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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 639 में से

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पृष्ठ 546

५३८ चरकसंहिता [ अ० ५
स्रोतांसि सिरा धमन्यो रसायन्यो रसवाहिन्यो नाड्यः पन्थानो
मार्गाः शरीरच्छिद्राणि संवृतासंवृतानि स्थानान्याशयाः क्षया निकेता-
श्चेति शरीरधात्ववकाशानां लक्ष्यालक्ष्याणां नामानि भवन्ति ॥ १४ ॥
स्रोतों के पर्याय—स्रोत, सिरा, धमनी, रसायनी, रसवाहिनी, नाड़ी, पन्था
मार्ग, शरीरच्छिद्र, संवृत-असंवृत, स्थान, आशय, क्षय और निकेत ये शरीर के
धातुओं को ले जाने के लिये जो आंख से दीखने या न दीखने योग्य छेद हैं
उन स्रोतों के नाम हैं। १४ ॥
तेषां प्रकोपात्स्थानस्थाश्चैव मार्गगाश्चैव शरीरधातवः प्रकोपमाप-
द्यन्ते। इतरेषां च प्रकोपादितराणि। स्रोतांसि स्रोतांस्येव धातवश्च
धातूनेव प्रदूषयन्ति प्रदुष्टाः; तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दूषयि-
तारो भवन्ति, दोषस्वभावादिति ॥ १५ ॥
इन स्रोतों (छिद्रों) के प्रकुपित होने से आशय में स्थित, मार्ग में स्रोतों
से जाने वाले शरीर के धातु भी प्रकुपित हो जाते हैं। दूसरों के प्रकोप से और भ
(स्रोतस्, वातादि दोष) कुपित होकर दुष्ट हुए स्रोत अन्य स्रोतों को दूषित
कर देते हैं। दुष्ट हुए धातु सब धातुओं को दूषित कर देते हैं। सब स्रोतों तथा
धातुओं को दूषित करने वाले वात, पित्त, कफ ही होते हैं। क्योकि दोष स्वभाव
होने से अर्थात् दूषित करना ही इनका स्वभाव है ॥ १५ ॥
भवन्ति चात्र—क्षयात्संधारणाद्रौक्ष्याद् व्यायामात्क्षुधितस्य च।
प्राणवाहीनि दुष्यन्ति स्रोतांस्यन्यैश्च दारुणैः ॥ १६ ॥
औष्ण्यादामाद्भयात्पानादतिशुष्कान्नसेवनात्।
अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात् ॥ १७ ॥
अतिमात्रस्य चाकाले चाहितस्य च भोजनात्।
अन्नवाहीनि दुष्यन्ति वैगुण्यात्पावकस्य च ॥ १८ ॥
गुरुशीतमतिस्निग्धमतिमात्रं समश्नताम्।
रसवाहीनि दुष्यन्ति चिन्त्यानां चातिचिन्तनात् ॥ १६ ॥
विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च।
रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चाऽऽतपानलौ ॥ २० ॥
अभिष्यन्दीनि भोज्यानि स्थूलानि च गुरूणि च।
मांसवाहीनि दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपतां दिवा ॥ २१ ॥
अव्यायामाद्दिवास्वप्नान्मेध्यानां चातिभक्षणात्।
मेदोवाहीनि दुष्यन्ति वारुण्याश्चातिसेवनात् ॥ २२ ॥