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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 661, कुल 760 में से

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पृष्ठ 661

अथोपसंहाराध्यायः
अथोपसंहाराध्यायो व्याख्यायते। तत्रादावेव शास्त्रमत्योर्माहात्म्यमाह—
ज्योतिःशास्त्रसमुद्रं प्रमथ्य मतिमन्दराद्रिणाऽथ मया।
लोकस्यालोककरः शास्त्रशशाङ्कः समुत्क्षिप्तः ॥१॥
मैंने (वराहमिहिर ने) बुद्धिरूप मन्दराचल के द्वारा ज्योतिष शास्त्ररूप समुद्र का
अच्छी प्रकार से मन्थन करके संसार को प्रकाशित करने वाले शास्त्ररूप चन्द्र को बाहर
निकाला है॥१॥
ज्योतिःशब्देन प्रधाननक्षत्राण्युच्यन्ते। ज्योतिषां शास्त्रं ज्योतिःशास्त्रम्। तदेव दुर्विज्ञेय-
त्वात् समुद्रं सागरम्। मतिमन्दराद्रिणा, मतिर्बुद्धिरेव मन्दरः पर्वत:, तेन मतिमन्दराद्रिणा
प्रमथ्य निर्मथ्य लोकस्य जगतः आलोककरः प्रकाशकरः, शास्त्रशशाङ्कः शास्त्रचन्द्रः
समुत्क्षिप्त उद्धृतः॥१॥
अन्यत् प्रतिपादयितुमाह—
पूर्वाचार्यग्रन्था नोत्सृष्टाः कुर्वता मया शास्त्रम्।
तानवलोक्येदं च प्रयतध्वं कामतः सुजनाः ॥२॥
इस शास्त्र को बनाते हुये मैंने पूर्वाचार्यकृत ग्रन्थों के आशयों को नहीं छोड़ा है।
अतः उन पूर्वाचार्यकृत ग्रन्थों को और इस शास्त्र को यत्नपूर्वक देखकर पण्डितों को
प्रयत्न करना चाहिये अर्थात् जो अच्छा हो, उसको ग्रहण करना चाहिये॥२॥
पूर्वोक्तानि यानि शास्त्राणि तानि न सन्त्यक्तानि। तान्येव दृष्ट्वा सर्वथा संक्षेपेण
सुवृत्तैः कृतम्। तान् पूर्वाचार्योक्तान् इदं मदीयं च शास्त्रमवलोक्य दृष्ट्वा कामतो यथेच्छं
सुजनाः साधवो बुधाः प्रयतध्वम्। यच्छोभनं तदेव ग्राह्यमित्यर्थः ॥२॥
अधुना सज्जनानां दुर्जनानाञ्च चेष्टितमाह—
अथवा कृशमपि सुजनः प्रथयति दोषार्णवाद् गुणं दृष्ट्वा।
नीचस्तद्विपरीतः प्रकृतिरियं साध्वसाधूनाम् ॥३॥
अथवा सुजन मनुष्य दोषरूप समुद्र में थोड़ा-सा भी गुण देखकर उसका विस्तार
करते हैं; परन्तु नीच पुरुष इससे विपरीत स्वभाव का होता है अर्थात् गुणों को छिपाता
है और स्वल्प दोष का भी विस्तार करता है। यही साधु (सज्जन) और असाधु
(दुष्ट) का लक्षण है॥३॥
अथवा सुजनः प्रधानजनो दोषार्णवाद् दोषसागरात् कृशमपि स्वल्पमपि गुणं दृष्ट्वा
तमेव प्रथयति प्रख्यापयति, दोषान् प्रच्छादयति। नीचस्तद्विपरीत इति। नीचो गुणसागरात्
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