चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 344, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें९—सम । १०—ठन । ११—जरतै । १२—भाग न । १३—महारब
औ बटपार । १४—सिरजन गये भेपार ।
टिप्पणी—(१) इन्द्र—द्वन्द्व । उद्वेग—उद्वेग । उचाट—खिंचता । (प्रथम वाचनमें
ये शब्द “दण्डदीक व्यबात' पढ़े गये थे। पर उनका कोई अर्थ
नहीं जान पड़ा। अन्य कोई पाठ समझमें नहीं आता । मिरगावर्तिमें
कई स्थानोंपर इस वाक्यांश का प्रयोग हुआ है । भारत कला भवन
काशीमें इसके कैथी लिपिमें लिखित कुछ सचित्र पृष्ठ हैं । उसमें यही
पाठ है । उसीके आधारपर हमने प्रस्तुत पाठ ग्रहण किया है किन्तु
हमें इस पाठ और अर्थसे सन्तोष नहीं है ।
(३) आध—अध । दरब—द्रव्य । जरब दरब—धन दौलत । वाजार—
घर ।
(४) अह्वर शामीर—रात दिन । दी—अग्नि ।
(५) वै—से । जरतै—जलते हुए ।
(६) बटपार—बटमार, रास्तेमें लूटनेवाले लुटेरे ।
४१८
( फील्ड्स ४१८ : बम्बई ५१ )
कैफियते दर फिराक सिरजन गायद
( सिरजनकी विरह अवस्था )
मिरिग जा पन्थ लांघि कहूँ जाहीं । धूम¹ धरन हाइ जाइ पराही ॥१
जाँवत परिख उरधि उड़ि गये । किशन बरन कोइला जरि³ भये ॥२
घालहु मिरजन होइ भाँवारा । फारिया दहुँ नाउ गुनधारा ॥३
मायर दाहि मँछि ददिदहे । टहे करंजवा जलहर अहे ॥४
अइस झार विरह क भइ । धरती दाहि गगन लहि गइ ॥५
मरग चँदरमँहि मेला, औ घूम पखि भइ कार ।६
सिरजन बनिज तुम्हारे", उबर [पूह न प*]ार ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—अज फिराक मैना आहूवान सोख्तन व अनपरान दग्गी व
आहियान दर आव साख्तन (मैनाके विरहमे हिरनों पशुओं और
जलचरोंका जल उठना)