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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 639 में से

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पृष्ठ 93

अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७५
एक दम जोर से नहीं आ सकना, और मात्रा तथा उचित समय में सेवन
किया हुआ धूम इन्द्रियों को पीड़ा नहीं पहुंचाता ।
उत्तम प्रकार से किये हुए धूम्रपान के लक्षण—
जब उरः ( वक्षःस्थल ), कण्ठ ( गला ), शिर का हल्के होना और कफ
पतला हो जाये या घट जाये तब धूम अच्छी प्रकार से पीया हुआ समझना चाहिये ।
अयोग्य रूप में पिये हुए धूम के लक्षण—
अविशुद्धः स्वरो यस्य कण्ठश्च सकफो भवेत् ॥ ५१ ॥
स्तिमितो मस्तकश्चैवमपीतं धूममादिशेत् ।
जिस पुरुष का स्वर, अविशुद्ध स्पष्ट साफ न हुआ हो कफयुक्त हो एवं
जिसका गला कफयुक्त हो, और मस्तिष्क स्तिमित अर्थात् जकड़ा हुआ भारी प्रतीत
होता है उसने ठीक प्रकार से धूम नहीं पिया ऐसा समझना चाहिये ॥ ५१ ॥
अतियोग के रूप में धूम्रपान के लक्षण—
तालुर्मूर्द्धा च कण्ठश्च शुष्यते परितप्यते ॥ ५२ ॥
तृष्यते मुह्यते जन्तू रक्तं च स्रवतेऽधिकम् ।
शिरश्च भ्रमतेऽत्यर्थं मूर्च्छा चास्योपजायते ॥ ५३ ॥
इन्द्रियाण्युपतप्यन्ते धूमेऽत्यर्थं निषेविते ।
तालु, मूर्द्धा ( शिर ) और कण्ठ (गला) खुश्क हो जाते हैं और जलते हैं,
इनमें जलन होती है । जन्तु ( पुरुष) को प्यास लगती है, मूर्छा आ जाती है,
विशेष रूप से रक्तस्राव होता है, शिर घूमता है, मूर्छा बेहोशी आ जाती है,
और इन्द्रियों में दाह, जलन होती है, ये अति धूम्रपान के लक्षण हैं ॥५२–५३॥
नस्य प्रयोग—
वर्षे वर्षेऽणुतैलं च कालेषु त्रिषु नाऽऽचरेत् ॥ ५४ ॥
प्रावृट्शरद्वसन्तेषु गतमेघे नभस्तले ।
नस्यकर्म यथाकालं यो यथोक्तं निषेवते ॥ ५५ ॥
न तस्य चक्षुर्न घ्राणे न श्रोत्रमुपहन्त्यते ।
न स्युः श्वेता न कपिलाः केशाः श्मश्रूणि वा पुनः ॥ ५६ ॥
न च केशाः प्रलुप्यन्ते वर्धन्ते च विशेषतः ।
मन्यास्तम्भः शिरःशूलमर्दितं हनुसंग्रहः ॥ ५७ ॥
पीनसार्धावभेदौ च शिरःकम्पश्च शाम्यति ।
शिराः शिरःकपालानां सन्धयः स्नायुकण्डराः ॥ ५८ ॥
नावनप्रीणिताश्चास्य लभन्तेऽभ्यधिकं बलम् ।