बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ]
71 तब उन्होंने चिता के ऊपर सुगन्धित वल्कलों, पत्तों, अगुरु, चन्दन और एलगज का ढेर लगा
दिया और शोक से साँपों के समान लम्बी साँसे लेते हुए, चञ्चल आँखों से मुनि के शरीर को
उसपर रख दिया।$^{103}$
72 तब यद्यपि उन्होंने प्रज्वलित दीप को तीन बार उसमें लगाया, तो भी महामुनि की चिता में
आग नही लगी, जैसे क्लीव राजा की, .... ....., राज्य-लक्ष्मी अग्नि ग्रहण नही करती है।
73 काश्यप, विशुद्ध चित्त से भावना करते हुए, मार्ग होकर आ रहा था और भगवान् के पवित्र
अवशेषों को देखने की उसकी इच्छा-शक्ति के ही कारण आग नही लगी।
74 तब उस समय गुरु को देखने की इच्छा से शिष्य शीघ्र ही आ गया और जैसे ही उसने
मुनिवर को प्रणाम किया कि अग्नि स्वयं प्रदीप्त हो उठी।
75 अग्नि से मुनि के शरीर के चर्म, मांस, बाल और अवयवों को, जो पापों से नही जले थे, जला
डाला; किन्तु घी और जलावन की (पर्याप्त) मात्रा तथा हवा के रहनेपर भी यह हड्डियों को नही
जला सकी।
76 तब उचित समय पर उन्होंने मृत महात्मा की हड्डियों को उत्तम जल से शुद्ध किया और मल्लों
के नगर में सोने के घड़ों में उन (हड्डियों) को रखकर, उन्होंने प्रशंसा के स्तोत्र गाये:- $^{104}$
77 “कलशों में उत्कृष्ट महाधातु है, जैसे कि महापर्वत की मणिमय धातु हो, और ये धातुएँ अग्नि
से नष्ट नही हुईं, जैसे कि स्वर्ग में देवेन्द्र (ब्रह्मा) का धातु (कल्पान्त की अग्नि से नष्ट नही
होता)।$^{105}$
78 ये मैत्रीमय तथा कामाग्नि से नही जल सकने योग्य हड्डियाँ (= अस्थि) उन (तथागत या
हड्डियों) की भक्ति के प्रभाव से रक्खी गई हैं, और शीतल होनेपर भी हमारे हृदय को गर्म कर
रही हैं।
79 जिन्होंने इच्छा को जीता और जो संसार में अद्वितीय थे उनकी हड्डियाँ, उनकी पारमार्थिक
शक्ति के कारण, विष्णु के (वाहन) गरुड़ द्वारा भी नही ढोये जा सकते, तो भी हम मानव उन्हें
ढोते हैं।
80 अहो! संसार के नियम का प्रभाव निष्ठुर है और इसकी शक्ति के वशीभूत वह भी हुए, जिनकी
शक्ति धर्म पर थी और इसलिए, जिनका यश सारी सृष्टि में व्याप्त हुआ उनके ये शारीरिक
अवशेष इन घड़ों में रक्खे जाते हैं।
81 उनकी दीप्ति दूसरे सूर्य की दीप्ति के समान थी और इससे उन्होंने पृथ्वी को प्रकाशित किया।
उनके शरीर का रङ्ग सुनहला था, तो भी अग्नि ने केवल बची हुई हड्डियों को ही छोड़ा है।
पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):
$^{103}$ - एलगज = इलायची या दालचीनी।
$^{104}$ - “घड़ों में” बहुवचन है, एकवचन होना उचित था।
$^{105}$ - ब्रह्मा का धातु = ब्रह्मा का पद।
[दायाँ स्तम्भ]
82 मुनि ने दोषों के बड़े बड़े पर्वतों को विदीर्ण किया, और जब उनपर दुःख आया, तो उन्होंने
धैर्य नही छोड़ा; उन्होंने सब दुःख का निरोध किया, तो भी अग्नि ने उनके शरीर को जला ही
डाला।
83 युद्ध में मल्ल दुश्मनों को रुलाते हैं, अपने आश्रितों के आँसू पोछते हैं, और प्रियजन के लिए
भी आँसू बहाने से विरत रहते हैं, तो भी इस समय मार्ग पर आँसू बहाते हुए वे शोक कर रहे
