छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोगों के साथ बाहर निकले। उनके पीछे-पीछे प्रह्लाद निराजी भी निकले। उसी
समय अण्णाजी ने निराजी का हाथ कसकर पकड़ा।
"थोड़ा रुको," उन्होंने आँखों से संकेत किया। बैठक से अन्तःपुर की ओर
जा रहे शिवाजी महाराज को सामने से रोक लिया। विनम्र मुद्रा में उन्होंने बड़ी
व्यग्रता से कहा, "महाराज, आप थोड़ा रुक जाएँगे तो अच्छा होगा। स्वामी से
हमारा एक निवेदन है।"
"बोलो।" महाराज के कदम रुक गये। "रामदास जैसे युगपुरुष ने आपको
इतना सम्मान ऐसे ही नहीं दिया है। जो कुछ भी महाराष्ट्र-धर्म बचा है वह केवल
आपके कारण। ऐसे अपने महाराज से हम थोड़े न्याय, थोड़े न्यायोचित बर्ताव की
माँग करें तो गलत तो नहीं होगा?"
"पन्त ऐसा आड़ा-टेढ़ा क्यों बोल रहे हो? जो कुछ कहना है साफ-साफ
बोलो।" महाराज ने कहा।
"अजी अण्णाजी, महाराज जल्दी में हैं, इतना लम्बा-चौड़ा भाषण क्यों दे
रहे हो?" बालाजी आवजी ने बीच में ही टोका।
अण्णाजी को बालाजी की चाटुकारिता पर बहुत क्रोध आया। वे अपना एक
हाथ उठाकर न्यायाधीश की मुद्रा में बोले, "मुझे इतना ही कहना है कि स्वराज्य
द्रोह जैसे अपराध के लिए शिवाजी महाराज के पास तिनके जितनी भी दया नहीं
होती है।"
शिवाजी महाराज का चेहरा अत्यन्त भ्रमित हो गया। उस समय बालाजी को
छोड़कर शेष सभी अधिकारी काँप उठे थे। लोगों को आश्चर्य था कि ऐसी साहसी
धृष्टता अण्णाजी कर सकते हैं? अण्णाजी का आक्रामक रुख महाराज ने पहले ही
पहचान लिया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "देखो अण्णाजी, इस प्रकार यहाँ-
वहाँ ऐसे ही घोड़े दौड़ाते मत घूमो। तुम्हारी शम्भूराजा के बारे में जो शिकायत हो
एक बार साफ-साफ बोल दो और मुक्त हो जाओ।"
अण्णाजी अपराधी की मुद्रा में खड़े हो गये। किन्तु शीघ्र ही साहस बटोरते
हुए बोले, "क्षमा करें महाराज! मैं ही नहीं धर्मशास्त्र भी यही सिखाता है कि न्याय
के पलड़े में एक चरवाहे और युवराज का स्थान समान होता है।"
अण्णाजी ने अपने उत्तरीय से चेहरे का पसीना पोंछा और पुनः हाथ जोड़ते
हुए बोले, "प्रजा को ऐसी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि अपने राज्य में
राजद्रोह के लिए दंड के स्थान पर पुरस्कार मिलता है। अपराधी स्वतन्त्र होकर घूमते
हैं।"
अन्तःपुर की ओर जा रहे बड़े महाराज के कदम रुक गये। वे वापस आकर
बैठक में बैठ गये। भरे दरबार में अण्णाजी दत्तो शिवाजी महाराज का विरोध कर रहे
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