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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 639 में से

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पृष्ठ 277

अ० २२ ] सूत्रस्थानम् २५६
मन्द अथवा पुष्ट शरीर वाले पुरुष को, एवं वात रोगियों को शिशिर काल में
लंघन देना उत्तम है । (शिशिर के समान गुण होने से हेमन्त भी उत्तम है) ।
अदिग्धविद्धमक्लिष्टं वयःस्थं सात्म्यचारिणाम् ।
मृगमत्स्यविहङ्गानां मांसं बृंहणमुच्यते ॥ २५ ॥
क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्बला नित्यमध्वगाः ।
स्त्रीमद्यनित्या ग्रीष्मे च बृंहणीया नराः स्मृताः ॥ २६ ॥
शोषार्शो-ग्रहणीदोषैर्व्याधिभिः कर्शिताश्च ये ।
तेषां क्रव्यादमांसानां बृंहणा लघवो रसाः ॥ २७ ॥
स्नानमुत्सादनं स्वप्नो मधुराः स्नेहबस्तयः ।
शर्करा क्षीरसर्पींषि सर्वेषां विद्धि बृंहणम् ॥ २८ ॥
विषयुक्त शस्त्र से न मारे हुए, नीरोगी, जवान, सात्म्यवस्तु को खाने वाले
एवं सात्म्य स्थान में चरने वाले, मृग, मछली या पक्षियों का मांस बृंहण के
लिये उपयुक्त है । ॐ क्षीण रोगी, उरःक्षत का रोगी, कृश, वृद्ध, दुर्बल, रोज़
सफ़र ( परिश्रम ) करने वाले, स्त्रीसेवी, मद्यसेवी पुरुषों का ग्रीष्म काल में
बृंहण करना चाहिये । शोष, अर्श, ग्रहणीरोग के कारण जो पुरुष निर्बल हो
गये हैं, उनको मांस खाने वाले पशु-पक्षियों के मांस से बृंहण करना चाहिये ।
मांस को संस्कार द्वारा लघु बना लेना चाहिये, अथवा लघु गुण वाले पक्षी
बाज़ आदि का मांस प्रयोग करना चाहिये । स्नान, उबटन, निद्रा मधुर एवं स्नेह
युक्त बस्ति या, शक्कर, घी, दूध ये वस्तुऐं सब पुरुषों का बृंहण करती हैं ॥२८॥
कटु-तिक्त-कषायाणां सेवनं स्त्रीष्वसंयमः ।
खलि-पिण्याक-तक्राणां मध्वादीनां च रूक्षणम् ॥ २६ ॥
अभिष्यन्दा महादोषा मर्मस्था व्याधयश्च ये ।
ऊरुस्तम्भप्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः ॥ ३० ॥
कडुए, तीखे, कषाय रस का सेवन, अति स्त्रीसंग, सरसों की खल, तिल
की खल, तक्र और मधु ( शहद ) आदि विरूक्षण करने वाले हैं । कफरोगी,
वातरोगी और जिन को मर्म स्थान के रोग ( ऊरुस्तम्भ 'आढ्यवात, प्रमेह
आदि ) हों उनका विरूक्षण उपचार करना चाहिये ॥ २६-३० ॥
ॐ घर में पाले या रक्खे पक्षी या मछलियों का मांस लाभकर नहीं है। जो
पशु-पक्षी अपने स्वाभाविक रूप में रहते हैं और अपना स्वाभाविक आहार लेते
हैं; उन का मांस ही लाभदायक है ।