हैं।”
84 अभिमान एवं बाहुबल होनेपर भी उन्होंने विलाप किया और नगर में ऐसे प्रवेश किया, जैसे
जङ्गल में और वीथि-वासियों (नागरिकों) द्वारा धातुओं की पूजा हो जानेपर, उन्होंने उनकी
पूजा के लिए एक उज्ज्वल महल बनाया।
॥बुद्धचरित महाकाव्य का “निर्वाण की प्रशंसा” नामक 27वाँ सर्ग समाप्त॥
अट्ठाईसवाँ सर्ग
धातु-विभाजन
1 कुछ दिनों तक उन लोगों ने विधिवत् समुचित रीति से धातुओं की पूजा की; तब उन धातुओं
को लेने के लिए उस नगर में सात पड़ोसी राजाओं के दूत क्रम से आये।
2 तब यथासमय उनकी बात सुनकर मल्लों ने अभिमान-वश और धातुओं के प्रति भक्ति होने के
कारण उन्हें नही देने का निश्चय किया, बल्कि युद्ध करना पसन्द किया।
3 तब उनका उत्तर जानकर सातों राजा, सात मारुतौं के समान, कुश के नाम से विख्यात उस
नगर में अत्यन्त वेगपूर्वक अपनी सेनाओं के साथ आये, जो बढ़ती हुई गङ्गा की धारा के
समान थीं।
4 तब उन राजाओं के घोड़ों का शब्द सुनकर नगर-निवासी जङ्गल से शीघ्रतापूर्वक नगर में घुसे
गये, उनके चेहरे भयभीत थे ।
5 तब राजाओं ने दूरवर्ती वनों में हाथियों को बाँधकर नगर को घेर लिया और उचित-रीति से
व्यूह-रचना कर अच्छे मल्लों के प्रतिकूल आचरण किया।
6 तब वह नगरी, शोकाकुल स्त्री के समान, छत्ररूपी भुजाओं को ऊपर फेंककर और चँवररूपी
सुन्दर एवं लम्बी पपनियों से द्वाररूपी आँखों को बन्दकर, शोक-मग्न हो गई।
7 जब सातों राजा एककार्य होकर अपने प्रताप से चमकने लगे, तब पृथ्वी आकाश के समान
भयङ्कर हो गई, जिसमें सातों ग्रह एक साथ ही एक ही समय चमक रहे हों।
8 तब स्त्रियों की भी नाकें मदस्रावी हाथियों की गन्ध से, उनकी आँखें हाथियों की सूँड़ों द्वारा
उड़ाई गई धूल से, और उनके कान घोड़ों हाथियों एवं दुन्दुभियों की ध्वनि से आक्रान्त हुए।
9 घेरे में चारों ओर युद्ध ही दिखाई पड़ता था, द्वार हाथियों और घोड़ों से घिर गये ।
बुद्धचरित 117
10 तब डरे हुए नगर-निवासियों ने साहस करके घबराहट छोड़ी और वे प्राकारों पर एकत्र हो गये;
उनकी बर्चियां तलवारें और तीर शत्रुओं पर बाज के समान चमक रहे थे।
11 कुछ लोग उत्तेजित होकर गरजे, वैसे ही दूसरों ने एकत्र होकर शङ्ख फूँके। कुछ लोग इधर
उधर तेजी से गए, वैसे ही दूसरों ने अपनी तेज तलवारें चमकाईं।
12 तब मल्लों को विजय-प्राप्ति के लिए लड़ने को तैयार तथा मल्लों (पहलवानों) के समान गरज
गरजकर अपना अपना नाम बताते देखकर, उन योद्धाओं की पत्नियों ने एक ही साथ उनके
चित्त ओषधि और पुरस्कार तैयार किये।
13 योद्धाओं की काँपती हुई स्त्रियों ने अपने पुत्रों को कवच पहनाये, जो युद्ध के अग्रभाग में जाना
चाहते थे, और उन्होंने उनके लिए मङ्गल-कर्म किये, उन (स्त्रियों) के मुख उदास थे और आँसू
अनियन्त्रित।
14 हरिणों के समान अधोमुख अन्य स्त्रियों ने अपने अपने पति के पास जाकर उस धनुष को
पकड़ रखा, जिसे वह लेना चाहता था और रणोन्मुख वीर को देखते ही (उनके पग) रुक गये
और वे न तो आगे ही गईं और न स्थिर ही खड़ी रहीं।
15 जब राजाओं ने मल्लों को इस तरह सुसज्जित एवं घड़े में बन्द साँपों के समान युद्ध के लिए
