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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 793 में से

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पृष्ठ 164

को बहू के रूप में चुन लिया तो हम सभी को अपार हर्ष हुआ।"
महाराज के घर के मंगलकार्य को अपना ही मानकर सभी सरदार कार्य में लग
गये थे। महाराज की निजी बैठक में अष्टप्रधानों की व्यस्तता बढ़ गयी थी। महाराज
स्वयं वर के पिता होने के नाते व्यस्त थे। वे बैठक के बीच में ही उठकर अन्तःपुर
में चले जाते थे। पुनः बैठक में आते थे। सेवक और परिचारक अपना कार्य शीघ्रता
से कर रहे थे।
यह जानकर कि महाराज अन्तःपुर में व्यस्त हैं, बालाजी आवजी ने इसका
फायदा उठाते हुए धीरे से प्रश्न किया, "पन्त यह बात सच है क्या?"
"किस सम्बन्ध में पूछ रहे हैं?"
"यही कि पन्हाला पर येसूबाई और संभाजी को निमन्त्रण नहीं भेजा गया
है?"
"बालाजी! दुर्भाग्य से यह बात सच है।" मोरोपन्त ने दुखी स्वर में कहा।
बालाजी आवजी को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने कहा, "ऐसा कहा जाता है
कि कम-से-कम शादी और मातम में तो किसी भी सम्बन्धी को भूलना नहीं
चाहिए। शम्भूमहाराज तो राजाराम के बड़े भाई हैं।"
वे दोनों धीमी आवाज में बात करने का प्रयास कर रहे थे। किन्तु उनका सारा
भाषण दूसरी ओर बैठे अण्णाजी दत्तो के कानों में पड़ गया। उन्होंने सिर पर बँधे
रूमाल को अलग किया। अपनी सफेद दाढ़ी में उँगलियों को घुमाते हुए झूठी हँसी
हँसते हुए कहा, "दूध में नमक और विवाह जैसे मंगल कार्य में अनाहूत मेहमान
चाहिए ही क्यों?"
बालाजी ने कहा, "अण्णाजी पन्त! तुम कुछ ज्यादती कर रहे हो।
शम्भूमहाराज के प्रति तुम्हारी रग-रग में क्रोध कूट कूट कर भरा है।"
"युवराज की जवानी के शौक-पर-शौक पूरा करने के लिए जिन लोगों
ने अपनी बहू-बेटियाँ गँवाई हैं, अपने दुःख की यातना वही जानते हैं, बालाजी! दूर
से देखने वाले उसकी कल्पना नहीं कर सकते?" बोलते-बोलते अण्णाजी का गला
भर आया।
बैठक का रंग उड़ गया। अण्णाजी की जहरीली वाणी से सभी लोग
चुप हो गये।
बड़े महाराज के भय से सभी अष्टप्रधान आपस में ऐसा व्यवहार कर रहे थे
जैसे उनमें परस्पर बड़ा सौहार्द हो किन्तु वास्तव में उनके बीच बहुत तू-तू मैं-मैं
होती थी। मोरोपन्त और अण्णाजी में भी सौमनस्य नहीं था। इसीलिए बड़े महाराज
किसी भी लड़ाई पर दोनों को माथ नहीं भेजते थे।
दोपहर का समय हो गया। बैठक ममाप्त हो गयी। पेशवा मोरोपन्त भी अन्य
162 .: सम्भाजी