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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१८७

रस अहार सँह देह अघाई । बिरह झारें रस न बुझाई ॥३
पहुल रसायन देखेउँ चाखी । रस कहहानी कहु महँ माखी ॥४
रस कै रात सपूरन [मानइ*] । औ रस मन सुख निंदरा आवइ ॥५
कहहु रस पचन बिरस्पत, जिहिं चित करउँ मिठाइ ।६
रस के घड़े भरावहु, दुख संताप सब जाइ ॥७

१८५
( सोरिनुद्दम् १४१ )
जबान दादन बिरस्पतका चाँदा रा
( बिरस्पतका चान्दको उत्तर )
तूँ रस बिरस चाँद का जानसि । हाँ रस कहौं घिरत ओ सानसि ॥१
घिरत खाँड सोँ करउँ मेरावा । चाँद लइस अपनहि तुम पावा ॥२
रस पर जिहि कै परै अहारू । रसहि पूर आछहिँ ससारू ॥३
रस कें दाध अन-पानि न भावा । रसजो आन भाँखद पड़ लावा ॥४
रस कें मात चितहि जो घरसी । रस कै घड़े बिरस जनु करसी ॥५
रस कै कुण्ड परा मदि, सँवर गुन खीर ।६
रस कह घूंट घरु माँह, चाँदा लावहु तीर ॥७

१८६
( सोरिनुद्दम् १४२ )
ज्याबदादन चाँदा बर बिरस्पत रा बागुस्सा
( चाँइका बिरस्पत पर क्रोध )
निलज बिरस्पत लाजन धरसी। महि बिगरािर सा मग्भर करसी ॥१
बिरस्पत ताँइँ मन अस आवा । जो हैं मदि मैयर दिगगया ॥२
बिहुँ रन चाँद गुरुज दिगगया । तिहँ दिन हून पड़ि अउर न भावा ॥३
नैन पँगि चित्त छीनसि थानूँ । पाप कीन्हि हां अन्न न खानूँ ॥४
हँ जा देगाइ बिरस्पत कहा । मा हीउ मं लागि पिस रहा ॥५