारण आसपास की जनता किस प्रकार बेचैन हो उठी थी, हनुमान जयन्ती के दिन
दोपहर के समय किस प्रकार महाराज सबको छोड़कर चल बसे। जासूस की बातें
सुनकर आसपास एकत्र लोग विलाप करने लगे।
"और राजा साहब की उत्तर क्रिया किसने की?" कवि कलश की आवाज
गूँजी। इस धारदार प्रश्न को सुनकर संभाजी महाराज ने भी जासूसों की ओर घूमकर
देखा।
"काल हौद के समीप कुछ लोग एकत्र हुए थे। वहीं पर चन्दनकाष्ठ और
बेलकाष्ठ से मन्त्राग्नि दी गयी।"
"परन्तु अन्तिम क्रिया किसके हाथों की गयी?"
"राजाराम के हाथों सम्पन्न हुई। उनके साथ सिगणापुरवासी साबाजी भोसले
को बिठाया गया था। उन्हीं की सहायता से राजारामसाहब ने सारी क्रिया पूरी की।"
"क्या आपके शास्त्री पंडित और उद्दंड कर्मचारी इस बात को भूल गये कि
पिता की उत्तर क्रिया का अधिकार शास्त्रों ने केवल ज्येष्ठपुत्र को दिया है?"
शम्भूराजा ने प्रश्न किया।
भगवान के गले की मोतियों की माला के धागे के जीर्ण हो जाने के कारण
टूट जाने से जिस प्रकार एक-एक मोती गिरने लगता है उसी प्रकार शम्भूराजा की
आँखों से अश्रुपात होने लगा। किन्तु दूसरी ओर इस अन्याय के विरोध में उनका मन
विद्रोह कर रहा था। उन्होंने प्रश्न किया—
"अन्तिम संस्कार का यह निर्णय हमारी उपेक्षा करके राज्यकर्मचारियों और
माताजी ने कैसे लिया? क्या शिवाजी महाराज का बेटा शम्भू जीवित नहीं था? या
सम्भाजी :: 185

अपने जन्मदाता, देवतुल्य पिता को मुखाग्नि देने के लिए उसके हाथ अपवित्र हो गये
थे? एक सामान्य गड़रिया या किसान समझने पर भी मुझे सूचित करना चाहिए था।
इससे कम-से कम इस अभागे संभा को अपने महाप्रतापी पिता की चिता पर चम्पा
के चार फूल चढ़ाने का अवसर मिल गया होता। मैं कृतार्थ हो गया होता।"

186 . सम्भाजी

रायगढ़ पर
एक
"बहुत दिनों से कोई लड़ाई नहीं हुई। इसलिए सारा शरीर शिथिल हो गया है।"
ऐसा कहते हुए हंबीरराव ने ठंडे पानी का लोटा उठाया और मुँह से लगाकर गरारा
किया। उन्होंने कोयना नदी के किनारे उन्होंने नीचे को देखा। सूर्योदय के साथ ही
नदी के किनारे हंबीरराव की बैठक चल रही थी। पास ही किंजल वृक्षों का घना
झुरमुट था। दूसरी ओर आधे कोस के फासले पर उनकी सेना का पड़ाव था। बहुत
दिनों से एक ही जगह पर रुके रहने के कारण घोड़े, गधे, हाथी आदि सभी जानवर
अलसाये हुए खड़े थे।
कल रात बड़ी देर से हंबीरराव अपनी तलेबीड़ की हवेली से सेना में वापस
लौटे थे। प्रतिदिन 2000 दंड बैठक निकाले बिना हंबीरराव के शरीर में स्फूर्ति नहीं
आती थी। दंड निकालते समय उनका तरीका कुछ अलग ही था। जब दंड निकालते
समय जमीन पर नाक रखकर शरीर को ऊपर उठाते थे तो कोई पन्द्रह सोलह वर्ष
का लड़का उनकी दोनों एड़ियों पर खड़ा हो जाता था। दंड करते समय वह लड़का
हंबीरराव की लँगोट के साथ बँधी चाँदी की करधनी को पकड़े रहता था। अपनी
पीठ पर यह बोझ सँभाले घंटाभर दंड निकालते रहते थे। इस दीर्घ व्यायाम से जब
उनका सीना फूल आता और उनके शरीर से पसीने की धार बहने लगती तब कहीं
उन्हें हल्कापन अनुभव होता था।
हंबीरराव ने अपनी तलवार के बल पर बड़ी प्रसिद्धि अर्जित की थी। उनके
नाम के साथ एक कीर्ति वलय बन गया था। कृष्ण और कोयना के तट के दूध पर
पले पुसे हंबीरराव सागौन के तने की तरह लम्बे थे। उनकी कड़ी ऐंठी मूंछें थीं,
गर्दन मोटी और मजबूत थी। पूरा शरीर सशक्त था। उनका व्यक्तित्व रोबदार दिखाई
पड़ता था। नेसरी की लड़ाई में प्रताप राव गुजर अपनी जिद के कारण अपने साथियों
के साथ बहलोलखान के विशाल सेना सागर में कूदकर डूब गये थे। पीछे बच गये
सम्भाजी 187

