बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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६६२ | बृहत्संहिता
| श्लोकांशाः | पृष्ठाङ्काः | श्लोकांशाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| स्त्रीसंज्ञा भासभषक | ३९२ | स्रोतस्तडागभेदैकपुत्रकः | ४२६ |
| स्थलसलिलचराणां | ४९२ | स्वकाले गिरितोयस्थाः | ३८५ |
| स्थानकल्प्यधनहा दशर्क्षग- | ५९५ | स्वजनविभवजीवितक्षयं | ३५५ |
| स्थानभ्रंशात् कार्यविधाताच्च | ५९२ | स्वल्पं पयः स्रवति | ५६८ |
| स्थानेऽष्टमे गुरुबुधौ | ५७० | स्वल्पवक्त्ररुहमत्कुणषण्ढान् | १९८ |
| स्थापकदैवज्ञद्विजसभ्यस्थपतीन् | १६५ | स्वैरङ्गुलप्रमाणैर्द्वादश | १३८ |
| स्थिरप्रदेशोपलमन्दिरेषु | ४९६ | हंसकारण्डवक्रौञ्च | १२२ |
| स्थूलशकृन्मणिभृङ्गः | १७० | हनुलोचनबाहुनासिकाः | २३३ |
| स्थूलाभिर्धनरहिता | २१६ | हयनरभुजगोष्ट्रद्वीपिसिंहर्क्ष | ४२५ |
| स्थूलास्थिरस्थिसारो | २४० | हरितमणिमहीसुगन्धीनि | ६१९ |
| स्नातामभुक्तवस्त्रां | १६४ | हरिणाक्षा मण्डललोचनाश्च | २२६ |
| स्निग्धः प्रभानुलेपी | ३६७ | हरीतकीशङ्खनद्रवाम्बुभिः | ३१३ |
| स्निग्धतरूणां याम्ये | ९८ | हर्म्यपृष्ठमुडुनाथरश्मयः | ३०३ |
| स्निग्धत्वक्का धनिनो | २३९ | हर्म्यप्रासादमङ्गल्य | ३८५ |
| स्निग्धद्विजत्वङ्नखरोम | २३६ | हलमुशलगदासिशङ्खचक्र | २५३ |
| स्निग्धद्विजस्य सन्दर्शनं | ४११ | हसितं शुभदमकम्पं | २२९ |
| स्निग्धाः प्रलम्बशाखा | ८६ | हस्तचतुष्के मध्यात् | ९४ |
| स्निग्धा निम्ना रेखा | २१८ | हस्तत्रयं मृगशिराः श्रवणत्रयं | ५३५ |
| स्निधा यतः पादपगुल्मवल्ल्यो | १०० | हस्तद्वात्रिंशादिषु चतुश्चतु | ९० |
| स्निग्धा सिताच्छहरिता नयना | २३६ | हस्ताङ्गुलयो दीर्घाश्चिरायुषा | २१६ |
| स्निग्धोन्नताग्रतनुताम्रनखौ | २६४ | हस्तायतं तद्द्विगुणं गभीरं | ११७ |
| स्नेहं मनोभवकृतं कथयन्ति | ३२७ | हस्तो मघानुराधा | १०८ |
| स्नेहः पञ्चसु लक्ष्यो | २४० | हस्तो मूलं श्रवणा | ५३८ |
| स्नेहो मृदुत्वं बहुवालता | २८४ | हस्त्यारोहभयं स्याद् | ४२३ |
| स्पृक्कात्वक्तगराणां | ३२० | हारीतस्य तु शब्दो | ४२९ |
| स्पृष्ट्वाऽथवालोक्य धुनोति गात्रं | ३२९ | हुंहुंगुग्लुगिति प्रियमभिलषन् | ४३५ |
| स्फटिकरजतवर्णो नीलराजी | १८० | हृदयं समुन्नतं पृथु | २१३ |
| स्फुटवाग्व्यसनी रिपुहा | ५६१ | हौतभुजं सविशाखं मृदुतीक्ष्णं | ५३४ |
| स्रग्गन्धधूपाम्बरभूषणाद्यं | ३१० | ह्रस्वयातिनिःस्वता | २७३ |