चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५२ चरकसंहिता [ अ० ४
यो रसान्न विजानाति न वा जानाति तत्त्वतः ।
मुखपाकादृते पक्कं तमाहुः कुशला नरम् ॥ २२ ॥
( १६ ) जो मनुष्य 'मुख-पाक' के बिना ही रसों को नहीं जानता अथवा
रसों को उनके स्वकीय रूप (जैसे हैं वैसे रूप ) में नहीं पहिचानता, वह
शीघ्र मर जाता है, कुशल पुरुष उसकी आयु को पूर्ण हुई कहते हैं ॥ २२ ॥
उष्णान्वाशीतान् खरान् श्लक्ष्णान्मृदूनपि च दारुणान् ।
स्पृश्यान् स्पृष्ट्वा ततोऽन्यत्वं मुमूर्षुस्तेषु मन्यते ॥ २३ ॥
( १७) जो मनुष्य उष्ण, शीत, खर, श्लक्ष्ण, चिकने, कोमल या कठोर
पदार्थों को स्पर्श करके विपरीत रूप में ( यथा उष्ण को शीत और शीत को
उष्ण ) जानता है वह मरणासन्न है ऐसा समझना चाहिये ॥ २३ ॥
अन्तरेण तपस्तीव्रं योगं वा विधिपूर्वकम् ।
इन्द्रियैरधिकं पश्यन् पञ्चत्वमधिगच्छति ॥ २४ ॥
इन्द्रियाणामृते दृष्टेरिन्द्रियार्थान्न पश्यति ।
विपर्ययेण यो विद्यात्तं विद्याद्विगतायुषम् ॥ २५ ॥
स्वस्थाः प्रज्ञाविपर्यस्तैरिन्द्रियार्थेषु वैकृतम् ।
पश्यन्ति ये सुबहुशस्तेषां मरणमादिशेत् ॥ २६ ॥
( १८ ) जो मनुष्य तीव्र तप के बिना अथवा विधिपूर्वक योगसमाधि से
ज्ञान प्राप्त किये बिना, साधारण मनुष्यों से अधिक इन्द्रिय ज्ञान देखता है,
वह मरणासन्न है । [ समाधि-ज्ञान तथा तीव्र तप ही अतीन्द्रिय ज्ञान करा
सकते हैं ] ।
( १९) जो मनुष्य इन्द्रियों की शक्ति से अप्राप्य पदार्थों को इन्द्रियों
द्वारा देखने या प्राप्त करने लगता है वह जीवित नहीं रहता है ।
( २० ) नीरोग, स्वस्थ पुरुष जो कि बुद्धिदोष के कारण प्रायः करके
( एक बार नहीं ) इन्द्रियों के विषयों को विपरीत रूप में अथवा असद् रूप में
देखते हैं वे शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ २४-२६ ॥
तत्र श्लोकाः - एतदिन्द्रियविज्ञानं यः पश्यति यथातथम् ।
मरणं जीवितं चैव स भिषग्ज्ञातुमर्हति ॥ २७ ॥
जो पुरुष इस इन्द्रिय विज्ञान को भली प्रकार से देखता है, वह वैद्य मृत्यु
और जीवन दोनों को भली प्रकार से जान सकता है ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने
इन्द्रियानीकमिन्द्रियं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