निकलते देखा, तब उन्होंने युद्ध करने का निश्चय किया।
16 द्रोण नामक ब्राह्मण ने रथ हाथी घोड़े और पैदल सेना को उत्तेजित और युद्ध के लिए पूरा
तैयार (कृतसङ्कल्प) देखा, और अपनी विद्वता एवं प्रेमपूर्ण दया के कारण उसने ये वचन
कहे:-
17 “युद्धस्थल में आप तीरों से शत्रुओं के क्रोध और जीवन को शान्त कर सकते हैं, किन्तु किलों
में रहनेवालों के साथ आप आसानी से वैसा नहीं कर सकते, उन शत्रुओं के साथ तो और भी
नहीं जिनका चित्त (= कार्य) एक है।
18 यदि आप घेरा डालकर शत्रुओं को जीत भी लें, तो क्या दृढ़चित्त होकर उन्हें उन्मूलित करना
तथा निर्दोष नगर-निवासियों को घेरे में डालकर हानि पहुँचाना धर्मसङ्गत है?
19 जैसे कि बिल में घुसते समय कृष्ण सर्प रास्ते में मिलकर एक दूसरे को काटते हैं, वैसे ही घेरा
डालने से या तो आपकी एकान्त (पूरी) जीत नहीं होगी, या जो घेरे जायेंगे, उन्हीं की जीत
होगी।
20 क्योंकि तुच्छ मनुष्य भी नगर के घेरे का समाचार सुनने पर उत्तेजित होकर बड़े काम के हो
जायेंगे, जैसे कि थोड़ी सी भी आग जलावन पाकर बढ़ जाती है।
21 नगर में घिरकर भी धर्मात्मा मनुष्यों ने तपस्या द्वारा उन्हें पीछे हटाया, जो उनकी हत्या करने
आये थे और अशक्त शस्त्रों के होनेपर भी उन्होंने धर्म-बल से कुश-नगर में करन्धम को जीता।
22 उन राजाओं को, जिन्होंने यश या राज्य (या विषय) के लिए सारी वसुधा को प्राप्त किया, इसे
छोड़कर धूल में लौट जाना पड़ा, जैसे कि पोखर से पानी पीनेपर बैलों को चारागाह में लौट
जाना पड़ता है।
23 अतः धर्म और अर्थ के लिए क्या जरूरी है, इसे ठीक ठीक देखकर आपको शान्तिपूर्ण उपायों
(= साम) से प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि जो तीरों द्वारा जीते जाते हैं वे फिर प्रदीप्त हो सकते
हैं; किन्तु जो शान्तिपूर्ण उपायों से जीते जाते हैं उनका विचार नहीं बदलता है।
24 यह सब आपकी शक्ति से परे है, आपकी सेना शत्रु की सेना का मुकाबला नहीं कर सकती।
जिन शाक्य-मुनि का सम्मान करना आपको अभीष्ट है, उन्हीं के उपदेश के अनुसार आपको
सहनशीलता (क्षमा) का आचरण करना चाहिए।”
25 यद्यपि वे राजा थे, तो भी उस भले मनुष्य ने उन्हें दृढ़तापूर्वक उपदेश दिया और ब्राह्मणोचित
स्पष्टवादिता एवं प्रेमपूर्ण दया के साथ उन्हें वास्तविक हित की बात कही। तब उन्होंने उत्तर
दिया:-
26 “आपके ये शब्द समयानुकूल और बुद्धिमत्तापूर्ण हैं और हमारी भलाई के लिए मित्रतापूर्वक
कहे गये हैं; अब आपको हमारा आशय विदित हो, जिसका कारण है हमारी धर्म-रति और
अपने बल का भरोसा।
27 नियमतः मनुष्य काम और क्रोध के कारण अथवा शक्ति या मृत्यु (हिंसा ?) के लिए कार्य-भार
उठाते हैं; किन्तु हमने श्रद्धा से प्रेरित होकर (= साभिमाना:) केवल बुद्ध का सम्मान करने के
लिए शस्त्र ग्रहण किया है।
28 शिशुपाल और चेदियों ने ... ... अहङ्कारवश कृष्ण के साथ युद्ध किया; तब जिन्होंने अहङ्कार
को जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन तक सङ्कट में डालें?