थे हंबीरराव। उन्होंने अपने सहयोगियों का साथ लिया। उन्होंने रूपाजी भोसले
और आनन्दराव मकाजी को विशेष रूप से सावधान किया। प्रतापराव की मृत्यु के
समाचार से वे निढाल हो गये थे। उन्होंने पीछे हट रही फौज को दृढ़ता से एकत्र
किया। जिस तरह शिकारी जंगली सुअरों को आगे की ओर खदेड़ देते हैं, उसी तरह
हंबीरराव ने बहलोलखान की सेना को बीजापुर की ओर खदेड़ दिया। शिवाजी
महाराज के सौतले भाई ब्यंकोजी राजा ने साम्राज्य के साथ गद्दारी की थी। तब
हंबीरराव ने बड़े साहस के साथ तंजौर की सीमा तक ब्यंकोजी का पीछा किया था
और उन्हें पराजित किया था। हंबीरराव की प्रशंसा में शिवाजी महाराज कहा करते
थे—"एक हंबीरराव के बदले में फिरंगी हमें किलों को ध्वस्त करने वाली पचास
तोपें दें तो भी हम उन्हें अपने से अलग नहीं करेंगे।"
इस समय सम्पूर्ण मराठी राज्य का ध्यान रायगढ़ के गृहकलह पर केन्द्रित हो
गया था। ऐसे समय में हंबीरराव जैसे शक्तिशाली सेनापति के साथ होने या न होने
से दोनों पक्षों में निर्णायक अन्तर पड़ने वाला था। इसलिए दोनों पक्षों से हंबीरराव के
पास निवेदन के पत्र आ रहे थे। कल रात तलबीड की हवेली से बाहर निकलते
समय हंबीरराव की पत्नी रखमाबाई ने साग्रह कहा था। विदाई के लिए एकत्र हुए
सभी मित्रों और सम्बन्धियों की भावना को व्यक्त करते हुए रखमाबाई ने कहा था—
"सोयराबाई का पत्र आ चुका है। खून का रिश्ता जन्मभर के लिए उपयोगी होता
है। बालक राजाराम तो आपका भांजा ही है। राजाराम को गद्दी दिलाने के लिए आप
उसके पीछे वटवृक्ष की तरह खड़े रहें।" यह आग्रह रखमाबाई बार बार दोहरा रही
थीं। हंबीरराव के चेहरे पर मन्द मन्द मुस्कान बिखरी हुई थी।
रात देर से जब हंबीरराव अपने पड़ाव पर लौटे उनके मुंशी ने पन्हालगढ़ से
आया लिफाफा उनके सामने रखा। मशाल की लाल पीली रोशनी में हंबीरराव ने
संभाजी राजा का पत्र पढ़ा-
"क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भु छत्रपति की ओर से प्रधान सेनापति
हंबीरराव मोहिते को दंडवत प्रणाम।
मामा साहब रिश्ते में मैं भी आपका भांजा हूँ। भोसले और मोहिते घराने का
सम्बन्ध तीन पीढ़ियों का है। पूज्य पिताजी ने प्रधान सेनापति का मुकुट आपके सिर
पर क्यों रखा? सोयराबाई का भाई होने के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि
महाप्रतापी प्रतापराव गूजर की खाली जगह भरने के लिए आप जैसे एक नर रत्न की
आवश्यकता थी। अब पिताजी के चले जाने से हम लोग अनाथ हो गये हैं। जैसा
योग्य समझें, निर्णय लें। आप स्वयं सक्षम हैं। मामा जी! और अधिक क्या लिखूँ।
बस यही प्रार्थना है कि हमारे सम्बन्ध में कोई दरार न पड़ने पाये।"
हंबीरराव का व्यायाम पूरा हो गया था। अब वे पचपन वर्ष के हो रहे थे किन्तु
188 .: संभाजी

