चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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(रॉइण्ड्स १२)
सिफत करूसहाय राय महर गोयद
(राय महरके महलोंका वर्णन)
पुनि हौं कहौं धौराहर पाता । इंगुर पानि ढार कइ राता ॥१
सतखंड पाटा आनों भाँती । सात चौखण्डी मयी जिह पाँती ॥२
चौरासी [ ] बसे उछाई । छत्री दररें अती सुहाई ॥३
अस रचना कै कीन बनाई । सातौँ कलस धरै सुनपानी ॥४
कनक खम्भ जड़ मानिक परे । जगमगाहिं जनु सरउँ भरे ॥५
अगर चंदन अन्तो लै, अछर सुहावन बास ।६
देख लोग अस भाखहिं, महुँ आइ कबिलास ॥७
टिप्पणी-(१) धौराहर-ध वलहगृह राजमहलके भीतर रनिवास धौराहर
कहलाता था । इसे अन्तःपुर भी कहते थे ।
(२) सतखंड-सप्तभूमिक प्रासाद सप्तमंजिला महल । इस प्रकारके
राजप्रासादोंकी कल्पना गुप्तकालसे ही इस देशम प्रचलित थी ।
दतियामे सतखण्डी दतीका बीरसिंह देवका महल सतखण्डा है ।
आनों-अन्यान्य अनेक प्रकारके भाँति-भाँतिके तरह-तरहक ।
लोकमें बहु प्रचलित इस सीधे सादे शब्दसे परिचित न होनेके कारण
माताप्रसाद गुप्तने पद्मावत और मधुमालतीमे सर्वत्र फारसी लिपिमें
लिखे 'अलिफ़', 'नून' 'वाव' 'नून'को अनबन' पढा है और
उसके अनकन <अन्यवर्णके विकृत पाठ होनेकी क्लिष्ट कल्पना की
है । चौखण्डी-चार खण्डकी चौकियाँ अथवा बुर्ज ।
(४) कलस-कलश गुम्बद । सुनपानी-सोनेके पानीवाला, सुनहरा ।
(७) महुँ-मानों। कबिलास-स्वर्ग।
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(रॉइण्ड्स १३)
सिफत हरमाँ राय महर हफ्ताद व चहार बूदन्द
(राय महरकी चौरासी रानियोंका उल्लेख)
राय महर रानी चौरासी । एक एक के तर चरि अकासी ॥१
जेकर जेकर होइ ओठनारा । जेकर मंदिर सेज सँभारा ॥२