29 पृथ्वी पालन करनेवाले वृष्णि-अन्धक नामक राजाओं ने एक कन्या के लिए युद्ध किया, तब
जिन्होंने काम (-वासना) का जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी
सङ्कट में डालें?
30 भृगु के पुत्र उस क्रोधी मुनि ने क्षत्रियों को उन्मूलित करने के लिए शस्त्र ग्रहण किया? तब
जिन्होंने क्रोध को जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन तक सङ्कट में
डालें?
31 दैत्य, यद्यपि वह अत्यन्त भयङ्कर था, सीतारूपी (सीताभिधान) मृत्यु को ग्रहणकर विनाश को
प्राप्त हुआ; तब जिन्होंने सब परिग्रह छोड़े उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन
भी सङ्कट में डालें।
118 अश्वघोष
32 उसी प्रकार एलि और पक, जिनकी पारस्परिक शत्रुता बढ़ती ही गई, (मोह-वश) नाश को
प्राप्त हुए; तब जो मोह से मुक्त थे उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी
खतरे में डालें?
33 संसार में ये और बहुतेरे दूसरे युद्ध अनुचित कारणों से हुए; तब हम क्यों न लड़ें, जब कि हम
बुद्ध की भक्ति से बँधे हुए हैं और यह (युद्ध) हमारे लिए हितकारी है?
34 यही हमारा उद्देश्य है; आप शीघ्र ही हमारा दूत बनकर जायें और अपनी सारी शक्ति लगाकर
(= सर्वात्मना) प्रयत्न करें जिससे यह उद्देश्य बिना युद्ध किये ही सिद्ध हो जाय।
35 यद्यपि हम लड़ने के लिए तैयार हैं और हमें तेज तीर हैं, तो भी धर्मानुसार कहे गये आपके
वचनों ने हमें रोक लिया है, जैसे कि मन्त्र साँपों को रोक लेते हैं जो अपने फैलते हुए विष को
पी जाते हैं।"
36 “मैं ऐसा ही करूँगा” यह कहकर ब्राह्मण ने राजाओं का आदेश ग्रहण किया और नगर में
प्रवेश किया; यथासमय उसने मल्लों से भेंट की और उनसे मिलकर उसने उचित समयपर उनसे
ये वचन कहे-
37 “ये नृप, जिनके हाथों में तीर हैं और जिनके चमकीले कवच सूर्य के समान उज्जवल हैं,
आपके इस नगर के द्वारों पर, मांस के टुकड़ों को चाटते हुए सिंहों के समान, उछलने को
तैयार हैं।
38 म्यानों में रखी हुई अपनी तलवारों को तथा सुनहली पीठवाले अपने धनुषों को देखते हुए वे
युद्ध की पुकार से नहीं डरते, किन्तु मुनि के धर्म का स्मरण करते हुए वे धर्म-विरुद्ध आचरण
करने से डरते हैं।
39 वे कहते हैं 'आपको हमारे उद्देश्य का आदर करना चाहिए; क्योंकि हम राज्य या सम्पत्ति के
लिए नही, अहङ्कार या शत्रुता से नही, किन्तु मुनि की भक्तिवश आये हैं।
40 मुनि समान रूप से हमारे और आपके गुरु थे; इसी कारण यह सङ्कट आया है। इसलिए यह
बन्धु-वर्ग एकत्र हुआ है और मुनि की धातुओं की पूजा करने के एकमात्र उद्देश्य से यहाँ आया
है।
41 धन की कृपणता उतना बड़ा पाप नही जितना कि धर्मानचरण की कृपणता। कृपणतापूर्वक
बोलने का निश्चय करना पाप है और पाप तो धर्म का शत्रु है ही।
42 यदि आप देने का निश्चय नही करते हैं तो किले से निकलकर अपने अतिथियों की सेवा-
शुश्रूषा कीजिए। जिनका बल (किले के) फाटकों में है, तीरों में नहीं, वे क्षत्रिय-वंश में उत्पन्न
नही हुए हैं।'