उनका जोश और उत्साह यौवन की देहरी पर खड़े तरुणों को भी लज्जित करने
वाला था। व्यायाम समाप्त होते ही उन्होंने नदी की ओर छलाँग लगाई। दस-पन्द्रह
कदम वे दौड़ते हुए गये, फिर नदी के तट तीन-चार पोरसा गहरे पानी में मल्लाहों
के बच्चों की तरह छलाँग लगा दी। नदी की धारा में आड़े तिरछे हाथ मारते हुए
प्रसन्नता से तैरते रहे। फिर कछार चढ़कर गीले वस्त्रों में तट पर पहुँच गये। उनके
मन में उठने वाली विचार तरंगें अभी भी शान्त नहीं हो रही थीं। उनके नौकर
चाकर वस्त्र आदि लेकर खड़े थे। जैसे मेले में कोई पहलवान सजधज कर खड़ा
होता है, उसी प्रकार उन्होंने वस्त्रालंकार धारण किया। उनका घोड़ा दुलकी चाल से
दौड़ता हुआ पड़ाव पर आ पहुँचा। रास्ते में शिलेदारों और कर्मचारियों का
अभिवादन स्वीकार करते हुए हंबीरराव बड़े रौब से अपने डेरे में प्रविष्ट हुए।
रूपाजी भोसले और आनन्दराव मकाजी वहाँ बड़ी देर से प्रतीक्षा कर रहे थे।
रूपाजी ने निवेदन किया, "सेनापति जी, रायगढ़ से अण्णाजी और मोरोपन्त
कल रात में ही उंब्रज पहुँच चुके हैं।"
"किसलिए ?'' हंबीरराव ने अनजान की तरह प्रश्न किया। "आप से मान
मनौवल करने के लिए। आप के साथ पन्हाला जाकर शम्भुराजा बेडियाँ पहनाना
चाहते हैं।" आनन्दराव ने उन लोगों की योजना की जानकारी दी।
यह सुनकर हंबीरराव कुछ बोले नहीं। अपनी पहलवानी की नटखटी वे नदी
के किनारे ही छोड़ आये थे। फौजी छावनी में समाचार पढ़ते हुए, सैनिकों को आदेश
देते हुए उनमें एक अलग ही दबदबा दिखाई पड़ता था।
हंबीरराव को इसके पहले लिखे गये शम्भुराजा के एक पत्र की याद आयी।
उन्होंने पत्रों का बस्ता खोला। उनकी दृष्टि लिफाफे पर घूमने लगी।
उन्होंने पत्र पढ़ा—"क्षत्रिय कुलावतंस श्री राजा शम्भू छत्रपति की ओर से
राजश्री हंबीरराव मोहिते प्रधान सेनापति को।
तीर्थरूप पिताजी का महानिर्वाण हो जाने से हमारे सिर पर तो आसमान ही
टूट पड़ा। ऐसी महाविपत्ति के समय एक ही अच्छी बात हुई। मृत्यु के तीन महीने
पूर्व पन्हालगढ़ पर पिताजी का लम्बा साहचर्य मिला। चार-पाँच दिन तक उनके
साथ निरन्तर विचार-विमर्श होता रहा। मन में जो दुविधा या किन्तु-परन्तु था, वह
मिट गया। मुगलों की ओर चले जाने से मेरे अविवेक को भी पिताजी ने क्षमा कर
दिया। तीर्थ रूप पिताजी का मन पहाड़ जैसा विशाल था। उन्होंने मुझे क्षमा ही नहीं
किया मुगलों के विरुद्ध नया मोर्चा खोलने का आदेश भी दिया। उन्होंने मेरी
जिम्मेदारियाँ भी समझाईं। पिताजी के अचानक चले जाने का कष्ट तो असह्य है।
स्मरण होते ही आँखें छलकने लगती हैं। किन्तु फिर भी माँ भवानी की कृपा से पुनः
कमर कसकर खड़ा होने का मैंने दृढ़ संकल्प किया है।
सम्भाजी :: 189

खेद है कि कुछ मन्त्री और अधिकारी तिरछी चाल चल रहे हैं। उनके दिल
में कपट है। वे बालक राजाराम को गद्दी पर बिठाने का घातक विचार माताजी के
सिर में भर रहे हैं। अपने स्वार्थ के कारण राजकुल में झगड़ा कराना चाहते हैं।
मामाजी! मैं आप का सगा भांजा भले न होऊँ किन्तु हिन्दवी स्वराज्य के निर्माता
शिवाजी महाराज का पुत्र तो हूँ। मैं एक दिन उस पापी औरंगजेब का काल
अवश्य बनूँगा।
बादशाह औरंगजेब बहुत उन्मत्त हो गया है। जजिया कर का हथियार हमारे
सिर पर चलाना चाहता है। पिताजी के संकल्पों को पूरा करने की दिशा में हम
अग्रसर हैं। इस अभियान में हमें आपके आशीर्वाद की अपेक्षा है।''
शम्भुराजा के संवेदनशील शब्दों ने उस दोपहर में हंबीरराव को बहुत
प्रभावित किया था। इसी समय उन्हें समाचार मिला कि मराठी राज्य के महत्त्वपूर्ण
प्रधान उनसे मिलने आये हैं। हंबीरराव ने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर झाँका।
तपती धूप में एक धूप छाँही घोड़ा आगे बढ़ रहा था। उस पर सवार मोरोपन्त पेशवा
बहुत थके दिखाई पड़ रहे थे। धूप में उनकी कनपटी और नाक कुछ अधिक लाल
हो गयी थी। जबरदस्ती घोड़े पर बिठाये गये बच्चे की तरह वे बेचैन हो रहे थे।
पीछे-पीछे काले कलूटे और गठीले शरीर वाले कहार दौड़ते आ रहे थे। अपने
कन्धों पर रखी भारी भरकम पालकी के कारण वे बेदम हो रहे थे। पालकी में हृष्ट
पुष्ट देह वाले अण्णाजी दत्तो बैठे थे। पालकी में अधिक समय से बैठे रहने के
कारण वे भी उकता गये थे।
हंबीरराव ने अपने डेरे से अपने विश्वासपात्र लोगों को भी हटा दिया। अब
वहाँ पर अण्णाजी पन्त, मोरोपन्त पेशवा और सेनापति हंबीरराव के अतिरिक्त और
कोई भी नहीं था।
अण्णाजी और मोरोपन्त को लगा कि आरम्भ में ही कुछ गड़बड़ हो गयी है।
इसलिए वे मूल विषय को आरम्भ नहीं कर रहे थे। यह स्थिति हंबीरराव की समझ
में आ गयी। इसलिए हंबीरराव ने स्वयं ही आरम्भ किया—‘‘पन्त जिस उद्देश्य से
बड़ी अपेक्षा लेकर आप लोग इस डेरे में आये हैं, मुझे नहीं लगता कि आपकी वह
मनोकामना पूरी हो सकेगी।’’
आरम्भ में ही ऐसी स्पष्ट नकार मिलेगी, ऐसी तो उन दोनों ने कल्पना तक न
की थी। लोग कहते हैं कि पहलवानों का दिमाग घुटने में होता है। इसलिए उन
लोगों ने सोचा था कि दाव-पेंच लगाकर आरम्भ में ही हंबीरराव को चित्त कर देंगे।
अपनी इच्छा के अनुसार उन्हें तैयार करके सेना के साथ पन्हालगढ़ की ओर भगा
देंगे। परन्तु आरम्भ में ही उन्हें मुँह की खानी पड़ी तो उनका मुँह देखने लायक हो
गया। अण्णाजी दत्तो ने क्रोध से कहा—‘‘ऐसा कैसे? आपने लिखित वचन दिया है
190 :: सम्भाजी

कि जहाँ हम जाएँगे वहीं आप भी जाएँगे। हंबीरराव हमारी बात सुनिए, आपका ही
भांजा गद्दी का अधिकारी होगा। इसमें आपका भी हित है और हमारा भी।''
"नहीं, यह सम्भव नहीं है।" हंबीरराव ने दृढ़ता से कहा। अण्णाजी बहुत
क्रुद्ध हुए। हंबीरराव पर दबाव डालते हुए पूछने लगे-"नहीं, नहीं का क्या
मतलब? आप राजाराम के मामाजी हो या कंस मामा हो?
अण्णाजी की इस उद्धंडता से हंबीरराव जरा भी नाराज नहीं हुए। उन्होंने शान्त
स्वर में कहा- "देखिए, अण्णाजी! रिश्तेदारी की बात आपसे अधिक मेरे लिए
लाभदायक है। आप तो सरस्वती के पुजारी हैं। आपको हमारे जैसा सिपाही क्या
कहेगा। मुझ जैसे खुद्दार व्यक्ति की समझ में तो इतना ही आता है कि भगवान की
पालकी के साथ लोग इसीलिए चलते हैं कि गुलाल के कुछ कण उन पर गिरें और
वे पवित्र हो जाएँ। सच है न? किन्तु शिवाजी महाराज जैसे महापुरुष के साथ
जन्मभर बने रहने पर हमने कुछ नहीं सीखा क्या? हमने अपना भांजा और अपना
हित ही पहचाना? आज हमें सन्तुलित दिमाग से इस पर विचार करना चाहिए।"
"क्या मतलब?" दोनों ने अपनी आँखें फैला दीं?
हंबीरराव ने कहना आरम्भ किया-"आज शिवाजी महाराज जैसा हमारा
तारणहार अचानक चला गया। धूल में गिरी उनकी तलवार हमें पुकार रही है।
शिवाजी के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में उस तलवार की पवित्रता की रक्षा करना
हमारा कर्तव्य है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि भांजे को राजगद्दी और बहन के
राजमाता पद की शहद लगी उँगली मुझे न चटाइए। हमारी बहन को किसी चीज
की कमी नहीं पड़ेगी। यदि किसी चीज की आवश्यकता पड़ी तो उसके लिए
थैलियाँ खुली रखने में उसका भाई निश्चित रूप से समर्थ है। किन्तु थोड़ी गहराई से
विचार करें, अपने मन को साक्षी बनाकर सोचें तो आप स्वयं अनुभव करेंगे कि आज
की इस बिगड़ी हुई परिस्थिति में यदि शिवाजी महाराज का नामोनिशान सुरक्षित
रखना है तो संभाजी राजा को सिंहासन पर बिठाने के अतिरिक्त हमारे पास दूसरा
विकल्प ही नहीं है।" न्यायाधीश अन्तिम फैसला सुनाने और उसके सत्य निर्णय
को सुनने के बाद धूर्त लोगों की जैसी दशा होती है, वैसी ही दशा अण्णाजी और
मोरोपन्त की हुई। वे निरुपाय बेचारों की तरह दिखाई देने लगे। अण्णाजी ने सिर की
पगड़ी उतारकर गोद में रख ली। वे हंबीरराव को क्रुद्ध आँखों से देखने लगे। जैसे
उन्हें डाँट रहे हों। मोरोपन्त भी अस्वस्थ हो गये। उन लोगों को कुछ सूझ नहीं रहा
था। तब उनकी आँखों में झाँककर, अपनी आँखें वर्तुलाकार घुमाते हुए हंबीरराव
कहने लगे-"आपने शंभूराजा को दरबार में अपने पिता के आगे सिर झुकाकर
विनम्रता से बैठे हुए ही देखा है। किन्तु वही शंभूराजा जब ज्वालाओं का लिवास
धारण कर उतरता है, तलवार लेकर शत्रु पर टूट पड़ता है तो उस अत्यन्त तेजस्वी
सम्भाजी : 191

