चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ चरकसंहिता [ अ० २२
चिकना, स्नेह युक्त, भारी, शीतल, मन्द ( चिरकारी ) और मृदु होता है, वह
प्रायः करके 'स्नेहन' होता है। उष्ण, तीक्ष्ण, बहने बाला, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म,
द्रव, स्थिर, और भारी जो पदार्थ होता है, वह प्रायः करके 'स्वेदन' होता है।
शीत, मन्द, मृदु, श्लक्ष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव और स्थिर तथा लघु होता है। वह
द्रव्य प्रायः करके 'स्तम्भन' होता है ॥ १२-१७ ॥
चतुष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा मारुतातपौ ।
पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्घनम् ॥ १८ ॥
प्रभूत-श्लेष्म-पित्तास्र-मलाः संसृष्टमारुताः ।
बृहच्छरीरा बलिनो लङ्घनीया विशुद्धिभिः ॥ १६ ॥
येषां मध्यबला रोगाः कफपित्तसमुत्थिताः ।
वम्यतीसार-हृद्रोग-विसूच्यलसक-ज्वराः ॥ २० ॥
विबन्ध-गौरवोद्गार-हृल्लासारोचकादयः ।
पाचनांस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणाऽऽदावुपाचरेत् ॥२१॥
एत एव यथोद्दिष्टा येषामल्पबला गदाः ।
पिपासानिग्रहैस्तेषामुपवासैश्च ताञ्जयेत् ॥ २२ ॥
रोगाञ्जयेन्मध्यबलान् व्यायामातपमारुतैः ।
बलिनां किं पुनर्यैषां रोगाणामवरं बलम् ॥ २३ ॥
त्वग्दोषिणां प्रमूढानां स्निग्धाभिष्यन्दिबृंहिणाम् ।
शिशिरे लङ्घनं शस्तमपि वातविकारिणाम् ॥ २४ ॥
चार प्रकार की शुद्धि अर्थात्—वमन, विरेचन, नस्य और आस्थापन
बस्ति; प्यास का रोकना, वायु और धूप का सहना, पाचन, उपवास और
व्यायाम ये शरीर में लघुता उत्पन्न करते हैं। जिन पुरुषों में कफ, पित्त, रक्त और
मल बहुत बढ़े हों, जिन को वात रोग हो, जिनका शरीर बहुत बड़ा हो, बलवान्
हो, उनको वमन विरेचन आदि संशोधन द्वारा लंघन देना चाहिये और जिन
मध्यम बल वाले पुरुषों में कफ, पित्त से उत्पन्न रोग हों, जिन को वमन, अती-
सार, हृदय रोग, विसूचिका, अलसक, ज्वर, विबन्ध, गौरव, उद्गार, बेचैनी,
अरुचि आदि (अजीर्ण) हों, उनको वैद्य प्रथम पाचन औषधियों से लंघन
देकर चिकित्सा करे। यही रोग यदि अल्पबलवाले पुरुष को हो तो पिपासा
के रोकने से और उपवास द्वारा लंघन कराके शान्त कराना चाहिये। मध्यम
बलवाले रोगों को व्यायाम, धूप और वायु के सेवन से लंघन कराना चाहिये।
इसी प्रकार बलवान् पुरुषों में जब रोग का बल न्यून हो, तब भी व्यायाम द्वारा
लंघन कराना चाहिये। त्वचा के दोष वाले, प्रमेह रोगियों को, स्निग्ध वा अभि-