43 राजाओं ने यही सन्देश आपको दिया है, और यह सद्भावना एवं साहस से भरा है। मैंने भी
इस विषयपर अपने मन में स्नेहपूर्वक विचार किया है, अब मेरा वक्तव्य ध्यानपूर्वक सुनिये।
44 दूसरों के साथ विवाद करने से न सुख होता है, न धर्म; दुर्भावना को प्रश्रय न देकर शान्ति-
मार्ग का अनुसरण कीजिए। क्योंकि मुनि क्षमा का उपदेश दिया करते थे, जिससे भक्ति की
अग्नि सदा बढ़ती ही रहती है।
45 मनुष्य, अर्थ या काम, इन दो में से एक के लिए सङ्घर्ष करते हैं, किन्तु जो मनुष्य धर्म के
निमित्त आर्य (साधु) हो गया है उसके लिए शम (शान्ति) और शत्रुता परस्पर-विरोधी हैं।
46 जिन्होंने स्वयं शान्ति प्राप्त कर उदार हृदय से जीवों को करुणा का उपदेश दिया उन
करुणामय की पूजा करते हुए आप (दूसरों को) क्लेश पहुँचायें, यह आपके सिद्धान्त के प्रतिकूल
है।
47 अतः धातुओं को देकर आप उनके साथ यश और धर्म के भागी बनें। इस प्रकार आप उनके
मित्र बनेंगे और वे भी धर्म व यश प्राप्त करेंगे।
48 हम धर्मानुयायियों को, धर्म से गिरे हुए लोगों को प्रयत्नपूर्वक भी धर्म से युक्त करना चाहिए।
क्योंकि जो दूसरों को धर्म से युक्त करते हैं वे धर्म को चिर-स्थायी बनाते हैं।
49 परम पवित्र मुनि ने कहा है कि धर्म का दान सब दानों से श्रेष्ठ है (= सर्वेषामेव दानानां
धर्मदानं विशिष्यते); जो कोई भी धन-दान कर सकता है, किन्तु धर्म का दाता दुर्लभ है।"
50 जब उन्होंने (आचार्य) द्रोण के समान ज्ञानी ब्राह्मण (द्रोण) से विख्यात व आनन्ददायक धर्म
वचन सुने, तब अत्यन्त लज्जित होकर एक-दूसरे को देखते हुए उन्होंने उस (ब्राह्मण) से
कहा:-
51 “आपका निश्चय सन्मित्र का है और ब्राह्मणोचित गुणों से युक्त है। हम बुरे घोड़ों के समान
कुमार्ग पर भटक रहे थे, किन्तु आपने हमें सन्मार्ग पर स्थापित किया।
52 हमें अवश्य ही वैसा करना चाहिए जैसा कि आपने कहा है, क्योंकि दयालु मित्र का उपदेश
ग्रहण करना उचित ही है। क्योंकि जो लोग मित्र के वचन की अवहेलना करते हैं वे पीछे
विपत्ति में पड़कर शोक करते हैं।”
53 तब विप्र (= लोक धातु) को जाननेवाले बुद्ध की धातुओं को मल्लों ने आठ भागों में बाँटा और
तब अपने लिए एक भाग रखकर, उन्होंने शेष सात भाग दूसरों को दे दिये, प्रत्येक के लिए
एक।
54 मल्लों से इस प्रकार सम्मानित होकर राजा लोग भी, जिनका लक्ष्य सिद्ध हो गया, आनन्दपूर्वक
अपने अपने देश को लौट गये। तब उन्होंने अपने अपने नगर में मुनि की धातुओं (को रखने)
के लिए विधिवत् स्तूप बनाये।
बुद्धचरित 119
55 तब अपने देश में मुनि के लिए एक स्तूप बनाने की इच्छा से द्रोण ने अपने हिस्से में घड़ा
लिया और पिसल नामक लोगों ने भक्तिपूर्वक बची हुई राख ली।$^{106}$
56 शुरु में श्वेत पर्वतों के समान आठ स्तूप थे, जिनके भीतर धातुएँ थीं। ब्राह्मण का घड़ावाला
स्तूप नवाँ था और राखवाला दसवाँ।
57 प्रजा-सहित राजाओं ने और बच्चों-सहित ब्राह्मणों ने पृथ्वी पर मुनि के इन विविध स्तूपों की
पूजा की, जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं और जो कैलास की बर्फीली चोटियों के समान
