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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 793 में से

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पृष्ठ 202

राजमहल में खेल रही नन्ही भवानी की पायल के घुँघरू छम-छम बज रहे थे।
एक सुबह महारानी येसूबाई चौक के बड़े तुलसी चौरे में पानी डाल रही थीं।
तुलसी का पौधा भी बड़ी समृद्धि के साथ पनप रहा था। पीछे से किसी पुरुष के पैर
की आहट मिली। शम्भूमहाराज के चलने की शैली ऐसी नहीं थी। तो फिर बिना
कोई सूचना भेजे अन्तःपुर प्रवेश करने का साहस किसने किया होगा? यह सोचकर
येसूबाई झट से पीछे मुड़ीं तो देखा कि छः फीट लम्बे, दुबले पतले, साँवले, चौड़े
मस्तक बड़ी बड़ी आँखों और घनी मूँछों वाले गणोजी शिर्के वहाँ हँसते हुए खड़े
थे।
येसूबाई ने पूजा शीघ्रता से समाप्त करके भाई का स्वागत किया। गणोजी वहीं
चन्दनी झूले पर आराम से बैठ गये। झूले के झूलने से पतली जंजीरों की आवाज
आने लगी। भविष्य में रायगढ़ की महारानी बनने वाली अपनी छोटी बहन को
गणोजी बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। शिवाजी का करोड़ों मुहरों वाला हिन्दवी
स्वराज्य अब येसूबाई के चरणों के समीप पहुँचने वाला था।
अपने भाई का स्वागत करते हुए येसूबाई ने कहा—
"बड़े भाई साहब, यहाँ आने की बजाय आप सीधे रायगढ़ चले गये होते तो
कितना अच्छा होता? वहाँ के कार्य, वहाँ की व्यवस्थाएँ "
"कितनी चिन्ता करोगी येसू! तुम्हारी प्रतीक्षा के दिन अब समाप्त हो रहे हैं।
तुम्हारा सौभाग्य छाया की तरह तुम्हारा पीछा कर रहा है। लेकिन येसू महारानी के
वस्त्राभूषण धारण करने के बाद अपने इस भाई को भूल तो नहीं जाओगी?"
"भाई साहब कितना मजाक उड़ाएँगे अपनी बहन का?"
"वैसी बात नहीं है। हम गरीबों का तो बस इतना कहना है कि अब आप
सब का भाग्य पूरी तरह खिल गया है, उसमें से थोड़ा प्रकाश अपने भाई की ओर
भी आने दो।"
येसूबाई ने सम्भ्रमित होकर कहा, "ऐसी पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो?"
"पहेली क्या? साफ-साफ तो कह रहा हूँ। एक बार सत्ता के घोड़े पर सवार
होकर राजा ने रकेब में पाँव जमा लिया तो अपने करीबी लोगों को भूल जाते हैं।
इसलिए सोचा कि समय पर स्मरण दिला दूँ तो अच्छा रहेगा।"
येसूबाई आश्चर्य से गणोजी की ओर देखने लगी।
अपने हाथों की उँगलियाँ व्यग्रता से नचाते हुए गणोजी ने कहा, "जिस दिन
रायगढ़ में महारानी के रूप में तुम्हारे सिर पर छत्र और चँवर सुशोभित होगा, उसी
दिन अपने भाई के घर पर भी जागीर का एक छोटा-सा वन्दनवार तुम बाँधोगी तो
बड़ा उपकार होगा?"
"कौन-सी जागीर?"
200 :: सम्भाजी