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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 122 में से

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पृष्ठ 54

स पाण्डवं पाण्डवतुल्यवीर्यः शैलोत्तमं शैलसमानवर्मा।
मौलिधरः सिंहगतिर्नृसिंहश्चलसटः सिंह इवारुरोह ॥१०.१७
पाण्डवों के समान उसकी वीरता थी, पर्वत के समान उसका शरीर था, वह पाण्डव नामक उत्तम पर्वत
पर चढ़ा; वह नर-सिंह, जो मुकुट पहने हुआ था और जिसकी चाल सिंह की-सी थी, उस सिंह के समान
था जिसके केसर हिल रहे हों ॥17॥
ततः स्म तस्योपरि शृङ्गभूतं शान्तेन्द्रियं पश्यति बोधिसत्त्वम्।
पर्यङ्कमास्थाय विरोचमानं शशाङ्कमुद्यन्तमिवाभ्रकुञ्जात् ॥१०.१८
तब उस (पर्वत) के ऊपर शिखर-सदृश बोधिसत्त्व को देखा, जिसके इन्द्रिय शान्त थे; पर्यङ्क आसन में
बैठा हुआ वह, मेघ कुञ्ज से उगते चाँद के समान चमक रहा था ॥18॥
तं रूपलक्ष्म्या च शमेन चैव धर्मस्य निर्माणमिवोपविष्टम्।
सविस्मयः प्रश्रयवान्नरेन्द्रः स्वयम्भुवं शक्र इवोपतस्थे ॥१०.१९
रूप-सम्पत्ति व शान्ति से जान पड़ता था जैसे धर्म का बनाया हुआ कोई बैठा हो; विस्मय और
विनयपूर्वक राजा उसके समीप उपस्थित हुआ, जैसे स्वयंभू के समीप इन्द्र (उपस्थित हो रहा हो) ॥19॥
तं न्यायतो न्यायविदां वरिष्ठः समेत्य पप्रच्छ च धातुसाम्यम्।
स चाप्यवोचत्सद्देन साम्ना नृपं मनःस्वास्थ्यमनामयं च ॥१०.२०
औचित्य जाननेवालों में वह श्रेष्ठ था, उसके समीप उचित रीति से जाकर उसका धातु-साम्य (= स्वास्थ्य)
पूछा। उसने भी योग्य नम्रतापूर्वक राजा से मानसिक स्वास्थ्य और (शारीरिक) आरोग्य कहे ॥20॥
ततः शुचौ वारणकर्णनीले शिलातले संनिषसाद राजा।
उपोपविश्यानुमतश्च तस्य भावं विजिज्ञासुरिदं बभाषे ॥१०.२१
तब स्वच्छ शिला-तलपर, जो हाथी के कान के समान नीला था, राजा बैठ गया। समीप में बैठकर और
अनुमति पाकर उसका भाव जानने की इच्छा से यों कहा:- ॥21॥
प्रीतिः परा मे भवतः कुलेन क्रमागता चैव परीक्षिता च।
जाता विवक्षा स्ववयो यतो मे तस्मादिदं स्नेहवचो निबोध ॥१०.२२
"आपके कुल से मेरी बड़ी प्रीति है, वह परम्परागत है और परीक्षित है; अतः हे मित्र, मुझे कुछ कहने
की इच्छा हुई है। इसलिए यह स्नेह-वचन सुनिये:- ॥22॥
आदित्यपूर्वं विपुलं कुलं ते नवं वयो दीप्तमिदं वपुश्च।
कस्मादियं ते मतिरक्रमेण भैक्षाक एवाभिरता न राज्ये ॥१०.२३
आपका कुल महान् है, सूर्य से उत्पन्न हुआ है, आपकी अवस्था नई है और यह दीप्त रूप है। किस कारण
क्रम तोड़कर आपकी बुद्धि भिक्षावृत्ति में रत है, राज्य में नही ॥23॥
गात्रं हि ते लोहितचन्दनाहं काषायसंश्लेषमनर्हमेतत्।
हस्तः प्रजापालनयोग्य एष भोक्तुं न चार्हः परदत्तमन्नम् ॥१०.२४