दिखाई पड़ते थे।
58 अनेक भूपों ने स्तोत्र-गान, उत्कृष्ट सुगन्धियों, सुन्दर मालाओं और गीत-ध्वनि से स्तूपों की,
जिनमें बुद्ध (= जिन) की धातुएँ थीं, उत्तम उपासना की।
59 तब कालक्रम से 500 अर्हत् 5 पर्वतों से चिह्नित नगर में एकत्र हुए और फिर से धर्म को
अच्छी तरह संस्थापित (स्थिर) करने के लिए उन्होंने पर्वत के ऊपर मुनि के उपदेशों का सङ्ग्रह
किया।
60 आनन्द ने ही महामुनि से सब उपदेश सुने थे, ऐसा निश्चयकर शिष्यों ने सङ्घ की सम्मति से
उस वैदेह मुनि से शास्त्र (= प्रवचन) दुहराने के लिए कहा।
61 तब वह उन लोगों के बीच बैठ गया और "मैंने ऐसा सुना है" इस तरह कहते हुए तथा
स्थान, प्रसङ्ग, समय और श्रोता की व्याख्या करते हुए, उसने उपदेशों को वैसे ही दुहराया जैसे
कि वक्ता-श्रेष्ठ (बुद्ध) ने कहा था।
62 इस प्रकार अर्हतों के साथ उसने मुनि का धर्म-शास्त्र निश्चित किया और प्रयत्नपूर्वक इसका पूरा
ज्ञान प्राप्त करनेपर ही मनुष्य दुःख के परे गये हैं, जा रहे हैं, और जायँगे।
63 काल-क्रम से धर्म-रत अशोक का जन्म हुआ; उसने अहङ्कारी शत्रुओं को शोकाकुल किया और
दुःखी लोगों का शोक दूर किया, वह फूलों और फलों से लदे अशोक-वृक्ष के समान प्रियदर्शन
था।
64 मौर्य-वंश के उज्ज्वल गौरव अशोक ने प्रजा की भलाई के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी पर स्तूप बनाने
का कार्य आरम्भ किया और इसलिए जो चण्डाशोक कहलाता था वह धर्म-राज अशोक बन
गया।
65 उस मौर्य ने मुनि की धातुओं को सात स्तूपों से जिनमें वे रक्खी गई थीं, लेकर एक ही दिन
में क्रम से 80,000 भव्य स्तूपों के बीच बाँट दिया, जो शरदृतु के उज्ज्वल मेघों के समान
चमक उठे।
66 रामपुर में स्थित आठवाँ मूल स्तूप उस समय विश्वस्त नागों से रक्षित था और इसलिए राजा
ने उस (स्तूप) से धातुओं को प्राप्त नही किया; किन्तु इससे उन (धातुओं) में उसकी श्रद्धा
बहुत बढ़ गई।
67 चञ्चल राज्य-लक्ष्मी की रक्षा करते हुए भी और चित्त के लिए शत्रुस्वरूप उपभोगों के बीच
रहते हुए भी, राजा ने काषाय-वस्त्र पहने बिना ही अपने चित्त को शुद्ध किया और प्रथम फल
प्राप्त किया।
68 इस प्रकार जिस किसी ने जहाँ कहीं मुनि का सम्मान (पूजा) किया है, करता है, या करेगा
उसे सज्जन-सुलभ परम फल प्राप्त हुआ है होता है या होगा।
69 हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो कि बुद्ध के गुण ऐसे हैं कि समान मानसिक शुद्धि होनेपर,
ऐहिक जीवन में मुनि का सम्मान करने से या उनके परिनिर्वाण के बाद उनकी धातुओं को
प्रणाम करने से एक ही फल प्राप्त होता है।$^{107}$
70 इसलिए उदारचेता करुणामय परम पूज्य मुनि की पूजा करनी चाहिए, जो लाभप्रद, सदा-
अव्यर्थ, अविकारी (अपरिवर्तनशील) परम और उत्कृष्ट धर्म के ज्ञाता थे।
71 क्या इस जगत् में यह उचित नही कि कृतज्ञ बुद्धिमान् धर्मात्मा उन्हें धन्यवाद दें जिन्होंने,
मनुष्यों के आशय की सम्यक् जानकारी रखते हुए, करुणावश, परोपकार के लिए महान्
परिश्रम किया?
