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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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पृष्ठ 214

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( रिसंग्रहम १२७ )
बाज गश्तन चाँद अज़ बुतखाना व आमदने ब खानये खुद
( चाँदका मन्दिरसे घर लौटना )
बाहर मदिर चाँद जो आई । सूरुज दिसत मुख गा कुँमलाई ॥१
पूछी चाँद बिरस्पत धाई । काह कहाँ कछु कही न जाइ ॥२
जोहि सीस मँझि कहुँ नाया । परा मुरुस मुख बकत न आवा ॥३
डार्य पाउ सर हर न सँभारी । धुन धुन सीस मंदिर सौं मारी ॥४
हार पिराइ सहेलिहिं दीन्हा । हँस कें चाँद पहिर गिय लीन्हा ॥५
कहा बिरस्पत चाँदा, चलहु बेग घर जाहिं ।६
चाँद सुरुज हैं अँधवत, महरी घरे डराहिं ॥७
टिप्पणी—(१) जोहि—जैसे ही; जिस समय; कर । बकत—बोली आवाज ।
(४) पाउ—पैर ।
(७) अँधवत—डूब रहे । घरे—घर पर ।
१८०-१८१
( अप्राप्त )
१८२
( रिसंग्रहम १२८ । बम्बई ९ )
बकियत दर तनहाइये लोरक शुबद
( लोरककी एकान्तताका वर्णन )
माता पिता पन्धु¹ न भाई² । मग न साथी मीत न धाइ³ ॥१
इहँ पनगंट कइ पाव न आवइ । पा३ग परन मुख नीर चुआवइँ ॥२
दह दिपन जीउ भर भंगाग । पॉपनि भीमतारि गदि पाग ॥३
सपन यनक में फलु दगा । भिन नवैमारउँ मग्न पिगरा ॥४
काह उगाह पैसार गँभार । इहँ कथा फल दइँ⁵ ईंकार ॥५