आपका शरीर लाल चन्दन के योग्य है, काषाय-स्पर्श के योग्य यह नही। यह हाथ प्रजा-पालन के योग्य
है, दूसरों का दिया अन्न खाने योग्य नही ॥24॥
तत्सौम्य राज्यं यदि पैतृकं त्वं स्नेहात्पितुर्नैच्छसि विक्रमेण।
न च क्रमं मर्षयितुं मतिस्ते बुद्ध्यार्धमस्मद्विषयस्य शीघ्रम् ॥१०.२५
इसलिए, हे सौम्य, यदि आप स्नेह-वश पिता से पैतृक राज्य पराक्रमपूर्वक नही (लेना) चाहते हैं और यदि
क्रम को सहने का (= क्रम से राज्य प्राप्ति तक ठहरने का) विचार आपका नही है, तो शीघ्र ही मेरे आधे
राज्य का आप पालन करें ॥25॥
एवं हि न स्यात्स्वजनापमर्दः कालक्रमेणापि शमश्रया श्रीः।
तस्मात्कुरुष्व प्रणयं मयि त्वं सद्भिः सहीया हि सतां समृद्धिः ॥१०.२६
इस प्रकार स्वजन का उत्पीड़न नही होगा, काल-क्रम से शान्ति में रहनेवाली सम्पत्ति भी मिलेगी।
इसलिए आप मुझसे प्रीति करें, क्योंकि सज्जनों की सङ्गति से सज्जनों की समृद्धि होती है ॥26॥
अथ त्विदानीं कुलगर्वितत्वादस्मासु विश्रम्भगुणो न तेऽस्ति।
व्यूहान्यनीकानि विगाह्य बाणैर्मया सहायेन परान् जिगीष ॥१०.२७
यदि इस समय कुल के गर्व के कारण हमारे ऊपर आपका विश्वास नही है, तो मुझ सहायक के साथ
बाणों से सैन्य-समूहों में प्रवेश कर शत्रुओं को जीतिये ॥27॥
तद्बुद्धिमन्त्रान्यतरां वृणीष्व धर्मार्थकामान्विधिवद्भजस्व।
व्यत्यस्य रागादिह हि त्रिवर्गं प्रेत्येह भ्रंशमवाप्नुवन्ति ॥१०.२८
इसलिए दो में से एक विचार स्वीकार कीजिये। धर्म, अर्थ और काम का विधिवत् सेवन कीजिए, क्योंकि
राग-वश यहाँ त्रिवर्ग का उलट-पुलट होने से लोग यहाँ और परलोक में भी भ्रष्ट होते हैं ॥28॥
यो ह्यर्थधर्मौ परिपीड्य कामः स्याद्धर्मकामौ परिभूय चार्थः।
कामार्थयोश्चोपरमेन धर्मस्त्याज्यः स कृत्स्नो यदि काङ्क्षितोऽर्थः ॥१०.२९
अर्थ और धर्म को परिपीड़ित कर जो काम होगा, धर्म व काम को दबाकर जो अर्थ होगा और काम व
अर्थ के विनाश से जो धर्म होगा उसे छोड़िये, यदि आप सम्पूर्ण लक्ष्य (की सिद्धि) चाहते हैं ॥29॥
तस्मात्त्रिवर्गस्य निषेवणेन त्वं रूपमेतत्स्फलं कुरुष्व।
धर्मार्थकामाधिगमं ह्यनूनं नृणामनूनं पुरुषार्थमाहुः ॥१०.३०
इसलिए त्रिवर्ग के सेवन से आप इस रूप को सफल कीजिए; क्योंकि कहते हैं कि धर्म, अर्थ व काम की
सम्पूर्ण प्राप्ति ही मनुष्यों का सम्पूर्ण पुरुषार्थ है ॥30॥
तन्निष्फलौ नार्हसि कर्तुमेतौ पीनौ भुजौ चापविकर्षणार्हौ।
मान्धातृवज्जेतुम इमौ हि योग्यौ लोकानपि त्रीनिह किं पुनर्गाम् ॥१०.३१
इसलिए धनुष खींचने योग्य इन मोटी भुजाओं को आपको निष्फल नही करना चाहिएय क्योंकि मान्धाता
के समान ये तीनों लोक जीतने योग्य हैं, फिर इस पृथ्वी का क्या कहना ॥31॥


54 अश्वघोष