72 पृथिवी पर जरा और मरण के समान तथा स्वर्ग में वहाँ से गिरने के समान कोई विपत्ति नही,
यह देखते हुए कौन सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने विश्व की इन दो विपत्तियों
को पहचाना?
73 जबतक जन्म है तबतक दुःख है, और पुनर्जन्म से मुक्ति के समान कोई सुख नही; कौन
सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने इस मुक्ति को प्राप्तकर संसार को दिया?
74 मुनि-श्रेष्ठ के प्रति सम्मान-भाव से, मुनि के शास्त्रानुसार, मनुष्यों के हित व सुख के लिए, न
कि विद्वत्ता या काव्य-कौशल दिखाने के लिए, यह काव्य रचा गया।
॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "धातु-विभाजन" नामक 28वाँ सर्ग समाप्त ॥
॥ समाप्तसम्पूर्णबुद्धचरित ॥
$^{106}$ - पिसल के स्थान में "पिप्पल" पढ़ने का सुझाव जॉन्स्टन ने किया है, इसलिए कि मौर्य पिप्पलवनिक थे।
चीनी अनुवाद में है "कुशीनगर के लोग"।
120 अश्वघोष
$^{107}$ - "हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो" या "बुद्धिमान् मनुष्य जानते हैं"।
परिशिष्ट 1
अतिरिक्त टिप्पणी एवं पाठान्तर
1.10 कक्षीवान्। “आसन्दीवद्दधी” (अष्टाध्यायी 8.2.12) इति निपात्यते, कक्षीवानृषिः।
1.18 अनुवाद और 13.56 क के आधार पर कोष्ठगत 'अदृश्यरूपाश्च' रखा है।
1.24 घ-अनुवाद के आधार पर रिक्त स्थान की पूर्ति की गई है।
1.61 संविष्टः = सुप्तः (रघुवंश 1.95)। देवी = पार्वती। अग्निपुत्र = कार्तिकेय।
2.1 पा० “जन्मजरान्तगस्य”
2.2 कृताकृत = घटिताघटित = गढ़ा हुआ और नहीं गढ़ा हुआ (चाँदी-सोना) - अमरकोष।
2.3 पद्म = दक्षिण दिशा में स्थित दिग्गज। मण्डल = राज्य, देश, हस्तिशाला, हाथियों का घेरा (दे० 5.23)।
2.7 ख-पा० “०मण्डितागः”।
2.25 घ- पा० 'वनं न यायादिति'।
2.33 घ- 'संविबभाज...' = या 'साधुओं की सेवा की'।
2.44 ख-अभिध्या = लोभ। अविवक्षीत्-वह् + सन् + लुङ्।
2.51 'स्वायंभुव सामवेदीय सूक्त का श्रद्धापूर्वक जप किया' - बंगला अनुवाद।
2.54 निपात-नि + पा + क्त। दे०- सो० 18.31
3.1 गीतैर्निबद्धानाि काननानि = संगीत से गूंजते हुए नगर-उद्यानों के बारे में; या उन उद्यानों के बारे में जिनके (सम्बन्ध में) गीत गाये जाते थे।
3.9 क-पा० '०पुष्पलाजं'।
3.26 ग-पा० 'प्रयातुं' के स्थान में 'प्रयान्तं'।
3.31 ख-पा० 'बालेन'-बालक होकर धूल में खेला।
3.53 ग-'स्याद् व्यत्यासो विपर्यासो व्यत्ययश्च विपर्यये'-अमरकोष।
3.57 घ-पा० 'प्रियः प्रियैस्'।
3.60 घ-पा० 'निर्हादवता'।
4.16 सम्भवतः 'काशिसुन्दरी' नाम नही, किन्तु विशेषण; इसका अर्थ होगा 'काशी की रूपवती (वेश्या)'।
4.38 घ-धीरलीलैया चेष्टितं = गम्भीरता का, स्थिर गति-विधि का।
4.56 क-उ + ईमाः = विमाः; पा० 'किं न्विमा'?
