सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 132 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

७२ चाणक्यनीतिदर्पणः

छन्द--विप्र वृक्ष हैं मूल सन्ध्या वेद शाखा जानिये ।
धर्म कर्म हैं पत्र दोऊ मूल को नहिं नाशिये ॥
जो नष्ट मूल है जाय तो कुछ शाख पात न फूटिये ।
यही नीति सुनीति है की मूल रक्षा कीजिये ॥१३॥

ब्राह्मण वृक्ष के समान है, उसकी जड़ है सन्ध्या, वेद हैं शाखा और कर्म पत्ते हैं। इसलिए मूल ( सन्ध्या ) की यत्न पूर्वक रक्षा करो। क्योंकि जब जड़ ही कट जायगी तो न शाखा रहेगी और न पत्र ही रहेगा ॥१३॥

माता च कमला देवी पिता देवो जनार्दनः ।
बान्धवा विष्णु भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१४॥

दोहा--लक्ष्मी देवी मातु हैं, पिता विष्णु सर्वेश ।
कृष्णभक्त बन्धू सभी, तीन भुवन निज देश ॥१४॥

भक्त मनुष्यकी माता हैं लक्ष्मीजी, विष्णु भगवान् पिता हैं, विष्णुके भक्त भाई बन्धु हैं और तीनों भुवन उसका देश है ॥१४॥

एकवृक्षे समारूढ़ा नानावर्णा विहंगमाः ।
प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना ? ॥१५॥

दोहा--बहु विधि पक्षी एक तरु, जो बैठें निशि आय ।
भोर दशो दिशि उड़ि चलें, कह कोही पछिताय ॥१५॥

विविध वर्ण ( रंग ) के पक्षी एक ही वृक्ष पर रात भर बसेरा करते हैं और सबेरे दशों दिशाओं में उड़ जाते हैं। यही दशा मनुष्यों की भी है, फिर इसके लिये सन्ताप करने की क्या जरूरत ? ॥१५॥

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।