रूप को आप जैसे अभागों ने कभी देखा ही नहीं है। शिवाजी महाराज जब युद्ध के
लिए निकलते थे तो दस हजार सैनिकों की टुकड़ी का नेतृत्व शम्भूराजा को सौंपते
थे। शम्भूराजा भी ऐसे उपलब्ध अवसरों को गौरवान्वित करते थे। युद्ध क्षेत्र में
उनकी उपस्थिति ही दस हजार सैनिकों के बगबर होती है। युद्ध क्षेत्र में जब वे घोड़े
को ऐड़ लगाकर जोश में नचाते हैं, तो सामान्य सिपाही के शरीर में ही दस हजार
हाथियों का बल पैदा हो जाता है। हाथी-घोड़े जैसे मूक जानवरों को भी बहादुरी के
पंख लग जाते हैं। बड़े महाराज गुजर गये इसलिए हमारे शत्रुओं में जोश आ गया
है। कल मराठी राज्य के दरवाजे पर औरंगजेब का आसमानी सुल्तानी संकट दस्तक
देने लगा तो क्या होगा? ऐसे समय में रायगढ़ के सिंहासन पर ईश्वर की कृपा से
प्राप्त शम्भूराजा जैसा वीर सिपाही ही राजा के रूप में चाहिए।"
"क्या पागल जैसी बात करते हो, हंबीरराव ?"
"अरे आपका भांजा रायगढ़ का राजा..."
"छोड़िए अण्णाजी ! भांजा तो क्या, भांजा तो क्या, मेरा अपना बेटा भी होता
तो उसे परे हटाकर इस मराठा मावले ने शम्भूराजा को ही सिर झुकाया होता।"
इन दोनों को यह अनुमान कतई नहीं था कि हंबीरराव के मुख से शम्भूगजा
की प्रशंसा में ऐसा पवाड़ा सुनने को मिलेगा। यही कारण था कि अण्णाजी को कुछ
सूझ ही नहीं रहा था। उनका गला सूख गया। उन्होंने लोटे से गटागट पानी पिया।
तब कुछ संतुलित हुए। और शान्त स्वर में हंबीरराव से कहा- "अपने दीवानजी
को तत्काल मेरे सामने बुलवाइए।" अण्णाजी की इच्छानुसार दीवान रायभान
सबनिस डेरे में प्रस्तुत हुए। अण्णाजी ने पुनः बड़ी सूक्ष्मता से हंबीरराव की ओर
देखा। पन्त के मस्तिष्क में उठे भीषण तूफान को काबू में रख पाना उनके लिए
कठिन हो रहा था। अण्णाजी ने गरजकर कहा-"फौज के दीवान! इस समय
कानूनन राजाराम साहब मराठी राज्य के राजा हैं। उनके कानूनी मन्त्री की हैसियत से
मैं अण्णाजी पन्त प्रभुणीकर और राज्य के पेशवा मोरोजी पन्त, हम दोनों आपको
आदेश देते हैं कि राजद्रोह के अपराध में हंबीरराव मोहिते को हथकड़ी लगाओ।
उनकी मुश्कें बाँधकर इसी वक्त खींचते हुए रायगढ़ के बन्दीगृह में ले जाओ।"
अण्णाजी ने एक भयानक तोप को पलीता लगाया था। किन्तु वार खाली
गया। उनके हुक्म की तामील करने के लिए दीवान अपनी जगह से हिला भी नहीं।
इस पर अण्णाजी का चेहरा मिट्टी के बर्तन की तरह काला पड़ गया। अत्यन्त क्रुद्ध
होकर मोरोपन्त के साथ वे बाहर निकल गये। उनके साथ रायगढ़ से आयी पाँच
हजार की फौज बाहर खड़ी थी। किन्तु इस फौज के चारों ओर हंबीरराव की बीस
हजार सेना का सागर फैला हुआ था। फिर भी अपनी सेना की ओर जाते हुए
अण्णाजी गरजे-
"चलो रे! डेरे में घुसकर हंबीरराव की मुश्कें बाँध लो।" तब तक हंबीरराव
192 :: सम्भाजी