ग-पा० 'संमता'।
5.8 ख-पा० 'निवर्त्य'।
5.19 ग-परिग्रह = घर स्वजन साथी सम्पति आदि बन्धन।
5.22 ग-पा० 'परिवर्त्य जनं'।
5.32 ख-लक्ष्म = प्रधान, योग्य।
5.40 निदर्शित = उदाहरण और दृष्टान्त देकर समझाये जानेपर।
5.52 शालभञ्जिका = शालवृक्ष (के काष्ठ) से बनाई गई मूर्ति।
5.53 पा० 'मणिकुण्डलदष्टगण्डलेखम्'।
5.55 योक्त्र = मुख का कोई आभूषण।
5.59 'स्पृष्टं स्फुटं प्रव्यक्तमुल्बणम्'-अमरकोष।
5.66 तदन्तरं = स्वभाव और बाह्य आभूषण का अन्तर; या सुयोग।
5.75 पा०- 'यथा ततुरुग्रश्रेष्ठ'।
5.84 क-पा० 'विकचपङ्कजो'। विकच = विकसित।
घ-पा० 'पुनरहं'।
5.86 ग-पा० 'अकुरुत'।
6.34 ख-पा० 'यशोधर्मभृतां वरं'।
6.37 'उचितदर्शित्वात्' अन्तःपुर या छन्दक के लिए भी हो सकता है। शुभ वस्तुओं को ही देखनेवाले या शुभ संवाद ही सुननेवाले अन्तःपुर में। अथवा, न्यायोचित को देखनेवाला या उचित कर्म करनेवाला में (छन्दक)।
6.57-58 एनं और तं मुकुट के लिए प्रयुक्त हुआ है या असि के लिए? 8.48 से ज्ञात होता है मुकुट के लिए।
7.42 ख-पा० 'सङ्कीर्णधर्मे पतितो०'; 'सङ्कीर्णधर्मा पतितो०'।
7.43 घ-पा० 'बृहस्पतेरप्युदयावहः'।
7.50 बहुमानमीयुः = (उन तपस्वियों ने मन में) उनका बड़ा सम्मान किया।
8.13 रघुवंश 10.7 की व्याख्या में मल्लिनाथ द्वारा उद्धृत।
8.31 ख-'विषाद-जन्य बाष्प से अवरुद्ध वाणी में'। दे० 2.62 ग तथा 8.60 घ।
8.39 घ- 'श्रियं' = या 'राज्यलक्ष्मी को'
8.57 ग-या 'दान देने का अभ्यासी था, माँगने का नहीं'।
8.66 ग घ-'भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि स्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः।'-रघुवंश 14.66।
9.21 घ-पा० 'वित्ताधिपत्यं'। विद् ज्ञाने क्त वित्तम्।
10.2 ख-धृतं च पूतं च = पोषित एवं पवित्रीकृत-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
10.26 घ-'सहीया' यह शब्द केवल बौद्ध-साहित्य में ही पाया जाता है।
10.30 पा० 'स्ववंशप्रतिरूपरूपं' = अपने वंश के अनुरूप रूप को।
बुद्धचरित 121
11.41 ग-भावाः = पदार्थाः-सिद्धान्त कौमुदी, कृदन्त प्रकरण; और दे० बु० च०
12.27
11.45 ग-आसंगकाष्ठ = भारवाही दण्डकाष्ठ-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र)
11.49 ग घ 'मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः'-वैराग्य शतक ।
11.70 'अव' धातु के अनेक अर्थों को ध्यान में रखते हुए तथा 'आर्यैः' के स्थान में
'आर्यान्' पढ़ते हुए, इस श्लोक का अर्थ यह होगा-
इन्द्र के समान रक्षा करें, आकाश के सूर्य के समान सदा प्रज्वलित हों,
सद्गुणों से शोभित हों, इस संसार में श्रेय को समझें, पृथ्वी का पालन करें, (दीर्घ)
आयु प्राप्त करें, सज्जनों व सत्पुत्रों को तृप्त करें, ऐश्वर्य की वृद्धि करें; हे राजन्,
अपने धर्म से लिपटे रहें (या स्वधर्म का आचरण करें) ।
13.60 यही श्लोक परिमार्जित रूप से भास-प्रणीत प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटक में
आया है।
14.14 उत्तरार्ध का यह अर्थ भी होगा-
कोई-कोई लौहचंचु धृष्ट कौओं द्वारा, जो लोहे के बने-से लगते हैं, खाये जाते
हैं।
समाप्त
3.7.2021
122 अश्वघोष