बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः ३१
रेखा खींचकर चौंसठ पद का क्षेत्र बनाना चाहिये )। फिर इसके चारो कोनों में
कर्णाकार दो-दो रेखायें खींचने से यह क्षेत्र बन जाता है। इस क्षेत्र में चार पदों का
स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के चारो कोनों में आठ देवता ( आप, आपवत्स, सविता,
सवित्र, इन्द्र, जयन्त, राजयक्ष्मा और रुद्र ) और बाहर के चारो कोनों में आठ देवता
( शिखी, अन्तरिक्ष, अनिल अथवा अनल, मृग, पिता, पापयक्ष्मा, रोग और दिति )
अर्धपदीय हैं। इनके दोनों तरफ पर्जन्य, भृश, पूषा, भृङ्गराज, दौवारिक, शोष, नाग और
अदिति सार्धपदीय ( डेढ़ पद के स्वामी ) हैं तथा शेष बीस देवता ( जयन्त, इन्द्र,
सूर्य, सत्य, वितथ, बृहत्क्षत, यम, गन्धर्व, सुग्रीव, कुसुमदन्त, वरुण, असुर, मुख्य,
भल्लाट, सोम, भुजग, अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर—ये बीस देवता )
द्विपदीय हैं।
विशेष—यहाँ पर केवल चतुरस्र क्षेत्र में वास्तु नर का प्रदर्शन किया गया है;
किन्तु वृत्त, त्रिकोण, षट्कोण आदि आकृति वाले भी गृह, ग्राम, नगर आदि देखे जाते
हैं। अतः वृत्त, त्रिभुज आदि में किस प्रकार वास्तु नर का स्थापन करना चाहिये, इसको
ग्रन्थान्तरों में इस प्रकार कहा गया है—
वृत्त में इक्यासी पद वाले वास्तु नर का स्थापन-क्रम—इक्यासी पद वाले
वृत्तक्षेत्र में पाँच वृत्त बनाकर उनमें बाहर के दो वृत्तों में बत्तीस-बत्तीस पद, तीसरे में
बारह पद, चौथे में चार पद और पाँचवें में केवल एक पद बनाना चाहिये। यहाँ मध्य
के पाँच पद में ब्रह्मा, बाहर के दोनों वृत्तों में दो-दो पद वाले शिखी आदि बत्तीस देवता
और अर्यमा आदि चार देवता तीन-तीन पदों में लिखे जायेंगे। इस प्रकार वृत्तक्षेत्र में
इक्यासी पद के वास्तु नर का स्थापन हो जाता है।।५५-५६।।
त्रिभुज में इक्यासी पद वाले वास्तु नर का स्थापन-क्रम—इक्यासी पद
वाले त्रिभुजाकार वास्तु नर क्षेत्र में पाँच त्रिभुज बनाकर उसके प्रथम भाग में दोनों
कोनों को छोड़ कर पूर्व दिशा की भुजा का आठ भाग करे और अन्य दो भुजाओं के
बारह-बारह भाग करे। तीनों कोनों में दिति, वायु और वरुण का स्थापन करे। फिर
प्रथम भाग के शेष पदों में शिखी आदि देवताओं का स्थापन करे। इसी तरह द्वितीय
भाग में भी पूर्वोक्त शिखी आदि देवताओं का स्थापन करे तथा इस भाग के तीनों कोनों
पर भी प्रथम कोण-स्थित देवताओं का स्थापन करे और शेष पदों में वास्तुकोष्ठस्थित
शेष देवताओं का स्थापन करे। तृतीय भाग में तीनों दिशाओं में चार-चार पद बना कर
उनमें प्रदक्षिणक्रम से अर्यमा, सवित्र, सविता, विवस्वान्, इन्द्र, मित्र, जय, हर, राज-
यक्ष्मा, भूमिधर, आप और आपवत्स का स्थापन करे। चतुर्थ ( मध्य ) भाग के पाँच
पदों में ब्रह्मा का स्थापन करे। इस प्रकार त्रिभुज क्षेत्र में इक्यासी पद के वास्तु नर का
स्थापन हो जाता है।
वृत्त में चौंसठ पद वाले वास्तु नर का स्थापन-क्रम—चौंसठ पद वाले वृत्ताकार
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