बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरणगुणाध्यायः ५५१
इदानीं संक्षेपेणावसरप्राप्तं विवाहपटलमाह—
रोहिण्युत्तररेवतीमृगशिरोमूलानुराधामघा-
हस्तस्वातिषु षष्ठतौलिमिथुनेषूद्यत्सु पाणिग्रहः ।
सप्ताष्टान्त्यबहिःशुभैरुडुपतावेकादशद्वित्रिगे
क्रूरैस्त्र्यायषडष्टगैर्न तु भृगौ षष्ठे कुजे चाष्टमे ॥७॥
दम्पत्योर्द्विनवाष्टराशिरहिते चारानुकूले रवौ
चन्द्रे चार्ककुजार्किशुक्रवियुते मध्येऽथवा पापयोः ।
त्यक्त्वा च व्यतिपातवैधृतिदिनं विष्टिं च रिक्तां तिथिं
क्रूराहायनपौषचैत्रविरहे लग्नांशके मानुषे ॥८॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां करणगुणो
नाम शततमोऽध्यायः ॥१००॥
रोहिणी, तीनों उत्तरा, रेवती, मृगशिरा, मूल, अनुराधा, मघा, हस्त और स्वाती
नक्षत्रों में; कन्या, तुला और मिथुन लग्नों में एवं सप्तम, अष्टम और द्वादश स्थानों से
भिन्न स्थानों में शुभ ग्रह हों, एकादश, द्वितीय या तृतीय स्थानों में चन्द्र हो, तृतीय, षष्ठ
और एकादश में पाप ग्रह हों तथा षष्ठ में शुक्र और अष्टम में मंगल न हो तो विवाह शुभ
होता है। वर, कन्या दोनों में से किसी एक की राशि से दूसरे की राशि दूसरी, नवीं और
आठवीं न हो अर्थात् द्विर्द्वादश, नवमपञ्चम और षट्काष्टक राशि से रहित राशि हो, सूर्य
चारानुकूल ( तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश स्थान में स्थित ) हो, सूर्य, मंगल, शनि
या शुक्र से वियुत या दो पापग्रहों के मध्य में चन्द्र हो तथा व्यतिपात और वैधृति योग,
विष्टि करण, रिक्ता तिथि, पाप वार, क्रूरायन ( दक्षिणायन ), चैत्र और पौष मास—इन
सबों को छोड़ कर मानुष ( द्विपदसंज्ञक लग्न = मिथुन, कन्या और तुला ) में विवाह
शुभ होता है। यहाँ पर पौष और चैत्र मास का निषेध कर रहे हैं; किन्तु दक्षिणायन में ही
पौष को होने के कारण दक्षिणायन के निषेध से ही पौष का निषेध हो जाता है; फिर पौष
का निषेध क्यों किया? यहाँ आचार्य का अभिप्राय यह है कि दक्षिणायन में स्थित
कार्त्तिक और मार्गशीर्ष में विवाह करना चाहिये; लेकिन उत्तरायन में स्थित चैत्र में
विवाह नहीं करना चाहिये॥७-८॥
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां करणगुणाध्यायः शततमः ॥१००॥
रोहिण्युत्तररेवतीति । रोहिणी। उत्तरत्रयम्। उत्तरफल्गुन्युत्तराषाढोत्तरभद्रपदा चेति।
रेवती। मृगशिरः। मूलम्। अनुराधा। मघा। हस्तः। स्वातिः। एतेषु नक्षत्रेषु पाणिग्रहो विवाहः
कार्यः। तथा षष्ठतौलिमिथुनेषूद्यत्सु । षष्ठः कन्या। तौली तुलः। मिथुनः प्रसिद्धः । एते-
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA