सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

११४
होता है। हरियांत—हल्का हरा रंग ऐसा रंग जिसमें हरीतिमा की
भाभा हो ।
(१) पखारी—पंख से युक्त ।
९९
(रौकेण्ड्स ५७)
सिफते पीलाने राव रूपचन्द गोयन्द
(राव रूपचन्द के हाथी)
पखरे हस्त दाँत बहिराये । धानुक लै ऊपर बैसाये ॥१
बनखंड जैस चले अविकारे । आने आनु मेघ अँधकारे ॥२
चलन लाग जनु चलहिं पहारा । छाँह परै अग मा अँधियारा ॥३
झँकरहि घोटहिं बाँकुस लागे । बर दस कोस सहस अग भागे॥४
जो कोपहिं तो राइ सँभारहिं । बन तरुवर अर मूर उपारहिं ॥५
सींकर पाइ बानि उठ, तरै काँदो होइ ।६
राठ रूपचंद कोपा, तेग न पारे कोइ ॥७
टिप्पणी—(१) पखरे—पाखर; हाथीके दोनों कानोंकी लोहेकी झूल । बहिराये—
निकाले हुए । धानुक—धनुर्धारी सैनिक ।
(४) बर—आगे ।
(५) अर मूर—जड़मूल ।
(६) काँदो—कीचड़ ।
१००
(रौकेण्ड्स ५८)
सिफते कूच कर्दने राव बाकरफरे काहिरा
(सेनाकी कूच)
सबही गजदल भयउ पयाना । ठोके सबल देत अँगराना ॥१
अफछत फौज चले असवारा । कोस बीस सग भयउ पसारा ॥२
आगं परे नीर खीर पावइ । पाछ रहे सो धूर पकावइ ॥३
सगरैं देस भइउ डर छावा । सबै नराएँ राउ चल आवा ॥४
उठे खेह अरु खग न पागा । जानु सरग परती होइ लागा ॥५