चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 551, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६७
मिला कर खाना चाहिये । इसी प्रकार ( २ ) पिप्पलीमूल के कल्क से घृत को
सिद्ध करके गुड और यवक्षार का प्रक्षेप देकर खाना चाहिये । ( ३ ) पिप्पली,
पिप्पलीमूल, सोठ और धनिया इनके कल्क से दही मे घृत सिद्ध करना चाहिये ।
ये तीनो घृत वायु और मल के विबन्ध को नष्ट करते है ॥१०६-१०७॥
चव्यं त्रिकटुकं पाठां क्षारं कुस्तुम्बुरूरणि च ।
यवानी पिप्पलीमूलमुभे च बिडसैन्धवे ॥ १०८ ॥
चित्रकं बिल्वमभया पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ।
शकृद्वातानुलोम्यार्थं जाते दध्नि चतुर्गुणे ॥ १०६ ॥
प्रवाहिका गुदभ्रंशं मूत्रकृच्छ्रं परिस्रवम् ।
गुदवंक्षणशूलं च घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ११० ॥
( २५ ) चव्याद्य घृत—चव्य, सोठ, मरिच, पिप्पली, पाठा, यवक्षार, हरा
धनिया, अजवायन, पिप्पलीमूल, बिड् नमक, सैन्धव, चित्रक, बेलगिरी, हरड़
इन चौदह द्रव्या को पीस कर कल्क ( २० तोला ) तैयार करना चाहिये ।
दही ( ४ सेर ) ओर घृत ( १ सेर ) लेकर वायु, मल के अनुलोमन के लिये
घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत प्रवाहिका, गुदभ्रंश, मूत्रकृच्छू, परिस्रव
( पिच्छास्राव ), गुदाशूल और वक्षण शूल को नष्ट करता है ॥१०८-११०॥
नागरं पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली ।
श्वदंष्ट्रा पिप्पली धान्यं बिल्वं पाठा यवानिका ॥ १११ ॥
चाङ्गेरीस्वरसे सर्पिः कल्कैरेतैर्विपाचयेत् ।
चतुर्गुणेन दध्ना च तद् घृतं कफवातनुत् ॥ ११२ ॥
अर्शसि ग्रहणीदोषं मूत्रकृच्छ्र प्रवाहिकाम् ।
गुदभ्रंशार्तिमानाहं घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ११३ ॥
इति नागरादिघृतम् ।
( २६ ) नागराद्य घृत—सोठ, पिप्पलीमूल, चित्रक, गजपिप्पली, गोखरू,
पिप्पली, धनिया, बेलगिरी, पाठा, अजवायन इनको समान भाग लेकर इनका
कल्क ( २० तोला ), चागेरी ( तिपतिया ) का स्वरस ४ सेर, दही ४ सेर ओर
घी १ सेर लेकर घृत पकाना चाहिये । यह घृत कफ और वायु का नाश करता
है । अर्श, ग्रहणीरोग, मूत्रकृच्छ्र, प्रवाहिका, गुदभ्रंश और आनाह-रोग
मे हितकारी है ॥ १११-११३ ॥
पिप्पलीं नागरं पाठां श्वदंष्ट्रां च पृथक् पृथक् ।
भागांस्त्रिपलिकान्कृत्वा कषायमुपकल्पयेत् ॥ ११४ ॥