दरवाजे पर आकर खड़े हो गये। अण्णाजी और मोरोपन्त का हुक्म बजाने एक भी
सिपाही आगे नहीं बढ़ा। उन दोनों की स्थिति भरे बाजार में हाथ नचाने वाले पागल
जैसी हो गयी। हंबीरराव ने उप सेनापतियों को अपने समीप बुलाया और धीमे स्वर
में कहा, "रूपाजी! आनन्दराव! इन दोनों को पकड़ लीजिए। इन्हें लेकर आज रात
तक पन्हाला पहुँच जाइए। शम्भूमहाराज के सामने यह उपहार प्रस्तुत कीजिए।
उनसे कहिए की कल भोर में पहली किरण के साथ यह हंबीरराव पन्हाला पर
उपस्थित हो जाएगा।"

दो

कार्यों के पहाड़ सामने खड़े थे। अनेक प्रकार के कार्यों का झमेला भी बहुत अधिक
था। असहयोग के कारण स्वराज्य की बिगड़ी हुई अवस्था को पुनः ठीक करना था।
शम्भूराजा पन्हाला पर बहुत सावधान रहते थे। उन्हें नींद नहीं आती थी। उनकी
आँखें जलती मशाल की तरह लाल हो गयी थीं; वे अपने निजी महल में आधी रात
तक व्यस्त थे। इसी बीच उनके सेवक गयाजी ने अन्दर आकर सूचना दी कि
रूपाजी भोसले मिलने के लिए आये हैं। ऐसा कहकर रायाजी बाहर चला गया।
शम्भूराजा ने अपना कमरबन्द ठीक किया। गले में पहिनी कौड़ियों की माला से
खेलते हुए शम्भूराजा बाहर के दालान में आ गये। रूपाजी ने झट से उठकर
शम्भूराजा का अभिवादन किया और बड़ी प्रसन्नता से ऊँची आवाज में बोले,
"महाराज हम जीत गये। आपको कैद करने वालों के ही हाथों में बेड़ियाँ पड़
गयीं।"
"मतलब ?"
आज दोपहर अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त को कराड के समीप हंबीररावजी
ने कैद कर लिया। उनकी मुश्कें बाँधकर उन्हें ही कर पन्हालगढ़ आये हैं। कल
सुबह तक हंबीरराव भी आपकी सेवा में उपस्थित होंगे।
"उत्तम! बहुत अच्छा! कैदियों को बन्दीखाने में बन्द कर दो। उन पर कड़ी
नजर रखो। बाकी सब कल देखेंगे।" शम्भूराजा ने बड़ी प्रसन्नता से कहा।
रायगढ़ पर कहने के लिए कोई भी राजा हो किन्तु स्वराज्य की जनता
शम्भूराजा को ही सच्चा उत्तराधिकारी मानती थी। इसलिए पन्हालगढ़ पर उनसे
मिलने के लिए सवारों और सैनिकों का निरन्तर ताँता लगा रहता था।
अभी-अभी मिला समाचार कुछ साधारण नहीं था। राजनीतिक दृष्टि से

