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चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 132 में से

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पृष्ठ 17

चाणक्यनीतिदर्पणः १५

वैश्यों का बल धन है और शूद्रों का बल द्विजाति की सेवा है।१६।

निर्द्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत् ।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वाचाभ्यागतोगृहम् ॥१७॥

दोहा—वेश्या निर्धन पुरुष को, प्रजा पराजित राय।
तजहिं पखेरू निष्फल तरु, खाय अतिथि चल जाय।१७।

धनविहीन पुरुष को वेश्या, शक्तिहीन राजा को प्रजा, जिसका फल झड़ गया है, ऐसे वृक्ष को पक्षी त्याग देते हैं और भोजन कर लेने के बाद अतिथि उस घर को छोड़ देता है।१७।

गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम् ।
प्राप्तविद्यागुरुंशिष्योदग्धारण्यंमृगास्तथा ॥१८॥

दोहा---लेइ दक्षिणा यजमान को, तजि दे ब्राह्मण वर्ग।
पढ़ि शिष्यन गुरु को तजहिं, हरिन दग्ध बन पर्व ॥१८॥

ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान को छोड़ देते हैं। विद्या प्राप्त कर लेने के बाद विद्यार्थी गुरु को छोड़ देता है और जले हुए जंगल को बनैले जीव त्याग देते हैं ॥ १८ ॥

दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्रीक्रियते पुम्भिर्नरःशीघ्रं विनश्यति ॥१९॥

दोहा--पाप दृष्टि दुर्जन दुराचारी दुर्बस जोय।
जेहि नर सों मैत्री करत, अवशि नष्ट सो होय ॥१९॥

दुराचारी, व्यभिचारी, दूषित स्थान के निवासी, इन तीन