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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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पृष्ठ 335

३ २
इस प्रकार तीन शब्द या शब्द-खण्ड हैं जो 'के वया के' पढ़े जा
सकते हैं । उन्हें 'वैप दिया क' भी पढ़ सकते हैं । पहला पाठ अर्थ-
हीन है । दूसरे पाठका अर्थ होगा—'हवसकी व्यथाको' । इस
अर्थके साथ पाठ ग्रहण किया जा सकता है । जो भी हो, पाठ
सन्दिग्ध है ।
(३) हरबइ—(स० स्मृ धातुका प्रा० यात्वादेश हरइ) याद करती है
चिन्तन करती है; सोचती है । भास बेआसी—बिना आशाके
आशा । निरासी—निराश ।
(५) पुरावइ—व्यतीत करती है । बचनहर—शब्द ।
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(रीसेंण्ड्स ५८३ : बम्बई ४८)
पुरखीदने सोझिन सिरमन य पुरखीदने अरुवारे गोरक
(झोझिनका सिरजनसे गोरककी खबर पूछना)
दीदी सुनउ सुनी एक बाता । आवा ठाँव कहा दोसौ साता ॥१
केंरें आइ सेंकट¹ कें मेला । पूछहु आन कवन मुँह खोला² ॥२
झोझिन नायक परहि³ पुछावा । पूछसि ठाँव कहाँ⁴ हुत आवा ॥३
कउन मनिज लादेते⁵ पर परधाना । कउन रात⁶ तुम्ह देत⁷ पयाना ॥४
कउन लोग घर कहाँ तुम्हारा । कउन नाँउ किंह कुटुंब हँकारा⁸ ॥५
आसा सुषुधैं पूछउँ, को परदेसी आइ ।६
मोर धार परबस बिरोधा, सुखहिं जाहि को पाइ⁹ ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—सुनीदने मैना व झोझिन कि कसी ताजस्यान अस तरफे हरदौं
आमद (मैना और झोझिनका सुनना कि हरदौरी ओरसे कोई वणिक
आया है) ।
१—कौंदे सैंकट आइ । २—पूछेउ ठाँव कवन मुखं लेग । ३—
मन्दिर । ४—कहवाँ । ५—वाषो । ६—रेत । ७—दैत । ८—
हमारा । ९—आसा षड़पै हीं हुत, पूछउ को परदेशी आड ।
⁹ —पाठ ।
टिप्पणी—(१) दीदी—मैनाने यहाँ अपनी सासको 'दीदी' सम्बोधित किया है जो
असाधारण है । कड़वक ४६ में मैनाकी ननदने अपनी माँके लिए इस