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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

परिशिष्ट 1
अतिरिक्त टिप्पणी एवं पाठान्तर

1.10 कक्षीवान्। “आसन्दीवद्दधी” (अष्टाध्यायी 8.2.12) इति निपात्यते, कक्षीवानृषिः।
1.18 अनुवाद और 13.56 क के आधार पर कोष्ठगत 'अदृश्यरूपाश्च' रखा है।
1.24 घ-अनुवाद के आधार पर रिक्त स्थान की पूर्ति की गई है।
1.61 संविष्टः = सुप्तः (रघुवंश 1.95)। देवी = पार्वती। अग्निपुत्र = कार्तिकेय।
2.1 पा० “जन्मजरान्तगस्य”
2.2 कृताकृत = घटिताघटित = गढ़ा हुआ और नहीं गढ़ा हुआ (चाँदी-सोना) - अमरकोष।
2.3 पद्म = दक्षिण दिशा में स्थित दिग्गज। मण्डल = राज्य, देश, हस्तिशाला, हाथियों का घेरा (दे० 5.23)।
2.7 ख-पा० “०मण्डितागः”।
2.25 घ- पा० 'वनं न यायादिति'।
2.33 घ- 'संविबभाज...' = या 'साधुओं की सेवा की'।
2.44 ख-अभिध्या = लोभ। अविवक्षीत्-वह् + सन् + लुङ्।
2.51 'स्वायंभुव सामवेदीय सूक्त का श्रद्धापूर्वक जप किया' - बंगला अनुवाद।
2.54 निपात-नि + पा + क्त। दे०- सो० 18.31
3.1 गीतैर्निबद्धानाि काननानि = संगीत से गूंजते हुए नगर-उद्यानों के बारे में; या उन उद्यानों के बारे में जिनके (सम्बन्ध में) गीत गाये जाते थे।
3.9 क-पा० '०पुष्पलाजं'।
3.26 ग-पा० 'प्रयातुं' के स्थान में 'प्रयान्तं'।
3.31 ख-पा० 'बालेन'-बालक होकर धूल में खेला।
3.53 ग-'स्याद् व्यत्यासो विपर्यासो व्यत्ययश्च विपर्यये'-अमरकोष।
3.57 घ-पा० 'प्रियः प्रियैस्'।
3.60 घ-पा० 'निर्हादवता'।
4.16 सम्भवतः 'काशिसुन्दरी' नाम नही, किन्तु विशेषण; इसका अर्थ होगा 'काशी की रूपवती (वेश्या)'।
4.38 घ-धीरलीलैया चेष्टितं = गम्भीरता का, स्थिर गति-विधि का।
4.56 क-उ + ईमाः = विमाः; पा० 'किं न्विमा'?
ग-पा० 'संमता'।
5.8 ख-पा० 'निवर्त्य'।


5.19 ग-परिग्रह = घर स्वजन साथी सम्पति आदि बन्धन।
5.22 ग-पा० 'परिवर्त्य जनं'।
5.32 ख-लक्ष्म = प्रधान, योग्य।
5.40 निदर्शित = उदाहरण और दृष्टान्त देकर समझाये जानेपर।
5.52 शालभञ्जिका = शालवृक्ष (के काष्ठ) से बनाई गई मूर्ति।
5.53 पा० 'मणिकुण्डलदष्टगण्डलेखम्'।
5.55 योक्त्र = मुख का कोई आभूषण।
5.59 'स्पृष्टं स्फुटं प्रव्यक्तमुल्बणम्'-अमरकोष।
5.66 तदन्तरं = स्वभाव और बाह्य आभूषण का अन्तर; या सुयोग।
5.75 पा०- 'यथा ततुरुग्रश्रेष्ठ'।
5.84 क-पा० 'विकचपङ्कजो'। विकच = विकसित।
घ-पा० 'पुनरहं'।
5.86 ग-पा० 'अकुरुत'।
6.34 ख-पा० 'यशोधर्मभृतां वरं'।
6.37 'उचितदर्शित्वात्' अन्तःपुर या छन्दक के लिए भी हो सकता है। शुभ वस्तुओं को ही देखनेवाले या शुभ संवाद ही सुननेवाले अन्तःपुर में। अथवा, न्यायोचित को देखनेवाला या उचित कर्म करनेवाला में (छन्दक)।
6.57-58 एनं और तं मुकुट के लिए प्रयुक्त हुआ है या असि के लिए? 8.48 से ज्ञात होता है मुकुट के लिए।
7.42 ख-पा० 'सङ्कीर्णधर्मे पतितो०'; 'सङ्कीर्णधर्मा पतितो०'।
7.43 घ-पा० 'बृहस्पतेरप्युदयावहः'।
7.50 बहुमानमीयुः = (उन तपस्वियों ने मन में) उनका बड़ा सम्मान किया।
8.13 रघुवंश 10.7 की व्याख्या में मल्लिनाथ द्वारा उद्धृत।
8.31 ख-'विषाद-जन्य बाष्प से अवरुद्ध वाणी में'। दे० 2.62 ग तथा 8.60 घ।
8.39 घ- 'श्रियं' = या 'राज्यलक्ष्मी को'
8.57 ग-या 'दान देने का अभ्यासी था, माँगने का नहीं'।
8.66 ग घ-'भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि स्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः।'-रघुवंश 14.66।
9.21 घ-पा० 'वित्ताधिपत्यं'। विद् ज्ञाने क्त वित्तम्।
10.2 ख-धृतं च पूतं च = पोषित एवं पवित्रीकृत-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
10.26 घ-'सहीया' यह शब्द केवल बौद्ध-साहित्य में ही पाया जाता है।
10.30 पा० 'स्ववंशप्रतिरूपरूपं' = अपने वंश के अनुरूप रूप को।

बुद्धचरित 121

11.41 ग-भावाः = पदार्थाः-सिद्धान्त कौमुदी, कृदन्त प्रकरण; और दे० बु० च०
12.27
11.45 ग-आसंगकाष्ठ = भारवाही दण्डकाष्ठ-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
11.49 ग घ 'मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः'-वैराग्य शतक ।
11.70 'अव' धातु के अनेक अर्थों को ध्यान में रखते हुए तथा 'आर्यैः' के स्थान में
'आर्यान्' पढ़ते हुए, इस श्लोक का अर्थ यह होगा-
इन्द्र के समान रक्षा करें, आकाश के सूर्य के समान सदा प्रज्वलित हों,
सद्गुणों से शोभित हों, इस संसार में श्रेय को समझें, पृथ्वी का पालन करें, (दीर्घ)
आयु प्राप्त करें, सज्जनों व सत्पुत्रों को तृप्त करें, ऐश्वर्य की वृद्धि करें; हे राजन्,
अपने धर्म से लिपटे रहें (या स्वधर्म का आचरण करें) ।
13.60 यही श्लोक परिमार्जित रूप से भास-प्रणीत प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटक में
आया है।
14.14 उत्तरार्ध का यह अर्थ भी होगा-
कोई-कोई लौहचंचु धृष्ट कौओं द्वारा, जो लोहे के बने-से लगते हैं, खाये जाते
हैं।
समाप्त
3.7.2021
122 अश्वघोष