सम्भाजी :: 193

अण्णाजी पन्त और मोरोपन्त की गिरफ्तारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। स्वराज्य के
सेनापति शम्भूराजा से मिलने आ रहे थे। कल सारी सेना महाराज से आकर मिलेगी।
इस एक घटना से भीतरी एवं सरहद पार के शत्रुओं को एक जबरदस्त झटका मिलने
वाला था। अधिक सोच-विचार किये बिना शम्भूराजा ने येसूबाई को जगा दिया।
पैरों को पेट में सिकोड़े भवानीबाई सोई थीं। उन्हें हल्के हाथों से अलग करके
येसूबाई उठ गयीं। शम्भूराजा को अचानक देखकर उन्हें कुछ घबराहट हुई। राजा ने
सुखद समाचार उन्हें सुनाया। समाचार सुनकर साम्राज्ञी तरोताजा हो गयीं। मन
हल्का हो गया। उन्होंने धीरे से पूछा, "कल हंबीरराव राजा से कहाँ मिलेंगे?"
"यहाँ, निजी महल में।"
"ऐसा कैसे महाराज! हंबीरराव मामा का यथोचित स्वागत करने के लिए
कल पन्हाला पर दरबार लगाइए।"
"कल्पना तो अच्छी है। किन्तु येसू! अपना सिंहासन तो वहाँ रायगढ़ पर
है।"
"उसकी चिन्ता महाराज को नहीं करनी है। आपके जैसा बहादुर राजा जहाँ
खड़ा हो जाता है, वहीं सिंहासन निर्मित हो जाता है।"
रात को ही सभी को खबर भेज दी गयी दूसरे दिन पन्हाला पर एक छोटा-
सा दरबार लगाया गया। सेनापति हंबीरराव युवराज के पक्ष में सम्मिलित हो रहे हैं।
यह सुनकर चारों ओर आनन्द छा गया। दरबार सभी अधिकारी और कार्यकर्ता
हंबीरराव के रास्ते में पलकें बिछाए खड़े रहे।
इसी समय लम्बे शरीर वाले हट्टे-कट्टे हंबीरराव ने बड़ी शान से दरबार में
प्रवेश किया। उनकी फौजी-पगड़ी में मणियों की माला चमक रही थी। उन्होंने बड़े
आदर भाव से संभाजी महाराज को झुककर अभिवादन किया। महाराज भाव-विभोर
हो गये। हंबीरराव ने झट से उनकी कलाई पकड़ ली। दोनों एक दूसरे के गले से
लिपट गये।
शम्भूराजा को भी पक्का विश्वास नहीं था कि राजाराम का पक्ष और अपनी
सगी बहन का हठ ठुकराकर हंबीरराव शम्भूराजा से आकर मिलेंगे। अपने आचार-
व्यवहार से युवराज और युवराज्ञी को लज्जित किया था। शम्भूराजा ने गद्गद होकर
कहा, "मामा साहब आपके आने से हमें बेहद खुशी हुई है। इसके बाद भी मराठी
राज्य के सुरक्षा की तलवार आपके ही हाथों में रहेगी।"
"शम्भूराजा आप मेरी ओर केवल रिश्तेदारी दृष्टि से ही न देखें। शिवाजी
महाराज मुझसे हमेशा कहते थे—'भोजन के आसपास जैसे रंगोली बनाई जाती है
उतनी ही सीमा में रिश्तों को मर्यादा रखिए'।"
हंबीरराव की आत्मीयता और निष्ठा से शम्भूमहाराज और येसूबाई दोनों
अभिभूत हो गये। शम्भूराजा ने अपने गले का रत्नहार निकालकर हंबीरराव के गले
194 :• सम्भाजी

म डाल दिया। मूल्यवान वस्त्रालंकार भेंटकर उनका बड़ा सम्मान किया। उसी समय
शम्भुराजा ने कहा, ‘‘मामाजी, आज के दरबार में एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति का सम्मान
होना है। ’’
‘‘कौन है ?’’
‘‘मामा साहब, अपने हिरोजी फर्जन्द चाचा। वे आते ही होंगे। ’’ तरुणाई की
मस्ती में हमसे कुछ भूलें न हो जाएँ, इसलिए आप जैसे अनुभवी बुजुर्गों की सलाह
से ही आगे का रास्ता तय करना है। ऐसा हमने निश्चित किया है। हमारे सलाहकारों
में फर्जन्द चाचा भी एक हैं।
दरबार का काम-काज चल ही रहा था कि गोवा से पुर्तगालियों के वकील
रामजी नाइक ठाकुर दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने पोर्चगीज वाइसराय रातांतियो
पाईस द सांदे का पत्र शम्भूमहाराज को दिया। पुर्तगाली वाइसराय ने शिवाजी
महाराज के आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त किया था। इसके बाद इच्छा प्रकट की
थी कि गोवा के पुर्तगालियों और मराठों में भाईचारा बना रहे। पत्र पढ़ते हुए सागर
की नीली-नीली लहरें शम्भुराजा की ओर संकेत करने लगीं। एक ओर गोवा का
अधिक वर्षा वाला किनारा, दूसरी ओर टेढ़ी-मेढ़ी खाड़ियों, घने पेड़-पौधों से भरा
कोंकण का तट। जिसमें पैरों में चुभने वाले साँपों के जहरीले काँटे। जैसे पैरों में
गोखरू अटक जाता है, वैसे ही मूरुड के पास का जंजीरा शम्भुराजा को अस्वस्थ
करने लगा।
दरबार में हंबीरराव ने स्मरण दिलाया—‘‘महाराज ! आपका यहाँ पन्हाला पर
अधिक समय गँवाना उचित नहीं है। शीघ्र से शीघ्र रायगढ़ जाकर वहाँ व्यवस्था
देखना उचित होगा। ’’
‘‘हंबीर मामा ! इतनी उतावली की आवश्यकता नहीं है। यहाँ सेना इकट्ठा
करने का काम हो ही रहा है। आप देख ही रहे हैं, फ्रेंच, अंग्रेज, पोर्चगीज आदि
देश-विदेश के पत्र यहीं आ रहे हैं। उन्हें भी थोड़ा समय देना चाहिए। ’’
दोपहर में मोरोजी पन्त और अण्णाजी दत्तो को शम्भूमहाराज के सामने प्रस्तुत
किया गया। मोरोपन्त की कलाइयाँ सिर्फ डोरी से बँधी थीं किन्तु अण्णाजी दत्तो के
हाथों में फौलादी बड़ी-बड़ी बेड़ियाँ पड़ी थीं। मोरोपन्त के चेहरे का रंग उड़ गया
था। वे बहुत ही खिन्न और अपराधभाव से पीड़ित दिखाई पड़ रहे थे।
शम्भुराजा ने बगल से पहरेदार सिपाही को संकेत से बुलाया। उन्होंने कहा,
‘‘मोरोपन्त की उम्र साठ-सत्तर वर्ष की है। उनकी कलाइयों को बाँधे नहीं। ’’
शम्भुराजा ने अण्णाजी दत्तो की ओर देखा। अण्णाजी ने शर्म से, अपराधभाव
से या क्रोध से अपनी आँखें झुकाई नहीं। जंगली जानवर की तरह मगरूरी से खड़े
रहे। देर तक न रोक पाने के कारण शम्भुराजा ही बोले—
सम्भा 11 195

