सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

29 जैसे इस जगत् में अन्धकार के विनाश के लिए प्रकाश पाने के हेतु से कोई जल नही गिराता,
वैसे ही ज्ञानाग्नि द्वारा (-नष्ट होनेवाले) अज्ञानरूपी अन्धकार के विनाश के लिए शारीरिक क्लेश
पूर्व-आवश्यकता नही है।
30 जैसे अग्नि चाहनेवाला व्यक्ति काठ को छेदकर या उसे चीरकर अग्नि नही पाता। किन्तु उचित
साधनों के सहारे से ही वह सफल होता है, वैसे ही योग से अमरत्व प्राप्त होता है, क्लेशों से
नहीं।
31 वैसे ही जो लोग अनर्थकारी काम-वासनाओं में आसक्त रहते हैं, उनके चित्त, तम व रज से
आक्रान्त हो जाते हैं, वे (तर्कज्ञान-) शास्त्र भी नहीं समझ सकते, फिर निरोध का राग-रहित
मार्ग कहाँ से समझेंगे? अर्थात् इस परधर्मरूपी रुकावट का राग-रहित मार्ग कहाँ से समझेंगे?
32 जैसे रोग से अभिभूत व्यक्ति अ-स्वास्थ्यकर भोजन करके रोग-मुक्त नही होता, वैसे ही
अज्ञानरूपी रोग से अभिभूत इन्सान काम-वासनाओं में आसक्त होकर शान्ति कहाँ से पाएगा?
33 जैसे जलावन (= अग्नि) के लिए सूखी घास रहने पर और हवा से वीजित (= प्रेरित) होनेपर
आग नही बुझती है, वैसे ही राग को साथ व काम का आश्रय पाकर चित्त शान्त नही होता
है।
34 इन दोनों मार्गों (= तप व भोग) को छोड़कर मैंने इनसे अलग— 'मध्यम-मार्ग' पाया है—जो
दुःख का अन्त करके प्रीति-सुख के परे चला जाता है।
35 सम्यक् दृष्टिरूपी सूर्य इसे प्रकाशित करता है, सम्यक् सङ्कल्परूपी रथ इस पर चलता है, ठीक-
ठीक बोली गई सम्यक् वाणी (इसके-) विहार (= विश्राम-स्थल) हैं, और यह सम्यक् कर्मान्त
(= सदाचार, कर्मों का अन्त) के सौ-सौ उपवनों से प्रसन्न है।
36 यह सम्यक् आजीविकारूपी सुभिक्षा (= सुलभ भिक्षा) का उपभोग करता है और सम्यक्
व्यायाम (= प्रयत्न) रूपी सेना व परिचारक-गुण से युक्त है; यह सम्यक् स्मृति (= सावधानी,
जागरूकता) रूपी किलेबन्दी से सब ओर सुरक्षित है और (सम्यक्-) समाधि (= मानसिक
एकाग्रता) रूपी शय्या व आसन से सुसज्जित है।
37 इस जगत् में यह ऐसा परम उत्तम अष्टाङ्गिक-मार्ग है, जिसके द्वारा जरा-मरण व रोग से मुक्ति
मिलती है।
38 यह केवल दुःख है, यह समुदय (= कारण) है, यह निरोध है और यह इसका मार्ग; इस प्रकार
निर्वाण के हेतु अभूतपूर्व और अश्रुतपूर्व धर्म-पद्धति के लिए मेरी दृष्टि विकसित हुई है।
39 जन्म जरा रोग और मरण भी, इष्ट-वियोग और अनिष्ट-संयोग, अभिलषित अन्त (= लक्ष्य,
वस्तु) की अप्राप्ति—ये विविध दुःख लोगों को सहने पड़ते हैं।

40 जिस किसी अवस्था में मुनष्य हो, चाहे वह काम-वासनाओं के अधीन हो या उसने अपने को
जीत लिया हो, चाहे वह शरीर-धारी हो या नहीं, जो कोई भी गुण उसे नहीं है सङ्क्षेप में उसी
को दुःख जानो।
41 मेरा यह निश्चित मत है कि जैसे ज्वालाओं के शान्त होनेपर, अति अल्प अग्नि भी उष्ण होने
का अपना सहज स्वभाव नहीं छोड़ती है, वैसे ही शान्ति आदि से अति सूक्ष्म होनेपर भी
आत्मभाव दुःखधर्मा ही रहता है।
42 जानो कि जैसे भूमि जल बीज व ऋतु, अङ्कुर के कारण-स्वरूप हैं, वैसे ही काम-राग आदि
दोष तथा दोषों से होनेवाले कर्म, दुःख के कारण-स्वरूप हैं।
43 स्वर्ग में या नीचे (के लोक में), भव-धारा का कारण काम-राग आदि दोषों का समूह है और
इहलोक और परलोक में हीन, मध्य व ऊँच के भेद का मूल कारण कर्म है।
44 दोषों के विनाश से संसाररूपी चक्र का कारण बन्द हो जाता है और कर्म का क्षय होने से
दुःख का अन्त होता है; क्योंकि किसी दूसरी चीज' के होने से सब चीजों का प्रादुर्भाव होता
है, इसलिए उस दूसरी चीज' का लोप होने से उन सबका अन्त होता है।
45 जानो कि निरोध वह है जिसमें न जन्म है, न जरा, न मरण, न अग्नि, न पृथ्वी, न जल, न
शून्य (आकाश), न वायु, और जो अनादि अनन्त आर्य अहार्य (जो हरण नही किया जा सके)
सुखमय (= सुखं) और अविनाशी (= अक्षर) है।
46 मार्ग वह है जिसे अष्टाङ्गिक कहा गया है इसे छोड़कर (लक्ष्य-) प्राप्ति (= अधिगम) का
(दूसरा) उपाय नही। इस मार्ग को नहीं देखने के कारण लोग विविध मार्गों में भटकते रहते
हैं।
47 इस विषय में मैंने इस प्रकार निश्चय किया है कि दुःख की पहचान करनी चाहिए, कारण का
त्याग करना चाहिए, निरोध का अनुभव करना चाहिए और मार्ग की भावना करनी चाहिए।
48 मुझमें दृष्टि (= चक्षु, ज्ञान) इस तरह विकसित हुई कि यह दुःख पहचाना गया और कारण
छोड़ा गया, उसी तरह निरोध का अनुभव हुआ और उसी तरह इस मार्ग की भावना की गई।
49 जबतक आर्य सत्य की ये चार अवस्थाएं मैंने नहीं देखीं, तबतक इस जगत् में मुक्त होने का
दावा मैंने नही किया और अपने में लक्ष्य-प्राप्ति भी नही देखी।
50 किन्तु जब मैंने आर्य सत्यों को अच्छी तरह जाना और उन्हें जानकर कर्तव्य कार्य को किया,
तब इस विषय में मैंने मुक्त होने का दावा किया और देखा कि मैंने लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।"
51 जब करुणामय महर्षि ने इन शब्दों में वहाँ इस तरह धर्मोपदेश किया, तब उस कौण्डिन्य
गोत्रवाले और सौ देवताओं ने पवित्र और निर्मल (= विरज) दृष्टि पाई।

बुद्धचरित 81