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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 793 में से

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पृष्ठ 181

दूसरा कोई नहीं कर सकता।'' मोरोपन्त ने बड़े विश्वास मे साफ-साफ कहा,
"यहीं मत रुकिए जरा बाहर भी झाँक कर देखिए कि वहाँ क्या चल रहा है? वहाँ
किले के बाहर मुख्य द्वार के पास पाचाड़, रायगढ़वाड़ी से लेकर महाड़ तक हजारों
की संख्या में प्रजा एकत्र हो रही है। प्रजा जोरदार माँग कर रही है कि—'शम्भुराजा
को ही गद्दी पर बिठाइए।' सेना में तो युवराज का ही हुक्म चलता है। समय की
माँग को पहचानिए, अपनी बुद्धि को ठिकाने रखिए।''
मोरोपन्त के स्पष्ट कथन से अण्णाजी के पक्षधर घबरा गये। इसी समय एक
गद्दी पर बैठे हुए बालाजी पन्त चिटणीस आगे बढ़े और उत्साहित होकर कहने लगे,
"अब सच ही कहना है तो ''
अण्णाजी पन्त ने बालाजी को बीच में ही रोकते हुए कहा, "रुकिए, आप
कुछ मत बोलिए। हमें सब मालूम है।'' उन्होंने मोरोपन्त की ओर रुख करके कहा,
"तो पन्त आपको सेना का डर है। आप भूल गये क्या? सोयराबाई के छोटे भाई
हंबीरराव मोहिते हमारे सेनापति हैं।
"किले पर जो करोड़ों का रत्न भंडार और खजाना है वह हमारे अधिकार में
है। सेनापति हमारे हैं। महारानी भी हमारे पक्ष में हैं। यह सब छोड़कर पन्तजी आप
जाएँगे कहाँ ? उस कवि कलश के पास ?'' अण्णाजी ने कहा।
अण्णाजी एक मंजे हुए अभिनेता की भाँति अपनी भूमिका निभा रहे थे। बात
करते करते कभी अपनी आँखों को वर्तुलाकार घुमाते कभी माथे की पगड़ी को
उतार कर जमीन पर फेंकते। इस बीच उन्होंने दो बार अपनी शिखा को खोला और
फिर से बाँधा। उन्होंने राजाराम के गद्दी पर बैठने के फायदों को फिर से दुहराया।
संभाजी के दुर्व्यवहार, बुरी आदत और क्रोधी स्वभाव का पहाड़ा एक बार फिर
दोहराया। एक बार पुनः कवि कलश के सम्बन्ध में उन्होंने कहा—
"अरे, एक बार शम्भुराजा के उस बदमाश कवि कलश को रायगढ़ पर आने
तो दो। वह जादूगर जब भैंस की गीली खाल पर बैठकर नराधम की तरह
जारण मारण क्रिया करता रहेगा, मन्त्र-तन्त्र के आवेश में सुई और आलपिन से
खाँसी काली गुड़िया की तरह थिरक थिरक कर नाचने लगेगा तब तुम लोगों का
मस्तिष्क ठिकाने पर आएगा।''
कवि कलश से जुड़े अज्ञात भय से सभी घबरा गये। अन्त में बड़ी मेहनत के
बाद अण्णाजी ने अपना वांछित फल अपनी झोली में डाल लिया। उनके प्रस्ताव पर
अन्ततः मोरोपन्त ने भी हामी भर दी।
अण्णाजी पन्त और महारानी सोयराबाई ने अन्ततः चैन की साँस ली। सारी
राजनीति अन्त में उनके मनोनुकूल हो गयी थी। उन्हें लगा कि अब सब ठीक हो
गया है। राजाराम का राज्यारोहण प्रायः निश्चित हो गया था। परन्तु सभी के सामने
सम्भाजी :: 179