“अण्णाजी ! आप तो दगाबाजों के सुमेरु मणि हैं ? हमारे विरोध में आपके
षड्यन्त्र और प्रचार का क्या कारण है ? आपको क्षमा करना या आपको छोड़ देना तो
आत्मघात ही होगा।”
बन्दी के रूप में जकड़े हुए होने पर भी अण्णाजी दत्तो पीछे हटने को तैयार
नहीं थे। वे युवराज के सामने झल्लाते हुए कहने लगे—
“शम्भूराजा ! कोई भी विचारवान मनुष्य आप जैसे व्यक्ति से किसी अच्छी
बात की अपेक्षा ही क्यों करेगा ? बड़े महाराज चले गये और उनके साथ ही उनका
बड़प्पन भी चला गया। उनके साथ सत्व भी गया और तत्व भी। इसके बाद अब
गुंडागर्दी के अतिरिक्त मराठी राज्य के भाग्य में हो भी क्या सकेगा ?”
“पन्त, राज्य की इतनी चिन्ता क्यों करते हो ? पहले अपने को देखो। ऐसा
क्या कारण था कि आपने मेरे विरोध में इतना बवाल किया ?”
“कहलवाना चाहते हो ? यदि आपकी शैतानी कम हो गयी हो और थोड़ी
भी सभ्यता संस्कृति बची हो तो बता देता हूँ।”
“सदाचार की भाषा किसी धोखेबाज लोमड़ी के मुँह से शोभा नहीं देती।
बताइए, आपका क्या करें ?”
अण्णाजी दत्तो ने गरजते हुए कहा, “पहले हमारे हाथों पैरों में जो भारी
भरकम बेड़ियाँ डाली हैं उन्हें निकालो।”
“पन्त राजद्रोह के गम्भीर अपराध के लिए यह सादा सा उपहार तो कुछ भी
नहीं है।”
“संभाजी राजा ! राजद्रोह का अपराध आप ही कर रहे हैं। आज रायगढ़ पर
सच्चा राजा कौन है ? उन्हीं के हस्ताक्षर और मुहर वाला आदेश लेकर आये हैं हम।
इसलिए इन बेड़ियों में आपको ही जकड़ा जाना चाहिए।”
संभाजी राजा ने दीर्घ निःश्वास लेते हुए कहा, “क्या करें रस्सी जल गयी,
पर ऐंठन नहीं गयी।”
“शम्भूराजा ! आप पापी हैं, दुर्विनीत हैं और बदचलन भी।” शम्भूराजा की
ओर हाथ उठा उठाकर जोर जोर से चिल्लाने लगे। येसूबाई के चेहरे पर विषाद का
जाल फैल गया। शम्भूराजा ने हंबीरराव की ओर देखा। उसी समय हबीरराव ने
पहरेदार से कहा, “ले जाओ यहाँ से इस बुड्ढे को। ले जाकर बन्दी खाने में फेंक
दो।” मोरोपन्त उसी समय कच्चे कैदखाने में भेज दिया गया। अण्णाजी दत्तो को
अँधेरी काल कोठरी में भेज दिया गया।
बहुत देर तक दरबार का कामकाज चलता रहा। हिरोजी का कहीं पता न था।
दीवान ने दरबार का समय समाप्त होने का संकेत किया। इसी बीच आठ दस
सिपाहियों का जत्था अन्दर आया। सभी शम्भूराजा का अभिवादन करके भयभीत
196 :: सम्भाजी